गुरुवार, 21 मई 2015

सेल्फी पीएम

आप चाहें तो न करें लेकिन मुझे हमारे पीएम पर 'गर्व' है। गर्व से ऊपर भी अगर कुछ हो सकता है, तो वह भी है। आखिर क्यों नहीं होना चाहिए मुझे हमारे पीएम पर गर्व। दशकों बाद हमें ऐसे 'सेल्फी प्रेमी' पीएम मिले हैं, जिनकी ली गईं सेल्फियों के चर्चे ईरान से लेकर तुरान तलक हो रहे हैं। पीएम का सेल्फी प्रेम मीडिया में 'ब्रेकिंग न्यूज' बना हुआ है। बुद्धिजीवि टाइप लोग पीएम के सेल्फी प्रेम पर 'बहस' कर रहे हैं। लोगों से राय ली जा रही हैं।

गजब यह है कि सरकार की एक साल की उपलब्धि को विकास के साथ-साथ पीएम के सेल्फी प्रेम से जोड़कर भी देखा जा रहा है। शासन का वक्त बदल गया है। विकास का रास्ता अब सेल्फी के दरमियान होकर गुजरता है। पीएम हर कहीं विकास की बातें तो करते हैं मगर अपने सेल्फी प्रेम को भी जाहिर करने से नहीं चूकते।

देश चाहे कोई भी हो पीएम ने सेल्फी को प्रमोट करने से कभी परहेज नहीं किया। पीएम के सेल्फी प्रेम के चलते, लोगों के भीतर भी सेल्फी का क्रेज दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। खबरें बता रही हैं कि मार्केट में सेल्फी फोनों की बाढ़ सी आ गई है। सेल्फी फोन अब हर किसी की चाहत बन गया है। लोग बाग अब अपने सेल्फी प्रेम को छिपा नहीं रहे बल्कि उसे और बढ़ावा दे रहे हैं। ताकि सेल्फी की महत्ता बनी रहे।

सीना चौड़ा हो जाता है, जब हमारे पीएम विदेश में वहां के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति एवं जनता के साथ सेल्फी लेते हुए दिखते हैं। चाहे ओबामा हों या शी जिनपिंग पीएम ने सेल्फियां दोनों के ही साथ लीं। वरना पहले ऐसा कहां होता था। बस पारंपरिक टाइप के कुछ फोटू खींच जाते थे। कभी हाथ मिलाते या गले मिलते हुए। लेकिन ऐसा इतिहास में पहली दफा हुआ है कि पीएम ने प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति के साथ स्वयं सेल्फी ली है।

मुझे लगता है, शायद पीएम का सेल्फी के प्रति प्रेम बचपन से ही रहा होगा। यों, सेल्फी के प्रति इत्ता दीवाना पिछला कौन पीएम रहा है।

हालांकि बहुतों को पीएम के इत्ते सारे विदेश दौरों पर गहरी आपत्ति है। पर इन आपत्तियों से पीएम की सेहत पर क्या फरक पड़ता है? पीएम कोई 'हवाबाजी' के लिए थोड़े न विदेश जा रहे हैं। तमाम तरह की डीलें वहां हो रही हैं। कुछ आर्थिक हैं, कुछ व्यापारिक हैं, कुछ सांस्कृतिक हैं। क्या आपको मालूम नहीं कि हमारे पीएम देश के चुनिंदा शहरों को बहुत जल्द 'स्मार्ट सिटी' में तब्दील करना चाहते हैं। बिना विदेश घूमे और वहां के प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति व उच्चाधिकारियों से मिले, कैसे यह सब हो पाएगा? शायद इसीलिए हमारे पीएम विदेश दौरों की कमान अपने हाथ में ही रखना चाहते हैं बजाए विदेश मंत्री के। विदेश मंत्री तब तलक देश संभालें।

हमारे पीएम को अभी एक साल ही तो हुआ है। एक साल में आधी दुनिया घूम लेना कोई मजाक बात थोड़े न है। साथ-साथ, अपने सेल्फी प्रेम से दुनिया को दीवाना बनाए रखना भी बहुत बड़ी उपलब्धि है।

मैं तो चाहता हूं कि पीएम जल्दी-जल्दी विदेश दौरों पर जाएं ताकि हमारे देश में सेल्फी फोनों की डिमांड बढ़े। अन्य देशों के साथ मोबाइल फोन के व्यापार में तेजी आए। चीन-जापान ज्यादा से ज्यादा फोन 'मेक न इंडिया' की तर्ज पर देश के बाजारों में लाए। उम्मीद हैं, सेल्फी फोनों में सुधार की गुंजाइश और बढ़ जाएगी।

