सोमवार, 16 मार्च 2015

हे! चोर, मेरा लिखा भी चुरा

पता नहीं लेखक लोग अपना लिखा चोरी चले जाने पर इत्ता बौखलाए क्यों रहते हैं? गाली-गलौज से लेकर मुकदमेबाजी तक पर उतर आते हैं। अखबारों-पत्रिकाओं में चोरी गए लेख के खिलाफ लंबी-लंबी टिप्पणियां लिखते हैं। हर मिलने-जुलने से वाले चोरी गए लेख का रोना ऐसे रोते हैं मानो सोना-चांदी चोरी चल गए हों। अरे भई आप लेखक हैं। ऊपर वाले ने लिखने का हुनूर आपको बख्शा है। अगर कुछ चोरी चला भी गया तो दोबारा लिख लें। इसमें समस्या क्या है? लेखक के लिए लिखना 'बाएं हाथ' का खेल होता है।

उलटा लेखक को तो चोर का 'एहसानमंद' होना चाहिए कि उसने चोरी के लिए उसके लिखे को चुना। वरना, दुनिया में इत्ते लेखक मौजूद हैं, चोर किसी और का भी लिखा चुरा सकता था। मगर चोर ने ऐसा नहीं किया। आपके लिखे को ही चुराया। यानी, आपके लेखन में 'कुछ बात' जरूर है। चोर आपके लेखन पर निगाह बनाए हुए था। उसे आपका लिखा पसंद था।

देखिए, बात को समझिए, चोर की नजर और आशिक के दिल का कोई भरोसा नहीं होता कब, कहां, किस पर आ जाए। इसलिए चोर की हरकत का कतई बुरा नहीं मानना चाहिए।

आप क्या समझते हैं, चोरी करना हंसी-खेल होता है। जान के साथ-साथ इज्जत तक दांव पर लगानी पड़ती है। तब कहीं जाकर चोर चोरी कर पाता है। सोना-चांदी, रुपए-पैसे चुराना तो खैर अलग बात है। लेकिन साहित्यिक चोरी करना बहुत 'गंभीरता' का काम है। अच्छों-अच्छों को नानी याद आ जाती है, साहित्यिक चोरी करने में। साहित्यिक चोरी के लिए चोर भी साहित्यिक दिमाग वाला होना चाहिए।

इधर, सोशल नेटवर्किंग के डिमांड में आने से साहित्यिक चोरों की संख्या में कमी आई है। अब चोरों ने साहित्य पर हाथ साफ करना कम और फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस को चुराना अधिक शुरू कर दिया है। आए दिन कोई न कोई खबर कानों में पड़ ही जाती है कि फलां ने मेरा स्टेटस चुरा लिया। फलां में मेरा ट्वीट चुरा लिया। यों भी, सोशल नेटवर्किंग पर चोरी करना है भी बहुत आसान। चुटकुले और कविताएं तो अक्सर ही यहां चोरी होते रहते हैं। अरे, न जाने कित्ते ही स्टेटस (फेसबुक-टि्वटर के) अखबार वाले अपने यहां बिना लेखक से पूछे छाप लेते हैं।

किंतु साहित्यिक या लेखकीय चोरी को मैं चोरी नहीं मानता। भले ही अपने नाम से किया पर चोर ने आपकी लिखी चीज का प्रचार-प्रसार तो किया। यह क्या कम बड़ी बात है। आपका लिखा आपके पास ही 'डंप' हो रहा था, चोर ने उसे नए आकार-प्रकार में अपने नाम से निकलवा दिया। क्या गलत किया? लिखे का प्रचार-प्रसार होना चाहिए। कैसे हो रहा है, कौन कर रहा है, किस तरह से कर रहा है; इस पर ध्यान कम से कम देना चाहिए।

अरे, मैं तो जाने कब से चाहता हूं कि मेरा लिखा कोई चुराए। उसका अपने तरीके से प्रचार-प्रसार करे। चुरा लेने के बाद मुझे कोई बताए कि आपका लिखा फलां-फलां ने चुरा लिया है। मैं उस चोरी की अनुभूति को भीतर तलक महसूस करना चाहता हूं। मैं उन लेखकों-साहित्यकारों की तरह नहीं हूं, जो अपना लिखा चोरी चलने जाने पर आंसू बहाते हैं। चोर को गरियाते हैं। अजी, इसमें आंसू बहाना कैसा? पब्लिक डोमेन में रहकर, इस बात की किसी के पास कोई गारंटी नहीं होती कि उसका सब-कुछ सुरक्षित है। कोई न कोई, कुछ न कुछ, कहीं न कहीं से चुरा ही रहा है। प्रेमी दिल चुरा रहा है। नेता कुर्सी चुरा रहा है। दुकानदार रेट चुरा रहा है।

चोरा-चारी बुराई नहीं अब धर्म बनती जा रही है। तमाम लोगों की आस्थाएं-भावनाएं इससे जुड़ी हैं। इसीलिए मैं चाहता हूं कि कोई मेरा लिखा भी चुराए। जिस दिन मेरा लिखा कुछ चुरा, भगवान कसम, उस चोर को मैं अपने खरचे से पार्टी दूंगा। उसे बार-बार अपने सीने से लगाकर उसे प्यार की झप्पी दूंगा। पर, पहले मेरा कुछ चुरे तो! 

1 टिप्पणी:

शारदा अरोरा ने कहा…

मजेदार लिखा है , हम भी बुरा नहीं मानते अगर कोई चुरा ले मगर बस नाम के साथ छापे , चुराने पर समझ लेते हैं कि लेखन सार्थक हो गया , इस लायक था शायद । और इसे पढ़ कर तो हँसी आ गई।
देखिए, बात को समझिए, चोर की नजर और आशिक के दिल का कोई भरोसा नहीं होता कब, कहां, किस पर आ जाए।