गुरुवार, 19 मार्च 2015

क्यों न करूं नेताओं पर फक्र!

मुझे खुद के बाद अगर किसी पर 'फक्र' होता है तो वे मेरे देश के नेता लोग हैं! नेताओं पर फक्र करना मेरा 'शौक' नहीं बल्कि 'पैशन' है। जब कभी मैं किसी नेता पर फक्र करता हूं तो भीतर से मुझे 'गुडी-गुडी' टाइप फिलिंग आती है।

मेरे कने देश के नेता लोगों पर फक्र करने के एक नहीं सैकड़ों कारण हैं। जित्ती 'खूबियां' मेरे देश के नेता लोगों के भीतर-बाहर हैं, उत्ती किसी दूसरे देश के नेताओं में न होंगी, मेरा दावा है। किसी को कुछ भी बोलने का हक जित्ता नेताओं के पास है, उत्ता तो आम आदमी के पास भी नहीं। आम आदमी पांच साल में सिर्फ एक दफा, वो भी वोट देने के बहाने, ही बोलता है बाकी साल तो नेता लोग ही बोलते रहते हैं। हालांकि नेता लोगों के बोलने या बोलते रहने से आज तलक आम आदमी को कुछ मिला नहीं है लेकिन फिर भी नेताओं को बोलना है तो बोलना है। वे अपने बोलने को ही जन-सेवा समझते हैं। मुझे उनके बोलने पर फक्र है।

अभी हाल एक बड़े नेता ने महिलाओं पर जो कुछ टिप्पणियां की हैं, मुझे उन पर भी फक्र है। फक्र इसलिए है क्योंकि जो दूसरा नहीं बोल पाता, उसे उन नेताजी ने संसद के भीतर 'खुलकर' बोल दिया। और, आज भी वे अपने 'बोल' पर 'डटे' हुए हैं। डटा ही रहना चाहिए, नहीं तो लोगों को पता कैसे चल पाएगा कि नेताजी कित्ते प्रगतिशील और उच्च विचारों के मालिक हैं।

काली-गोरी स्त्री में फर्क जिसे आज तलक क्रीम-पॉडर बनाने वाली बड़ी-बड़ी तोपची कंपनियां नहीं समझा पाईं, हमारे नेताजी ने 'हाथ के इशारों' से दो मिनट में समझा दिया। हालांकि कुछ स्त्रियों ने नेताजी के 'हाथ के इशारों' पर 'एतराज' जताया है पर क्या कीजिएगा, नेताजी का मन है। मन पर भला कब, किसका कंट्रोल रहा है।

न जी न इसे आप नेताजी की 'पुरुष-मानसिकता' समझकर उन पर 'शक' न करें, उन्होंने तो समझया है कि स्त्री को देखने के लिए उसके 'संघर्ष' से ज्यादा 'रूप-रंग' की आवश्यकता होती है। इसी रूप-रंग पर तो दुनिया मरती है। काले को हिकारत और गोरे को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

रही बात उन बुद्धिजीवियों की जो नेताजी के पक्ष में आन खड़े हुए हैं। दरअसल, उन्हें तो बहाना चाहिए नेताजी के सहारे खुद को लोगों के बीच बनाए रखने का। देश के बुद्धिजीवि अब हर उस बात का समर्थन करने लगे हैं, जो सरकार या प्रधानमंत्री के खिलाफ जाती हो। चूंकि वे प्रगतिशील बुद्धिजीवि हैं इसलिए अपनी प्रगतिशीलता को दिखाने का मौका भला हाथ से क्यों जाने दें। इसी प्रगतिशीलता के सहारे ही तो साहित्य-समाज के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की रोजी-रोटी चल रही है पियारे। जब तलक वे विपरित हवा में बहेंगे नहीं, प्रगतिशील कैसे कहलाएंगे।

काली-गोरी स्त्री पर बहस के बाद जिस तरह नेता लोगों ने भूमि-अधिग्रहण मुद्दे पर किसानों के पक्ष में सड़क पर चहलकदमी की, मुझे उस पर भी फक्र है। कुछ नेता लोग तो जरा-सी चहलकदमी में ही 'हांफते' नजर आए फिर भी खुद को कैमरे के आगे आने से न रोक सके। ताकि देश के किसानों को भी पता लग सके कि नेता लोगों ने उनके अधिकारों के वास्ते मार्च किया। नेता लोगों ने इस 'हांफते मार्च पास्ट' को बेहद सफल बताया है। मुझे उन पर फक्र है।

देखा किसान भाइयों तुम्हारी किस्मत कित्ती अच्छी है, कि तुम्हें ऐसे 'जन-हितैषी' नेता मिले हैं। जो दो कदम चलने पर ही 'हांफ' जाते हैं लेकिन मन से तुम्हारे साथ हैं। तुम्हें भी हमारे देश के नेता लोगों पर फक्र करना चाहिए। अपने गुस्से को दबाने के लिए नेताओं पर फक्र करना जरूर है पियारे।

फिलहाल, मैं फक्र कर ही रहा हूं आप चाहें तो मेरे साथ आ सकते हैं। 

2 टिप्‍पणियां:

Anjali Sengar ने कहा…

Lol... Awesome post..

http://zigzacmania.blogspot.in/

मधु अरोड़ा ने कहा…

सटीक, सार्थक व सामयिक व्‍यंग्‍य...बधाई....