मंगलवार, 30 जून 2015

पागलपन की डिग्री

जी हां, मेरे कने 'पागलपन की डिग्री' है! यों, यह डिग्री- आंशिक या बहुतायत में- हममें से हर किसी के पास होती है। किंतु कुछ सामाजिक तो कुछ पारिवारिक भय के कारण कोई बताना नहीं चाहता। लेकिन मुझे ऐसा कोई भय नहीं। जब मंत्रियों को फर्जी डिग्री रखने पर कोई 'शर्म' नहीं तो फिर मुझे 'असली डिग्री' रखने पर क्यों हो?

पागलपन की डिग्री भीड़ में पाई जाने वाली फर्जी डिग्रियों से कहीं बेहतर नजर आती है। इस डिग्री से कम से कम शैक्षिक-प्रतिबद्धताएं तो नहीं जुड़ी हैं। न ही कागज-पत्तर के रूप में इसे कहीं दिखाने की जरूरत है। पागलपन की डिग्री का सीधा-साधा संबंध आपकी आदतों और व्यवहार से है। मुझे इस बात का फख्र है कि मेरी आदतें और व्यवहार पागलपन से काफी तक हद मेल खाती हैं। यही नहीं पागलपन के कुछ अंश मेरे लेखन में भी मौजूद हैं। सही कहूं, इस पगलाई दुनिया पर पागल होकर लिखने में जो आनंद है, वो बुद्धिजीवि या ज्ञानी होकर लिखने में नहीं।

पागल होना समझदारों के लिए बेशक 'बेअक्ली' का प्रतीक होगा किंतु मेरे तईं 'वरदान' है। कम से कम मुझ पर इस-उस के 'बौद्धिक-वाद' का 'बोझ' नहीं है। बौद्धिक आदमी कई दफा जिन बातों को कहने से डरता है, पागल उन्हें 'बिंदास' कह-बोल डालता है। इसी पागलपन ने मुझे इत्ता 'बोल्ड' बनाया है। नहीं तो अब तलक मैं भी बौद्धिकता के लिहाज के चक्कर में निपट लिया होता।

पागलपन की डिग्री पाना इत्ता सहज-सरल नहीं होता है। लगातार पागलों के बीच उठना-बैठना पड़ता है। उन जैसी हरकतें करनी पड़ती हैं। उन जैसा दिमाग पाना होता है। सीधे रास्ते पर नहीं हमेशा उल्टे रास्ते चलकर मंजिल को अपने कब्जे में करना होता है। पागल कभी किंतु-परंतु के चक्कर में नहीं पड़ता। हमेशा जैसे तो तैसा वाली स्थिति में रहता है। बुद्धिजीवि भले ही दो का पांच कर ले मगर पागल दो को दो ही रहने देता है। दुनियाभर के सच पागलों के आगे 'पनाह' मांगते हैं।

सबसे राहत की बात मेरे साथ यह रही कि मुझे पागलपन की डिग्री लेने के लिए दिल्ली-बंबई नहीं जाना पड़ा। पागलखाना मेरे शहर में ही मौजूद है। यहां तो दूसरी जगह के लोग पागलपन की डिग्री पाने के लिए भर्ती होते हैं। कुछ अंत तक डटे रहते हैं तो कुछ बीच में छोड़कर ही भाग जाते हैं। पागलपन की डिग्री पाना इत्ता आसान थोड़े न है पियारे।

दुनिया या मेरे परिवार वाले भले ही मुझे पागल समझकर मेरा मजाक उड़ाएं, मेरी सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ता। उन्हें क्या पता, पागल होने में जो आनंद है, वो समझदार बने रहने में नहीं। फिर जिसके कने पागलपन की डिग्री हो, उसकी तो बात ही निराली है।

बिन पगलाए आप इस दुनिया-समाज को समझ ही नहीं सकते। सबकुछ (अपवादों को छोड़के) यहां फर्जी है, डिग्री से लेकर रिश्ते तक। ऐसे में अगर मेरे पास पागलपन की ओरिजनल डिग्री है तो कैसी शरम।

शुक्रवार, 26 जून 2015

पत्नी और इमरजेंसी

पत्नी ने मुझ पर 'अघोषित इमरजेंसी' लगा रखी है। न.. न.. हंसिए नहीं। यह सच है। न मुझे घर से बाहर जाने और न ही पड़ोस में झांकने की इजाजत है। दिनभर घर की चार-दीवारी में ही कैद रहता हूं। यहां तक कि मेरे लेखन पर भी पाबंदी-सी लगा दी गई है। मुझे केवल पत्नी पर कविताएं लिखने की छूट मिली हुई है। व्यंग्य लिखना तो क्या, उसके बारे में सोच तक नहीं सकता। यह टुकड़ा मैं काफी छिप-छिपाकर लिख पा रहा हूं।

पता नहीं किस करमजले ने पत्नी के कान में यह फूंक दिया कि मेरा पड़ोस की लड़की से 'चक्कर' चल रहा है। पत्नी ने मुझसे न कुछ पूछा, न गछा बस साफ-सीधे शब्दों में कह दिया, अगर घर के बाहर कदम रखा या पड़ोस में झांका भी तो टांगे और आंखें दोनों की 'छंटनी' करवा दूंगी। जो भी करना है, घर में करो। लड़कियां देखने का इत्ता ही शौक है तो पड़ोस की दुकान से सीडीयां मंगवाए देती हूं। जो देखना है, घर में ही देखो।

तब से न जाने कित्ती दफा पत्नी को समझा चुका हूं कि मेरा पड़ोस की किसी लड़की से कोई चक्कर-वक्कर नहीं चल रहा। जो कुछ चल रहा है, केवल तुम्हीं से चल रहा है। लेकिन पत्नी मानने को राजी ही नहीं। उलटा धमकी और दे देती है, कोतवाली में जाने की। जग-हंसाई के कारण कुछ बोल भी तो नहीं सकता। घर में नजरबंद हूं। इमरजेंसी का डंडा चौबीस घंटे मेरी खोपड़ी पर तना रहता है। जो काम यानी कविता लिखने का जिंदगी में कभी नहीं किया, पत्नी के हुकम के आगे वो भी करना पड़ रहा है। सच बताऊं, पत्नी पर कविता लिखना इमरजेंसी की यातना से कहीं ज्यादा कठोर काम है। फिर भी कर रहा हूं। क्योंकि दो वक्त की रोटी का सवाल जो है पियारे।

साथ-साथ यह स्पष्ट करना 'अत्यंत जरूरी' है कि मेरा पड़ोस तो क्या पड़ोसी देश की किसी लड़की से कोई चक्कर-वक्कर नहीं चल रहा। अरे, मैं तो लड़कियों की तरफ ढंग से आंख उठाकर देखता तक नहीं। मैं उस रास्ते को छोड़ देना पसंद करता हूं, जहां से लड़कियां गुजरती हैं। आज तलक मैंने न किसी लड़की को प्रेम-पत्र लिखा है, न ही कविता। मुझे तो यह तक नहीं मालूम रहता कि मेरे पड़ोस में कौन-सी और कैसी लड़की रह रही है।

तिस पर भी पत्नी को मुझ पर 'शक' है कि मेरा पड़ोस की लड़की से चक्कर है। अव्वल तो है नहीं अगर होता भी तो क्या अपनी पत्नी को नहीं बतलाता! यों भी, मैं कभी कोई (व्यक्तिगत या पारिवारिक) बात पत्नी को बताना नहीं भूलता! क्या करूं, मेरे पेट में बात पचती ही नहीं।

दरअसल, पत्नी भी न थोड़े 'पुराने ख्यालों' की है। आजकल के जमाने में भला ऐसा कौन-सा पति-पत्नी होंगे, जिनका एकाध जगह चक्कर-शक्कर न चल रहा हो! आज के जमाने में इससे या उससे चक्कर चलना तो 'स्टेटस-सिंबल' समझा जाता है। लाइफ में जिसका किसी से चक्कर नहीं चलता, उसे 'उदासीन' टाइप समझा लिया जाता है। पृथ्वी भी तो किसी न किसी चक्कर पर ही घूम रही है न। देखिए, कित्ती मस्त है।

पत्नी को तो 'शुक्र' मनाना चाहिए कि मैं दुनिया का इकलौता पति हूं, जिसका किसी से कोई चक्कर नहीं चल रहा। वरना तो दुनिया में कैसे-कैसे पति भरे पड़े हैं।

फिलहाल, यह तो नहीं मालूम कि मुझे पत्नी की इमरजेंसी से कब मुक्ति मिलेगी पर दुआ जरूर कर रहा हूं कि पत्नी के भरे गए कान जल्द ही खाली हों। ताकि हमारे जीवन में खुशियां पुनः लौट सकें।

सोमवार, 22 जून 2015

ललित मोदी का दिमाग

ऐसा नहीं है कि 'गर्मी' केवल आम आदमी को ही लगती है, सरकार और नेताओं को भी बराबर लगती है। मगर नेताओं को 'सियासी गर्मी' ही ज्यादा लगती है। सियासी तापमान के हिसाब से उनका 'पारा' भी चढ़ता-उतरता रहता है।

अब देखिए न, बीच में न जाने कहां से आन टपके श्रीमान ललित मोदी ने सरकार और नेताओं के तापमान को इस कदर बढ़ा दिया है कि न पसीना पोछते बन रहा है, न सुखाते। छोटे-मोटे विवादों और मसलों को छोड़कर सरकार के भीतर-बाहर सबकुछ 'टनाटन' (!) चल रहा था मगर ललित मोदी के प्रकरण ने सब 'मटियामेट' करके रख दिया। सरकार के साथ मुसीबत यह लग गई है कि वो जवाब क्या और कैसे दे? विदेश मंत्री को बचाए या मुख्यमंत्री को?

ऊपर से विपक्ष ऐसे पीछे पड़ा है, जैसे गाय के पीछे शेर। इधर भागते हैं तो 'खाई' है, उधर भागते हैं तो 'दरवाजा बंद'। बीच में लटके हुए हैं। लटक कर ही जवाब दे रहे हैं, जो भी बन पड़ रहा है। नेता लोगों को अभी एक मोदीजी के बचाव में ही आगे आना पड़ता था, अब दो-दो हो गए हैं। दुविधा में हैं, किसको छोड़ें और किसको पकड़ें।

लेकिन साहब 'दाद' देनी पड़ेगी श्रीमान ललित मोदी के 'दिमाग' की भी। कहना पड़ेगा कि श्रीमान मोदी का दिमाग तो चाचा चौधरी के दिमाग से भी तेज चलता है। मियांजान एक ही तीर से जाने कित्ते-कित्ते शिकार किए बैठे हैं। आइपीएल का तो मजा लिया ही, साथ-साथ सियासत और नेताओं के साथ संबंध खूब गहरे किए। मियांजान कने कुछ नेताओं की टनाटन 'पोल-पट्टी' भी है। अगर खोल दें तो बैठे-ठाले 'भूचाल' आ जाए। वैसे कुछ के साथ तो यह आ भी चुका है।

विदेश मंत्री ने अच्छा 'मानवीयता' का रिश्ता निभाया कि अगला 'गले' ही पड़ गया। मानवीयता के रिश्ते ने विवाद का रूप धारण कर लिया। विवाद भी ऐसा कि लगता नहीं इत्ती आसान से पीछा छोड़ेगा। यानी, सियासत में अब तो किसी के भी प्रति मानवीयता का रिश्ता रखना या निभाना ही खुद की गर्दन फंसाने जैसा हो गया है पियारे।

ललित मोदी ने यह तो साबित कर ही दिया कि मियां शुरू से ही 'ऊंचा खेल' खेलने के 'शौकिन' रहे हैं। तब ही तो आइपीएल से लेकर सियासत के मैदान तक पर छक्के ही छक्के जड़ते रहे। संबंध भी इत्ते ऊंचे-ऊंचे बनाए कि आसानी से कोई हाथ भी डाल सके। वाह! इसे कहते हैं, जिंदगी को मस्त ऊंचाईयों के साथ जीना। बाद में अंजाम चाहे जो हो पर वर्तमान को तो भरपूर जी ही लो। है कि नहीं।

कहना न होगा, योग दिवस के साथ-साथ ही ललित मोदी ने सरकार और नेताओं को जमकर योगा करवा दिया। योग करवा-करवा करके हालत इत्ती पतली कर डाली कि हर वक्त खिले रहने वाले चेहर भी फिलहाल 'मुरझाए' हुए से हैं।

हालिया सीन देखकर तो यही लग रहा है कि सरकार और नेताओं को मोदी-प्रकरण में अभी कुछ दिन और यों ही हिलगे रहना होगा। मामला इत्ता बढ़ चुका है कि समाधान का रास्ता कम ही नजर आता है। विपक्ष और बुद्धिजीवियों को भी मसाला हाथ लग गया है अपनी भड़ास निकालने का। सो मजे से निकाल रहे हैं।

पर मुझे क्या...। चाहे ललित मोदी का मामला हो या मैगी-डिग्री का, मुझे तो 'मनोरंजन' का स्वाद चखने से मतलब। सो चख रहा हूं। आप भी चखें। खाली-पीली दिमाग का दही न बनाएं। क्योंकि मनोरंजन में ही जिंदगी का हर सुख छिपा है।

बुधवार, 17 जून 2015

चलो, योग का विरोध करें

सोच रहा हूं, या तो योग करना बंद कर दूं या फिर मोहल्ला ही छोड़ दूं। दरअसल, अपने मोहल्ले में एक अकेला मैं ही गैर-प्रगतिशील व गैर-वामपंथी हूं। बाकी मोहल्ले में एक से बढ़कर एक प्रगतिशील और वामपंथी मौजूद हैं। चूंकि वे प्रगतिशील वामपंथी हैं इसलिए वे योग न कर केवल मार्निंग वॉक पर जाया करते हैं। योग उनके तईं हिंदूत्ववादी और मार्निंग वॉक धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है।

अक्सर मैंने देखा है, जब भी मैं योग करने बैठता हूं, मेरे आजू-बाजू के वाम-प्रगतिशील मुझे 'हिकारत' भरी निगाह से देखते हैं। योग कर न जाने मैं ऐसा कौन-सा 'पाप' कर रहा होता हूं, जो उनकी निगाह में 'सांप्रदायिक' किस्म का है। 'सूर्य नमस्कार' से उन्हें 'चिढ़' है लेकिन 'सूर्य' से बहुत प्यार। सूर्य पर क्रांतिकारी किस्म की कविताएं भी लिखी हैं उन्होंने। उनकी निगाह में केवल वही ठीक है, जो वे करते या कर रहे हैं। लेकिन वही काम अगर कोई दूसरा करे तो तुरंत 'पिछड़ा' या 'गैर-प्रगतिशील' घोषित कर देते हैं।

