मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

क्यों तू परेशान है किसान

पियारे किसान,

तू इत्ता परेशान क्यों है? क्यों खामखां जान देने पर तुला हुआ है? क्यों बार-बार जा-जाकर सरकार और मंत्रियों से 'मुआवजे' के वास्ते 'गुहार' लगा रहा है? क्यों अपनी फसल बर्बादी का प्रदर्शन कर रहा है? देख, सुन, अब जो हो गया सो हो गया। होनी को न तू टाल सके है न सरकार। तो ठंड रख। दिमाग पर ज्यादा लोड न ले। इस दफा फसल खराब हुई तो क्या, अगली दफा अच्छी हो जाएगी। चिंता न कर। चिंता चिता समान।

देख भई, एक बात कान खोलकर सुन ले, तेरी 'बर्बादी' या 'आत्महत्या' से 'फर्क' न मंत्रीजी पर पड़ रहा है] न सरकार पर और न बुद्धिजीवियों पर। सब अपने-अपने में 'मस्त' और 'व्यस्त' हैं। हां, जब थोड़ा-बहुत यहां-वहां से 'जोर' पड़ता है तो तेरे कने आ जाते हैं, तेरा हाल-चाल लेने। पूछने कि और सब कैसा चल रहा है? कित्ती फसल या कित्ता गेंहू कहां-कहां, किस-किसका बर्बाद हुआ? बाद में, सभी थोड़ा मौसम को गरिया लेते हैं और थोड़ा केंद्र या राज्य सरकार को। फिर सब अपने-अपने रास्तों पर निकल लेते हैं, तुझे मुआवजे का भ्रम देकर।

देख भई, बुरा न मानियो। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा था, जब तूने सरकारी इमदाद (चैक) को मीडिया-अखबारों के सामने दिखाया था। अरे, 60 या 100 रुपए के चैक कोई कम नहीं होते! बहुत मोटी रकम (!) होती है ये। क्या तुझे नहीं मालूम कि गए साल योजना आयोग वालों ने 25 से 30 रुपए कमाने वालों को गरीबी की श्रेणी से ऊपर बतलाया था। और, एक मंत्रीजी ने ज्ञान दिया था कि 15 से 25 रुपए में भोजन किया जा सकता है। और, तू 60 रुपए के चैक पर इत्ता 'व्यथित' हुए जा रहा है।

अरे, शुक्र माना कि सरकार और मंत्रीजी ने इत्ती व्यस्ताओं के बीच तेरी भी सुध ले ली। तुझे चैक बंटवा दिए। वरना, उन्हें कोई एक ही काम थोड़े है। हजारों काम हैं उनके सिर। यह भी तो समझ, फसल तबाह तेरी हुई है, बैंकों-साहूकारों का कर्ज तुझ पर है, बीवी-बच्चे तेरे भूखों मर हैं अब इसमें सरकार या मंत्रीजी क्या करें। तेरा दुख, तू जान। फिर भी अगर आत्महत्या करने का तुझे इत्ता ही शौक है तो कर भाई। न सरकार, न कोई मंत्री तेरी मैय्यत पर रोने आ रहा है।

यह तो प्योर मौसम की बदमाशी रही है। मौसम के आगे न तू कुछ कर सके है न सरकार न मंत्री लोग। तुझे पता है, जब तेरी फसल पर ओलों की मार पड़ रही थी तब प्रधानमंत्रीजी विदेश में और सरकार अन्य कामों में बिजी थी। वो तो तेरी सुध तब आई, जब पानी बिलकुल ही सिर के ऊपर से गुजर गया। तब ही तो आनन-फानन में 60-60, 100-100, 1000-1000 रुपए के चैक बंटवाए। और तू कहता है कि सरकार तेरी चिंता नहीं करती। इत्ती तो करती है। अब अपना दिल निकालकर तो तेरे सामने रख नहीं सकती। क्या समझा...।

अब जो हो गया सो हो गया। हुए पर 'खाक' डाल और आगे की सोच। दिमाग को शांत रख। आत्महत्या न कर। मेरी बात मान, शहर जाकर तू किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखा। थोड़ा भजन-भगवान-आध्यात्म में मन लगा। जीवन में सुख-दुख तो लगे रहते हैं। गीता में भी कहा गया है- जो होता है अच्छे के लिए होता है। हो सकता है, इसमें भी कोई अच्छाई छिपी हो।

हमारी सरकार और मंत्री लोग किसानों के वास्ते बहुत कुछ कर रहे हैं। आजकल रात-दिन बस उन्हीं की चिंता में लगे रहते हैं। उन पर भरोसा रख। जो मिल रहा है ले ले। जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। बाकी तेरी मर्जी।

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