मंगलवार, 31 मार्च 2015

अपनी मूर्खता पर गर्व

मुझे अपनी मूर्खता साबित करने के लिए कभी किसी खास दिवस का मुंह नहीं ताकना पड़ा। मेरे तईं हर दिवस मूर्ख दिवस है। मेरे विचार में, मूर्ख दिवस को तारीख में बांधना उचित नहीं। देखा जाए तो हर दिन में कुछ न कुछ मूर्खता का पुट रहता ही है।

जैसे बुद्धिजीवि को अपनी बुद्धि पर, अकलमंद को अपनी अकल पर, नकलची को अपनी नकल पर गर्व होता है, वैसे ही मुझे अपनी मूर्खता पर गर्व है। इस गर्व को मैंने कभी किसी से छिपाया नहीं। छिपाऊं भी क्यों? मूर्ख होना कोई खराब बात थोड़े है। हम सब थोड़े या बहुत हर स्तर पर कुछ न कुछ मूर्ख हैं। कुछ अपनी मूर्खता को छिपाने का प्रयास करते हैं तो कुछ उजागर करने का। वैसे, अपनी मूर्खता को उजागर करने में ही भलाई है। कम से कम सामने वाला किसी 'भ्रम' में तो नहीं रहता।

मुझे ही देख लीजिए। मुझे बचपन से मूर्ख होने का खिताब मिला हुआ है। क्लास में मेरे टीचर ने कभी मुझे समझदार नहीं समझा। हमेशा मुझे मूर्ख कहकर ही पुकारते थे। यहां तक कि मैं एग्जाम में नंबर भी 'मूर्खपंती' वाले ही लाता था। मेरी मूर्खता का क्लास में इत्ता खौफ था कि अकलमंद बच्चे मेरे पास बैठना तो छोड़िए, मेरे करीब तक न आते थे। उन्हें हमेशा यह भय बना रहता था कि मैं उनको भी अपने जैसा (यानी मूर्ख) बना दूंगा।

लेकिन मैंने कभी अपनी मूर्खता को किसी पर थोपने की कोशिश नहीं की। जिसे मेरा मूर्खतापूर्ण ज्ञान पसंद आया उसे दिया। जिसे ना-पसंद लगा, उससे किनारा कर लिया। दरअसल, समाज में हर कोई बुद्धिमान या अकलमंद ही होना चाहता है, मूर्ख कोई नहीं। मूर्ख से लोग उत्ता ही दूर भागते हैं, जैसे शेर को देखकर इंसान।

अपनी मूर्खता को मैंने अपने लेखन में भी बनाए रखा है। मेरा समस्त लेखन मूर्खता की निशानी है। बिन मूर्खता के मैं अपने लेखन की कल्पना तक नहीं कर सकता। शायद आप यकीन न करें पर यह सत्य है कि मूर्खतापूर्ण लेखन करने में वैचारिक लेखन से भी साढ़े दस गुनी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे ही हवा में कोई मूर्ख लेखक नहीं हो जाता पियारे। मूर्ख लेखक वैचारिक तुकबंदियों और हवा-हवाई प्रगतिशीलताओं से कोसों दूर रहता है।

मैं तो चाहता हूं कि दुनिया भर के मूर्खों को एकजुट होकर अपना एक संगठन बना चाहिए। ताकि सब मूर्ख अपनी-अपनी मूर्खताओं को एक जगह रख सकें। एक साथ हंस-बोल सकें। यह शायद ज्यादा सहज रहेगा। इस बहाने मूर्ख लोग खुद को अकेला भी महसूस नहीं करेंगे।

इस मूर्ख दिवस पर मेरी तरफ से दुनिया भर के मूर्खों को मूर्खतायुक्त शुभकामनाएं।

सोमवार, 30 मार्च 2015

मूर्खता में मजा

मुझे 'गंभीरता' से नफरत पर 'मूर्खता' से प्यार है। जब सृष्टि की रचना की गई होगी, तब मूर्खों में मेरा नाम 'अव्वल नंबर' पर रहा होगा! गंभीरता का पुर्ज मेरे मस्तिष्क में शायद इसलिए नहीं डाला गया होगा- कहीं यह बंदा धरती पर पहुंचकर माहौल 'मातमी' न कर दे। इसीलिए मुझे हर वो आदत बख्शी गई, जिसमें मूर्खता का पुट ज्यादा हो। मूर्ख होने के नाते मैं खुद को बुद्धिजीवियों व पढ़े-लिखों से कुछ अलग-सा महसूस करता हूं।

