सोमवार, 2 मार्च 2015

खुद पर हंसता और व्यंग्य बनाता हूं

मुझे खुद पर 'हंसने' और 'व्यंग्य' करने में मजा आता है। दिन के 24 में से 23 घंटे मैं खुद पर हंसता हूं। और बाकी के बचे एक घंटे में खुद ही पर व्यंग्य खींचता हूं। इससे मुझे मानिसक और दिली सुकून मिलता है। लगता है, मेरा दिन सार्थक हुआ। खुद पर हंसना और व्यंग्य बनाना सचमूच दिलेरी का काम है।

मेरा दावा है, हंसी और व्यंग्य कभी 'बोरिंग' हो ही नहीं सकते। क्योंकि जिंदगी में यही दो महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं, जिनके साथ इंसान खुद को हल्का और तरोताजा बना पाता है। वरना सुबह से लेकर रात तलक दौड़-दौड़ और बस दौड़ ही है जिंदगी में।

दूसरों पर हंसने से कहीं ज्यादा कठिन है खुद पर हंसना। खुद की बेवकूफियों पर व्यंग्य तानकर पाठक के समक्ष रखना। लेखक की असली परीक्षा तो वही होती है कि वो खुद पर, खुद की आदतों, बेवकूफियों, सियानेपन पर कित्ता और कहां तलक लिख पाता है। मुझे परसाई और केपी सक्सेना के व्यंग्य इसलिए पसंद आते हैं क्योंकि उन्होंने देश, दुनिया, समाज, व्यवस्था, राजनीति आदि पर व्यंग्य खुद पर केंद्रित कर लिखे हैं। अंगरेजी में खुशवंत सिंह की खास पहचान खुद की आदतों पर केंद्रित लेखन रहा है। आरके लक्ष्मण के कार्टूनों में कॉमन मैन (आम आदमी) अंत तक कॉमन मैन ही बना रहा। और व्यवस्था-राजनीति को 'झकझोरता' रहा। इसी में तो आनंद है पियारे कि दूसरों पर सीधा तंज न कर खुद को उस तंज का हिस्सा बनाकर अपनी बात कह जाओ।

बड़े आत्मकेंद्रित से होते हैं वो लोग जो न अपनी हंसी हंसते हैं न दूसरे को हंसता देख पाते हैं। हर समय माथे पर बल डाले और मोहर्रमी सूरत बनाए न जाने किन अजीब से ख्यालों में खोए रहते हैं। इस किस्म के प्राणी ज्यादातर 'बुद्धिजीवि कुनवे' में ही मिला करते हैं। व्यंग्य उनकी निगाह में पल्लेदरजे का लेखन होता है। इसीलिए तो मैं आत्मकेंद्रित किस्म के बुद्धिजीवियों से गज भर की दूरी बनाकर रहता हूं। मैं अपनी हंसी और व्यंग्य पर किसी बुद्धिजीवि की 'भुनभुनी नजर' नहीं डलवाना चाहता।

यों भी, मुझे किसी की बुद्धिजीविता या बेवकूफियों से क्या मतलब, जब हजारों प्रकार की बेवकूफियां मेरे भीतर खुद ही मौजूद हैं। मुझे अपनी बुद्धि से कहीं ज्यादा अपनी बेवकूफियों पर 'नाज' है। ये मेरी बेवकूफियां ही तो हैं, जो आज मुझ से खुद पर व्यंग्य लिखवा रही हैं। बेवकूफियां हर बंदे के अंदर होती हैं, कुछ उन पर हंसकर दिल को बहला लेते हैं तो कुछ हर वक्त उन्हें 'नसीब' की माफिक कोसते रहते हैं।

मेरी तरफ से आपको भी 'खुल्ली छूट' है कि मेरी बेवकूफियों पर हंसे और व्यंग्य बनाएं। आपकी कसम, मुझे बहुत आनंद आएगा। व्यंग्य का असली मजा ही खुद पर कसे जाने में है। क्यों पियारे, है कि नहीं...।

1 टिप्पणी:

अनूप शुक्ला ने कहा…

खुद पर हंसने का यह जज्बा बना रहे।