मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मच्छर से भला काहे की एलर्जी

आजकल खूब सुनने-पढ़ने में आ रहा है कि मच्छरों ने किसका कैसे-कैसे रात को सोना मुहाल कर रखा है। लोग बाग बड़े चिंतित है कि मच्छर रात को आनकर उनका खून चूस जाते हैं। या सिर पर भून-भूनाते हुए मंडराते रहते हैं। कुछ ने यह तक कहा है कि रात को उन्हें चोर से कहीं ज्यादा मच्छरों से डर लगता है। मच्छरों से बचने के लिए वे रात-रात भर मच्छारमार-रैकेट से उन पर वार करते रहते हैं। रात में जाग-जागकर अगले दिन दफ्तर में सोने का कारण चाहकर भी बॉस को नहीं बता पाते।

मच्छरों ने इंसान नामक प्राणी को 'उलझन' में डाल दिया है। यह ऐसी उलझन है, जिसे जित्ता सुलझाने की कोशिश करो, और उलझती चली जाती है। हालांकि लोग कई-कई दफा लोकल स्तर पर मेयर या मंत्री आदि से गुहार लगा चुके हैं, मच्छरों के विरूद्ध छिकड़ाव अभियान छिड़वाने के प्रति लेकिन बात सुनकर भी अनसुनी कर दी जाती है। फिलहाल, लोग अपने स्तर पर ही मच्छरों से जंग लड़ने को अभिशप्त हैं। या अखबारों में हर रोज छपने वाले डॉक्टरिया-निर्देशों को पढ़-पढ़कर अपना बचाव कर रहे हैं। मतलब, एक मच्छर ने इंसान को अपने डंकों पर नचा रखा है।

मुझे यह समझ नहीं आता कि लोगों को मच्छरों से इत्ती एलर्जी क्यों है? क्यों हर वक्त हाथ-मुंह धोके उसके पीछे पड़े रहते हैं? क्यों हर वक्त उसे मारने-मरवाने का ही विचार बनाते रहते हैं? क्या पेट सिर्फ हम इंसानों का ही है? मच्छरों-कीट-पंतगों का पेट नहीं होता? जैसे हमें भूख लगती है, उन्हें भी भूख लगती होगी! अब यह बात अलहदा है कि जब हमें भूख लगती है, हम दाल-रोटी-चावल खाते हैं और जब मच्छरों को भूख लगती है, वे इंसान का खून चूसते हैं। भूख की खातिर खून चूसने में कोई बुराई तो नहीं! आखिर इंसान या मच्छर इत्ती मेहनत करते किसलिए है, पेट की खातिर ही न।

कित्ता अजीब है कि इंसान को इंसान का खून पीना, निकालना या चूसना बुरा नहीं लगता। वहीं अगर जरा-बहुत मच्छर इंसान का खून चूस ले तो तन-बदन में आग लग जाती है। मच्छरों को मारने के उपाय सोचे जाते हैं। क्वॉइल और हिट से उन पर हमला किया जाता है। हम इंसानों के हाथ न जाने कित्ते ही मासूम मच्छरों की बेमतलब मौत से सने हुए हैं। बिचारा मच्छर इंसान के खिलाफ किसी अदालत में मुकदमा कायम नहीं कर सकता इसीलिए उसकी बेचारगी का फायदा उठाया जाता है। तरह-तरह की प्रताड़नाएं उसे दी जाती हैं।

ठीक है, अगर कुछ ग्राम खून मच्छरों ने इंसानों का चूस भी लिया तो कौन-सा इंसानों का खून गंदा या कम हुआ जा रहा है। गारंटी के साथ कह सकता हूं कि इंसान का खून पीने के बाद मच्छरों को 'चक्कर' अवश्य आते होंगे। बिचारे कमजोर सेहत वाले मच्छरों की तो हालत ही खराब हो जाती होगी। यह हकीकत है कि इंसान का खून मच्छरों से कहीं ज्यादा दूषित व काला हो चुका है। वो तो मच्छरों की मजबूरी है, जो उन्हें इंसानों का खून पीना पड़ता है।