इधर जब से 'योग दिवस' मनाने पर विवाद बढ़ा है, वाम-प्रगतिशीलों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। आजकल वे अखबारों-पत्रिकाओं में कम सोशल नेटवर्किंग पर अधिक सक्रिए हो गए हैं, इसके खिलाफ लिखने-बोलने में। तर्क भी ऐसे-ऐसे पेश कर रहे हैं, कभी-कभी तो मेरा माथा ही चकरा जाता है। एक-दो बार तो मैं बेहोश होते-होते बचा हूं।

उनके अनुसार योग से कोई खास फायदा नहीं होता। योग केवल एक धर्म विशेष की विशेषताओं को आगे बढ़ाने का काम करता है। बहुत से ऐसे प्रगतिशील हैं, जो योग इसलिए नहीं करते, कहीं उन्हें धर्म विशेष का पिछलग्गू न मान-समझ लिया जाए। यों भी, वाम-प्रगतिशीलों में 'ऐंठ' गजब की होती है। पूरी रस्सी जल जाने के बाद भी।

इत्ते साल मुझे योग करते हो गए लेकिन एक बार भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मैं किसी धर्म या जाति विशेष का कोई काम कर रहा हूं। योग मेरे लिए महज खुद को 'स्वस्थ' रखने की एक सार्थक प्रक्रिया है। जिसे करने में मुझे शांति और स्फूर्ति का एहसास होता है। मगर योग कब में सांप्रदायिक हो गया, ये मुझे आज तलक समझ नहीं आया।

योग पर वाम-प्रगतिशीलों द्वारा इत्ती आपत्तियां रखने का कारण कहीं उनका हर समय 'खाली' रहना तो नहीं? जब से सत्ता परिवर्तन हुआ है, वाम-प्रगतिशीलों की 'बेचैनियां' इस कदर बढ़ गई हैं, बिचारे दिन-रात मोदी-हिंदू-हिंदुत्व-बाबा का ही नाम जपते रहते हैं। अपने लिखे पुराने-धुराने लेखों के हवाले देते रहते हैं कि देखो हमाने हिंदू-हिंदुत्व के खिलाफ कित्ता-कित्ता लिखा है। लेकिन उससे क्या होता है पियारे। समय के साथ जो नहीं बदलता, उसे एक न एक दिन 'हाशिए' पर जाना ही होता है। आजकल ठीक ऐसी ही स्थिति में वाम-प्रगतिशील हैं। खाली है। खास काम कोई पास है नहीं तो चलो योग के बहाने की अपनी घिसी-पिटी प्रगतिशीलता जनता को दिखला दी जाए।

योग के भीतर जाति-धर्म-संप्रदाय के सूत्र तलाशना वाकई दुखद है। योग पर अगर विश्वास करते हैं तो करें। नहीं करते हैं न करें। किसी बाबा या नेता ने 'जोर' देकर कोई थोड़े न कहा है कि अगर हिंदुस्तान में रहना है तो योग करना ही पड़ेगा। आपकी मर्जी।

मेरे योग करने को लेकर मेरे पड़ोसी वाम-प्रगतिशल मेरे प्रति चाहे जो धारणाएं बना लें, मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मैं कल भी योग कर रहा था। आज भी कर रहा हूं। आगे भी करता रहूंगा। मेरे तईं योग जीवन का अहम हिस्सा है।

फिर भी, जिनको योग पर 'बमचक' मचाने का शौक है, शौक से मचाएं। जिन्हें योग करना है, भला कौन-सा रुकने वाले हैं।

मंगलवार, 16 जून 2015

जिंदगी और स्टेटस

सोशल नेटवर्किंग का दायरा क्या बड़ा, जिंदगी अब 'स्टेटस' सरीखी हो गई। अब सबकुछ स्टेटस से मैनीज हो रहा है। कौन, कब, कहां, क्या खा रहा है, क्या पी रहा है, क्या सोच रहा है, क्या देख रहा है, सबकुछ स्टेटस पर अपडेट हो रहा है। एक के बाद एक स्टेटस इत्ती जल्दी-जल्दी अपडेट हो रहे हैं कि ध्यान ही नहीं रहता कुछ सेकेंड पहले किसने, क्या स्टेटस अपडेट किया था। स्टेटस का मकड़जाल इत्ता घना है कि बच पाना मुश्किल।

दिमाग का कमाल देखिए। कित्ती तेजी से कित्ते-कित्ते स्टेटस क्षण भर में सोच लेता है। जहां रवि पहुंचे न कवि पहुंचे का जुमला बदलकर अब जहां न रवि पहुंचे न कवि वहां स्टेटस पहुंचे हो गया। घटना के घटने भर की देर है और स्टेटस पर स्टेटस सोशल नेटवर्किंग पर हाजिर हैं। वन-लाइनर स्टेटस ने तो चुटकुले और व्यंग्य की परिभाषा ही बदलकर रख दी है। लंबे-लंबे व्यंग्य पढ़ने में अब उत्ता दिल नहीं लगता, जित्ता वन-लाइनर स्टेटस को पढ़ने में लगता है। गौरतलब है, फेसबुक से कहीं उम्दा वन-लाइनर स्टेटस टि्वटर पर लिखे जा रहे हैं। ऐसे-ऐसे फन्नी स्टेटस कि मुस्कुराए बिन रहा न जाए।

बंदा अब किसी के लीविंग स्टेटस पर ध्यान कम फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस पर ज्यादा देता है। स्टेटस बता देता है सामने वाले बंदे का मेंटल-लेवल क्या है। अभी हाल कहीं पढ़ा था कि अब बॉस लोग अपने एम्पलाइ के- काम के साथ-साथ- फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस पर ही निगाह रखा करेंगे। ताकि एम्पलाइ के दिलो-दिमाग में जो चल रहा है, पता लग सके। वो दिन दूर नहीं जब बंदे को कंपनी में नौकरी ही उसके फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस को पढ़-देखकर दी जाएगी। क्या कीजिएगा, जमाना ही इत्ता हाइ-टेक हो चला है। सब बदल रहे हैं तो कंपनियां भी क्यों न बदलें।

जिंदगी अब संघर्ष नहीं बल्कि स्टेटसमय हो गई है। जिंदगी से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात अब स्टेटस के रूप में नुमायां है। कह सकते हैं, जिंदगी को जीते रहने के लिए स्टेटस का दामन थामे रखना बहुत जरूरी है। ताकि जिंदगी को भी हमसे कोई शिकायत न रहे कि मेरे बारे में तुमने कभी कुछ अपेडेट क्यों नहीं किया।

अब तो कुछ देर खुद का या किसी और का स्टेटस अपडेट होते हुए न दिखे तो मन ही मन भय सा पैदा होने लगता है कि कहीं कोई बात तो नहीं। स्टेटस अपडेट होते ही इत्ता सुकून मिलता है मानो घर बैठे जनत मिल गई हो। मैंने तो लोगों को सुबह-सुबह अपने 'फारिग' होने का स्टेटस अपडेट करते भी देखा है। जरूरी नहीं स्टेटस 'टेक्स' करके ही अपडेट किया जाए, 'सेल्फी' ही काफी है। हर बात, हर मूमेंट की 'सेल्फी' अब हमारी जरूरत है।

मैंने तो सोच रखा है, जिस दिन मैं इस दुनिया-जहां से अंतिम विदाई ले रहा होऊंगा, पहले स्टेटस ही अपडेट करूंगा। ताकि स्वर्गलोक में बैठे यमराज को भी पता लग जाए कि बंदा आने को है। और मुझे लाने की अतिरिक्त तैयारियां भी उन्हें न करनी पड़ें। सुना है, अब तो स्वर्गलोक में भी सोशल नेटवर्किंग का इस्तेमाल जोर-शोर से होने लगा है!

जिंदगी और स्टेटस एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। दोनों यों ही जुड़े रहें ताकि स्टेटस का स्टैंडर्ड बना रहे।

सोमवार, 15 जून 2015

डिग्री की मुसीबत

पियारे, 'फर्जी' तो छोड़ो मेरे कने 'ओरिजनल डिग्री' भी नहीं है। डिग्री लेने की कभी 'जरूरत' ही महसूस नहीं हुई। न कभी इस लायक पढ़ाई ही की, कि डिग्री मिलने पर कुछ 'गर्व' टाइप फील हो। एग्जाम दे दिया। पास हो गए। नई क्लास में आ गए। बात खत्म।

यों भी, डिग्री की जरूरत तो उन्हें पड़ती है, जिन्होंने पढ़ाई-लिखाई के क्षेत्र में ऊंचे-ऊंचे झंडे गाड़े हों। देश के साथ-साथ अपने इलाके का नाम 'रौशन' किया हो। जिन पर न केवल परिवार बल्कि देश को भी गर्व हो। लेकिन मैंने मेरी पढ़ाई के साथ ऐसा कुछ नहीं किया। 'इजी टू गेट' के हिसाब से सबकुछ 'स्मूथली' चलता रहा। फिर भला मुझे डिग्री की क्या दरकरार?

बता दूं, बिन डिग्री मैंने कुछ कम झंडे नहीं गाड़े हैं। पढ़ाई में भले ही 'अव्वल' न रहा हूं किंतु लेखन के मामले में अपना और अपने शहर का नाम 'रौशन' कर ही रहा हूं। कईयों ने मुझसे पूछा भी है कि क्या आपके पास लेखन-वेखन की कोई डिग्री है? मैंने साफ मना कर दिया, न जी न मेरे कने लेखन-वेखन की कोई डिग्री नहीं, बस संपादकों की किरपा-दृष्टि है। उन्हीं के सहारे गाड़ी टॉप-गेयर में चल रही है। रही-सही कसर, मेरी कलम पूरी कर दे रही है।

दरअसल, डिग्री के साथ किस्म-किस्म के 'लफड़े' हैं। डिग्री हो तो मुसीबत, न हो तो मुसीबत और अगर फर्जी हो तो मुसीबत ही मुसीबत। फर्जी डिग्री के मारे एक नेताजी पड़े हुए हैं न मुसीबत में। फर्जी डिग्री को ओरिजनल बताके मियां नेता तो बन गए मगर जब भंडा फूटा तो कुर्सी और इज्जत दोनों ही हाथ से गए। अब पुलिस के साथ जा-जाकर फर्जी डिग्री के ओरिजनल रहस्य का पता लगवा रहे हैं।

यह तब है जब चुनी हुई सरकार घोषित तौर पर ईमानदार है। वैसे आज के जमाने में ईमानदारी और ईमानदारियों का कोई भरोसा नहीं कब में फर्जी निकल आएं। डिग्री की तो फिर भी जांच हो सकती है लेकिन फर्जी ईमानदारी की जांच इत्ता आसान नहीं।

लगता तो ऐसा है जैसे जांचों का मौसम आया हुआ हो। मैगी से लेकर डिग्री तक की जांच चल रही है। इत्ती तत्परता अगर पहले ही बरती गई होती तो शायद ये 'नौबत' ही न आती। मगर हम तो 'जब जागे तब ही सवेरा' के चलन पर चलने वाले लोग हैं। खामखा पेन क्यों लें?

मंत्रीजी की डिग्री भले ही फर्जी निकल गई हो लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि मेरे कने डिग्री ही नहीं है। सारा झंझट ही खत्म। डिग्री लेने के लिए क्यों कॉलेज-विश्वविद्यालय को परेशान किया जाए। अब तो लोग इत्ता होशियार हो गए हैं कि आइआइएन की कथित डिग्री से काम चलाने लगे हैं। जब सबकुछ आइआइएन पर ही मिलने लगा है फिर भला ओरिजनल डिग्री का क्या करना?

एक मैं ही नहीं हर वो बंदा 'सुखी' है, जिसके कने डिग्री नहीं है। कम से कम सुकून की तो कट रही है। मंत्रीजी की तरह कोर्ट-कचहरी के चक्कर तो नहीं काटने पड़ रहे।

मुझे बिन डिग्री रहना मंजूर है मगर डिग्री के साथ रहना एक पल मंजूर नहीं। कभी कहीं पढ़ा था, डिग्री पास रहती है तो हार्ट-अटैक की संभवानाएं ज्यादा बनी रहती है। फिलहाल, मैं इन संभावनाओं से कोसों दूर हूं। 

शुक्रवार, 12 जून 2015

आत्मा की धमकी

मैं जाने-अनजाने भी कभी 'आत्मा' के चक्कर में नहीं पड़ता। आत्मा का चक्कर है ही बुरा। हर समय भय-सा बना रहता है कि आत्मा हमारे साथ कब-क्या कर जाए! सच बोलूं, मुझे जित्ता डर बीवी से नहीं लगता, उससे कहीं ज्यादा आत्मा से लगता है। आत्मा चाहे मेरी हो या किसी दूसरे की प्रयास यही रहता है कि दूर रहूं। यही वजह है कि मैं किसी भी लेखक की न आत्मकथा पड़ता हूं न ही उस पर लिखता। अगले की आत्मा कब मेरे लिखे का बुरा मान जाए, क्या पता। इसलिए इस पचड़े में न पड़ता ही बेहतर।

लेकिन इधर कुछ दिनों से मैं अजीब-सी मुसीबत में फंस गया हूं। मेरी आत्मा को यह अच्छे से मालूम है कि न मैं उससे बात करता हूं न भाव देता। फिर भी, उसकी कोशिश हमेशा मुझे रिझाने की ही रहती है। मगर मैं ऐसा कोई मौका ही नहीं आने देता।

इधर मेरी आत्मा ने मुझे अपनी 'गिरफ्त' में रखने के वास्ते एक नया पासा फेंका है। बोली है- मेरे जाने के बाद मेरा फेसबुक अकाउंट वो ही चलाया करेगी। जैसे मैं हर रोज- किसी न किसी बात या मुद्दे पर- स्टेटस अपडेट करता हूं, मेरे बाद, यह सब अब वो (आत्मा) किया करेगी। हालांकि मुझे इस बात की फिकर नहीं कि मेरे जाने के बाद मेरे फेसबुक अकाउंट का क्या होगा- रहेगा या डेड कर दिया जाएगा।

