मंगलवार, 5 मई 2015

भूचाल और व्यंग्य-संग्रह

हालांकि भूचाल आकर जा चुका हूं मगर मेरे मन में 'दहशत' अभी भी बरकरार है। न.. न.. दहशत मुझे इस बात की नहीं है कि अगले भूचाल में मैं 'खर्च' होऊंगा या नहीं, दहशत मुझे इस बात है कि प्रकाशक को अपने नए व्यंग्य-संग्रह के तईं दिए हजारों रुपयों पर पानी फिर जाएगा। एक तो जैसे-तैसे करके मैंने मन बनाया था अपना व्यंग्य-संग्रह छपवाने का, उसे बस भूचाल की 'नजर' नहीं लगनी चाहिए।

यों मेरा मन कतई न था कि मेरा कोई व्यंग्य-संग्रह भी आए, पर क्या कीजिएगा, मुझे पत्नी की जिद के आगे 'नतमस्तक' होना ही पड़ा। पत्नी ने साफ-सीधे शब्दों में कह दिया था कि इस साल या तो अपना व्यंग्य-संग्रह ले आओ नहीं तो कहीं और ठिकाना ढूंढो। पत्नी जिद करे और पति न माने, भला ऐसा भी कहीं हुआ है।

उस भूचाल से तो कैसे भी निपटा जा सकता है, यहां-वहां से मदद भी मांगी जा सकती है, लेकिन पत्नी द्वारा लाए गए भूचाल से बचना मुश्किल ही नहीं नामुंकिन है। इसीलिए मैं चाहता हूं कि अगला भूचाल आने से पहले ही मेरा व्यंग्य-संग्रह बाजार में आ जाए। इस बहाने पत्नी की निगाह में मेरी कुछ 'इज्जत' भी बढ़ जाएगी और लेखकों के बीच 'मान' भी। हो सकता है, आगे कोई ईनाम-पुरस्कार की जुगाड़ भी बैठ जाए।

वैसे मैंने, जब तलक मेरा व्यंग्य-संग्रह आ नहीं जाता, तमाम प्रकार के टोटके कर रखे हैं, भूचाल को रोके रखने के लिए। हर रोज सुबह उठते ही नहा-धोकर हनुमानजी के मंदिर जाकर हनुमान चालीसा पढ़ता हूं, घर के आगे नींबू-मिर्ची-पोदीना काले घागे में बांधकर लटका दिया है, बाएं हाथ में मंत्र-फूंका लाल धागा भी बांधना शुरू कर दिया है, दफ्तर से लौटते वक्त गुरुद्वारे, चर्च और मस्जिद में 'दुआ' मांगकर आता हूं। इत्ती चीजों में से कोई एक तो काम करेगी ही। विज्ञान पर पूरा भरोसा है लेकिन आस्था भी कोई चीज होती है कि नहीं।

और तो और भूचाल को खुश करने के लिए मैंने अपने व्यंग्य-संग्रह में एक गंभीर टाइप व्यंग्य भूचाल की स्तुति में भी लिख मारा है। ताकि कल को भूचाल मेरे लेखन व मंशा पर उंगुली न उठा सके। पियारे, समाज और लेखन में रहकर बहुत सारी चीजें देखनी पड़ती हैं। हमेशा प्रगतिशीलता की ऐंठ में ही ऐंठे रहने से कुछ नहीं मिलता सिवाय गालियों के।

मैंने तो यह भी तय कर लिया है कि मैं अपने व्यंग्य-संग्रह का विमोचन किसी मशहूर या वरिष्ठ व्यंग्यकार से नहीं बल्कि किसी नामी भू-गर्भ वैज्ञानिक से करवाऊंगा। ताकि भूचाल और भू-गर्भ वैज्ञानिक के बीच तालमेल बना रह सके। दोनों को खुश रखना जरूरी है। दोनों में से किसी एक के भी बुरा मान जाने से कहानी सेकेंडों में पलट सकती है।

फिलहाल, भूचाल से 'गुजारिश' ही कर सकता हूं अभी (और कभी) न आने की, बाकी 'उसकी मर्जी'।

1 टिप्पणी:

निर्मला कपिला ने कहा…

dard par hansana vyang ki khoobee hai.achha lagaa.