गुरुवार, 5 मार्च 2015

सेल्फी होली

तय हुआ है कि इस दफा मेरे मोहल्ले में 'सेल्फी होली' खेली जाएगी। यानी, रंग लगाने की छूट एक-दूसरे को रहेगी फिर भी जिन्हें दूसरों से रंग लगवाने में 'परहेज' है, वे अपने रंग खुद लगा सकते हैं। रंग में पुते चेहरों की 'सेल्फी' ली जाएगी। सेल्फी को तुरंत अपने फेसबुक या टि्वटर खाते पर टांगा जाएगा। जिसकी सेल्फी मस्त होगी, उसको ईमानस्वरूप 'सेल्फीयुक्त स्मार्टफोन' दिया जाएगा।

देख रहा हूं, सेल्फी होली खेलने की सूचना पाकर घरों से वो लोग भी बाहर निकलने लगे हैं, जिन्हें होली पर रंग खेलना तो बहुत दूर की बात रही, कभी मौजूद तक नहीं देखा था। होली पर न जाने कहां, किस गुफा में जाकर छिप जाते थे। खोजने पर अगर मिल भी जाते थे, तो रंग लगाने व लगवाने में इत्ता परहेज करते थे कि कहीं उनका 'किडनैप' ही न हो जाए।

एक वो ही नहीं, ऐसे न जाने कित्ते ही लोग होते हैं, जिनको रंग लगाओ तो 'भड़क' जाते हैं। मरने-मारने पर उतारू हो लेते हैं। अजीब होते हैं, वो लोग जो रंग की रूमानियत को नहीं समझते।

शायद इसी कारण लोगों में अब 'सेल्फी होली' खेलने का चलन बढ़ा है। अपने रंग खुद लगाओ और सेल्फी लेकर तुरंत फेसबुक या टि्वटर पर ठेल दो। ताकि देखने वालों को भी लगे कि बंदा मस्त होली खेलता है। सेल्फी पर मिले लाइक और कमेंट मूड के साथ-साथ दिन भी बना देते हैं। सेल्फी के क्रेज ने अब त्यौहारों को भी सेल्फी-त्यौहार बना डाला है।

मोहल्ले में सेल्फी होली खेलने के आइडिए को बुर्जुग लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें सेल्फी होली का कॉसेप्ट समझ नहीं आ रहा। पूछने पर कहते हैं- 'सेल्फी होली'...? ये कौन-सी होली होती है...? अपना रंग लेकर खुद ही लगाना यह कोई बात हुई भला? अरे, होली के रंगों का मजा ही दूसरे से लगवाने में है। होली में जब तलक मस्तियां न हों, भला कैसी होली? सेल्फी होली तो एक प्रकार से 'सेल्फिश होली' है।

मोहल्ले के बुर्जुग लोगों की 'भावनाओं' को मैं समझ सकता हूं लेकिन नए दौर के नए लोगों के लिए सेल्फी होली ही अब 'असली होली' है। बदलते दौर ने त्यौहारों के 'कॉनसेप्ट' को एकदम से बदलकर रख दिया है। सेल्फी का क्रेज इस कदर बढ़ा है कि लोग त्यौहार मनाने से ज्यादा सेल्फी लेना पसंद करते हैं। किस्म-किस्म के मूड की सेल्फियों से फेसबुक की दीवालें अटी रहती हैं।

सेल्फी होली के असर ने मस्तियों को भी बदल डाला है। सेल्फी होली खेलने वाले अपनी मस्तियां खुद करते हैं। और अपनी ही मस्तियों की सेल्फी लेकर आनंद से भर जाते हैं। आत्मकेंद्रित ही सही पर सेल्फी होली के बहाने वे लोग भी रंग से थोड़ा खेल लेते हैं, जिन्हें रंग से हमेशा एलर्जी-सी रही है। एक होली ही नहीं, अब लगभग हर त्यौहार सेल्फी है।

अब मोहल्ले के बुर्जुग चाहे जो समझें या कहें मगर मुझे मोहल्ले वालों को सेल्फी होली खेलते देखना अच्छा लग रहा है। सेल्फी होली में उन चेहर को भी देख पा रहा हूं, जो होली आते ही गायब हो जाया करते थे। मगर आज खुद से या दूसरे के साथ सेल्फी होली खेल रहे हैं।

देखो पियारे, अपना तो मानना है कि होली पर हर चेहरा रंग-पुता होना चाहिए। अब चाहे वो खुद ही अपने को पोते या दूसरे से पुतवाए। होली पर जिसने रंग न लगाया, वो भला रंगों की तासीर को क्या समझेगा? चाहे सेल्फी होली के बहाने ही सही पर रंग हमारे जीवन में अभी बने हुए हैं। यही बहुत है।

फिलहाल, मैं मेरे मोहल्ले में खेली जा रही 'सेल्फी होली' का 'फुलटू आनंद' ले रहा हूं। सेल्फी होली का कॉसेप्ट इत्ता भी बुरा नहीं।

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ला ने कहा…

मुबारक हो सेल्फ़ी होली।