गुरुवार, 5 मार्च 2015

पागलखाने में होली

इस दफा मैंने 'डिसाइड' किया है कि होली 'पागलों' संग खेलूंगा। 'पागलखाने' जाकर खेलूंगा। पागलों जैसे कपड़े पहनकर खेलूंगा। पागलों संग पूर्ण 'पागलपंती' में डूबकर खेलूंगा। मैंने लाइफ में लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों, सियानों, पूंजीपतियों, नेताओं, बिगडैलों, घर-परिवार वालों, नाते-रिश्तेदारों आदि के संग-साथ खूब होली खेली है किंतु पागलों संग होली खेलने का 'अनुभव' मेरा पहला होगा। यकीन कीजिए, पागलों संग होली खेलने के प्रति मैं उत्ता ही 'एक्साइटिड' हूं, जित्ता सनी लियोली पर्दे पर कपड़े उतारने के लिए रहती है।

सूखी-साखी होली खेलने में मुझे रत्तीभर मजा नहीं आता। होली पर जब तलक रंग-बिरंगी मस्तियां न हों, भला ऐसी होली का क्या मतलब? होते हैं कुछ ऐसे सियाने भी जो होली को कायदे से खेलने की सलाह देते हैं। शरीर पर रंग पड़ते ही 'हत्थे से उखड़' लेते हैं। रंगे-पूते चेहरे उन्हें 'खलनायक' जैसे नजर आते हैं। भांग की मस्ती उन्हें बिगडैल-प्रवृति का प्रतीक लगती है। होली (रंग) वाले दिन भी खुद को कमरे में यों बंद कर लेते हैं मानो घर में कोई शेर-चीता घुस आया हो।

लेकिन पागलों के साथ ऐसा कुछ नहीं है। पागल लोग बड़े ही 'मस्त' तरीके से होली खेलते हैं। न रंग लगवाने पर एतराज जताते हैं न लगाने पर। रंग-बिरंगे कलर उनके जीवन में सबसे खूबसूरत अर्थ रखते हैं। रंग उनके एकाकीपन को तोड़ते हैं। उन्हें फुल चांस देते हैं, होली के बहाने खुद को 'रिचार्ज' करने का। होली की मस्तियां पागलों संग बढ़कर दोगुनी हो जाती हैं पियारे।

चूंकि पागलखाना मेरे शहर में ही है। इस नाते पागलपंती टाइप कुछ गुण मेरे भीतर भी मौजूद रहते हैं हर वक्त। जिन्हें मैं गाहे-बगाहे भुनाता भी रहता हूं। यकीन कीजिए, पागलपंती की हरकतों में जो मजा है, वो नॉर्मल इंसान बने रहने में नहीं। पागलपंती आपको हर बंधन से पूर्णता स्वतंत्र रखती है, सबकुछ करने के लिए। पागलपंती के एहसास को पाने के लिए एकाध दफा मैंने खुद भी पागल बनकर इस अनुभव को महसूस किया है। पागलों के साथ या उन्हें होली खेलते देखने में जो सुख है, वो अन्यत्र नहीं।

नॉर्मल इंसान के साथ तो मैं हर बार होली खेलता ही हूं क्यों न इस बार पागलों के साथ 'पागलखाना' जाकर ही खेली जाए। ताकि पागलों को भी यह लगे कि उनके टाइप का एक बंदा उन जैसा ही बनकर उनके साथ रंग भरे त्यौहार को 'सेलिब्रेट' करने आया है। वैसे, मैं काफी-कुछ लगता-दिखता भी 'पागलों' जैसा ही हूं, ऐसा मेरी गर्लफ्रेंड ने कई दफा मुझको बोला है।

होली की मस्तियों का यही तो मजा है कि इस दिन अच्छा-खासा बंदा भी लगभग 'पगला' जाता है। कुछ अपनी पागलपंती पर कंट्रोल किए रहते हैं तो कुछ बिलकुल ही पागल हो जाते हैं। बिलकुल ही पागल हो जाने वालों से मैं उत्ती ही दूरी बनाकर रखता हूं, जित्ती बरेली दिल्ली से।

पागलों संग रंगों की फुहार के बीच उनके साथ डांस का भी 'आनंद' लेना चाहता हूं। सुना हैं, पागल लोग 'नाचते' बहुत 'मस्त' हैं। डांस चीज ही ऐसी है पियारे कि अच्छे-खासे बंदे को भी अपना 'दीवाना' बना लेती है। मगर होली पर डांस की बात ही कुछ और है। मेरे मोहल्ले में होली पर रंग कम खेला जाता है, डांस ज्यादा होता है। और ऐसे-ऐसे करतबपूर्ण डांस की प्रोफेशनल डांसर तलक पानी मांग जाएं। होली पर डांस की कोई 'कैटेगिरी' नहीं होती। हर डांस अपने आप में 'अनूठा' और 'अजूबा' होता है।

बस इसी प्रकार का अनूठा और अजूबा डांस मैं पागलखाने में पागलों संग करना चाहता हूं। ताकि मुझे भी पागलों के बीच अपनी 'डांसमय पागलपंती' को दिखाने का मौका मिल सके। यों भी, शादी के बाद बंदे को खुलकर डांस करने का मौका मिलता ही कहां है? क्योंकि हर दिन हर किस्म का डांस बीवी के आगे ही करना होता है न।

फिलहाल, पागलखाने से बुलावा आया लिया है। पागलों संग होली खेलने का। अगर पागल और पागलखाना जांच गया तो थोड़े दिन मैं वहीं रह लूंगा। नॉर्मल इंसानों के बीच रहते-रहते अब बोर-सा हो चला हूं। 'लाइफ' में 'हर रंग' का 'मजा' लेना चाहिए। क्यों पियारे, है कि नहीं...।

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ला ने कहा…

होली मउबारक हओ।