मंगलवार, 10 मार्च 2015

बेवकूफ बनो, बेवकूफियां करो

मैं और मेरी 'बेवकूफियां' हमेशा साथ-साथ रहती-चलती हैं। शायद ही दिन या रात का कोई ऐसा पल हो जिसमें मैं बेवकूफियां न करता हूं। मुझे बेवकूफियां करना इसलिए 'पसंद' है क्योंकि ये मुझे 'कूल' रखती हैं तथा समाज और दुनिया को समझने की 'ताकत' देती हैं। मेरा मानना भी है कि जिस बंदे कने बेवकूफियां नहीं, उसके जीवन का कोई अर्थ-मतलब नहीं। जीवन में बेवकूफियों और बेवकूफों का रहना उत्ता ही जरूर है, जित्ता सनी लियोनी का बिकनी में रहना।

बेवकूफ तो मैं बचपन से हूं, ऐसा अक्सर (आज भी) पिताजी मुझे कहते-बतलाते रहते हैं। बचपन में मुझे मेरी बेवकूफियों पर 'मार' पड़ती थी, अब 'हंसी' उड़ाई जाती है। लेकिन 'बुरा' न मैंने तब माना था, न ही अब मानता हूं। बुरा क्यों मानूं? मेरी बेवकूफियां हैं, मैं उनके साथ चाहे कैसे भी रहूं, मेरी मर्जी। मेरी तो हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं अपनी बेवकूफियों का असर अपने कामों (लेखन में भी) में जारी रखूं। बेवकूफियां मेरे 'सहज' बनने रहने की सबसे बड़ी 'प्रेरणा' हैं।

बहुत संभव है, ऐसा लेखक लोग न मानते हों, किंतु अपने बारे में मैं सौ फीसद यही मानता हूं कि लेखक 'बेवकूफ' होता है। लेखक अगर बेवकूफ न होता तो इत्ती 'पैनी दृष्टि' से न समाज को देख पाता न दुनिया को। 'समझदार' बने रहकर अगर आप इस समाज और दुनिया को समझने की कोशिश करेंगे तो पक्का 'धोखा' ही खाएंगे। बेवकूफ की निगाह से अगर समाज और दुनिया को देखेंगे तो हर वक्त कुछ न कुछ नए 'करतब' और 'कार्टून' देखने को मिलते रहेंगे। मेरा दावा है, इस समाज और दुनिया में मात्र दस प्रतिशत समझदार और नब्बे प्रतिशत बेवकूफ हैं। हर घर में चार में से दो बेवकूफ जरूर होते हैं। और जित्ती 'प्रैक्टिकल' बात बेवकूफ करेगा, उत्ता समझदार नहीं।

दरअसल, समझदारों के साथ हमेशा से सबसे बड़ा 'दुर्भाग्य' यही रहा है कि वे अपने को समझदार ही मानते-समझते रहे हैं। अपनी समझदारी के पीछे हमेशा 'लठ्ठ' लिए पड़े रहते हैं। जबकि बेवकूफ के साथ ऐसा नहीं है। बेवकूफ हर 'कंडिशन' में एकदम 'कूल' रहता है। न वो अपने सिर पर वैचारिकता का लोड लेता है न प्रगतिशीलता का तमगा अपने माथे पर चिपकाए घुमता है। हर समस्या का निदान है, बेवकूफ के पास। लेकिन समाज और दुनिया तो बेवकूफ को बेवकूफ ही समझती है। ठीक जैसे- गधे को गधा। जबकि जानवरों में गधे से बड़ा 'ज्ञानी' कोई नहीं!

मुझे इस बात का बहुत 'फक्र' है कि लेखकों के बीच मैं अकेला 'बेवकूफ लेखक' हूं। मेरा लेखन, मेरी सोच, मेरी वैचारिकता सब बेवकूफियों की खान है। मेरी मित्र-मंडली में एक से बढ़कर एक बेवकूफ हैं। जिनसे मुझे किस्म-किस्म का 'बेवकूफी भरा लेखन' करने की प्रेरणा मिलती है। स्थिति यह है कि दिन में दो-तीन बेवकूफी भरे व्यंग्य जब तलक न लिख लूं, चैन नहीं पड़ता। अपनी बेवकूफियों को बनाए-बचाए रखने के लिए मैं कथित बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों से 'उचित दूरी' बनाकर रखता हूं।

बेवकूफियों के मजे बेवकूफ ही अच्छी तरह से उठा सकता है। जो बेवकूफ नहीं है, वो क्या जाने 'रायते का स्वाद'। बेवकूफों की अपनी दुनिया है, जिसमें वो हमेशा मस्त रहते हैं। अपनी दुनिया में आने से किसी को रोकते-टोकते नहीं। फिर भी, पता नहीं, लोग बेवकूफ को 'खराब नजर' से ही क्यों देखते हैं? जबकि बेवकूफ ने आज तक किसी का न कुछ चुराया, न छीना। जो हो, मगर बेवकूफ पर किसी बात का कोई असर नहीं पड़ता। उनके तईं तो पूरी दुनिया और समाज ही बेवकूफों की शरण स्थली है।

तब ही तो मैं लोगों से कहता हूं कि बेवकूफ बनो, बेवकूफियां करते रहे फिर देखो यह दुनिया, यह समाज कित्ता 'मस्त' नजर आएगा।

2 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ला ने कहा…

बढ़िया लिखा। बधाई।

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

शुक्रिया अनूपजी।