सोमवार, 27 अप्रैल 2015

किसान की चिंता में

हे! किसान, देख नेताओं को तेरी कित्ती 'चिंता' है। तेरी चिंता में घुले जा रहे हैं। बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं। संसद के अंदर-बाहर तीखी-तेज बहस कर रहे हैं। एक-दूसरे के बीच जबरदस्त होड़-सी लगी है, तेरा (किसानों) 'मसीहा' बनने की। तुझे हुए नुकसान की भरपाई, न न अपनी जेब से नहीं, सरकारी खजाने से हर कीमत पर करना चाहते हैं। इसीलिए तो तुझे 60, 100 और 1000 रुपए के चैक बांटे-बंटवाए गए हैं। इत्ते रुपयों से तेरा कित्ता और कहां तलक भला हो पाएगा, यह तू जान।

एक नेता ही नहीं बुद्धिजीवि और मीडिया वाले भी तेरी चिंता में 'दुबले' हो गए हैं। हर रोज देखता हूं, अखबार भरे पड़े रहते हैं, तेरी बर्बाद फसलों और आत्महत्याओं की खबरों से। लंबी-लंबी स्टोरी छपी मिलती हैं, तुझे कहां से कित्ता मुआवजा मिला। टीवी चैनल वाले भूत-प्रेत और नागिन का बदला छोड़-छाड़कर तुझ पर 'फोकसड' हो गए हैं। एक से एक धांसू टाइप खबरें दिखलाई जा रही हैं तुझ पर। खबरें देखकर तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि एंकर अब रोया कि तब रोया। इत्ती संवेदनशीलता, इत्ती दया, इत्ती आत्मीयता उफ्फ आंखों पर विश्वास ही नहीं होता पियारे।

हालांकि तेरे प्रति चिंतित हो-होकर सभी लोग अपना-अपना दिल निकाले बैठे हैं लेकिन अभी तलक किसी ने भी अपनी जमीन या आधी सैलरी तेरे या तेरे परिवार के नाम करने की घोषणा नहीं की है। बस यहीं आनकर पेच फंस जाता है। वो कहावत है न कि दूर की ढोल सुहावने होते हैं। इसीलिए हर कोई ढोल को ढोल की तरह ही बजाना और बजवाना चाहता है। यहां सुहावनेपन की कल्पना किसी के भी मन में नहीं है।

सही भी है न, तेरे प्रति उन लोगों ने इत्ती चिंता जतलाली यह क्या कम है। यों भी, चिंता जतलाने में पैसे थोड़े न लगते हैं। किसी और का क्या कहूं, मैं खुद तेरे प्रति बहुत चिंतित हूं। तेरी चिंता में मैंने अपना ढाई किलो वजन कम कर लिया है। रात को सोते और दिन को जागते वक्त बस तेरी ही चिंता मुझे सताती रहती है।

मगर हे! किसान तू फिकर कतई न कर। नेता और मीडिया वाले मिलकर सबकुछ सही कर देंगे। सुख-दुख तो जीवन में लगे ही रहते हैं। मेरी मान, तू आत्महत्या करना बंद कर 'आध्यात्म' में मन लगा। सुबह-शाम गीता-रामायण-हनुमान चालीसा पढ़। हर चिंता, हर बाधा निश्चित ही दूर होगी।

और हां सरकार से जो 'इमदाद' मिल रही है बिना चू-चपड़ किए रख ले। भविष्य के काम आएगी। तू बस इत्ता ध्यान रख कि आगे आने वाले चुनावों में वोट तुझे फलां-फलां नेता और पार्टी को ही वोट देना है। बदले में तू 'वायदों की मिसरी' चख और मस्त रहे। क्या समझा...।