किंतु फिकर इस बात की अधिक हो रही है कि क्या मेरी आत्मा मेरे स्वभाव के मुताबिक स्टेटस डाल पाएगी? जैसे मैं सोशल मीडिया पर हर वक्त 'कूल मूड' में रहता हूं, क्या मेरी आत्मा रहेगी? सुना है, आत्मा- चाहे किसी की भी हो- बहुत गंभीर और गुस्सैल टाइप होती हैं। बर्दाशत करने की क्षमता न के बराबर होती है उसमें। कब-किसके शरीर में घुसकर, क्या हाल कर दें, क्या भरोसा।

मैं मेरी आत्मा की सारी चालें समझ रहा हूं। वो अभी से तत्पर हो ली है, मुझे रास्ते से हटाने में। मेरे तईं हर रोज कोई न कोई संकट पैदा कर ही देती है। अभी तीन-चार रोज पहले की बात है, मेरे शरीर में अंबरीश पुरी की आत्मा बनकर घुस गई। बार-बार मुझसे मोगाबो खुश हुआ, मोगाबो खुश हुआ कहलवाए जाए। और तो और मोहल्ले की जिन लड़कियों को मैंने कभी निगाह ऊंची करके नहीं देखा, उन्हें छेड़ने-छिड़वाने-उठाने तक की हरकतें कर चुकी है। अब घर वाले मय बीवी मुझ पर शक करने लगे हैं। मेरे आने-जाने, मिलने-जुलने, उठने-बैठने, खाने-पीने का हिसाब-किताब मांगने लगे हैं। कई दफा उनको समझाया कि जो दिख या हो रहा है, उसमें मैं कतई शामिल नहीं हूं, यह सब आत्मा का किया-धरा है, लेकिन कोई सुनने-समझने को तैयार ही नहीं।

अजीब मुसीबत में फंसा दिया है मेरी आत्मा ने मुझे। न निगलते बन पा रहा है, न उगलते। अभी दो दिन पहले ही धमकी दी है कि मुझे भूकंप में निपटवा देगी।

बताओ पियारे यह हाल तो तब है जब मैं किसी आत्मा-परमात्मा के चक्करों में नहीं पड़ता। दूर ही रहता हूं। यह तो उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली स्थिति हो गई।

पानी अब सिर के ऊपर से निकलता जा रहा है, तो सोच रहा हूं, एक व्यक्तिगत पत्र मार्क जुकरबर्क को लिख ही डालूं। अब मार्क ही इस मुसीबत से छुटकारा पाने का मेरा अंतिम सहारा है। कहीं मेरा फेसबुक अकांउट आत्मा के हाथों में पड़ गया तो मेरी रही-सही इज्जत भी बेइज्जत हो लेगी। जब आत्मा से दो-चार हाथ करने ही हैं तो क्यों न सीना तानकर किए जाएं। ताकि बाद में किसी प्रकार का गम या पछतावा न रह जाए। है कि नहीं...।

बुधवार, 10 जून 2015

पत्नी का बेलन

मैं भगवान से डरता हूं न शैतान से मगर 'पत्नी के बेलन' से बहुत डरता हूं। इत्ता डरता हूं, पत्नी जब रसोई में रोटी बेलती है, तब मैं घर में नहीं होता। न जाने ऐसा क्यों होता है, पत्नी को मुझ पर तब ही गुस्सा आता है, जब वो रोटी बेल रही होती है। कई दफा मैंने पत्नी के इस व्यवहार को 'अगंभीर' तौर पर लिया लेकिन जब यह 'नियम' बन गया फिर मुझे खुद को बचाना ही पड़ा। आखिर मेरी खोपड़ी की सुरक्षा मैं नहीं करूंगा तो क्या पड़ोसी आनकर करेंगे।

ज्ञात रहे, पत्नी मुझ पर गुस्सा करने का कोई अवसर नहीं छोड़ती। कई बार तो एंवई गुस्सा हो जाती है। जब कारण पूछो तो कहती है- 'मेरी मर्जी, मेरा गुस्सा।' पत्नी को अपने गुस्सा पर उत्ता ही कांट्रोल नहीं है, जित्ता नेता को अपनी जुबान पर। हालांकि पहले मैं खुद को ही सबसे अधिक गुस्से वाला समझा करता था लेकिन पत्नी के गुस्से के आगे मेरा गुस्सा भी 'फीका' पड़ गया है। पत्नी का गुस्सा मुझ पर वाया बेलन उतरता है।

सच कहूं, मेरे पास ऐसा कोई 'रिकार्ड' नहीं, जिसकी बिनाह पर मैं बतला सकूं कि अब तलक पत्नी कित्ते बेलन मेरी खोपड़ी पर तोड़ चुकी है। बेलन पत्नी तोड़ती है, खरीदकर मुझे ही लाने पड़ते हैं। ये बेलन बनाने वाले भी न, पता नहीं कौन-सी लकड़ी का इस्तेमाल करते हैं, एक दफा बेलन के खोपड़ी पर पड़ते ही दिन-रात के तारे एक साथ दिखाई पड़ने लगते हैं। अब तो मेरे पड़ोसी भी मुझसे हर हफ्ते बेलन के टूटने का सबब पूछने लगे हैं। अब उन्हें क्या बतलाऊं अपना दर्द-ए-दिल।

यों तो पत्नी को मेरी हर बात पर गुस्सा आता है। पर सबसे अधिक गुस्सा उसे मेरे लेखन पर आता है। उसका कहना है- मैं हर वक्त घर में बैठे-बैठे सिवाय पन्ने काले-पीले करने के कुछ और खास नहीं करता। होऊंगा मैं बड़ा लेखक मगर उत्ता बड़ा नहीं जित्ता खुशवंत सिंह और काफ्का थे। उसका तो साफ कहना है- मुझे लेखक न होकर हीरो या क्रिकेटर होना चाहिए था। मेरी तुलना सलमान खान से कर, ताना मारती है, एक सलमान है, जिसने अपने दम पर केस में खुद को बचा लिया और एक तुम हो जिसे मेरे अलावा बाहर तो छोड़ो पूरे खानदान में कोई नहीं जानता।

अक्सर ऐसे मुद्दों पर पत्नी से बहस मैं इसलिए नहीं करता खामखां उसका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाए और मेरी खोपड़ी एंवई काम में आ जाए। इसलिए बचता हूं, जित्ता बच सकता हूं।

हो सकता है, मेरा दर्द सुनकर आपको खूब 'हंसी' आ रही हो लेकिन मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं, दुनिया मैं शायद ही ऐसा कोई पति रहा होगा, जिसकी खोपड़ी अपनी पत्नी के बेलन से 'सुरक्षित' रही-बची हो! वैवाहिक जीवन में एक दिन ऐसा अवश्य आता है, जब पत्नी का बेलन होता है और पति का सिर। चूंकि मैं भुक्तभोगी हूं इसलिए इस दर्द को अच्छे से समझ सकता हूं। बेलन पत्नी के लिए वो हथियार है, जिसके दम पर वो पति को पल भर में काबू कर सकती है। चाहो तो आजमाकर देख लो पियारे।