पीएम का सेल्फी प्रेम यों ही बरकरार रहे। सेल्फी का क्रेज अगर ऐसे ही बढ़ता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हर गली-मोहल्ले में एक सेल्फी की दुकान हुआ करेगी। जित्ते भी ठलुए यहां-वहां मटरगशती करते रहते हैं, सब काम पर लग जाएंगे। फिर फेसबुक और टि्वटर की दुनिया स्टेटस या पोस्टों से नहीं सेल्फियों से ही पहचानी जाएगी। यानी, सारा वातावरण सेल्फीमय हो लेगा।

बस इसीलिए तो मुझे हमारे पीएम के सेल्फी प्रेम पर इत्ता गर्व है।

रविवार, 17 मई 2015

मैं बचपन से चोर बनना चाहता था!

यों तो ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें मैं बचपन से करना चाहता था लेकिन किन्हीं कारणों से न कर पाया। उन चीजों को न कर पाने का 'दुख' तो है पर साथ-साथ 'संतोष' भी है कि मेरे जैसे और उन कामों को अपने तरीके से 'अंजाम' दे रहे हैं। चीज होनी चाहिए, अब यह कौन कर रहा है, क्यों कर रहा, किसलिए कर रहा है, मेरे तईं, ज्यादा मायने नहीं रखता।

जैसे- मेरी बचपन से इच्छा थी कि मैं बड़ा होकर 'चोर' बनूं! तमाम तरह की चीजें- कभी इस घर तो कभी उस घर- से चुराऊं। अपनी चोरी और चुराई चीजों पर 'फख्र' महसूस करूं। घर-परिवार व नाते-रिश्तेदारों को बताऊं कि फलां-फलां चीज को चुराने में मुझे कित्ती मेहनत करनी पड़ी थी। लोग अपने जीवन-संघर्ष पर आत्मकथ्य लिखते हैं, मैं अपनी चोरियों पर आत्मकथ्य लिखूं।

पता नहीं ऐसा क्यों है, लेकिन है, कि मुझे चोरी करना बड़ा पसंद है। हालांकि बचपन में तमाम प्रकार की चोरियां मैंने की थीं परंतु फिर भी मैं 'प्रॉफेशनल चोर' नहीं बन सका। यह बात मेरे मन में रह-रहकर 'चुभती' भी है।

जिस चीज को मैंने कभी नहीं चाहा था कि मैं लेखक बनूं सो बन गया। लेखक बनकर मैंने कोई 'तोप' नहीं मारी है। लेकिन अब बन गया हूं तो निभाना तो पड़ेगा ही। सच कह रहा हूं, मेरी पत्नी तो मुझे 'आधा परसेंट' लेखक नहीं मानती। कहती है- 'लेखक बनकर तुमने अपनी जिंदगी के साथ-साथ मेरी जिंदगी भी 'तबाह' कर दी। न जाने ऐसा वो कौन-सा 'मनहूस पल' था, जो तुम जैसे 'ईमानदार लेखक' से मुझे ब्याह करना पड़ा। किसी नेता, खिलाड़ी, अफसर या फिर चोर से ही कर लेती तो आज कहीं ज्यादा सुखी होती।'

खैर, पत्नी की शिकायतें न कभी पूरी हुई हैं न कभी होंगी। जाने दीजिए।

चोरों के प्रति मेरे मन में बचपन से ही 'अथाह प्रेम' रहा है। मैं चोरों को बड़े-बड़े तीसमारखां धर्मनिपेक्षों से कहीं बड़ा धर्मनिरपेक्ष मानता हूं। क्योंकि चोर कभी यह देखकर चोरी नहीं करता कि यह हिंदू का घर है या सिख का या ईसाई का या मुसलमान का या दलित का या ब्राह्मण का। उसका 'उद्देश्य' तो केवल चोरी करना होता है। जो वो करता है। पकड़े जाने पर उसका 'हश्र' चाहे जो होता हो पर बंदा करता तो 'मेहनत' ही है न! पेट की खातिर आदमी क्या-क्या नहीं करता। यह तो फिर चोरी है।

न जी न चोर और चोरी की बात को सुनकर यों चौड़े न होइए। हम सभी अपनी-अपनी जिंदगी में- कम या ज्यादा- चोर ही हैं। यह बात और है कि हम अपनी चोरियों को छिपा या बचा ले जाते हैं। चोर तो फिर भी रुपए-पैसे, गहने-जेवर चुराता है- हम तो ईमान से लेकर लेख-कविता-कहानी तक चुरा लेते हैं। इसीलिए चोर-चोर अंततः मौसेरे भाई ही कहलाते हैं।

बहरहाल, इस जन्म में न सही पर अगले जन्म में मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि मैं चोर ही बनूं। जो सुख चोर बनने में है, लेखक बनने में कहां!

