बुधवार, 25 मार्च 2015

मेरी जासूसी भी करें

मेरा लड़कपन से यह मानना रहा है कि जासूसी होती रहनी चाहिए। जासूसी होती रहती है तो बंदे के सारे टांके दुरुस्त रहते हैं। न हवा में ज्यादा उड़ता है न छोड़ता। उसे हर पल इस बात का 'भय' रहता है कि तीसरी आंख कहीं से मुझे और मेरी हरकतों को देख रही है।

फिर भी जो लोग जासूसी के नाम से ही 'भड़क' जाते हैं, उनके मन में कहीं न कहीं 'चोर' जरूर होता है। वरना, जासूसी से क्या घबराना? यों भी, जासूसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे की तो होती नहीं, हमेशा बड़े लोगों की जाती है। अगर कोई बड़ा न भी हो, जासूसी होने के बाद बड़ा हो जाता है। जासूसी की खबर का मीडिया में आना बंदे को और प्रतिष्ठित बना देता है। नाते-रिश्तेदारों और घर-परिवार के बीच कद में इजाफा होता है सो अलग।

सच बोलूं, मेरी तो बहुत इच्छा करती है कि कोई बड़ी एजेंसी या बड़ा जासूस मेरी जासूसी करे। मुझ पर, मेरी हरकतों और मेरे लेखन पर 'गिद्ध-दृष्टि' बनाए रखे। कुछ ऐसा-वैसा पाए जाने पर मेरी जासूसी से जुड़ी खबरें तमाम बड़े अखबारों में आए। बड़े-बड़े लेखक-स्तंभकार और नेता लोग मेरा 'नोटिस' लें। न केवल देश बल्कि विदेशी मीडिया में भी मेरी जासूसी की खबरें सनसनी टाइप बनें। लोग मुझसे मेरी जासूसी होने के बाबत लगातार फोन कर-करके पूछें।

ऐसा कम ही सुनने या पढ़ने में आता है कि लेखक लोगों की जासूसी की गई हो। ज्यादातर जासूसी नेता या कुख्यात टाइप लोगों की ही की जाती है। जिन पर सरकार या खुफिया एजेंसियों को 'शक' हो। यह शक भी बड़ी ऊंची बला है। कब, कहां और किस पर डेवलेप हो ले, पता नहीं चलता। कभी-कभी तो बंदा शक के आधार पर ही 'फेमस' हो लेता है। शक-शक में बंदा न केवल देश बल्कि मीडिया का 'हीरो' भी बन जाता है।

आदमी के भीतर थोड़ा-बहुत शक का बना रहना इसलिए भी जरूरी है ताकि जासूसी का आधार मजबूत बना रहे।

शक के आधार पर ही एक दफा पत्नी मेरी जासूसी भी करवा चुकी है। बाद में पता लगने पर मुझे 'गुस्सा' नहीं बल्कि खुद पर 'गर्व' टाइप फिल हुआ था। इस फिलिंग को आगे बनाए रखने के लिए ही मैं खुद की जासूसी करवाने के पक्ष में हूं। मेरी जासूसी का सिलसिला बना रहेगा तो मैं आसानी से अपनी आदतों-हरकतों पर कंट्रोल रख पाऊंगा।

न जी न जासूसी से 'बदनामी' नहीं 'नाम' मिलता है! आजकल हर जगह 'नाम' का ही 'जोर' है। जिसका नाम वही 'महान' है। इस जोर और महानता के दमखम को मैं बनाए रखना चाहता हूं और अपील करता हूं देश की खुफिया एजेंसियों से कि मेरी भी जासूसी करें। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ला ने कहा…

कोई बड़ा न भी हो, जासूसी होने के बाद बड़ा हो जाता है।

-सही।