मूर्ख होना मेरे लिए 'अपमान' की नहीं, बेहद 'सम्मान' की बात है। मेरा मानना है- खुद या दुनिया को मूर्ख बनकर या बनाकर ही बेहतर समझा जा सकता है। हालांकि दुनिया में एक से बढ़कर एक मूर्ख मौजूद हैं पर वो मूर्ख इत्ते 'सियाने' हैं कि खुद को मूर्ख मानते ही नहीं। अगर उन्हें कोई मूर्ख कह दे, तो इत्ता बुरा मान जाते हैं, मानो उनकी बुद्धि पर डाका डाल दिया हो। जबकि बुद्धि का मूर्ख या मूर्खता से कोई लेना-देना नहीं है। बुद्धि तो मूर्ख के लिए दिमाग का मैल है।

यही वजह है कि मैं बुद्धि के मैल को दिमाग से बाहर रखता हूं। दिमाग के भीतर रहकर बुद्धि तरह-तरह से 'आतंक' मचाती है। किसी भी बात या मुद्दे पर बंदे को इत्ता अधिक सोचने पर मजबूर कर देती है कि 'पगला' जाए। जबकि ज्यादा सोचना एक प्रकार की 'बीमारी' है। मैंने कई ऐसे बंदे देखे-सुने हैं, जो बिचारे सोचते-सोचते ही दुनिया से खर्च हो लिए। मेडिकल सांइस बताती है कि सोचने से बुद्धि का सबसे अधिक 'सत्यानाश' होता है। सोचना बुद्धि को इस कदर कुंद बना देता है कि बंदा फिर न खुद का रह पाता है न समाज का। सोचने वालों की दुनिया बेहद काली होती है। काल-कोठरी समान। बुद्धि का दबाव उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।

मगर मूर्खता ऐसा कुछ भी करने से हमेशा रोकती है। मूर्ख बंदे कने इत्ता टाइम नहीं होता कि वो अपनी मूर्खता के अतिरिक्त किसी और बात या मुद्दे पर ध्यान दे सके। वो तो हर वक्त अपनी मूर्खता में ही व्यस्त रहता है। जैसाकि मैं।

यकीन मानिए, मूर्खों की दुनिया समझदारों से कहीं बेहतर और दिलचस्प होती है। सबसे खास बात, मूर्ख बेफालतू की टेंशन का लोड नहीं लेता। न किसी के बारे में गलत सोचता है, न किसी को गलत बताता। मूर्ख की स्थिति एकदम गधे जैसे होती है। अपनी ढेंचू-नुमा दुनिया में ही मस्त रहता है।

आप शायद यकीन नहीं करेंगे गधा मेरी मूर्खता की प्रेरणा है। अपने जीवन व लेखन में मैंने गधे से बहुत कुछ सीखा व जाना है। दुनिया मेरे बारे जो चाहे राय रखे, मुझे इससे ज्यादा मतलब नहीं रहता। मेरे सरोकार मूर्खों और गधों से अधिक जुड़े हैं। मैं हर उसी बात को करना-मानना पसंद करता हूं, जहां बौद्धिता का नहीं मूर्खता का वर्चस्व ज्यादा हो। मूर्खता के धरातल पर खड़े होकर चीजें मुझे अधिक 'पारदर्शी' दिखाई पड़ती हैं। यही हमारे वक्त का तकाजा भी है।

दरअसल, लेखन में मैंने व्यंग्य को इसलिए चुना ताकि अपनी मूर्खतापूर्ण सोच एवं विचारधारा का उत्पादन अधिक खुलकर कर सकूं। मेरा विश्वास चिंतन या मनन करने से अधिक मूर्ख-नुमा विचार और व्यवहार में है। चिंतन वो करते हैं, जिनके कने अतिरिक्त दिमाग होता है। चूंकि मेरे कने नहीं है, इसलिए मैं बचकर रहता हूं।