मेरी खपोड़ी ने भी अब शिकायत करना छोड़ दिया है। उसे मालूम है होना-हवाना कुछ नहीं है। पत्नी के आगे भला किसकी चली है। मैंने भी खोपड़ी को समझा दिया है, झेलो जित्ता झेल सकती हो। मेरी भी 'मजबूरी' है, न मैं पत्नी से अलग रह सकता हूं न खोपड़ी को अलग कर सकता हूं।

ओह! पत्नी रसोई में रोटी बनाने पहुंच चुका है। मेरी भलाई इसी में हैं कि मैं यहां से निकल लूं। पत्नी का कोई भरोसा नहीं उसका बेलन कब, किस क्षण मेरी खोपड़ी पर आनकर 'टन्न' से बज जाए।

मंगलवार, 9 जून 2015

पत्नी और अच्छे दिन

पत्नी 'नाराज' है कि उसके अभी 'अच्छे दिन' नहीं आए हैं। ताना मारकर कहती है- 'देख लो। कुछ सबक लो। मोदीजी मात्र एक साल में ही 'अच्छे दिन' ले आए और तुम शादी के दस साल बाद भी अच्छे दिन नहीं ला पाए! अच्छे दिन लाओगे कैसे रात-दिन तो कलम-कागज में डूबे रहते हो। लेखक हो न।'

पत्नी के तानों पर अब मैं ज्यादा ध्यान नहीं देता। क्योंकि उसकी तो आदत है। मैं अच्छे दिन लाने के लिए चाहे खुद को ही क्यों न 'बेच' दूं, शिकायत उसकी फिर भी बनी रहेगी- मेरे अच्छे दिन अभी नहीं आए। इसलिए 'इग्नोर' करता हूं। इग्नोर करने के सिवाय मेरे पास चारा भी तो नहीं।

पत्नी क्या जाने मोदीजी देश में अच्छे दिन कैसे और कहां-कहां ला पाए हैं। चमकते विज्ञापनों, दमकते भाषणों और लुभावने बयानों से थोड़े न अच्छे दिन आ जाते हैं। अच्छे दिन का मतलब अच्छे दिन से होता है।

दूर क्यों जाऊं, अच्छे दिन के वायदे में एक काला धन वापस लाना भी तो था। लेकिन अभी तलक न काला धन वापस आया न खाते में 15 लाख की रकम। मैं तो इस 'उम्मीद' में बैठा था कि इधर काला धन वापस आएगा और उधर 15 लाख मेरे खाते में चढ़ जाएंगे। बाद में पता चला कि 15 लाख खाते में आने वाली बात महज 'राजनीति जुमला' थी। हकीकत से उसका कोई लेना-देना नहीं था। तो जनता ने जुमले पर ही लट्टू होकर इत्ता बड़ा एकपक्षीय बहुमत दे दिया। वाह जी वाह।

इत्ते पर भी पत्नी को यकीन है कि अच्छे दिन आ चुके हैं और बुरे दिन हवा हुए। कल ही कह रही थी- 'मोदीजी ने 'बुरे दिनों' को समाप्त कर वो महान काम किया है, जो तुम अपनी पूरी जिंदगी लगाकर भी नहीं कर पाते। मोदीजी की 'इच्छा-शक्ति' कित्ती 'स्ट्रांग' है। और तुम्हारी... न तुममें 'इच्छा' है न 'शक्ति'। बस हर वक्त बैठे-बैठे कागजों में 'प्रगतिशीलता का नगाड़ा' बजाते रहते हो। कागजों के बाहर तुम क्या हो? दुनिया 'शाब्दिक-प्रगतिशीलता' से नहीं पैसे, विकास और अच्छे दिन से चला करती है। क्या समझे...?'

क्या करूं, पत्नी की प्रत्येक 'जली-कटी' सुननी पड़ती है। न सुनूं तो रोटी का एक कौरा नसीब न हो। मेरी खाट अगले दिन घर के बाहर ही पड़ी नजर आएगी। यह दीगर बात है कि लेखक चाहे कित्ता बड़ा, कित्ता प्रगतिशील ही क्यों न हो परंतु पत्नी के आगे रहता 'भिगी बिल्ली' बनकर ही है। मजाल है जो पत्नी के कहे को काट सके।

पत्नी कहती है कि उसके अच्छे दिन नहीं आए हैं, मैं भी मान लेता हूं कि हां नहीं आएं हैं। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि न मैं मोदीजी जित्ता इच्छा-शक्तिपूर्ण हो सकता हूं न सलमान खान जित्ता ताकतवर। दुनिया-समाज के उनकी 'ठसक' है। मेरा क्या है, सिर्फ लेखक ही तो हूं। पत्नी की निगाह में तो वो भी नहीं। अगर मैं यों ही लेखक बना रहा तो कम से कम इस जन्म में तो पत्नी के वास्ते अच्छे दिन लाने से रहा। अच्छे दिन लाने के लिए हर कोण से अच्छा होना पड़ता है और वो मैं चाहकर भी नहीं हो सकता।

चलिए, अच्छा ही हुआ जो 'बुरे दिन' चले गए और अच्छे दिन आ गए। मेरा काम आसान हो गया। अब मुझे बुरे दिनों पर लिखने के लिए ज्यादा मगज-मारी नहीं करनी पड़ेगी। अब मैं केवल अच्छे दिनों पर ही लिखा करूंगा। अच्छे दिनों पर लिखते-लिखते हो सकता है मेरी 'किस्मत' भी 'चकम' जाए। क्या पता प्रधानमंत्रीजी की निगाह में चढ़ जाऊं। इस बहाने मेरे अच्छे दिन भी आ जाएं।

सरकार के एक साल पूरा होने और बुरे दिन रूखसत होने पर 'जश्न' मनाइए। मैं पत्नी को समझाने की कोशिश करता हूं, चिंता न कर- एक न एक दिन तुम्हारे अच्छे दिन भी आ ही जाएंगे।

शुक्रवार, 5 जून 2015

स्मार्टफोन और सेल्फी

मार्केट में किस्म-किस्म के 'स्मार्टफोन' अपना रंग जमाए हुए हैं। जो कहीं नहीं मिलता, अब स्मार्टफोन में मिलता है। स्मार्टफोन हमारे 'पर्सल स्टेटस' से कहीं ज्यादा हमारी 'सेल्फी' का 'स्टेटस सिंबल' है। जिसके कने जित्ता महंगा (बड़ा) स्मार्टफोन, उसकी उत्ती ही 'ग्लैमरस सेल्फी'। यू नो, स्मार्टफोन ने सेल्फी की 'भाषा-परिभाषा' को ही बदल कर रख दिया है। स्मार्टफोन होते हुए भी जिसने, खुद की सेल्फी न ली, मतलब कुछ न लिया।

ज्यादा दूर क्यों जाऊं, मेरे मोहल्ले में जित्ते घर हैं, उससे कहीं ज्यादा स्मार्टफोन हैं। हर बंदे-बंदी कने एक नहीं दो-दो स्मार्टफोन हैं। और, एक से बढ़कर एक सिल्की, सेक्सी और ग्लैमरस लुक वाले। उन स्मार्टफोनों पर मुंह से बात कम, की-पैड से चैट ज्यादा होती है। जिसे देखो दिन-रात लगा रहता है, या तो की-पैड चटकाने में या फिर सेल्फियां लेने में। साथ-साथ, वाह्टसएप-फेसबुक-टि्वटर पर भी समां बांधे रहता है, सो अलग। क्या खाया, क्या पिया, क्या फैलाया, क्या उलटाया, क्या बनाया, क्या सजाया, क्या बिछाया, क्या डुबोया सबकुछ फेसबुक और वाह्टसएप पर हर मिनट शेयर होता रहता है। लेकिन सबसे अधिक शेयर होने वाला आइट 'सेल्फी' ही है पियारे।

