मंगलवार, 24 मार्च 2015

नकल से कैसा घबराना!

नकल मानव का स्वभाव है। नकल कभी किसी को 'नुकसान' नहीं पहुंचाती। हम भले ही अकल से दूर रह लें किंतु नकल से दूर एक पल नहीं रह सकते। नकल की हमारे जीवन में उत्ती ही जरूरत है, जित्ती भैंस को चारे की।

लेकिन पता नहीं क्यों, हम नकल के साथ 'सहज' नहीं रह पाते। मौके-बेमौके नकल को 'कोसने' बैठ जाते हैं। नकलबाजों को 'गरियाते' हैं। नकल को वर्तमान और भविष्य के लिए 'खतरा' बताते हैं। जबकि नकल के साथ ऐसा कुछ नहीं है। नकल को लेकर हम चाहे कित्ती ही ऊंची-ऊंची बातें कर लें मगर नकल की महत्ता को न जीवन, न रहन-सहन, न पढ़ाई-लिखाई, न लेखन, न फैशन से कभी 'खारिज' नहीं कर सकते। किसी न किसी रूप में नकल हर कहीं मौजूद रहती है।

मुझे बड़ा अटपटा-सा लग रहा है, जो लोग बिहार में खिड़कियों के रास्ते करवाई जा रही नकल की फोटू देखके 'विचलित' हुए पड़े हैं। भाई, इसमें इत्ता विचलित होने की क्या जरूरत है? वे सब तो हमें हमारी शिक्षा-व्यवस्था का 'सही आईना' दिखला रहे थे। एकजुट होकर अपने-अपने साथियों-मित्रों की सहायता कर रहे थे, वो भी इत्ता 'रिस्क' लेकर। यह कम बड़ी बात नहीं।

आज जब नकल की परंपरा धीरे-धीरे कर 'हाशिए' पर जा रही थी, उन लड़कों ने अपने गंभीर प्रयासों से इसे फिर से 'पुर्नजीवित' किया है। हमें तो उनका 'एहसानमंद' होना चाहिए। नकल का पढ़ाई-लिखाई में बने रहना कित्ता अवश्यक है, यह उन वीर लड़कों ने हमें बताया है।

लद लिए वो दिन जब नकल के लिए अकल की जरूरत हुआ करती थी। अकल तो खामखां सरहाना बटोर लेती है जबकि सारा काम तो नकल ही करती है। जित्ती तेजी से वक्त बदला है, उत्ती ही तेजी से नकल के पैमाने भी बदल रहे हैं। नकल ने पुरानी परंपराओं को तोड़ा है। नकल अब 'हाईटेक' हो ली है। हालांकि पारंपरिक नकल अब भी फर्रों या पर्चियों की सहायता से ही हो रही है लेकिन अब इसमें स्मार्टफोन और किस्म-किस्म के चैटिंग एप्स भी शामिल हो लिए हैं। 'वाह्ट्सएप्स' नकल के वास्ते मस्त भूमिका निभा रहा है। मुझे यह देखकर खुशी होती है कि कुछ समझदार बंदों ने नकल के नाम को मिटने नहीं दिया है।

आज के जमाने में नकल कौन नहीं कर रहा? हर बंदा किसी न किसी तरह से कुछ न कुछ नकल कर ही रहा है। भले ही वो नकल की हकीकत को न स्वीकारे लेकिन नकल की छाया उस पर बनी हुई है। दुनिया में इत्ती बड़ी-बड़ी खोजें हो गईं, बड़े-बड़े लोग इत्ता पढ़-लिख लिए सब में कहीं न कहीं नकल का ज्यादा या कम प्रभाव रहा ही। बिना नकल किए किसी ने कुछ पाया या खोजा हो, ऐसा कम से कम मेरे 'संज्ञान' में तो नहीं है।

किसी और के बारे में क्या 'टिप्पणी' करूं, मेरा खुद का लेखन नकल पर बेस्ड है। दिन में जब तलक छह-सात वरिष्ठ लेखकों के लिखे की नकल नहीं कर लेता न तो सही से कुछ लिख पाता हूं न सो पाता। मेरे लिए नकल करना उत्ता ही अवश्यक है, जित्ता जिंदा रहने के लिए सांसें। सच बोलूं, मैं इत्ता बड़ा लेखक बना ही नकल कर-करके हूं। अगर नकल न होती तो शायद मैं भी न होता। नकल ने मुझे न केवल लेखन जगत में बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच भी ठीक-ठाक पहचान दी है।

बिहार के उन वीर लड़कों ने नकल की जरूरत को बनाए रखने में महत्ती भूमिका निभाई है। और मैं खुद भी दिल से यही चाहता हूं कि नकल की प्रसांगिकता यों ही बनी रहे ताकि अकलमंद लोग खुद की अकल पर इतरा-इठला न सकें। लाइफ में सफलता के लिए नकल जरूरी है पियारे। मानो या न मानो।

4 टिप्‍पणियां:

Anjali Sengar ने कहा…

Lol.. It is funny.. Kitne confidence se nakal kar rahe hain students..

http://zigzacmania.blogspot.in/

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

जी हां बिलकुल। कुछ इसी टाइप का बनता जा रहा है हमारे देश का भविषय।
शुक्रिया पढ़ने के लिए।

Moti Suthar ने कहा…

बढ़िया जानकारी धन्यवाद
www.gyankablog.blogspot.com
थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालोंका आभारी रहूँगा।

अनूप शुक्ला ने कहा…

सटीक!