हम मूर्खों का कोई एक दिन नहीं होता। हर दिन, हर पल हमारा होता है। मूर्ख-दिवस चाहे एक अप्रैल को हो या न हो, हमें अपनी मूर्खता से मतलब। जिंदगी को मस्त होकर जीने का सबसे उम्दा जरिया है, खुद मूर्ख बने रहकर दूसरे की अकलमंदी पर मन ही मन मुस्कुराना।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

अलविदा, 66 A

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 66 A का डंडा अब कभी नहीं चलेगा। मगर फिर भी मेरे मन में 'भय' और 'संशय' कायम है। अभिव्यक्ति की आजादी मिलने के बाद भी पता नहीं क्यों उंगुलियां की-बोर्ड पर कंपकंपा-सी रही हैं। फेसबुक या टि्वटर पर कुछ पोस्ट करने से पहले अब मैं दस दफा उसको संभालकर पढ़ने लगा हूं। हालांकि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि मैं अपनी लिखी पोस्ट दोबारा से पढ़ी हो। लेकिन अब ऐसा कर रहा हूं।

वो क्या है कि मुझे जरूरत से ज्यादा मिली आजादी और भूख से ज्यादा मिला खाना कभी 'हजम' नहीं हो पाता। 'बदहजमी' न हो इसलिए जरूरी प्रीकॉशन पहले ही बरत लेता हूं। 66 A के मामले में भी मैं ऐसा ही कर रहा हूं। बेशक, अब किसी को कुछ भी लिखने की आजादी मेरे पास है लेकिन पुलिसिया डंडे और आहत भावनाओं के मारे बंदों का क्या कीजिएगा जनाब। वे कब में अपना आपा खोकर आप पर चढ़ बैठें, क्यों नहीं जानता। ठीक है कि कानून खत्म हुआ है पर सेंटीमेंट का उबाल तो बन ही हुआ है न।

आलम यह है कि मैं किसी दूसरे पर तो जाने ही दीजिए, अब खुद पर भी कमेंट बहुत सोच-समझकर कर रहा हूं। मैं भी कोई भावनाओं से अलहदा थोड़े हूं। क्या पता मेरी ही भावनाएं मेरी ही किसी बात पर आहत होकर, मुझे ही जेल भिजवा दें। मेरा भी वही नुकसान कर दें, जो अब तलक दूसरों का हुआ है। बताने में शर्माना कैसा, मैं दो चीजों से बेहद डरता हूं; एक- जेल और दूसरा- भावनाएं। दोनों से उत्ती ही दूरी बनाकर रहता हूं, जित्ता कि बिल्ली कुत्ते से।

मानता हूं कि 66 A का हमारे बीच से अलविदा होना निश्चित ही खुशी का विषय है लेकिन खुशियों को मातम में तब्दील होते देर ही कित्ती लगती है पियारे। ये सोशल मीडिया तो एक प्रकार का 'खुल्ला दरबार' है। किसी के भी बारे में कुछ भी लिखो। कहीं किसी को कोई रोक-टोक नहीं। यहां न जाने कित्ती ही दफा तो मैं ही दूसरों के द्वारा 'गरियाया' जा चुका हूं। मगर मैंने कभी किसी का 'विरोध' इसलिए नहीं किया कि क्या फायदा मामले को आगे बढ़ाके। आजकल का जमाना ऐसा है भी नहीं। सेर को सवा सेर मिलते यहां देर ही कित्ती लगती है। इसीलिए, जित्ता हो सके अपनी बचाए रहने में ही भलाई है। अपनी बची है तो समझिए सबकी बची हुई है।

जानता हूं कि डर कर रहने से कुछ हासिल नहीं होता। क्योंकि डर के आगे जीत है। मगर मैं ऐसी भी जीत नहीं चाहता कि जान पर ही बन आए। जान है तो जहान है। जहान है तो सोशल मीडिया के बीच मौजूदगी है। सही है कि सोशल मीडिया ने तमाम प्रकार के उबड़-खाबड़ बंधनों-परंपराओं को जरूर तोड़ा है पर 'यथास्थितिवाद' अब भी बचा हुआ है यहां कहीं-कहीं।

यहां तो लोग जरा से 'व्यंग्य' पर ही बुरा मान जाते हैं। व्यंग्य को मान-हानि समझ लेते हैं। जबकि व्यंग्य या कार्टून ने कभी किसी की मान-हानि की हो, ऐसा उसका स्वभाव नहीं। लेकिन लोगों का दिमाग है, कब में उलट जाए क्या पता।

चलिए अभी 66 A के अलविदा होने का वक्त है सो आप लोगों की खुशी और जश्न में मैं भी शरीक हो लेता हूं मगर मेरे संशय फिर भी बने रहेंगे। और मुझे इंतजार रहेगा 66 A की विदाई के बाद के सीन का। या खुदा कुछ 'अप्रिय' न हो।

बुधवार, 25 मार्च 2015

मेरी जासूसी भी करें

मेरा लड़कपन से यह मानना रहा है कि जासूसी होती रहनी चाहिए। जासूसी होती रहती है तो बंदे के सारे टांके दुरुस्त रहते हैं। न हवा में ज्यादा उड़ता है न छोड़ता। उसे हर पल इस बात का 'भय' रहता है कि तीसरी आंख कहीं से मुझे और मेरी हरकतों को देख रही है।

फिर भी जो लोग जासूसी के नाम से ही 'भड़क' जाते हैं, उनके मन में कहीं न कहीं 'चोर' जरूर होता है। वरना, जासूसी से क्या घबराना? यों भी, जासूसी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे की तो होती नहीं, हमेशा बड़े लोगों की जाती है। अगर कोई बड़ा न भी हो, जासूसी होने के बाद बड़ा हो जाता है। जासूसी की खबर का मीडिया में आना बंदे को और प्रतिष्ठित बना देता है। नाते-रिश्तेदारों और घर-परिवार के बीच कद में इजाफा होता है सो अलग।

सच बोलूं, मेरी तो बहुत इच्छा करती है कि कोई बड़ी एजेंसी या बड़ा जासूस मेरी जासूसी करे। मुझ पर, मेरी हरकतों और मेरे लेखन पर 'गिद्ध-दृष्टि' बनाए रखे। कुछ ऐसा-वैसा पाए जाने पर मेरी जासूसी से जुड़ी खबरें तमाम बड़े अखबारों में आए। बड़े-बड़े लेखक-स्तंभकार और नेता लोग मेरा 'नोटिस' लें। न केवल देश बल्कि विदेशी मीडिया में भी मेरी जासूसी की खबरें सनसनी टाइप बनें। लोग मुझसे मेरी जासूसी होने के बाबत लगातार फोन कर-करके पूछें।

ऐसा कम ही सुनने या पढ़ने में आता है कि लेखक लोगों की जासूसी की गई हो। ज्यादातर जासूसी नेता या कुख्यात टाइप लोगों की ही की जाती है। जिन पर सरकार या खुफिया एजेंसियों को 'शक' हो। यह शक भी बड़ी ऊंची बला है। कब, कहां और किस पर डेवलेप हो ले, पता नहीं चलता। कभी-कभी तो बंदा शक के आधार पर ही 'फेमस' हो लेता है। शक-शक में बंदा न केवल देश बल्कि मीडिया का 'हीरो' भी बन जाता है।

आदमी के भीतर थोड़ा-बहुत शक का बना रहना इसलिए भी जरूरी है ताकि जासूसी का आधार मजबूत बना रहे।

शक के आधार पर ही एक दफा पत्नी मेरी जासूसी भी करवा चुकी है। बाद में पता लगने पर मुझे 'गुस्सा' नहीं बल्कि खुद पर 'गर्व' टाइप फिल हुआ था। इस फिलिंग को आगे बनाए रखने के लिए ही मैं खुद की जासूसी करवाने के पक्ष में हूं। मेरी जासूसी का सिलसिला बना रहेगा तो मैं आसानी से अपनी आदतों-हरकतों पर कंट्रोल रख पाऊंगा।

न जी न जासूसी से 'बदनामी' नहीं 'नाम' मिलता है! आजकल हर जगह 'नाम' का ही 'जोर' है। जिसका नाम वही 'महान' है। इस जोर और महानता के दमखम को मैं बनाए रखना चाहता हूं और अपील करता हूं देश की खुफिया एजेंसियों से कि मेरी भी जासूसी करें। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

नकल से कैसा घबराना!

नकल मानव का स्वभाव है। नकल कभी किसी को 'नुकसान' नहीं पहुंचाती। हम भले ही अकल से दूर रह लें किंतु नकल से दूर एक पल नहीं रह सकते। नकल की हमारे जीवन में उत्ती ही जरूरत है, जित्ती भैंस को चारे की।

लेकिन पता नहीं क्यों, हम नकल के साथ 'सहज' नहीं रह पाते। मौके-बेमौके नकल को 'कोसने' बैठ जाते हैं। नकलबाजों को 'गरियाते' हैं। नकल को वर्तमान और भविष्य के लिए 'खतरा' बताते हैं। जबकि नकल के साथ ऐसा कुछ नहीं है। नकल को लेकर हम चाहे कित्ती ही ऊंची-ऊंची बातें कर लें मगर नकल की महत्ता को न जीवन, न रहन-सहन, न पढ़ाई-लिखाई, न लेखन, न फैशन से कभी 'खारिज' नहीं कर सकते। किसी न किसी रूप में नकल हर कहीं मौजूद रहती है।

मुझे बड़ा अटपटा-सा लग रहा है, जो लोग बिहार में खिड़कियों के रास्ते करवाई जा रही नकल की फोटू देखके 'विचलित' हुए पड़े हैं। भाई, इसमें इत्ता विचलित होने की क्या जरूरत है? वे सब तो हमें हमारी शिक्षा-व्यवस्था का 'सही आईना' दिखला रहे थे। एकजुट होकर अपने-अपने साथियों-मित्रों की सहायता कर रहे थे, वो भी इत्ता 'रिस्क' लेकर। यह कम बड़ी बात नहीं।

आज जब नकल की परंपरा धीरे-धीरे कर 'हाशिए' पर जा रही थी, उन लड़कों ने अपने गंभीर प्रयासों से इसे फिर से 'पुर्नजीवित' किया है। हमें तो उनका 'एहसानमंद' होना चाहिए। नकल का पढ़ाई-लिखाई में बने रहना कित्ता अवश्यक है, यह उन वीर लड़कों ने हमें बताया है।

लद लिए वो दिन जब नकल के लिए अकल की जरूरत हुआ करती थी। अकल तो खामखां सरहाना बटोर लेती है जबकि सारा काम तो नकल ही करती है। जित्ती तेजी से वक्त बदला है, उत्ती ही तेजी से नकल के पैमाने भी बदल रहे हैं। नकल ने पुरानी परंपराओं को तोड़ा है। नकल अब 'हाईटेक' हो ली है। हालांकि पारंपरिक नकल अब भी फर्रों या पर्चियों की सहायता से ही हो रही है लेकिन अब इसमें स्मार्टफोन और किस्म-किस्म के चैटिंग एप्स भी शामिल हो लिए हैं। 'वाह्ट्सएप्स' नकल के वास्ते मस्त भूमिका निभा रहा है। मुझे यह देखकर खुशी होती है कि कुछ समझदार बंदों ने नकल के नाम को मिटने नहीं दिया है।

आज के जमाने में नकल कौन नहीं कर रहा? हर बंदा किसी न किसी तरह से कुछ न कुछ नकल कर ही रहा है। भले ही वो नकल की हकीकत को न स्वीकारे लेकिन नकल की छाया उस पर बनी हुई है। दुनिया में इत्ती बड़ी-बड़ी खोजें हो गईं, बड़े-बड़े लोग इत्ता पढ़-लिख लिए सब में कहीं न कहीं नकल का ज्यादा या कम प्रभाव रहा ही। बिना नकल किए किसी ने कुछ पाया या खोजा हो, ऐसा कम से कम मेरे 'संज्ञान' में तो नहीं है।

किसी और के बारे में क्या 'टिप्पणी' करूं, मेरा खुद का लेखन नकल पर बेस्ड है। दिन में जब तलक छह-सात वरिष्ठ लेखकों के लिखे की नकल नहीं कर लेता न तो सही से कुछ लिख पाता हूं न सो पाता। मेरे लिए नकल करना उत्ता ही अवश्यक है, जित्ता जिंदा रहने के लिए सांसें। सच बोलूं, मैं इत्ता बड़ा लेखक बना ही नकल कर-करके हूं। अगर नकल न होती तो शायद मैं भी न होता। नकल ने मुझे न केवल लेखन जगत में बल्कि नाते-रिश्तेदारों के बीच भी ठीक-ठाक पहचान दी है।

बिहार के उन वीर लड़कों ने नकल की जरूरत को बनाए रखने में महत्ती भूमिका निभाई है। और मैं खुद भी दिल से यही चाहता हूं कि नकल की प्रसांगिकता यों ही बनी रहे ताकि अकलमंद लोग खुद की अकल पर इतरा-इठला न सकें। लाइफ में सफलता के लिए नकल जरूरी है पियारे। मानो या न मानो।

गुरुवार, 19 मार्च 2015

क्यों न करूं नेताओं पर फक्र!

मुझे खुद के बाद अगर किसी पर 'फक्र' होता है तो वे मेरे देश के नेता लोग हैं! नेताओं पर फक्र करना मेरा 'शौक' नहीं बल्कि 'पैशन' है। जब कभी मैं किसी नेता पर फक्र करता हूं तो भीतर से मुझे 'गुडी-गुडी' टाइप फिलिंग आती है।

मेरे कने देश के नेता लोगों पर फक्र करने के एक नहीं सैकड़ों कारण हैं। जित्ती 'खूबियां' मेरे देश के नेता लोगों के भीतर-बाहर हैं, उत्ती किसी दूसरे देश के नेताओं में न होंगी, मेरा दावा है। किसी को कुछ भी बोलने का हक जित्ता नेताओं के पास है, उत्ता तो आम आदमी के पास भी नहीं। आम आदमी पांच साल में सिर्फ एक दफा, वो भी वोट देने के बहाने, ही बोलता है बाकी साल तो नेता लोग ही बोलते रहते हैं। हालांकि नेता लोगों के बोलने या बोलते रहने से आज तलक आम आदमी को कुछ मिला नहीं है लेकिन फिर भी नेताओं को बोलना है तो बोलना है। वे अपने बोलने को ही जन-सेवा समझते हैं। मुझे उनके बोलने पर फक्र है।

अभी हाल एक बड़े नेता ने महिलाओं पर जो कुछ टिप्पणियां की हैं, मुझे उन पर भी फक्र है। फक्र इसलिए है क्योंकि जो दूसरा नहीं बोल पाता, उसे उन नेताजी ने संसद के भीतर 'खुलकर' बोल दिया। और, आज भी वे अपने 'बोल' पर 'डटे' हुए हैं। डटा ही रहना चाहिए, नहीं तो लोगों को पता कैसे चल पाएगा कि नेताजी कित्ते प्रगतिशील और उच्च विचारों के मालिक हैं।

काली-गोरी स्त्री में फर्क जिसे आज तलक क्रीम-पॉडर बनाने वाली बड़ी-बड़ी तोपची कंपनियां नहीं समझा पाईं, हमारे नेताजी ने 'हाथ के इशारों' से दो मिनट में समझा दिया। हालांकि कुछ स्त्रियों ने नेताजी के 'हाथ के इशारों' पर 'एतराज' जताया है पर क्या कीजिएगा, नेताजी का मन है। मन पर भला कब, किसका कंट्रोल रहा है।

न जी न इसे आप नेताजी की 'पुरुष-मानसिकता' समझकर उन पर 'शक' न करें, उन्होंने तो समझया है कि स्त्री को देखने के लिए उसके 'संघर्ष' से ज्यादा 'रूप-रंग' की आवश्यकता होती है। इसी रूप-रंग पर तो दुनिया मरती है। काले को हिकारत और गोरे को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