स्मार्टफोन और सेल्फी की जुगलबंदी कभी-कभी मुझे 'चोली-दामन' जैसी लगती है। यानी, दोनों एक-दूजे बिन अधूरे। अच्छा ही है न, कम से कम इस बहाने किसी को अपने चेहरे की रंगत को लेकर 'इफियरिटी कॉमपलेक्स' तो नहीं रहता। स्मार्टफोन में हर किसी को अपनी 'सेल्फी' 'सेक्सी' ही नजर आती है। मार्केट का भी जोर अब 'सेल्फी बेस्ड स्मार्टफोन' पर ही अधिक है।

आपसे क्या छिपाना, मुझे भी मेरा चेहरा सेल्फी लेते-लेते अब सेक्सी-सा लगने लगा है। कोई दूसरा कहता तो एक बार को झूठ मान लेता लेकिन जाने कित्ती ही दफा मुझे ऐसा मेरी वाइफ ने बोला है! यू नो, मेरी वाइफ मेरे बारे में कभी 'झूठ' नहीं बोलती!

बीत लिए वो जमाने जब कैमरे घर-घर की शान हुआ करते थे। अब स्मार्टफोन से ली सेल्फी ही बंदे-बंदी की 'शान' है।

गुरुवार, 4 जून 2015

आ गए मैगी के 'बुरे दिन'

मैगी बनाने वालों, न खाने वालों, न बेचने वालों ने कभी सोचा होगा कि मैगी के भी 'बुरे दिन' आएंगे। आज जिधर देखो उधर केवल मैगी, मैगी और मैगी के ही चर्चे हैं। अखबार में हर रोज मैगी के बाबत कुछ न कुछ छप ही रहा है। सरकार और मैगी बनाने वालों में ऐसी 'ठनी' है कि न झुकने को वो तैयार हैं न ये। ऊपर से मैगी के ब्रांड एबेंसडरों को नोटिस और जारी कर दिए गए हैं। कि बताओ- मैगी के विज्ञापन में हिस्सा लेने की क्या मजबूरी रही। अब वे बिचारे क्या बतलाएं- उन्हें इससे क्या लेना-देना कि मैगी के खाने, न खाने के क्या फायदे, क्या नुकसान हैं, उन्हें तो अपनी 'फीस' से मतलब। विज्ञापन चल रहा है। मैगी बिक रही। और पैसा अपनी अंटी में आ रहा है। पर्याप्त है।

मुझे खूब ध्यान है, जब पहली दफा मैं मैगी को घर लेके आया था। बनने के बाद लंबी-लंबी सूढ़ियों जैसी लगी थी। न खाते बन रहा था, न उगलते। फिर एक डर यह भी लग रहा था कि कहीं खाने के बाद सुबह को पीछे के रास्ते से न निकल आए। हिम्मत करके खाई। लेकिन मैगी के प्रति 'डर' हमेशा कायम रहा कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। मात्र दो मिनट में बनी चीज का क्या भरोसा, कब अपना 'रंग' दिखा दे।

घर-घर में मैगी का चलन ऐसा बढ़ा, ऐसा बढ़ा कि लोग 'रोटी' की जगह 'मैगी' ही खाने लगे। खासकर बच्चे। दो मिनट में भूख मिटाने का इससे सस्ता और आसान जरिया भला क्या हो सकता है?

इधर मैगी चलन में आई तो उधर चीन वालों ने चाऊमीन को इंडिया के मार्केट में खपा दिया। आज देखिए, मैगी और चाऊमीन मार्केट में गजब ढहाए हुए हैं। हर शहर के गली-मोहल्लों में चाहे 'दाल का ठेला' न मिले पर 'चाऊमीन का ठेला' जरूर मिलेगा। और लोग भी ऐसे 'दीवाने' की चाऊमीन खाने को यों टूटे रहते हैं मानो ये न मिले तो जीवन ही बेकार।

कहना न होगा कि मैगी और इंसान एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं। न मैगी अपना 'आकर्षण' छोड़ सकती है, न इंसान अपनी आदत। लेकिन इधर मैगी पर जो सितम ढहाए जा रहे हैं, उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि मैगी के शायद 'बुरे दिन' शुरू हो चुके हैं। दुकानदार से भी अगर मैगी मांग लो तो झट से 'इंकार' कर देता है कि 'नहीं है'। या फिर दाएं-बाएं देख-दाखकर देता है।

मैगी पर जब से बैन लगने की बात सामने आई है, बीवी ने तो मेरा बुरा हाल कर रक्खा है। रोज कहती है कि अभी ही मैगी के पांच-सात बोरे लाके घर में रख लो। ताकि बाद में दिक्कत न हो। क्योंकि मैं रोटी के बिना तो रह सकती हूं मगर मैगी के बिना नहीं। मैगी मेरे जिंदगी में तुमसे अधिक इंर्पोटेंट है। अब बीवी को कैसे समझाऊं कि मैगी की फैक्टी मेरे पिताजी की नहीं है। कि जब चाहा ले आया।

मजबूरी है कि आजकल मैं भी मैगी को छोड़कर चाऊमीन पर ही निर्भर हूं। बीवी के पास मैगी का विकल्प चाऊमीन जो मौजूद है। क्या करूं, खानी पड़ती है। न खाऊं तो एक ही दिन में बोरिया-बिस्तरा गोल। मरता क्या न करता वाली स्थिति से गुजर रहा हूं फिलहाल।

मैं तो चाहता हूं कि मैगी और सरकार के बीच चल रही तना-तनी जल्द ही खत्म हो। नहीं तो बीवी ने मुझे मैगी का विकल्प चाऊमीन खीला-खीला के चाइनीज बना ही देना है। मैगी आती रहेगी तो कम से कम मुझे मिलने वाली रोटी के बुरे दिन तो नहीं रहेंगे।

बुधवार, 3 जून 2015

सेल्फी की दुकान

तय किया कि मैं नौकरी छोड़के मोहल्ले में ही 'सेल्फी की दुकान' खोलूंगा! नौकरी छोड़ने का विचार दिमाग में था तो कई दिनों से पर कोई ऑल्टरनेटिव नहीं मिल पा रहा था। मगर अब मिल गया है। सेल्फी की दुकान मेरे तईं 'बेहतर' विकल्प रहेगा। आजकल सेल्फियों का 'क्रेज' भी खूब है। हर कोई किसी न किसी बहाने अपनी सेल्फी लेने में लगा है।

लोगों के बीच सेल्फी का क्रेज तब से और अधिक बढ़ गया है, जब से प्रधानमंत्रीजी सेल्फी लेते 'जग-प्रसिद्ध' हुए हैं। प्रधानमंत्रीजी अब तलक जित्ती भी विदेश यात्राओं पर गए, हर मौके की सेल्फी लेना नहीं भूले। बंदा चाहे जित्ता ही बड़ा तुर्रमखां क्यों न हो मगर प्रधानमंत्रीजी के आगे सेल्फी-मोड में आ ही गया।

अब तो कहा भी जाने लगा है कि ये वाले प्रधानमंत्री 'सेल्फी-प्रधानमंत्री' हैं। विपक्ष तो प्रधानमंत्री के सेल्फी प्रेम से इत्ता 'आहत' है कि उसने अपने ही चेहरे को आईने में देखना बंद कर दिया है। सरकार से एक साल का हिसाब-किताब मांग रहा है लेकिन अपने दस के किए पर यों चुप है मानो 'गूंगा' हो!

