मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मच्छर से भला काहे की एलर्जी

आजकल खूब सुनने-पढ़ने में आ रहा है कि मच्छरों ने किसका कैसे-कैसे रात को सोना मुहाल कर रखा है। लोग बाग बड़े चिंतित है कि मच्छर रात को आनकर उनका खून चूस जाते हैं। या सिर पर भून-भूनाते हुए मंडराते रहते हैं। कुछ ने यह तक कहा है कि रात को उन्हें चोर से कहीं ज्यादा मच्छरों से डर लगता है। मच्छरों से बचने के लिए वे रात-रात भर मच्छारमार-रैकेट से उन पर वार करते रहते हैं। रात में जाग-जागकर अगले दिन दफ्तर में सोने का कारण चाहकर भी बॉस को नहीं बता पाते।

मच्छरों ने इंसान नामक प्राणी को 'उलझन' में डाल दिया है। यह ऐसी उलझन है, जिसे जित्ता सुलझाने की कोशिश करो, और उलझती चली जाती है। हालांकि लोग कई-कई दफा लोकल स्तर पर मेयर या मंत्री आदि से गुहार लगा चुके हैं, मच्छरों के विरूद्ध छिकड़ाव अभियान छिड़वाने के प्रति लेकिन बात सुनकर भी अनसुनी कर दी जाती है। फिलहाल, लोग अपने स्तर पर ही मच्छरों से जंग लड़ने को अभिशप्त हैं। या अखबारों में हर रोज छपने वाले डॉक्टरिया-निर्देशों को पढ़-पढ़कर अपना बचाव कर रहे हैं। मतलब, एक मच्छर ने इंसान को अपने डंकों पर नचा रखा है।

मुझे यह समझ नहीं आता कि लोगों को मच्छरों से इत्ती एलर्जी क्यों है? क्यों हर वक्त हाथ-मुंह धोके उसके पीछे पड़े रहते हैं? क्यों हर वक्त उसे मारने-मरवाने का ही विचार बनाते रहते हैं? क्या पेट सिर्फ हम इंसानों का ही है? मच्छरों-कीट-पंतगों का पेट नहीं होता? जैसे हमें भूख लगती है, उन्हें भी भूख लगती होगी! अब यह बात अलहदा है कि जब हमें भूख लगती है, हम दाल-रोटी-चावल खाते हैं और जब मच्छरों को भूख लगती है, वे इंसान का खून चूसते हैं। भूख की खातिर खून चूसने में कोई बुराई तो नहीं! आखिर इंसान या मच्छर इत्ती मेहनत करते किसलिए है, पेट की खातिर ही न।

कित्ता अजीब है कि इंसान को इंसान का खून पीना, निकालना या चूसना बुरा नहीं लगता। वहीं अगर जरा-बहुत मच्छर इंसान का खून चूस ले तो तन-बदन में आग लग जाती है। मच्छरों को मारने के उपाय सोचे जाते हैं। क्वॉइल और हिट से उन पर हमला किया जाता है। हम इंसानों के हाथ न जाने कित्ते ही मासूम मच्छरों की बेमतलब मौत से सने हुए हैं। बिचारा मच्छर इंसान के खिलाफ किसी अदालत में मुकदमा कायम नहीं कर सकता इसीलिए उसकी बेचारगी का फायदा उठाया जाता है। तरह-तरह की प्रताड़नाएं उसे दी जाती हैं।

ठीक है, अगर कुछ ग्राम खून मच्छरों ने इंसानों का चूस भी लिया तो कौन-सा इंसानों का खून गंदा या कम हुआ जा रहा है। गारंटी के साथ कह सकता हूं कि इंसान का खून पीने के बाद मच्छरों को 'चक्कर' अवश्य आते होंगे। बिचारे कमजोर सेहत वाले मच्छरों की तो हालत ही खराब हो जाती होगी। यह हकीकत है कि इंसान का खून मच्छरों से कहीं ज्यादा दूषित व काला हो चुका है। वो तो मच्छरों की मजबूरी है, जो उन्हें इंसानों का खून पीना पड़ता है।

फिर कहते हैं कि मच्छर के काट लेने से फलां-फलां रोग या बीमारी हो गई। अरे, झूठ बोलते हैं सब के सब- भला मच्छर इंसान को क्या बीमार कर पाएगा? जब इंसान के खून में ही इत्ती खराबी है फिर इसमें मच्छरों का क्या दोष? नाहक ही मच्छर बिरादरी को बदनाम कर रखा है, हम इंसानों ने।

मानो या न मानो, मच्छर इस धरती का सबसे शांत प्राणी है। वो काटता तब ही है, जब उसे कोई छेड़ता है। वो खून तब ही पीता है, जब उसे भूख लगती है। वरना, मच्छर इंसानों से दूर रहना ही पसंद करता है। मच्छर को न धन का लालच है, न प्रॉपर्टी की चिंता, न नौकरी का झंझट। वो तो आराम से किसी नदी-नाले-पोखर में पड़ा चैन की बंसी बजाता रहता है। हां, इंसान भले ही मच्छरों से नफरत करे किंतु मच्छर ने कभी किसी से इंसान से नफरत नहीं की। उसके तईं सब बराबर हैं। तब ही तो बिना भेदभाव किए हर जाति, हर बिरादरी, हर संप्रदाय, हर धर्म, हर वर्ण के इंसान का खून चाव से चूसता है।

हम इंसानों को मच्छरों के प्रति अपनी सोच को बदलना होगा। उनके प्रति 'एलर्जी' का भाव न रख, प्यार का भाव रखना होगा। तब ही हम मच्छरों को पूरा 'सम्मान' दे पाएंगे।

कोई टिप्पणी नहीं: