गुरुवार, 26 मार्च 2015

अलविदा, 66 A

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 66 A का डंडा अब कभी नहीं चलेगा। मगर फिर भी मेरे मन में 'भय' और 'संशय' कायम है। अभिव्यक्ति की आजादी मिलने के बाद भी पता नहीं क्यों उंगुलियां की-बोर्ड पर कंपकंपा-सी रही हैं। फेसबुक या टि्वटर पर कुछ पोस्ट करने से पहले अब मैं दस दफा उसको संभालकर पढ़ने लगा हूं। हालांकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि मैं अपनी लिखी पोस्ट दोबारा से पढ़ी हो। लेकिन अब ऐसा कर रहा हूं।

वो क्या है कि मुझे जरूरत से ज्यादा मिली आजादी और भूख से ज्यादा मिला खाना कभी 'हजम' नहीं हो पाता। 'बदहजमी' न हो इसलिए जरूरी प्रीकॉशन पहले ही बरत लेता हूं। 66 A के मामले में भी मैं ऐसा ही कर रहा हूं। बेशक, अब किसी को कुछ भी लिखने की आजादी मेरे पास है लेकिन पुलिसिया डंडे और आहत भावनाओं के मारे बंदों का क्या कीजिएगा जनाब। वे कब में अपना आपा खोकर आप पर चढ़ बैठें, क्यों नहीं जानता। ठीक है कि कानून खत्म हुआ है पर सेंटीमेंट का उबाल तो बन ही हुआ है न।

आलम यह है कि मैं किसी दूसरे पर तो जाने ही दीजिए, अब खुद पर भी कमेंट बहुत सोच-समझकर कर रहा हूं। मैं भी कोई भावनाओं से अलहदा थोड़े हूं। क्या पता मेरी ही भावनाएं मेरी ही किसी बात पर आहत होकर, मुझे ही जेल भिजवा दें। मेरा भी वही नुकसान कर दें, जो अब तलक दूसरों का हुआ है। बताने में शर्माना कैसा, मैं दो चीजों से बेहद डरता हूं; एक- जेल और दूसरा- भावनाएं। दोनों से उत्ती ही दूरी बनाकर रहता हूं, जित्ता कि बिल्ली कुत्ते से।

मानता हूं कि 66 A का हमारे बीच से अलविदा होना निश्चित ही खुशी का विषय है लेकिन खुशियों को मातम में तब्दील होते देर ही कित्ती लगती है पियारे। ये सोशल मीडिया तो एक प्रकार का 'खुल्ला दरबार' है। किसी के भी बारे में कुछ भी लिखो। कहीं किसी को कोई रोक-टोक नहीं। यहां न जाने कित्ती ही दफा तो मैं ही दूसरों के द्वारा 'गरियाया' जा चुका हूं। मगर मैंने कभी किसी का 'विरोध' इसलिए नहीं किया कि क्या फायदा मामले को आगे बढ़ाके। आजकल का जमाना ऐसा है भी नहीं। सेर को सवा सेर मिलते यहां देर ही कित्ती लगती है। इसीलिए, जित्ता हो सके अपनी बचाए रहने में ही भलाई है। अपनी बची है तो समझिए सबकी बची हुई है।

जानता हूं कि डर कर रहने से कुछ हासिल नहीं होता। क्योंकि डर के आगे जीत है। मगर मैं ऐसी भी जीत नहीं चाहता कि जान पर ही बन आए। जान है तो जहान है। जहान है तो सोशल मीडिया के बीच मौजूदगी है। सही है कि सोशल मीडिया ने तमाम प्रकार के उबड़-खाबड़ बंधनों-परंपराओं को जरूर तोड़ा है पर 'यथास्थितिवाद' अब भी बचा हुआ है यहां कहीं-कहीं।

यहां तो लोग जरा से 'व्यंग्य' पर ही बुरा मान जाते हैं। व्यंग्य को मान-हानि समझ लेते हैं। जबकि व्यंग्य या कार्टून ने कभी किसी की मान-हानि की हो, ऐसा उसका स्वभाव नहीं। लेकिन लोगों का दिमाग है, कब में उलट जाए क्या पता।

चलिए अभी 66 A के अलविदा होने का वक्त है सो आप लोगों की खुशी और जश्न में मैं भी शरीक हो लेता हूं मगर मेरे संशय फिर भी बने रहेंगे। और मुझे इंतजार रहेगा 66 A की विदाई के बाद के सीन का। या खुदा कुछ 'अप्रिय' न हो।