फिर कहते हैं कि मच्छर के काट लेने से फलां-फलां रोग या बीमारी हो गई। अरे, झूठ बोलते हैं सब के सब- भला मच्छर इंसान को क्या बीमार कर पाएगा? जब इंसान के खून में ही इत्ती खराबी है फिर इसमें मच्छरों का क्या दोष? नाहक ही मच्छर बिरादरी को बदनाम कर रखा है, हम इंसानों ने।

मानो या न मानो, मच्छर इस धरती का सबसे शांत प्राणी है। वो काटता तब ही है, जब उसे कोई छेड़ता है। वो खून तब ही पीता है, जब उसे भूख लगती है। वरना, मच्छर इंसानों से दूर रहना ही पसंद करता है। मच्छर को न धन का लालच है, न प्रॉपर्टी की चिंता, न नौकरी का झंझट। वो तो आराम से किसी नदी-नाले-पोखर में पड़ा चैन की बंसी बजाता रहता है। हां, इंसान भले ही मच्छरों से नफरत करे किंतु मच्छर ने कभी किसी से इंसान से नफरत नहीं की। उसके तईं सब बराबर हैं। तब ही तो बिना भेदभाव किए हर जाति, हर बिरादरी, हर संप्रदाय, हर धर्म, हर वर्ण के इंसान का खून चाव से चूसता है।

हम इंसानों को मच्छरों के प्रति अपनी सोच को बदलना होगा। उनके प्रति 'एलर्जी' का भाव न रख, प्यार का भाव रखना होगा। तब ही हम मच्छरों को पूरा 'सम्मान' दे पाएंगे।

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

किसान की चिंता में

हे! किसान, देख नेताओं को तेरी कित्ती 'चिंता' है। तेरी चिंता में घुले जा रहे हैं। बड़ी-बड़ी रैलियां कर रहे हैं। संसद के अंदर-बाहर तीखी-तेज बहस कर रहे हैं। एक-दूसरे के बीच जबरदस्त होड़-सी लगी है, तेरा (किसानों) 'मसीहा' बनने की। तुझे हुए नुकसान की भरपाई, न न अपनी जेब से नहीं, सरकारी खजाने से हर कीमत पर करना चाहते हैं। इसीलिए तो तुझे 60, 100 और 1000 रुपए के चैक बांटे-बंटवाए गए हैं। इत्ते रुपयों से तेरा कित्ता और कहां तलक भला हो पाएगा, यह तू जान।

एक नेता ही नहीं बुद्धिजीवि और मीडिया वाले भी तेरी चिंता में 'दुबले' हो गए हैं। हर रोज देखता हूं, अखबार भरे पड़े रहते हैं, तेरी बर्बाद फसलों और आत्महत्याओं की खबरों से। लंबी-लंबी स्टोरी छपी मिलती हैं, तुझे कहां से कित्ता मुआवजा मिला। टीवी चैनल वाले भूत-प्रेत और नागिन का बदला छोड़-छाड़कर तुझ पर 'फोकसड' हो गए हैं। एक से एक धांसू टाइप खबरें दिखलाई जा रही हैं तुझ पर। खबरें देखकर तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि एंकर अब रोया कि तब रोया। इत्ती संवेदनशीलता, इत्ती दया, इत्ती आत्मीयता उफ्फ आंखों पर विश्वास ही नहीं होता पियारे।

हालांकि तेरे प्रति चिंतित हो-होकर सभी लोग अपना-अपना दिल निकाले बैठे हैं लेकिन अभी तलक किसी ने भी अपनी जमीन या आधी सैलरी तेरे या तेरे परिवार के नाम करने की घोषणा नहीं की है। बस यहीं आनकर पेच फंस जाता है। वो कहावत है न कि दूर की ढोल सुहावने होते हैं। इसीलिए हर कोई ढोल को ढोल की तरह ही बजाना और बजवाना चाहता है। यहां सुहावनेपन की कल्पना किसी के भी मन में नहीं है।

सही भी है न, तेरे प्रति उन लोगों ने इत्ती चिंता जतलाली यह क्या कम है। यों भी, चिंता जतलाने में पैसे थोड़े न लगते हैं। किसी और का क्या कहूं, मैं खुद तेरे प्रति बहुत चिंतित हूं। तेरी चिंता में मैंने अपना ढाई किलो वजन कम कर लिया है। रात को सोते और दिन को जागते वक्त बस तेरी ही चिंता मुझे सताती रहती है।

