रविवार, 12 अप्रैल 2015

भ्रष्टाचार बनाम हेल्पलाइन

इतिहास गवाह है कि भ्रष्टाचार ने कभी किसी को 'कष्ट' नहीं पहुंचाया! बल्कि सारे कष्ट अपने सिर ही लिए हैं। लेकिन फिर भी लोग भ्रष्टाचार के पीछे कुत्ते-बिल्ली की तरह पड़े रहते हैं। चौबीस घंटे दिमाग में बस एक ही बात घुमती रहती है कि देश-समाज-व्यवस्था को कैसे 'भ्रष्टाचार-मुक्त' बनाना है।

सुनने में आया है कि दिल्ली की नई-नवेली 'आप' सरकार ने दिल्ली को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने के लिए कोई 'हेल्पलाइन' शुरू की है। जब भी कहीं भ्रष्टाचार आपको परेशान करे तुरंत हेल्पलाइन पर कॉल करें। या फिर आप उसका 'स्टिंग' भी बना सकते हैं।

बताइए, एक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए इत्ता ताम-झाम। गोया भ्रष्टाचार न हुआ फिल्म का खलनायक हो गया।

अरे, भ्रष्टाचार को क्या तीतर-बटेर समझ रखा है, जो हेल्पलाइन से पकड़ जाएगा। भ्रष्टाचार तो हर वक्त, हर कहीं 'स्वतंत्र' रहता है, उसे पकड़ने की क्या जरूरत। फिर, इस बात की क्या गारंटी है कि हेल्पलाइन पर सारे फोन भ्रष्टाचार की शिकायत के ही आएंगे? हेल्पलाइन पर फोन कर कोई राहुल गांधी की लोकेशन, सनी लियोनी की फिल्म रिलीज होने की तारीख, अपने पिज्जा पहुंचने, ना-पहुंचने का स्टेटस, पति-पत्नी के बीच का झगड़ा-टंटा सुलटवाने, भैंस के गायब होने आदि-आदि के बारे में भी तो पूछताछ कर सकता है। हेल्पलाइन तो भई हेल्पलाइन है। हेल्प के वास्ते कुछ भी पूछा जा सकता है।

मुझे समझ नहीं आता कि दिल्ली सरकार भ्रष्टाचार को 'जड़' से समाप्त कर ऐसा कौन-सा बड़ा भारी तीर मार लेगी। जिस परंपरा की जड़ें इत्ती गहरी हैं। जो हमारे न केवल 'तंत्र' बल्कि 'तंतु' तक में रच-बस गया है, वो मात्र हेल्पलाइन के सहारे मिट जाएगा। दशकों-पीढ़ियों से हम भ्रष्टाचार के रंग-बिरंगे किस्से सुनते चले आए हैं। क्या उसका मुकाबला हेल्पलाइन कर पाएगी?

दिन में ख्याली सपने दिखाना तो कोई 'आप' से सीखे। अपनी पार्टी की अंदरूनी कलह थाम नहीं पा रहे, चले हैं भष्टाचार को रोकेंगे। सरकार ने तो भ्रष्टाचार को 'लल्ला' समझ रखा है कि हेल्पलाइन का झुनझुना दिखाकर तुरंत बहल जाएगा। आत्म-समर्पण कर देगा।

इस बात को कोई समझता ही नहीं कि दिल बहलाने को भ्रष्टाचार कित्ता जरूरी है। भ्रष्टाचार रहता है तो तरह-तरह की रोचक एवं रोमांचक खबरें सुनने-पढ़ने को मिलती रहती हैं। जब भी किसी मामूली चपरासी, किसी अदने से बाबू, किसी बड़े अफसर आदि के यहां से बिस्तर के नीचे, दीवार के पीछे या तहखाने में नोट छिपे होने की खबरें आती हैं तो दिल को बड़ी राहत मिलती है। उन पर 'गर्व' करने को जी करता है। एहसास होता है कि हमारे देश में नोट की कहीं कमी नहीं। बस तरीके आने चाहिए नोट कमाने के। भ्रष्टाचार चाहे सीट के नीचे से आए या बगल से... उद्देश्य नोट कमाना ही होता है। ऐसे 'मनी माइंडिड' लोगों की तो हमारे देश को सख्त जरूरत है। मगर सरकार उसी को खत्म करना चाहती है। हद है।

समाज और व्यवस्था में जैसे और हकीकतें हैं, उसी तरह से भ्रष्टाचार भी एक हकीकत है। हकीकत से मुंह छिपाके आज तक किसका भला हुआ है? हकीकत को फेस करना सीखें नाकि उसे मिटाना। ऐसे हेल्पलाइन से भ्रष्टाचार अगर काबू में आना लगा तो देशभर के भ्रष्टाचारी 'ठलुए' हो जाएंगे। और मैं नहीं चाहता कि मेरे देश के भ्रष्टाचारी ठलुए हों। जैसे पेट हमारा है, उनका भी है। पेट हरा-भरा रहता है तो जीवन ज्यादा आसान लगता है।

फिर भी जिन्हें यह 'खुशफहमी' पालनी है कि हेल्पलाइन से भ्रष्टाचार मिट जाएगा, पाले रहें। उनकी मर्जी।

2 टिप्‍पणियां:

ऋषभ शुक्ला ने कहा…

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Tushar Rastogi ने कहा…

Badhiya post