मंगलवार, 12 मई 2015

सलमान और किस्मत

मानना पड़ेगा- सलमान भाई की किस्मत चाचा चौधरी के दिमाग से भी ज्यादा तेज चल रही है। तेरहा साल बाद फैसले का आना। सजा सुनाया जाना। तुरंत ही बेल मिल जाना। फिर सजा पर भी रोक लग जाना। वाह! क्या अद्भूत किस्मत पाई है भाई ने। काश! ऐसी ही किस्मत ऊपर वाला हम सबको दे।

लेकिन ऊपर वाला भी बड़ा 'चालू' है। देख सब रहा है। मालूम हर सच है। मगर फिर भी रहता चुप है। न कोई 'रिएक्शन' देता है, न 'एक्शन' लेता है। सारा का सारा जिम्मा उसने नीचे वालों के कंधों पर डाल दिया है। बेट्टा जो मन में आए करो। हिसाब-किताब बाद में- ऊपर आने पर- ले लिया जाएगा।

मैं भी कित्ता मूर्ख हूं खामखा गरीबों की चिंता करता रहता हूं। हर वक्त चाहता हूं कि गरीब को न्याय मिले। खुशी-समृद्धि मिले। उसका विकास हो। लेकिन गरीब की हैसियत इत्ते सारे अमीरों-सेलिब्रिटियों के बीच- बकौल अभिजीत कुत्ते समान ही है। दिन-रात अमीरों की जी-हुजूरी करते रहो। जब मरो तो बे-मौत कि रोने या पूछने वाला ही कोई पास न हो।

अरे तो क्या हुआ जो सलमान भाई की गाड़ी कुछ गरीबों के ऊपर चढ़ी गई। जिनमें से एक खर्च हो लिया, दो-चार के चोट-फेट आईं। आखिर वो गरीब ही तो थे। कौन से अमीर या किसी वर्ल्ड फेम सेलिब्रिटी की औलाद थे। मरे गए। इस बहाने धरती का कुछ बोझ तो कम हुआ। यों भी गरीबों ने धरती पर बहुत बोझ बढ़ाया हुआ है। फुटपाथ को अपने बाप की जमीन समझकर सोते हैं। जब किसी नेक-ईमानदार सेलिब्रिटी की गाड़ी चढ़ जाती है। तो फिर रोते फिरते हैं- हमें इंसाफ दिलाओ। हमें पैसा दिलाओ। क्या सलमान भाई जैसे लोग इसी काम के लिए बने हैं। उनके कने अपने इत्ते बड़े-बड़े और खास काम हैं। वो तो पेच फंस गया जो उन्हें कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने पड़े वरना...।

अब तो मुझे रोड पर चलते हुए भी डर-सा लगने लगा है। क्या पता कोई कार वाला, गैर-इरादतन ही सही, मुझे निपटा जाए। बादे में कह दे, जी, गाड़ी मैं नहीं मेरा ड्राइवर चला रहा था। थोड़े-बहुत दिन केस चलेगा फिर वही सलमान भाई वाले ट्रेक पर आ जाएगा। इसीलिए पियारे अपनी जिंदगी अपने हाथ। सड़क से लेकर परिवार तक में जित्ता बच सकते हो बचो। वरना फिर ऊपर वाला भी नहीं बचा पाएगा।

कह लीजिए जिसको जो कहना है सलमान भाई की सजा, जेल और बेल के खिलाफ। सलमान भाई की सेहत पर क्या फरक पड़ना है। वो कल भी मजे में थे, आज भी मजे में हैं और आगे भी मजे में ही रहेंगे।

गरीब तो कुत्ता है मरने दो साले को...। क्यों अभिजीत बाबू सही है न।

सोमवार, 11 मई 2015

भ्रष्टाचारियों एक हो...!

इधर, जब से भ्रष्टाचार पर सात साल की सजा होने का कानून बनने की खबर आई है, तब से मेरा दिल बैठे चला जा रहा है। दिल में यकायक भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के प्रति 'सहानुभूति' दोगुनी हो गई है। जी तो कर रहा है कि अभी इस 'जालिम कानून' को निशाने पर लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ 'आरटीआइ' डाल दूं। लेकिन प्रधानमंत्रीजी की 'स्वच्छ इमेज' का ख्याल करते हुए कदम पीछे खींच लेता हूं। मगर फिर भी इस कानून के विरूद्ध अपने 'मन की बात' कहूंगा तो जरूर। कहने में जाता ही क्या है।

