बुधवार, 6 मई 2015

नेता, किसान और हमदर्दी

मेरे देश के नेताओं को किसानों की कित्ती 'फिकर' है, यह देख-देखकर ही मेरा सीना गर्व से दोगुना हुआ जा रहा है। बिचारे दिन-रात, संसद से लेकर सड़क तक, डटे हुए हैं किसानों को उनका वाजिब हक दिलवाने में। किसानों के हक के लिए संसद और सड़क पर बड़ी-बड़ी बहसें कर रहे हैं। जिन्हें चांस मिल रहा है, वे टीवी चैनलों पर जाकर किसानों की तबाही के प्रति अपनी 'संवेदनाएं' प्रकट कर रहे हैं। ईंट से ईंट बजाने और हर कीमत पर मुआवजा दिलवाने के 'क्रांतिकारी वायदे' भी कर रहे हैं।

सच बतलाऊं, आज मुझे पहली बार बिलकुल पहली बार महसूस हो रहा है कि किसानों-गरीबों के असली 'हितैषी' देश के नेता लोग ही हैं! चुनावों में किसानों से जो वायदे थे, एक-एक कर सब निभाने में लगे हैं। धन्य हैं मेरे देश के किसान, जो उन्हें इन जैसी 'जुझारू नेता' मिले!

मसला चाहे भूमि-अधिग्रहण बिल का हो या बारिश से तबाह फसल का सभी दल के नेता लोग तन-मन-धन से किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर यों खड़े हैं मानो यह उनके घर का ही मसला हो। रैलियां की जा रही हैं। रैलियों में किसानों-गरीबों को 'सम्मान' के साथ बुलाया जा रहा है। उनका दुख-दर्द सुना व अपनी स्थिति बताई जा रही है। कुछ वर्तमान सरकार को कोसा तो कुछ पिछली सरकार को गरियाया जा रहा है। मंच पर हल (भले उलटा ही सही) पकड़कर बताया जा रहा है कि भले ही हम किसान नहीं किंतु किसानों के 'शुभचिंतक' बहुत बड़े वाले हैं। बहाने से एक पार्टी ने अपने नेता को 'रि-लांच' भी कर दिया। रि-लांचिंग के बाद नेता बेहद जोश में और विपक्ष से चुन-चुनकर बदला लेने के मूड में दिखलाई पड़ रहे हैं। साथ-साथ किसानों के प्रति उनकी दरियादिली को देखके मेरा कलेजा मुंह को आ गया है।

इसमें रत्तीभर शक नहीं कि नेताओं और सरकार ने किसानों के लिए बहुत कुछ किया है! न न 'हंसे' नहीं। एकदम सच्ची बोल रहा हूं। देखा नहीं, सरकार ने किसानों को मुआवाजा बंटवाया। प्रत्येक किसान को बुला-बुलाकर नेताजी ने खुद अपने हाथों से चैक बांटे। भले ही चैक 60 या 1000 रुपए के रहे या दो-चार बाउंस भी हो गए लेकिन बांटे तो। उनके दुख में अपनी 'हमदर्दी' साझा तो की। यह क्या कम बड़ी बात है। इससे पता चलता है कि हमारे देश के नेता लोगों और सरकार को किसानों की कित्ती चिंता है। अगर चिंता न होती तो मुआवजा न दे रहे होते।

अजी, किसने क्या कहा, इसको छोड़िए। लोगों का तो काम है कहना। खुद कुछ करते-धरते हैं नहीं और जो करता है उसके काम में मीन-मेख निकालते हैं। देख नहीं, केवल भूमि-अधिग्रहण के ही मसले पर सांसदों ने संसद नहीं चलने दी। सरकार से भिड़ गए। किसानों की जमीन पर सरकार का कब्जा नेताओं को कतई बर्दाशत नहीं! बिचारे इसीलिए तो बहसबाजी में संघर्षरत हैं।

भूमि-अधिग्रहण के मसले पर नेताओं को किसानों के साथ खड़ा देख मेरे मन में आया कि कहीं नेता लोग अपनी जमीनें ही किसानों को न दे दें! आखिर हमदर्दी रखते हैं किसानों से। उनके दुख में पूरी शिद्दत के साथ खड़े हैं। हालांकि अभी ऐसा हुआ नहीं। फिर भी, सोचने में क्या जाता है।

मैं तो पूरी दुनिया से कहता हूं कि देखो, हमारे देश के नेताओं का दिल कित्ता बड़ा है, कित्ती हमदर्दी रखता है किसानों से। नाहक ही बदनाम किए हुए हैं नेता लोगों को।

देख भाई किसान, तू जरा भी चिंता न कर। नेता व सरकार सबकुछ ठीक कर देंगे। तू तो बस मुआवजे के चैक चुप-चुप अपनी अंटी में धर ले और अपनी किस्मत पर फख्र कर कि तू किसान है। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

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