मंगलवार, 3 मार्च 2015

बजट, जूता और होली

वाह! क्या गजब 'कंबिनेशन' ढूंढा है वित्तमंत्री अरुण जेटली जी ने। बजट में उन्होंने आम आदमी के वास्ते 'जूता' 'सस्ता' कर दिया। जूता सस्ता करने के पीछे जरूर उनके ख्याल में 'होली का त्यौहार' रहा होगा। होली पर बंदा नए कपड़े खरीदने के साथ-साथ जूता भी अवश्य खरीदता है। लेकिन अक्सर उसे जूते की कीमत कपड़ों से कहीं ज्यादा चुकानी पड़ जाती है। मतलब, जित्ते में कपड़े आते हैं, उत्ते में वो दो जूते ही खरीद पाता है। मार्केट में आजकल पांच सौ से लेकर तीन हजार तक के जूते मौजूद हैं।

आम आदमी अगर तीन हजार के जूते पहनेगा तो दूसरी चीजों की खरीददारी क्या खाक कर पाएगा? इसीलिए वित्तमंत्री जी ने अन्य चीजों पर दाम बढ़ाके जूते सस्ते कर दिए। बढ़िया किया। बहुत ही बढ़िया किया।

यों तो जूता हर वर्ग की शान हैं लेकिन आम आदमी को जूतों से खास लगाव रहता है। सरकारी कामों में सबसे ज्यादा जूते आम आदमी के ही घिसते हैं। आम आदमी की असहमति का हथियार भी जूते ही हैं। आम आदमी अक्सर जूते को गाली में भी ढाल लेता है। मसलन- काम बिगाड़ा तो जूते पड़ेंगे। महंगाई या व्यक्तिविशेष का विरोध करने के लिए भी जूते की माला गधे या भैंस के गले में डाली जाती है। कभी-कभी लड़कियां भी मजनूंओं को सबके सिखाने के लिए जूते या चप्पल प्रयोग में लाती हैं।

बजट में जूते का सस्ता होना वित्तमंत्रीजी का 'क्रांतिकारी कदम' कहा-माना जाएगा। एक प्रकार से यह आम आदमी को वित्तमंत्रीजी द्वारा दिया गया- 'होली का उपहार' है। इस वास्ते आम आदमी को वित्तमंत्रीजी का 'शुक्रगुजार' होना चाहिए।

मैंने तो तय किया है कि इस दफा होली पर मैं कपड़े नहीं केवल जूते ही खरीदूंगा। ताकि सनद रहे। होली भी जूते पहनकर ही खेलूंगा। कम से कम पैर तो गंदे नहीं होंगे। मैं चेहरे से अधिक पैरों की सफाई का ध्यान रखता हूं। बल्कि मैंने तो अपने परिवार और मोहल्ले वालों को भी इस होली जूते पहनकर ही खेलने की सलाह दी है।

वित्तमंत्रीजी द्वारा सस्ती की गई चीज का 'अपमान' मैं नहीं कर सकता। आम आदमी हूं आम बजट में मिली सस्ती चीज मेरे तईं 'सौगात' की तरह है।
जिन्हें बजट या वित्तमंत्रीजी का विरोध करना है, करें। मैं उनके साथ कतई नहीं हूं। वे विरोध के अतिरिक्त कुछ और कर भी नहीं सकते। विरोधी लोग क्या जानें सस्ते जूते की महत्ता? जूते का सस्ता होना आम आदमी को एक नई पहचान देगा, जैसी आम आदमी पार्टी को टोपी ने दी है। ध्यान रखें, जूता कभी अपनी जमीन नहीं भूलता, हंसिया-हथौड़ा चाहे भूल जाए।

फिलहाल, हम विरोध को भूलाकर बजट में सस्ते हुए जूते का मजा होली के रंगों के साथ लें।

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