मगर हे! किसान तू फिकर कतई न कर। नेता और मीडिया वाले मिलकर सबकुछ सही कर देंगे। सुख-दुख तो जीवन में लगे ही रहते हैं। मेरी मान, तू आत्महत्या करना बंद कर 'आध्यात्म' में मन लगा। सुबह-शाम गीता-रामायण-हनुमान चालीसा पढ़। हर चिंता, हर बाधा निश्चित ही दूर होगी।

और हां सरकार से जो 'इमदाद' मिल रही है बिना चू-चपड़ किए रख ले। भविष्य के काम आएगी। तू बस इत्ता ध्यान रख कि आगे आने वाले चुनावों में वोट तुझे फलां-फलां नेता और पार्टी को ही वोट देना है। बदले में तू 'वायदों की मिसरी' चख और मस्त रहे। क्या समझा...।

रविवार, 26 अप्रैल 2015

खुदकुशी पर राजनीति

कहा जा रहा है कि नेता लोग 'खुदकुशी' पर 'राजनीति' कर रहे हैं। अजीब बात है, राजनीति नेता नहीं करेगा तो क्या मंदिर का पुजारी करेगा? नेता को- हर बात, हर मुद्दे पर- राजनीति करने का पूरा 'हक' है। नेता जब तलक राजनीति नहीं कर लेता, न उसका सुबह का न रात का खाना हजम नहीं होता। चुनाव में जाने और वोट पाने के लिए राजनीति करना बेहद जरूर है। वरना, लोग नेता को भूल जाएंगे और राजनीति को भी।

क्या हुआ जो नेता लोग खुदकुशी पर राजनीति कर रहे हैं? कुछ गलत तो नहीं कर रहे! जित्ती हो सकती है, उत्ती ही कर रहे हैं। नेता अगर खुदकुशी पर राजनीति नहीं कर रहे होते न तो यह मामला इत्ता उछलता भी नहीं। वहीं का वहीं दब-दबा कर रह जाता।

फिर यह भी तो समझने की कोशिश कीजिए कि नेता लोग खुदकुशी पर राजनीति अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए नहीं बल्कि 'जनहित' की खातिर रहे हैं। किसी पर विषय या मुद्दे पर नेताओं द्वारा राजनीति जनता की भलाई के वास्ते ही की जाती है। नेता अगर जनता का ध्यान नहीं रखेंगे तो क्या मोहल्ले का चौकरीदार रखेगा।

एक तो किसान होकर उसने खुदकुशी कर ली और चाह रहे हैं कि नेता लोग राजनीति भी न करें! अरे, यह तो 'गोल्डन चांस' है उनके लिए। इस मुद्दे पर तो सौ फीसद राजनीति बनती है। किसान की खुदकुशी पर तो खासकर। देश का किसान जित्ती अधिक आत्महत्याएं करेगा, नेता लोग उत्ती ही राजनीति करेंगे। आखिर नेता को देश के किसान की चिंता है। हर पल वे उसकी बेहतरी के लिए ही सोचते हैं।

खुदकुशी के मामले में जिनको नेताओं की भूमिका संदिग्ध लग रही है, वे जाकर अपनी भैंस चराएं। नेता लोग एकदम सही रास्ते पर हैं। इस राजनीति का फायदा उन्हें आगे आने वाले चुनावों में अच्छे से मिलेगा। यों भी, वोट में सबसे अधिक प्रतिशत तो गरीबों-किसानों का ही होता है।

नेताओं को अगर देश के किसानों की चिंता न होती तो अपने सारे जरूर कामकाज छोड़-छाड़कर संसद में किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर बहस नहीं कर रहे होते। किसान आजकल नेताओं के लिए सबसे हॉट 'टर्निंग पांइट' है। आजकल तो हर दूसरा नेता यह कहता हुआ मिल जाता है कि मेरा संबंध भी खेती-किसानी से रहा है। मैं खुद किसान परिवार से हूं। गर्व है मुझे मेरे देश के नेताओं पर।