मैं केंद्र सरकार के इस भ्रष्टाचार निरोधक कानून का खुले दिल से विरोध करता हूं। और पूछना चाहता हूं कि आखिर देश के भ्रष्टाचारियों ने ऐसा कौन-सा महा-पाप कर दिया है, जो उन्हें भ्रष्टाचार की खातिर सात साल जेल में रहना पड़ेगा? क्या खाने-पीने-कमाने का हक केवल नेताओं-अफसरों-उद्योगपतियों को ही है, भ्रष्टाचारियों को नहीं? नेता चाहे कित्ते ही करोड़ का घपला-घोटाला कर दे फिर भी रहता वो नेता ही है। लेकिन अगर भ्रष्टाचारी दो पैसे की ऊपरी कमाई कर ले तो लोग बाग तुरंत उस पर तरह-तरह के आरोप लगाने बैठ जाते हैं। उसे व्यवस्था और देश पर 'कलंक' बताते हैं। दोगलापन।

जबकि यह आज तक का रिकार्ड है कि कभी किसी भ्रष्टाचारी ने किसी नेता-अफसर-उद्योगपति पर घूसखोरी का इल्जाम नहीं लगाया है। न ही उन्हें खुलेआम गरियाया है। भ्रष्टाचारी हर किसी की भावनाओं की कद्र करना बहुत अच्छे से जानता है। जित्ता नेता देश में विकास के प्रति तत्पर रहता है, उत्ता ही भ्रष्टाचारी भी। अपने पेट या अपने परिवार की खातिर दो पैसों की ऊपरी कमाई कोई अपराध तो नहीं?

न.. न.. मैं इस युक्ति से कतई सहमत नहीं कि भ्रष्टाचार व्यवस्था की दीमक है। अरे, भ्रष्टाचार तो व्यवस्था को हर प्रकार के 'अतिरिक्त बोझ' से बचाकर रखता है। जहां काम सीधे-सीधे नहीं हो पाता भ्रष्टाचारी उसे दो मिनट में 'सुविधा शुल्क' के साथ कर डालता है। इससे अतिरिक्त समय और श्रम दोनों का बचाव होता है।

मैं तो सात साल की सजा सोच-सोचकर ही हैरान व परेशान हूं। ये तो ऐसे हो गया, जैसे भ्रष्टाचारी ने किसी को अगवा कर डाला हो। किसी का माल-पानी लूट लिया हो। भले ही आप मुझसे सहमत न हों लेकिन मुझे यह कहने में रत्तीभर हर्ज नहीं कि भ्रष्टाचारी धरती का सबसे शांत प्राणी है। उसे केवल अपने काम (भ्रष्टाचार) से मतलब रहता है। दुनिया कहां जा रही है, कौन किसके बारे में क्या कह रहा है, उसे नहीं मतलब। न वो किसी को छेड़ता है न गलियाता। फिर भी, सरकार, बुद्धिजीवि, आम आदमी उसके पीछे हाथ-पैर धोकर पड़े रहते हैं।

दरअसल, कानून बनाने वालों को इस बात का एहसास ही नहीं कि भ्रष्टाचार करने में कित्ती 'मेहनत' और 'अकल' की जरूरत होती है। साथ-साथ, जान और इज्जत का भी कित्ता जोखिम रहता है। लोग ऐसा समझते हैं कि 'ऊपरी' या 'अंडर द टेबल' कमाई बहुत आसान होती है, अमां करके देखिए कभी, नानी तो क्या पुरखे तक याद आ जाएंगे, मेरा दावा है।

मुद्दे की बात यह है कि भ्रष्टाचार के नाम पर भ्रष्टाचारियों का 'उत्पीड़न' निरंतर जारी है। आम आदमी पार्टी ने तो भ्रष्टाचार का झुनझुना जनता को पकड़वाकर अपनी सरकार ही दिल्ली में बना ली। जबकि खुद उसकी पार्टी के एक मंत्री फर्जी डिग्री पाए जाने के मामले में संदिग्ध हैं। और कथित ईमानदार पार्टी के मुखिया खामोश हैं।

बहरहाल, अब समय आ गया है कि देश भर के भ्रष्टाचारी एक हों। सरकार के खिलाफ आंदोलनरत हों। ऐसे कानून अगर यों ही बनते रहे तो एक दिन भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों का 'अस्तित्व' ही 'खतरे' में पड़ जाएगा।

भ्रष्टाचार की हिफाजत के लिए भ्रष्टाचारी 'संघर्ष' करें, मैं उनके हमेशा साथ हूं।

गुरुवार, 7 मई 2015

सल्लू मियां की किस्मत

वाह! सल्लू मियां वाह! किस्मत हो तो आप जैसी वरना न हो। तेरहा साल बाद पांच साल की जेल का इधर फैसला आया और तीन घंटे में उधर बेल भी मिल गई। अब इसे आपकी तेज किस्मत न कहूं तो और क्या कहूं? हमारे देश में न्याय प्रक्रिया का इत्ता तेज होना कम से कम आम आदमी के पक्ष में तो संभव नहीं। चूंकि आप सलमान खान हैं, न केवल बॉलीवुड बल्कि वर्ल्ड फेम पर्सनाल्टी हैं, आपके लिए इत्ता भी न होगा तो फिर किसके लिए होगा!

