सोमवार, 30 मार्च 2015

मूर्खता में मजा

मुझे 'गंभीरता' से नफरत पर 'मूर्खता' से प्यार है। जब सृष्टि की रचना की गई होगी, तब मूर्खों में मेरा नाम 'अव्वल नंबर' पर रहा होगा! गंभीरता का पुर्ज मेरे मस्तिष्क में शायद इसलिए नहीं डाला गया होगा- कहीं यह बंदा धरती पर पहुंचकर माहौल 'मातमी' न कर दे। इसीलिए मुझे हर वो आदत बख्शी गई, जिसमें मूर्खता का पुट ज्यादा हो। मूर्ख होने के नाते मैं खुद को बुद्धिजीवियों व पढ़े-लिखों से कुछ अलग-सा महसूस करता हूं।

मूर्ख होना मेरे लिए 'अपमान' की नहीं, बेहद 'सम्मान' की बात है। मेरा मानना है- खुद या दुनिया को मूर्ख बनकर या बनाकर ही बेहतर समझा जा सकता है। हालांकि दुनिया में एक से बढ़कर एक मूर्ख मौजूद हैं पर वो मूर्ख इत्ते 'सियाने' हैं कि खुद को मूर्ख मानते ही नहीं। अगर उन्हें कोई मूर्ख कह दे, तो इत्ता बुरा मान जाते हैं, मानो उनकी बुद्धि पर डाका डाल दिया हो। जबकि बुद्धि का मूर्ख या मूर्खता से कोई लेना-देना नहीं है। बुद्धि तो मूर्ख के लिए दिमाग का मैल है।

यही वजह है कि मैं बुद्धि के मैल को दिमाग से बाहर रखता हूं। दिमाग के भीतर रहकर बुद्धि तरह-तरह से 'आतंक' मचाती है। किसी भी बात या मुद्दे पर बंदे को इत्ता अधिक सोचने पर मजबूर कर देती है कि 'पगला' जाए। जबकि ज्यादा सोचना एक प्रकार की 'बीमारी' है। मैंने कई ऐसे बंदे देखे-सुने हैं, जो बिचारे सोचते-सोचते ही दुनिया से खर्च हो लिए। मेडिकल सांइस बताती है कि सोचने से बुद्धि का सबसे अधिक 'सत्यानाश' होता है। सोचना बुद्धि को इस कदर कुंद बना देता है कि बंदा फिर न खुद का रह पाता है न समाज का। सोचने वालों की दुनिया बेहद काली होती है। काल-कोठरी समान। बुद्धि का दबाव उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।

मगर मूर्खता ऐसा कुछ भी करने से हमेशा रोकती है। मूर्ख बंदे कने इत्ता टाइम नहीं होता कि वो अपनी मूर्खता के अतिरिक्त किसी और बात या मुद्दे पर ध्यान दे सके। वो तो हर वक्त अपनी मूर्खता में ही व्यस्त रहता है। जैसाकि मैं।

यकीन मानिए, मूर्खों की दुनिया समझदारों से कहीं बेहतर और दिलचस्प होती है। सबसे खास बात, मूर्ख बेफालतू की टेंशन का लोड नहीं लेता। न किसी के बारे में गलत सोचता है, न किसी को गलत बताता। मूर्ख की स्थिति एकदम गधे जैसे होती है। अपनी ढेंचू-नुमा दुनिया में ही मस्त रहता है।

आप शायद यकीन नहीं करेंगे गधा मेरी मूर्खता की प्रेरणा है। अपने जीवन व लेखन में मैंने गधे से बहुत कुछ सीखा व जाना है। दुनिया मेरे बारे जो चाहे राय रखे, मुझे इससे ज्यादा मतलब नहीं रहता। मेरे सरोकार मूर्खों और गधों से अधिक जुड़े हैं। मैं हर उसी बात को करना-मानना पसंद करता हूं, जहां बौद्धिता का नहीं मूर्खता का वर्चस्व ज्यादा हो। मूर्खता के धरातल पर खड़े होकर चीजें मुझे अधिक 'पारदर्शी' दिखाई पड़ती हैं। यही हमारे वक्त का तकाजा भी है।

दरअसल, लेखन में मैंने व्यंग्य को इसलिए चुना ताकि अपनी मूर्खतापूर्ण सोच एवं विचारधारा का उत्पादन अधिक खुलकर कर सकूं। मेरा विश्वास चिंतन या मनन करने से अधिक मूर्ख-नुमा विचार और व्यवहार में है। चिंतन वो करते हैं, जिनके कने अतिरिक्त दिमाग होता है। चूंकि मेरे कने नहीं है, इसलिए मैं बचकर रहता हूं।

हम मूर्खों का कोई एक दिन नहीं होता। हर दिन, हर पल हमारा होता है। मूर्ख-दिवस चाहे एक अप्रैल को हो या न हो, हमें अपनी मूर्खता से मतलब। जिंदगी को मस्त होकर जीने का सबसे उम्दा जरिया है, खुद मूर्ख बने रहकर दूसरे की अकलमंदी पर मन ही मन मुस्कुराना।

4 टिप्‍पणियां:

Yogi Saraswat ने कहा…

मूर्ख होना मेरे लिए 'अपमान' की नहीं, बेहद 'सम्मान' की बात है। मेरा मानना है- खुद या दुनिया को मूर्ख बनकर या बनाकर ही बेहतर समझा जा सकता है। हालांकि दुनिया में एक से बढ़कर एक मूर्ख मौजूद हैं पर वो मूर्ख इत्ते 'सियाने' हैं कि खुद को मूर्ख मानते ही नहीं। अगर उन्हें कोई मूर्ख कह दे, तो इत्ता बुरा मान जाते हैं, मानो उनकी बुद्धि पर डाका डाल दिया हो। जबकि बुद्धि का मूर्ख या मूर्खता से कोई लेना-देना नहीं है। बुद्धि तो मूर्ख के लिए दिमाग का मैल है।बहुत ही सार्थक और व्यंग्यात्मक पोस्ट

Digamber Naswa ने कहा…

असल जीवन वाही जीते हैं वो ही सबसे समझदार होते हैं जो मूर्ख कहलाये जाते हैं ... दुनिया के बड़े से बड़े गम को ऐसे मूर्ख ही आसानी से झेल जाते हैं ...

N A Vadhiya ने कहा…

Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us. Latest Government Jobs.

अनूप शुक्ला ने कहा…

बुद्धि तो मूर्ख के लिए दिमाग का मैल है।

खूब!