खुदकुशी करके जिसे जाना था वो तो खैर चला गया। बहुत से बहुत उसकी मौत पर 'शोक' जताया जा सकता है। लेकिन इस बहाने हमारे नेताओं को एक 'लॉलीपॉप' जरूर मिल गई है, चौबीस घंटे चूसने के लिए। जय हो नेताओं की। जय हो राजनीति की।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

क्यों तू परेशान है किसान

पियारे किसान,

तू इत्ता परेशान क्यों है? क्यों खामखां जान देने पर तुला हुआ है? क्यों बार-बार जा-जाकर सरकार और मंत्रियों से 'मुआवजे' के वास्ते 'गुहार' लगा रहा है? क्यों अपनी फसल बर्बादी का प्रदर्शन कर रहा है? देख, सुन, अब जो हो गया सो हो गया। होनी को न तू टाल सके है न सरकार। तो ठंड रख। दिमाग पर ज्यादा लोड न ले। इस दफा फसल खराब हुई तो क्या, अगली दफा अच्छी हो जाएगी। चिंता न कर। चिंता चिता समान।

देख भई, एक बात कान खोलकर सुन ले, तेरी 'बर्बादी' या 'आत्महत्या' से 'फर्क' न मंत्रीजी पर पड़ रहा है] न सरकार पर और न बुद्धिजीवियों पर। सब अपने-अपने में 'मस्त' और 'व्यस्त' हैं। हां, जब थोड़ा-बहुत यहां-वहां से 'जोर' पड़ता है तो तेरे कने आ जाते हैं, तेरा हाल-चाल लेने। पूछने कि और सब कैसा चल रहा है? कित्ती फसल या कित्ता गेंहू कहां-कहां, किस-किसका बर्बाद हुआ? बाद में, सभी थोड़ा मौसम को गरिया लेते हैं और थोड़ा केंद्र या राज्य सरकार को। फिर सब अपने-अपने रास्तों पर निकल लेते हैं, तुझे मुआवजे का भ्रम देकर।

देख भई, बुरा न मानियो। उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा था, जब तूने सरकारी इमदाद (चैक) को मीडिया-अखबारों के सामने दिखाया था। अरे, 60 या 100 रुपए के चैक कोई कम नहीं होते! बहुत मोटी रकम (!) होती है ये। क्या तुझे नहीं मालूम कि गए साल योजना आयोग वालों ने 25 से 30 रुपए कमाने वालों को गरीबी की श्रेणी से ऊपर बतलाया था। और, एक मंत्रीजी ने ज्ञान दिया था कि 15 से 25 रुपए में भोजन किया जा सकता है। और, तू 60 रुपए के चैक पर इत्ता 'व्यथित' हुए जा रहा है।

अरे, शुक्र माना कि सरकार और मंत्रीजी ने इत्ती व्यस्ताओं के बीच तेरी भी सुध ले ली। तुझे चैक बंटवा दिए। वरना, उन्हें कोई एक ही काम थोड़े है। हजारों काम हैं उनके सिर। यह भी तो समझ, फसल तबाह तेरी हुई है, बैंकों-साहूकारों का कर्ज तुझ पर है, बीवी-बच्चे तेरे भूखों मर हैं अब इसमें सरकार या मंत्रीजी क्या करें। तेरा दुख, तू जान। फिर भी अगर आत्महत्या करने का तुझे इत्ता ही शौक है तो कर भाई। न सरकार, न कोई मंत्री तेरी मैय्यत पर रोने आ रहा है।

यह तो प्योर मौसम की बदमाशी रही है। मौसम के आगे न तू कुछ कर सके है न सरकार न मंत्री लोग। तुझे पता है, जब तेरी फसल पर ओलों की मार पड़ रही थी तब प्रधानमंत्रीजी विदेश में और सरकार अन्य कामों में बिजी थी। वो तो तेरी सुध तब आई, जब पानी बिलकुल ही सिर के ऊपर से गुजर गया। तब ही तो आनन-फानन में 60-60, 100-100, 1000-1000 रुपए के चैक बंटवाए। और तू कहता है कि सरकार तेरी चिंता नहीं करती। इत्ती तो करती है। अब अपना दिल निकालकर तो तेरे सामने रख नहीं सकती। क्या समझा...।