मगर मुझे इससे क्या! मुझे तो सीधा मतलब अपनी सेल्फी की दुकान से है। वातावरण में सेल्फी का खुमार कुछ इस तरह से घुल गया है कि हर कोई मदहोश सा रहता है अपनी सेल्फियां लेने को। लोग अब स्मार्टफोन 'बात' करने के लिए कम 'सेल्फी' लेने के लिए ज्यादा खरीद रहे हैं। मोबाइल कंपनियों ने भी वक्त के तकाजे को भांपते हुए किस्म-किस्म के सेल्फी फोन मार्केट में उतार दिए हैं। फोन क्या हैं पूरा कैमरा ही हैं।

स्टूडियों में बंदा-बंदी अब फोटू खींचवाने नहीं सेल्फी लेने जाते हैं। हालांकि सेल्फी खुद ही ली जाती है लेकिन अगर दूसरा भी ले ले तो भी उसे सेल्फी ही कहा जाता है। फोटू खींचना-खींचवाने जैसा पारंपरिक चलन अब बीत जमाने की बात हुआ। और तो और शादी-ब्याह के लिए भी बंदा-बंदी फोटू नहीं खींचवाते सीधा सेल्फी लेके वाट्सएप कर देते हैं। यही तो तकनीक की ताकत है पियारे।

अपनी सेल्फी की दुकान में मैं भी कुछ ऐसी ही सुविधाएं रखूंगा ताकि सामने वाले को अपने ही मोबाइल से ली गई सेल्फी जैसा फील हो। फील होना ही महत्त्वपूर्ण है।

मोबाइल सेल्फी ने कैमरों का मार्केट भी चौपट करके रख दिया है। पहले जित्ते में एक कैमरा आ जाता था, अब उससे भी कम में सेल्फी मोबाइल आ जाता है। न रखने का झंझट न खींचने-खींचवाने का झाड़। अपना हाथ जगननाथ।

सबसे खास बात, सेल्फी के लिए किसी प्रकार का 'मूड-शूड' बनाने की जरूरत नहीं। हाथ में बस मोबाइल होना चाहिए। फिर तो सेल्फियां ही सेल्फियां।
आने वाला समय सेल्फी-युग का ही होगा! हमारे प्रधानमंत्रीजी ने यह अच्छे से पहचान लिया है। कोई अचंभा नहीं होना चाहिए कि अब दूसरे देशों से संबंध 'बातचीत' से ज्यादा सेल्फियों के आदान-प्रदान से सुधरें! ऐसा प्रधानमंत्री के सेल्फी-मोड में रहने को देखकर लगने लगा है।

सेल्फी के प्रति हमारी 'दीवानगी' और बढ़ेगी ही कम नहीं होगी। अभी मैंने सेल्फी की दुकान खोलने का मन बनाया है, हो सकता है, आगे चलकर सरकार इस क्षेत्र में कोई 'डिप्लोमा' कोर्स ही शुरू न कर दे!

जो भी कहिए पर सेल्फी का बाजार हिटम-हिट है।

सोमवार, 1 जून 2015

हाय! गर्मी, हाय! बत्ती

अखबार बतला रहा है कि गर्मी 'विकट' पड़ रही है। टेम्प्रेचर 44-45 से ऊपर डोल रहा है। विकट गर्मी की मार से इंसान तो क्या जानवर का भी जीना मुहाल है। हर कोई हाय गर्मी, हाय गर्मी चिल्ला रहा है। विकट गर्मी ने कूलर और एसी का भी 'बैंड' बजा दिया है। ऊपर से बत्ती का न आना या आकर बार-बार चले जाना भी, गजब ढाह रहा है। लोग कभी गर्मी तो कभी बत्ती को 'कोस' रहे हैं।

लेकिन मैं गर्मी और बत्ती दोनों को ही 'एंज्वॉय' कर रहा हूं। गर्मी और बत्ती के साथ 'धैर्य' बनाए हुआ हूं। मैं जानता हूं, गर्मी या बत्ती को कोसते रहने से तीव्रता दोनों में से किसी भी कम नहीं होनी वाली। न गर्मी अपने ताप से पीछे हटने वाली है, न बत्ती अपनी आदत से बाज आने वाली। गर्मी और बत्ती के लिए यही दो महीने होते हैं, अपने मन की करने के लिए। फिर क्यों न उन्हें अपने-अपने मन की करने दी जाए।

जाहिर-सी बात है, गर्मियों में गर्मी नहीं पड़ेगी तो क्या दिसंबर-जनवरी में पड़ेगी! क्या करें हम भी 'मजबूर' हैं, अधिक गर्मी और अधिक जाड़े को कोसते रहने के लिए। अमां, गर्मी और बत्ती से अगर इत्ती ही 'परेशानी' है तो क्यों नहीं 'हिमालय की चोटी' पर घर बना लेते। न वहां गर्मी का झंझट न बत्ती का ज्यादा रगड़ा। हर मौसम में चकाचक ठंड का मजा लो। दुनियावी से झंझटों से मुक्ति अलग से।

गर्मी जब पड़ती है, तब हम केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। उनके बारे में कतई नहीं सोचते, जिनका करोबार ही गर्मी-जाड़े-बरसात के साथ जुड़ा है। गर्मी का अपना 'ठंडे का बाजार' है। तो बत्ती का 'जनरेटर' का। न गर्मी, न बत्ती दोनों के ही अपने हाथ में कुछ नहीं। सबकुछ ऊपर वाले के हाथ में है। ऊपर से जित्ती बत्ती आएगी, उत्ती मिलेगी। ऊपर से जित्ती गर्मी छूटेगी, उत्ती झेलनी पड़ेगी।

यों, गर्मी और बत्ती का इत्ता पता न चले मगर क्या करें अखबार और मौसम विभाग वाले बात-बेबात डराते रहते हैं। अभी पढ़ा कि पारा 48 पार तक जा सकता है। अमां, जब जाएगा तब जाएगा। उससे भी निपट लेंगे। लेकिन क्या यह पहले से बताना जरूरी है? कौन-सा पहले से बता देने से हम बढ़ते पारे को रोक लेंगे? पारे पर भला किसका जोर चला है। पारा तो अपनी 'मन-मर्जी' करने के वास्ते 'कुख्यात' है।

मैं तो कहता हूं, जित्ती गर्मी पड़ रही है, पड़ने दो। जित्ती बत्ती जा रही है, जाने दो। बस धैर्य का दामन न छोड़ो। क्योंकि जो-जो जब-जब होना है, वो-वो तब-तब होएगा ही। होने-हवाने के बीच अगर ज्यादा हथेली लगाने की कोशिश करोगे तो हथेली से भी हाथ धो बैठोगे।

सो, एंज्वॉय गर्मी एंड बत्ती।