सच बोलूं सल्लू मियां, आपको जेल की सजा की खबर सुनकर मुझे रत्तीभर भी 'अफसोस' न हुआ। अफसोस क्यों होता, आखिर आप सलमान खान हैं। न केवल रील बल्कि रियल लाइफ में भी अलग किस्म के हीरो हैं। 'बीइंग ह्यूमन' नाम की संस्था चलाते हैं। अब तलक न जाने कित्ते मजलूमों की मदद कर चुके हैं। साथ-साथ आपको बॉलीवुड में यारों का यार भी कहा जाता है। शाहरूख से कई दफा टेढ़ी होने के बाद भी आप दोनों के बीच 'आत्मीयता' का रिश्ता बरकरार है। बड़ी बात है।

आपको जेल जाने में डर क्यों लगेगा? हालांकि जेल का नाम सुनते ही थोड़ी घबराहट अवश्य हुई होगी। मगर फिल्मों में न जाने कित्ती दफा आप जेल जा चुके हैं। जाने कित्ती दफा विलेन को जेल पहुंचाया है। जेल आपके लिए कोई नई जगह नहीं। आप जैसी हाई-प्रोफाइल पर्सनालटी के लिए जेल जाना सम्मान की बात मानी जानी चाहिए। हमारे देश के न जाने कित्ते नेता और कुछ फिल्मी कलाकार भी जेल जा चुके हैं। हाल-फिलहाल, संजय दत्त तो जेल में ही हैं। यों भी, संजय दत्त के लिए जेल जाना-आना अब गुडे-गुड़ियों का खेल-सा हो गया है।

और फिर सल्लू मियां जेल वाले कौन सा आपसे चक्की पिसवाएंगे, पत्थर तूड़वाएंगे, हल चलवाएंगे। या सूखी-बासी रोटी खाने को देंगे। आपको भी आपके मन मुताबिक कोई काम वहां मिल ही जाएगा। सुना है, आप पेटिंग बहुत मस्त बना लेते हैं। आपकी बनाई पेटिंग की चरचाएं भी खूब होती हैं। सुना यह भी है कि संजय दत्त जेल में बढ़ईगिरी का काम कर रहे हैं।

यों जेल से घर आना-जाना तो लगा ही रहेगा। पेरोल किसलिए है। संजय दत्त तो न जाने कित्ती दफा पेरोल पर जेल से घर आ-जा चुके हैं। सेलिब्रिटी अपराधियों के यही तो 'ठाठ' होते हैं। अभी होता कोई मेरे जैसा आम आदमी तो जेल की सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद बेल मिलना तो दूर, कोर्ट से सीधा जेल भेज दिया गया होता।

अभी आप ठीक से जेल के करीब पहुंचे भी नहीं हैं मगर बॉलीवुड में आपके प्रति 'कथित सहानुभूति' के भाव ऐसे उमड़-घुमड़ रहे हैं मानो आपसे बढ़कर 'बीइंग ह्यूमन' इस धरती पर दूसरा कोई है ही नहीं। कथित सहानुभूति प्रकट करते-करते एक बड़े सिंगर ने गरीबों को 'कुत्ता' कह दिया। और गरीबों को फुटपाथ पर न सोने की हिदायत तक दे डाली। वाकई, बड़ी ही अजीबो-गरीब विचारधारा रखते हैं आपके बॉलीवुड वाले। गरीब के लिए शायद यहां कोई जगह ही नहीं। आपका यकायक 'बीइंग ह्यूमन' होना भी शायद 'जरूरत' कम 'मजबूरी' अधिक रही होगी।

चलिए खैर सजा तो सुना ही दी गई है। अब आप इन पांच साल जेल में आराम से आराम करना। लगातार काम करते-करते बंदा थक भी तो जाता है। इस नाते एक 'ब्रेक' तो बनता है। तब तलक हम आपकी फिल्में देख-देखकर ही अपना मन बहला लिया करेंगे।

बुधवार, 6 मई 2015

नेता, किसान और हमदर्दी

मेरे देश के नेताओं को किसानों की कित्ती 'फिकर' है, यह देख-देखकर ही मेरा सीना गर्व से दोगुना हुआ जा रहा है। बिचारे दिन-रात, संसद से लेकर सड़क तक, डटे हुए हैं किसानों को उनका वाजिब हक दिलवाने में। किसानों के हक के लिए संसद और सड़क पर बड़ी-बड़ी बहसें कर रहे हैं। जिन्हें चांस मिल रहा है, वे टीवी चैनलों पर जाकर किसानों की तबाही के प्रति अपनी 'संवेदनाएं' प्रकट कर रहे हैं। ईंट से ईंट बजाने और हर कीमत पर मुआवजा दिलवाने के 'क्रांतिकारी वायदे' भी कर रहे हैं।

सच बतलाऊं, आज मुझे पहली बार बिलकुल पहली बार महसूस हो रहा है कि किसानों-गरीबों के असली 'हितैषी' देश के नेता लोग ही हैं! चुनावों में किसानों से जो वायदे थे, एक-एक कर सब निभाने में लगे हैं। धन्य हैं मेरे देश के किसान, जो उन्हें इन जैसी 'जुझारू नेता' मिले!

मसला चाहे भूमि-अधिग्रहण बिल का हो या बारिश से तबाह फसल का सभी दल के नेता लोग तन-मन-धन से किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर यों खड़े हैं मानो यह उनके घर का ही मसला हो। रैलियां की जा रही हैं। रैलियों में किसानों-गरीबों को 'सम्मान' के साथ बुलाया जा रहा है। उनका दुख-दर्द सुना व अपनी स्थिति बताई जा रही है। कुछ वर्तमान सरकार को कोसा तो कुछ पिछली सरकार को गरियाया जा रहा है। मंच पर हल (भले उलटा ही सही) पकड़कर बताया जा रहा है कि भले ही हम किसान नहीं किंतु किसानों के 'शुभचिंतक' बहुत बड़े वाले हैं। बहाने से एक पार्टी ने अपने नेता को 'रि-लांच' भी कर दिया। रि-लांचिंग के बाद नेता बेहद जोश में और विपक्ष से चुन-चुनकर बदला लेने के मूड में दिखलाई पड़ रहे हैं। साथ-साथ किसानों के प्रति उनकी दरियादिली को देखके मेरा कलेजा मुंह को आ गया है।

इसमें रत्तीभर शक नहीं कि नेताओं और सरकार ने किसानों के लिए बहुत कुछ किया है! न न 'हंसे' नहीं। एकदम सच्ची बोल रहा हूं। देखा नहीं, सरकार ने किसानों को मुआवाजा बंटवाया। प्रत्येक किसान को बुला-बुलाकर नेताजी ने खुद अपने हाथों से चैक बांटे। भले ही चैक 60 या 1000 रुपए के रहे या दो-चार बाउंस भी हो गए लेकिन बांटे तो। उनके दुख में अपनी 'हमदर्दी' साझा तो की। यह क्या कम बड़ी बात है। इससे पता चलता है कि हमारे देश के नेता लोगों और सरकार को किसानों की कित्ती चिंता है। अगर चिंता न होती तो मुआवजा न दे रहे होते।

अजी, किसने क्या कहा, इसको छोड़िए। लोगों का तो काम है कहना। खुद कुछ करते-धरते हैं नहीं और जो करता है उसके काम में मीन-मेख निकालते हैं। देख नहीं, केवल भूमि-अधिग्रहण के ही मसले पर सांसदों ने संसद नहीं चलने दी। सरकार से भिड़ गए। किसानों की जमीन पर सरकार का कब्जा नेताओं को कतई बर्दाशत नहीं! बिचारे इसीलिए तो बहसबाजी में संघर्षरत हैं।

भूमि-अधिग्रहण के मसले पर नेताओं को किसानों के साथ खड़ा देख मेरे मन में आया कि कहीं नेता लोग अपनी जमीनें ही किसानों को न दे दें! आखिर हमदर्दी रखते हैं किसानों से। उनके दुख में पूरी शिद्दत के साथ खड़े हैं। हालांकि अभी ऐसा हुआ नहीं। फिर भी, सोचने में क्या जाता है।

मैं तो पूरी दुनिया से कहता हूं कि देखो, हमारे देश के नेताओं का दिल कित्ता बड़ा है, कित्ती हमदर्दी रखता है किसानों से। नाहक ही बदनाम किए हुए हैं नेता लोगों को।

देख भाई किसान, तू जरा भी चिंता न कर। नेता व सरकार सबकुछ ठीक कर देंगे। तू तो बस मुआवजे के चैक चुप-चुप अपनी अंटी में धर ले और अपनी किस्मत पर फख्र कर कि तू किसान है। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