अब जो हो गया सो हो गया। हुए पर 'खाक' डाल और आगे की सोच। दिमाग को शांत रख। आत्महत्या न कर। मेरी बात मान, शहर जाकर तू किसी अच्छे मनोचिकित्सक को दिखा। थोड़ा भजन-भगवान-आध्यात्म में मन लगा। जीवन में सुख-दुख तो लगे रहते हैं। गीता में भी कहा गया है- जो होता है अच्छे के लिए होता है। हो सकता है, इसमें भी कोई अच्छाई छिपी हो।

हमारी सरकार और मंत्री लोग किसानों के वास्ते बहुत कुछ कर रहे हैं। आजकल रात-दिन बस उन्हीं की चिंता में लगे रहते हैं। उन पर भरोसा रख। जो मिल रहा है ले ले। जल्द ही सब ठीक हो जाएगा। बाकी तेरी मर्जी।

सोमवार, 20 अप्रैल 2015

बधाई हो, वो लौट आए हैं

आखिर वो आ ही गए। इत्ते दिनों से न केवल मुझे बल्कि देश को भी उनके लौटकर आने का इंतजार था। उनके इंतजार में मेरी तो आंखें ही 'पथरा' गईं थीं। लेकिन अब 'सुकून' है। अब मुझे हर रोज न अपनी गली, न अपने मोहल्ले, न अपने शहर के मुख्य चौराहों, न टीवी चैनलों पर उनकी खोज-खबर नहीं लेनी पड़ेगी। क्या बताऊं, इन दो महीनों उनके इंतजार में मैं कित्ता 'बेकरार' रहा हूं। मैंने तो उनकी 'गुमशुदगी' की रपट तक अपने इलाके के थाने में लिखवा दी थी। चूंकि अब वे घर लौट गए हैं सो अपनी वो रपट मैंने वापस ले ली है।

देख रहा हूं, उनके वापस आते ही पार्टी के कार्यकर्ताओं के चेहरों पर 'रौनक' लौट आई है। वे पहले से ज्यादा खुश और खुद को स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं। नहीं तो इन महीनों में उन्हें किसी को जवाब देते नहीं बन पा रहा था कि उनके नेता कहां हैं? जित्ते मुंह थे, उत्ती बातें थीं। लोग बाग भी अपने-अपने हिसाब से जाने क्या-क्या अनुमान लगाए पड़े थे। हालांकि यह रहस्य अभी भी बरकरार है कि वे विदेश में थे या अपने देश में। पार्टी के भीतर कोई भी ठीक-ठाक बोलने को तैयार नहीं है।

फिर भी उन्हीं की पार्टी के सज्जन बता रहे थे कि वे मौज-मस्ती के लिए नहीं बल्कि पार्टी का रोड-मैप तैयार करने के वास्ते दो महीने की 'खास छुट्टी' पर गए थे। वाह! क्या बात है। पार्टी का रोड-मैप अब देश में नहीं विदेश जाकर तैयार होने लगा है। ज्यादा मुझे जानकारी नहीं, हो सकता है, विपश्यना से रोड-मैप ही तैयार होता हो! अगर वाकई ऐसा ही है तो एक दफा मैं भी विदेश जाकर विपश्यना करके अपने लेखन का रोड-मैप तैयार करना चाहता हूं। यों मेरे लेखन में कुछ भी ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। जो लेख जहां भेजो वहीं 'डंप' हो लेता है।

चलिए खैर तमाम तरह की बातों से इतर खुशी और राहत की बात यह है कि वे लौटकर आ चुके हैं। उनके लौटकर आने की खुशी में पार्टी वालों ने पटाखे-सटाखे भी खूब चलाए। पटाखे चलाना इसलिए भी बनता था क्योंकि पिछले चुनावों में उन बिचारों को यह मौका ही नहीं मिल पाया था। सारे के सारे पटाखे एक कोने में 'बेसहारा' से पड़े थे। इस बहाने ही सही पर पार्टी के भीतर कुछ तो 'आत्मविश्वास' आया। नहीं तो अब तलक न घर के रहे थे न घाट के।

फिलहाल, यह 'जश्न' मनाने का समय है। आप भी जश्न मनाइए और मुझे भी मनाने दीजिए। हां, उनसे इत्ती गुजारिश जरूर करना चाहूंगा कि अब अगर आगे से कहीं भी जाएं तो कम से कम हमें बताकर जरूर जाएं। ताकि हम रातों को चैन से सो लें और विपक्ष को जवाब दे सकें।

रविवार, 12 अप्रैल 2015

भ्रष्टाचार बनाम हेल्पलाइन

इतिहास गवाह है कि भ्रष्टाचार ने कभी किसी को 'कष्ट' नहीं पहुंचाया! बल्कि सारे कष्ट अपने सिर ही लिए हैं। लेकिन फिर भी लोग भ्रष्टाचार के पीछे कुत्ते-बिल्ली की तरह पड़े रहते हैं। चौबीस घंटे दिमाग में बस एक ही बात घुमती रहती है कि देश-समाज-व्यवस्था को कैसे 'भ्रष्टाचार-मुक्त' बनाना है।

सुनने में आया है कि दिल्ली की नई-नवेली 'आप' सरकार ने दिल्ली को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने के लिए कोई 'हेल्पलाइन' शुरू की है। जब भी कहीं भ्रष्टाचार आपको परेशान करे तुरंत हेल्पलाइन पर कॉल करें। या फिर आप उसका 'स्टिंग' भी बना सकते हैं।

बताइए, एक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए इत्ता ताम-झाम। गोया भ्रष्टाचार न हुआ फिल्म का खलनायक हो गया।

अरे, भ्रष्टाचार को क्या तीतर-बटेर समझ रखा है, जो हेल्पलाइन से पकड़ जाएगा। भ्रष्टाचार तो हर वक्त, हर कहीं 'स्वतंत्र' रहता है, उसे पकड़ने की क्या जरूरत। फिर, इस बात की क्या गारंटी है कि हेल्पलाइन पर सारे फोन भ्रष्टाचार की शिकायत के ही आएंगे? हेल्पलाइन पर फोन कर कोई राहुल गांधी की लोकेशन, सनी लियोनी की फिल्म रिलीज होने की तारीख, अपने पिज्जा पहुंचने, ना-पहुंचने का स्टेटस, पति-पत्नी के बीच का झगड़ा-टंटा सुलटवाने, भैंस के गायब होने आदि-आदि के बारे में भी तो पूछताछ कर सकता है। हेल्पलाइन तो भई हेल्पलाइन है। हेल्प के वास्ते कुछ भी पूछा जा सकता है।

मुझे समझ नहीं आता कि दिल्ली सरकार भ्रष्टाचार को 'जड़' से समाप्त कर ऐसा कौन-सा बड़ा भारी तीर मार लेगी। जिस परंपरा की जड़ें इत्ती गहरी हैं। जो हमारे न केवल 'तंत्र' बल्कि 'तंतु' तक में रच-बस गया है, वो मात्र हेल्पलाइन के सहारे मिट जाएगा। दशकों-पीढ़ियों से हम भ्रष्टाचार के रंग-बिरंगे किस्से सुनते चले आए हैं। क्या उसका मुकाबला हेल्पलाइन कर पाएगी?

दिन में ख्याली सपने दिखाना तो कोई 'आप' से सीखे। अपनी पार्टी की अंदरूनी कलह थाम नहीं पा रहे, चले हैं भष्टाचार को रोकेंगे। सरकार ने तो भ्रष्टाचार को 'लल्ला' समझ रखा है कि हेल्पलाइन का झुनझुना दिखाकर तुरंत बहल जाएगा। आत्म-समर्पण कर देगा।

इस बात को कोई समझता ही नहीं कि दिल बहलाने को भ्रष्टाचार कित्ता जरूरी है। भ्रष्टाचार रहता है तो तरह-तरह की रोचक एवं रोमांचक खबरें सुनने-पढ़ने को मिलती रहती हैं। जब भी किसी मामूली चपरासी, किसी अदने से बाबू, किसी बड़े अफसर आदि के यहां से बिस्तर के नीचे, दीवार के पीछे या तहखाने में नोट छिपे होने की खबरें आती हैं तो दिल को बड़ी राहत मिलती है। उन पर 'गर्व' करने को जी करता है। एहसास होता है कि हमारे देश में नोट की कहीं कमी नहीं। बस तरीके आने चाहिए नोट कमाने के। भ्रष्टाचार चाहे सीट के नीचे से आए या बगल से... उद्देश्य नोट कमाना ही होता है। ऐसे 'मनी माइंडिड' लोगों की तो हमारे देश को सख्त जरूरत है। मगर सरकार उसी को खत्म करना चाहती है। हद है।

