रविवार, 3 मई 2015

तू पेड़ पर चढ़ा ही क्यों

अरे.. चलो.. छोड़ो.. न यार किसान ही तो था। पेड़ पर चढ़ा। अपने गमछे का फंदा बनाया और लटक गया। ऐसा यहां तमाम किसान हर रोज कर रहे हैं, उसने (गजेंद्र) ने भी कर लिया, कौन-सा नया काम किया। खुशकुशी करना तो किसान की 'नियति' में लिखा है। तो पियारे इस पर इत्ता 'शोक' जतलाने या फिकरमंद होने की जरूरत नहीं, जो हो गया सो हो गया। गीता में भी कहा गया है- जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है।

मीडिया वाले खामखां एक किसान की खुशकुशी पर इत्ता 'पगलाए' जा रहे हैं। पता नहीं बार-बार उस फुटेज को दिखलाकर साबित क्या करना चाहते हैं? कहानी तो निपट ली न, फिर रोकर क्या फायदा। हां फिर भी अगर शौक ही है रोने या बड़ी-बड़ी बातें या बहस करने का तो करते रहिए, इससे न मर चुके किसान को कुछ मिलने वाला है न उसके परिवार को। बहुत हुआ तो हमारे नेता लोग या सरकार गजेंद्र की मौत पर अच्छी-अच्छी तीन-चार लाइनें कह देगें। बस।

देखिए, बात को समझिए, किसान की मौत से कहीं ज्यादा जरूरी थी वो रैली। रैली भी तो किसानों की बेहतरी, उनके वाजिब हक के लिए ही की जा रही थी। बिचारे नेता लोगों को रैलियों में ही तो मौका मिलता है, अपना कलेजा किसानों-गरीबों के समक्ष निकाल देने का। उनसे बड़ी-बड़ी मगर अच्छी-अच्छी बातें करने का। अब इत्ती बड़ी रैली में न गया होगा किसी नेता का ध्यान उस पेड़ या किसान की तरफ। इधर निगाह बची, उधर दुर्घटना घट गई। होनी को भी कोई टाल सका है भला।

लोग भी बड़े अजीब हैं। वहां मौजूद नेताओं और पार्टी के बाउंसरों को दोष दे रहे हैं! उन बिचारों की क्या गलती? अरे भई गजेंद्र उनसे कहके थोड़े न गया था कि मैं फांसी पर झूलने जा रहा हूं। वो तो अचानक से सबकुछ हो गया। वहां मौजूद पार्टी के एक सदस्य ने बहुत ही मार्क की बात बोली कि 'अरविंद केजरीवाल उसे (किसान) बचाने पेड़ पर थोड़े न चढ़ जाते।' बात सही भी है। भला क्यों चढ़ जाते? क्या लगता था वो माननीय मुख्यमंत्रीजी का। लेकिन न भूलिए, केजरीवालजी एक दफा बिजली का कनेक्शन जोड़ने के वास्ते बिजली के खंबे पर चढ़ गए थे। मगर यह बात चुनाव से पहले की है पियारे। चुनाव से पहले बिचारा नेता जनता के वास्ते क्या-क्या नहीं करता। चुनाव जीत लेने के बाद उसे भी तो कुछ आराम चाहिए होता है न। है कि नहीं।

अब तलक हजारों किसान 'अपनी मर्जी' (!) से खुदकुशी कर चुके हैं। उन सब की मौत के लिए कोई नेता या सरकार थोड़े न दोषी मान लिए जाएंगे। ठीक है.. माना कि फसल चौपट हो गई, घर में न खाने को कुछ है, न बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसे किंतु इसका समाधान कोई खुदकुशी थोड़े न है। किसान लोग इत्ता बड़ा कदम उठाने से पहले एक दफा हमारे देश के नेताओं से आनकर मिलते, उनके समक्ष अपनी परेशानियां रखते, साथ ही यह भी पूछ लेते कि क्या मैं आत्महत्या या खुदकुशी कर सकता हूं?

मैं बहुत अच्छे से जानता हूं मेरे देश के नेताओं को। वो कभी किसान से खुदकुशी करने के लिए नहीं कहते। प्रत्येक सरकार का प्रत्येक नेता प्रत्येक किसान के प्रति दिलो-जान से 'फिकरमंद' है। सुना है, आजकल देश के नेता लोग किसानों की फिकर में न रात में, न दिन में चैन से सो नहीं पा रहे। चौबीस घंटे अपने चेलों से उनका हालचाल लेते रहते हैं। अभी हाल मुआवजा भी तो बंटवाया है उन्होंने। मुआवजे के 60, 100 या 1000 रुपए कोई कम थोड़े न होते हैं।

मैं फिर कह रहा हूं कि सिरफिरा था गजेंद्र जो एंवई फांसी पर लटक गया। एक बार अरविंद केजरीवालजी से मिल लिया होता। वे बहुत ही अच्छे और अति-ईमानदार युगपुरुष हैं, उसकी परेशानी का हाल तुरंत खोज निकालते। यों भी, आप में एक से बढ़कर एक ईमानदार और भद्र नेता हैं।

मेरे विचार में, नैतिकता के आधार पर केजरीवाजी को कतई इस्तीफा नहीं देना चाहिए। उन्हें अपनी सरकार यों ही चलाते रहना चाहिए। इत्ती मुश्किलों के बाद तो मुख्यमंत्री की गद्दी हाथ आई है। फिर भी जो लोग उन पर दोष मढ़ रहे हैं, उन्हें मढ़ते रहने दीजिए। क्या करें, बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी खुशकुशियां तो होती रहती हैं।

1 टिप्पणी:

Jyoti Dehliwal ने कहा…

रस्तोगी जी, बहुत बढ़िया! बधाई ...