मंगलवार, 5 मई 2015

भूचाल और व्यंग्य-संग्रह

हालांकि भूचाल आकर जा चुका हूं मगर मेरे मन में 'दहशत' अभी भी बरकरार है। न.. न.. दहशत मुझे इस बात की नहीं है कि अगले भूचाल में मैं 'खर्च' होऊंगा या नहीं, दहशत मुझे इस बात है कि प्रकाशक को अपने नए व्यंग्य-संग्रह के तईं दिए हजारों रुपयों पर पानी फिर जाएगा। एक तो जैसे-तैसे करके मैंने मन बनाया था अपना व्यंग्य-संग्रह छपवाने का, उसे बस भूचाल की 'नजर' नहीं लगनी चाहिए।

यों मेरा मन कतई न था कि मेरा कोई व्यंग्य-संग्रह भी आए, पर क्या कीजिएगा, मुझे पत्नी की जिद के आगे 'नतमस्तक' होना ही पड़ा। पत्नी ने साफ-सीधे शब्दों में कह दिया था कि इस साल या तो अपना व्यंग्य-संग्रह ले आओ नहीं तो कहीं और ठिकाना ढूंढो। पत्नी जिद करे और पति न माने, भला ऐसा भी कहीं हुआ है।

उस भूचाल से तो कैसे भी निपटा जा सकता है, यहां-वहां से मदद भी मांगी जा सकती है, लेकिन पत्नी द्वारा लाए गए भूचाल से बचना मुश्किल ही नहीं नामुंकिन है। इसीलिए मैं चाहता हूं कि अगला भूचाल आने से पहले ही मेरा व्यंग्य-संग्रह बाजार में आ जाए। इस बहाने पत्नी की निगाह में मेरी कुछ 'इज्जत' भी बढ़ जाएगी और लेखकों के बीच 'मान' भी। हो सकता है, आगे कोई ईनाम-पुरस्कार की जुगाड़ भी बैठ जाए।

वैसे मैंने, जब तलक मेरा व्यंग्य-संग्रह आ नहीं जाता, तमाम प्रकार के टोटके कर रखे हैं, भूचाल को रोके रखने के लिए। हर रोज सुबह उठते ही नहा-धोकर हनुमानजी के मंदिर जाकर हनुमान चालीसा पढ़ता हूं, घर के आगे नींबू-मिर्ची-पोदीना काले घागे में बांधकर लटका दिया है, बाएं हाथ में मंत्र-फूंका लाल धागा भी बांधना शुरू कर दिया है, दफ्तर से लौटते वक्त गुरुद्वारे, चर्च और मस्जिद में 'दुआ' मांगकर आता हूं। इत्ती चीजों में से कोई एक तो काम करेगी ही। विज्ञान पर पूरा भरोसा है लेकिन आस्था भी कोई चीज होती है कि नहीं।

और तो और भूचाल को खुश करने के लिए मैंने अपने व्यंग्य-संग्रह में एक गंभीर टाइप व्यंग्य भूचाल की स्तुति में भी लिख मारा है। ताकि कल को भूचाल मेरे लेखन व मंशा पर उंगुली न उठा सके। पियारे, समाज और लेखन में रहकर बहुत सारी चीजें देखनी पड़ती हैं। हमेशा प्रगतिशीलता की ऐंठ में ही ऐंठे रहने से कुछ नहीं मिलता सिवाय गालियों के।

मैंने तो यह भी तय कर लिया है कि मैं अपने व्यंग्य-संग्रह का विमोचन किसी मशहूर या वरिष्ठ व्यंग्यकार से नहीं बल्कि किसी नामी भू-गर्भ वैज्ञानिक से करवाऊंगा। ताकि भूचाल और भू-गर्भ वैज्ञानिक के बीच तालमेल बना रह सके। दोनों को खुश रखना जरूरी है। दोनों में से किसी एक के भी बुरा मान जाने से कहानी सेकेंडों में पलट सकती है।

फिलहाल, भूचाल से 'गुजारिश' ही कर सकता हूं अभी (और कभी) न आने की, बाकी 'उसकी मर्जी'।

रविवार, 3 मई 2015

तू पेड़ पर चढ़ा ही क्यों

अरे.. चलो.. छोड़ो.. न यार किसान ही तो था। पेड़ पर चढ़ा। अपने गमछे का फंदा बनाया और लटक गया। ऐसा यहां तमाम किसान हर रोज कर रहे हैं, उसने (गजेंद्र) ने भी कर लिया, कौन-सा नया काम किया। खुशकुशी करना तो किसान की 'नियति' में लिखा है। तो पियारे इस पर इत्ता 'शोक' जतलाने या फिकरमंद होने की जरूरत नहीं, जो हो गया सो हो गया। गीता में भी कहा गया है- जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है।