समाज और व्यवस्था में जैसे और हकीकतें हैं, उसी तरह से भ्रष्टाचार भी एक हकीकत है। हकीकत से मुंह छिपाके आज तक किसका भला हुआ है? हकीकत को फेस करना सीखें नाकि उसे मिटाना। ऐसे हेल्पलाइन से भ्रष्टाचार अगर काबू में आना लगा तो देशभर के भ्रष्टाचारी 'ठलुए' हो जाएंगे। और मैं नहीं चाहता कि मेरे देश के भ्रष्टाचारी ठलुए हों। जैसे पेट हमारा है, उनका भी है। पेट हरा-भरा रहता है तो जीवन ज्यादा आसान लगता है।

फिर भी जिन्हें यह 'खुशफहमी' पालनी है कि हेल्पलाइन से भ्रष्टाचार मिट जाएगा, पाले रहें। उनकी मर्जी।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

माई च्वाइस

दीपिका पादुकोण ने 'माई च्वाइस' के बहाने अपनी इच्छाएं क्या जाहिर कीं कि टि्वटर और फेसबुक पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं और चुटकुले बनने लगे। ऐसा ही कुछ तब भी हुआ था, जब दीपिका ने अपने शरीर के बहाने- मेरे पास ये है, वो है- टाइप कुछ कहा था।

लेकिन भाई लोग भला कहां मानने वाले हैं? उन्हें तो फिलहाल दीपिका की माई च्वाइस गाली जैसी लग रही है। दीपिका की माई च्वाइस पर तरह-तरह की बातें बना रहे हैं। गुस्सा जतला रहे हैं। आलोचना कर रहे हैं। तमाम प्रकार की नैतिकताओं का हवाला दे रहे हैं। वो सब ठीक है मगर दीपिका की च्वाइस दीपिका की है। उससे हमें या आपको क्या लेना-देना? अमां, हम एक लोकतांत्रिक मुल्क में रहे हैं। ऐसे में एक बंदे या बंदी को अपनी बात या च्वाइस जाहिर करने का हक तो बनता है।

और फिर दीपिका ने माई च्वाइस में अपनी च्वाइस ही तो बताई है, यह थोड़े न बोला है कि लड़कियों को यह सब करना ही चाहिए। या फिर मैं यह सब करने जा रही हूं। बात कहने और करने में बहुत फर्क होता है। इसीलिए तो इसे कथनी-करनी का अंतर कहा जाता है।

वक्त के साथ जब तकनीक बदली है तो क्या इंसान की च्वाइस न बदलेगी। हम 21वीं सदी के दौर में हैं। 16वीं सदी का जमाना हवा हुआ। बदलते वक्त के साथ कुछ तो आजाद-ख्याली लड़कियों में आएगी ही। बल्कि आनी चाहिए। लड़कियां कब तलक एक ही दायरे में सिमटी और एक जैसी परंपराओं को निभाती रहेंगी।

आज दीपिका ने अपनी च्वाइस जाहिए की है, कल को कोई और लड़की करेगी। च्वाइस तो च्वाइस है कभी भी, कैसे भी व्यक्त की जा सकती है। च्वाइस के हिसाब से ही आदमी अपना माइंडसेट बनाता है। हम सब अपनी-अपनी मर्जी के मालिक हैं। आपकी जो मर्जी हो वो आप करें, दीपिका की जो मर्जी है, उसे करने दें। फिर खाली-पीली पेट का हाजमा क्यों खराब करना पियारे।

अपने दिमाग को थोड़ा दिमागदार बनाओ। दुनिया चांद और मंगल पर पहुंच ली है और हम हैं कि एक व्यक्ति की च्वाइस पर ही अकड़े-भड़के जा रहे हैं। हद है। जमाना 'बोल्डनेस' का है। बोल्ड बंदा या बंदी ही सामने वाले को अपनी बोल्डनेस से क्लीन-बोल्ड कर सकते हैं। लजाने और शर्माने के दिन गुजर लिए।

