रविवार, 17 मई 2015

मैं बचपन से चोर बनना चाहता था!

यों तो ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें मैं बचपन से करना चाहता था लेकिन किन्हीं कारणों से न कर पाया। उन चीजों को न कर पाने का 'दुख' तो है पर साथ-साथ 'संतोष' भी है कि मेरे जैसे और उन कामों को अपने तरीके से 'अंजाम' दे रहे हैं। चीज होनी चाहिए, अब यह कौन कर रहा है, क्यों कर रहा, किसलिए कर रहा है, मेरे तईं, ज्यादा मायने नहीं रखता।

जैसे- मेरी बचपन से इच्छा थी कि मैं बड़ा होकर 'चोर' बनूं! तमाम तरह की चीजें- कभी इस घर तो कभी उस घर- से चुराऊं। अपनी चोरी और चुराई चीजों पर 'फख्र' महसूस करूं। घर-परिवार व नाते-रिश्तेदारों को बताऊं कि फलां-फलां चीज को चुराने में मुझे कित्ती मेहनत करनी पड़ी थी। लोग अपने जीवन-संघर्ष पर आत्मकथ्य लिखते हैं, मैं अपनी चोरियों पर आत्मकथ्य लिखूं।

पता नहीं ऐसा क्यों है, लेकिन है, कि मुझे चोरी करना बड़ा पसंद है। हालांकि बचपन में तमाम प्रकार की चोरियां मैंने की थीं परंतु फिर भी मैं 'प्रॉफेशनल चोर' नहीं बन सका। यह बात मेरे मन में रह-रहकर 'चुभती' भी है।

जिस चीज को मैंने कभी नहीं चाहा था कि मैं लेखक बनूं सो बन गया। लेखक बनकर मैंने कोई 'तोप' नहीं मारी है। लेकिन अब बन गया हूं तो निभाना तो पड़ेगा ही। सच कह रहा हूं, मेरी पत्नी तो मुझे 'आधा परसेंट' लेखक नहीं मानती। कहती है- 'लेखक बनकर तुमने अपनी जिंदगी के साथ-साथ मेरी जिंदगी भी 'तबाह' कर दी। न जाने ऐसा वो कौन-सा 'मनहूस पल' था, जो तुम जैसे 'ईमानदार लेखक' से मुझे ब्याह करना पड़ा। किसी नेता, खिलाड़ी, अफसर या फिर चोर से ही कर लेती तो आज कहीं ज्यादा सुखी होती।'

खैर, पत्नी की शिकायतें न कभी पूरी हुई हैं न कभी होंगी। जाने दीजिए।

चोरों के प्रति मेरे मन में बचपन से ही 'अथाह प्रेम' रहा है। मैं चोरों को बड़े-बड़े तीसमारखां धर्मनिपेक्षों से कहीं बड़ा धर्मनिरपेक्ष मानता हूं। क्योंकि चोर कभी यह देखकर चोरी नहीं करता कि यह हिंदू का घर है या सिख का या ईसाई का या मुसलमान का या दलित का या ब्राह्मण का। उसका 'उद्देश्य' तो केवल चोरी करना होता है। जो वो करता है। पकड़े जाने पर उसका 'हश्र' चाहे जो होता हो पर बंदा करता तो 'मेहनत' ही है न! पेट की खातिर आदमी क्या-क्या नहीं करता। यह तो फिर चोरी है।

न जी न चोर और चोरी की बात को सुनकर यों चौड़े न होइए। हम सभी अपनी-अपनी जिंदगी में- कम या ज्यादा- चोर ही हैं। यह बात और है कि हम अपनी चोरियों को छिपा या बचा ले जाते हैं। चोर तो फिर भी रुपए-पैसे, गहने-जेवर चुराता है- हम तो ईमान से लेकर लेख-कविता-कहानी तक चुरा लेते हैं। इसीलिए चोर-चोर अंततः मौसेरे भाई ही कहलाते हैं।

बहरहाल, इस जन्म में न सही पर अगले जन्म में मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि मैं चोर ही बनूं। जो सुख चोर बनने में है, लेखक बनने में कहां!

5 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हाहाहा...बहुत ज़बरदस्त। सही है आज सफेदपोश चोरों से ज्यादा खतरा है।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

हाहाहा...बहुत ज़बरदस्त। सही है आज सफेदपोश चोरों से ज्यादा खतरा है।

Udan Tashtari ने कहा…

हा हा

Shah Nawaz ने कहा…

:)

Bharat Bhushan ने कहा…

अब चोरों को भी फ़ख्र होगा कि कोई लेखक चोर बनना चाहता है।