मीडिया वाले खामखां एक किसान की खुशकुशी पर इत्ता 'पगलाए' जा रहे हैं। पता नहीं बार-बार उस फुटेज को दिखलाकर साबित क्या करना चाहते हैं? कहानी तो निपट ली न, फिर रोकर क्या फायदा। हां फिर भी अगर शौक ही है रोने या बड़ी-बड़ी बातें या बहस करने का तो करते रहिए, इससे न मर चुके किसान को कुछ मिलने वाला है न उसके परिवार को। बहुत हुआ तो हमारे नेता लोग या सरकार गजेंद्र की मौत पर अच्छी-अच्छी तीन-चार लाइनें कह देगें। बस।

देखिए, बात को समझिए, किसान की मौत से कहीं ज्यादा जरूरी थी वो रैली। रैली भी तो किसानों की बेहतरी, उनके वाजिब हक के लिए ही की जा रही थी। बिचारे नेता लोगों को रैलियों में ही तो मौका मिलता है, अपना कलेजा किसानों-गरीबों के समक्ष निकाल देने का। उनसे बड़ी-बड़ी मगर अच्छी-अच्छी बातें करने का। अब इत्ती बड़ी रैली में न गया होगा किसी नेता का ध्यान उस पेड़ या किसान की तरफ। इधर निगाह बची, उधर दुर्घटना घट गई। होनी को भी कोई टाल सका है भला।

लोग भी बड़े अजीब हैं। वहां मौजूद नेताओं और पार्टी के बाउंसरों को दोष दे रहे हैं! उन बिचारों की क्या गलती? अरे भई गजेंद्र उनसे कहके थोड़े न गया था कि मैं फांसी पर झूलने जा रहा हूं। वो तो अचानक से सबकुछ हो गया। वहां मौजूद पार्टी के एक सदस्य ने बहुत ही मार्क की बात बोली कि 'अरविंद केजरीवाल उसे (किसान) बचाने पेड़ पर थोड़े न चढ़ जाते।' बात सही भी है। भला क्यों चढ़ जाते? क्या लगता था वो माननीय मुख्यमंत्रीजी का। लेकिन न भूलिए, केजरीवालजी एक दफा बिजली का कनेक्शन जोड़ने के वास्ते बिजली के खंबे पर चढ़ गए थे। मगर यह बात चुनाव से पहले की है पियारे। चुनाव से पहले बिचारा नेता जनता के वास्ते क्या-क्या नहीं करता। चुनाव जीत लेने के बाद उसे भी तो कुछ आराम चाहिए होता है न। है कि नहीं।

अब तलक हजारों किसान 'अपनी मर्जी' (!) से खुदकुशी कर चुके हैं। उन सब की मौत के लिए कोई नेता या सरकार थोड़े न दोषी मान लिए जाएंगे। ठीक है.. माना कि फसल चौपट हो गई, घर में न खाने को कुछ है, न बच्चों को पढ़ाने के लिए पैसे किंतु इसका समाधान कोई खुदकुशी थोड़े न है। किसान लोग इत्ता बड़ा कदम उठाने से पहले एक दफा हमारे देश के नेताओं से आनकर मिलते, उनके समक्ष अपनी परेशानियां रखते, साथ ही यह भी पूछ लेते कि क्या मैं आत्महत्या या खुदकुशी कर सकता हूं?

मैं बहुत अच्छे से जानता हूं मेरे देश के नेताओं को। वो कभी किसान से खुदकुशी करने के लिए नहीं कहते। प्रत्येक सरकार का प्रत्येक नेता प्रत्येक किसान के प्रति दिलो-जान से 'फिकरमंद' है। सुना है, आजकल देश के नेता लोग किसानों की फिकर में न रात में, न दिन में चैन से सो नहीं पा रहे। चौबीस घंटे अपने चेलों से उनका हालचाल लेते रहते हैं। अभी हाल मुआवजा भी तो बंटवाया है उन्होंने। मुआवजे के 60, 100 या 1000 रुपए कोई कम थोड़े न होते हैं।

मैं फिर कह रहा हूं कि सिरफिरा था गजेंद्र जो एंवई फांसी पर लटक गया। एक बार अरविंद केजरीवालजी से मिल लिया होता। वे बहुत ही अच्छे और अति-ईमानदार युगपुरुष हैं, उसकी परेशानी का हाल तुरंत खोज निकालते। यों भी, आप में एक से बढ़कर एक ईमानदार और भद्र नेता हैं।

मेरे विचार में, नैतिकता के आधार पर केजरीवाजी को कतई इस्तीफा नहीं देना चाहिए। उन्हें अपनी सरकार यों ही चलाते रहना चाहिए। इत्ती मुश्किलों के बाद तो मुख्यमंत्री की गद्दी हाथ आई है। फिर भी जो लोग उन पर दोष मढ़ रहे हैं, उन्हें मढ़ते रहने दीजिए। क्या करें, बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी खुशकुशियां तो होती रहती हैं।