यों दीपिका की माई च्वाइस पर मुझे रत्तीभर एतराज नहीं बस पूछना इत्ता भर है, यह च्वाइसनुमा बोल्डनेस तब कहां चली जाती है, जब महिलाओं को सरेराह छेड़ा और मार दिया जाता है? उनसे उनके अधिकार छिनकर अपने पास गिरवी रख लिए जाते हैं? बताओ दीपिका है तुम्हारे पास कोई जवाब। 

बुधवार, 1 अप्रैल 2015

66 A खत्म होने के बाद

इत्ता खुश मैंने अपने मोहल्ले के लौंडो को पहले कभी नहीं देखा था, जित्ता कि आज थे। हंस-हंसकर एक-दूसरे को बधाईयां दे रहे थे। उनके सीने 56 इंच से थोड़ा चौड़े और चेहरे पर आत्मविश्वास का अक्स था। हालांकि रहते तो वे पहले भी फेसबुक और टि्वटर पर थे मगर अब सक्रियता में कुछ और इजाफा हुआ है।

पूछने पर पता चला कि मेरे मोहल्ले के लौंडे धारा 66 A को खत्म किए जाने पर इत्ता खुश हैं। हालांकि ये खुशी की बात केवल उन्हीं के लिए नहीं बल्कि हम सबके लिए है। मगर लौंडो के लिए कुछ ज्यादा ही। क्योंकि इस धारा के सबसे ज्यादा शिकार वे ही हुए हैं अब तलक। मामला चाहे कैसा या किसी से भी जुड़ा रहा हो।

66 A हट जाने से सोशल मीडिया पर खुलकर लिखना अब और आसान हो गया है। अब व्यक्तिगत भावना से आहत हुआ बंदा, ज्यादा उछलकूद नहीं कर सकेगा। अभिव्यक्ति स्वतंत्र रहेगी- चाहे फेसबुक हो या टि्वटर। लेकिन पियारे, क्या यह वाकई इत्ता आसान होगा? हमारे यहां की पुलिस का रंग-ढंग तो हर किसी को मालूम ही है। डंडे के आगे भला कौन सा कानून रहा या खत्म हुआ है। कानून खत्म होने के बाद भी खुदा-न-खास्ता अगर फिर कहीं से ऐसा कोई मामला सामने आ जाए तो ज्यादा आश्चर्य न कीजिएगा। क्योंकि अब हम जिस प्रकार के समाज बन रहे हैं, वहां असहमति और आलोचना की दीवारें बहुत तेजी से 'दरक' रही हैं। फिर चाहे 66 A रहे या खत्म हो कुछ खास फर्क नहीं पड़ता।

हम इत्ते तो सियाने हैं कि हर दो मिनट में, चाहे सोशल मीडिया हो या सोसाइटी, किसी न किसी की भावनाएं आहत होने की खबर आ ही जाती है। बेशक धारा 66 A खत्म जरूर हुई है मगर सहनशक्ति के दायरे उत्ते ही सिकुड़ हैं। भले ही, मेरे मोहल्ले या अन्य जगहों के लौंडे अवश्य खुश हुए हों किंतु मैं अभी भी किस्म-किस्म की शंकाओं से घिरा हुआ हूं।

देखा गया है, कभी-कभी ज्यादा आजादी भी खाना खराब कर देती है। फिर यहां से लेकर वहां तलक रायता फैलते जरा देरी नहीं लगती। गैर तो छोड़िए अपने भी ऐसे कन्नी काट लेते हैं मानो पहले कोई रिश्ता-नाता रहा ही न रहा हो। बीच का रास्ता तो यही है कि सोशल मीडिया पर जो भी लिखा जाए 'अपनी बचाते' हुए ही लिखा जाए। अगर अपनी बची है तो समझिए सबकी बची हुई है।

66 A से पहले के सीन तो हम देख ही चुके हैं अब बाद का सीन कैसा बनेगा देखना यह है। क्योंकि आजादी को तो आजादी की तरह ही लिया जाता है। शायद मेरे मोहल्ले के लौंडे इसी आजादी को पाकर इत्ता खुश हुए जा रहे हैं। खुद उनकी खुशी बनाए रखे। आमीन।