रही बात उन बुद्धिजीवियों की जो नेताजी के पक्ष में आन खड़े हुए हैं। दरअसल, उन्हें तो बहाना चाहिए नेताजी के सहारे खुद को लोगों के बीच बनाए रखने का। देश के बुद्धिजीवि अब हर उस बात का समर्थन करने लगे हैं, जो सरकार या प्रधानमंत्री के खिलाफ जाती हो। चूंकि वे प्रगतिशील बुद्धिजीवि हैं इसलिए अपनी प्रगतिशीलता को दिखाने का मौका भला हाथ से क्यों जाने दें। इसी प्रगतिशीलता के सहारे ही तो साहित्य-समाज के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की रोजी-रोटी चल रही है पियारे। जब तलक वे विपरित हवा में बहेंगे नहीं, प्रगतिशील कैसे कहलाएंगे।

काली-गोरी स्त्री पर बहस के बाद जिस तरह नेता लोगों ने भूमि-अधिग्रहण मुद्दे पर किसानों के पक्ष में सड़क पर चहलकदमी की, मुझे उस पर भी फक्र है। कुछ नेता लोग तो जरा-सी चहलकदमी में ही 'हांफते' नजर आए फिर भी खुद को कैमरे के आगे आने से न रोक सके। ताकि देश के किसानों को भी पता लग सके कि नेता लोगों ने उनके अधिकारों के वास्ते मार्च किया। नेता लोगों ने इस 'हांफते मार्च पास्ट' को बेहद सफल बताया है। मुझे उन पर फक्र है।

देखा किसान भाइयों तुम्हारी किस्मत कित्ती अच्छी है, कि तुम्हें ऐसे 'जन-हितैषी' नेता मिले हैं। जो दो कदम चलने पर ही 'हांफ' जाते हैं लेकिन मन से तुम्हारे साथ हैं। तुम्हें भी हमारे देश के नेता लोगों पर फक्र करना चाहिए। अपने गुस्से को दबाने के लिए नेताओं पर फक्र करना जरूर है पियारे।

फिलहाल, मैं फक्र कर ही रहा हूं आप चाहें तो मेरे साथ आ सकते हैं। 

मंगलवार, 17 मार्च 2015

पत्नी और सेंसेक्स

पियारे, लाइफ में पत्नी के बाद अगर किसी दूसरे को 'इंर्पोटेंस' दी है तो वो 'सेंसेक्स' ही है। बल्कि कहना चाहिए, सेंसेक्स मेरी लाइफ में पहले आया और पत्नी बाद में। लेकिन पत्नी के लाइफ में आने के बाद से सेंसेक्स एक स्टेप नीचे खिसक गया। या कहूं, खिसकाना पड़ा। अगर नहीं खिसकाता तो एक दिन पत्नी के हाथों मेरा खिसकना तय था। क्या कीजिएगा, पत्नी के लाइफ में आने के बाद से अति-महत्त्वपूर्ण चीजें भी 'गौण' या 'दूसरे पायदान' पर खुद-ब-खुद चली ही जाती हैं।

मेरा 'इंट्रस्ट' पत्नी और सेंसेक्स दोनों को ही करीब से जानने में रहा है। लेकिन दोनों को इत्ता आसान भी नहीं करीब से जानना। क्योंकि दोनों (पत्नी और सेंसेक्स) के न मूड, न एटिट्यूड, न चाल, न ढाल, न पसंद, न नापसंद का कोई भरोसा नहीं। यह मेरा, पत्नी और सेंसेक्स के बारे में, व्यक्तिगत अनुभव रहा है कि दोनों का ही 'दिल' बेहद नाजुक होता है। कब, कौन-सी बात दिल पे लेकर 'बिदक' जाएं, कुछ नहीं पता। चलो, पत्नी के दिल को किसी न किसी 'डिमांड' या 'गिफ्ट' के सहारे 'खुश' किया भी जा सकता है किंतु सेंसेक्स का दिल अगर एक दफा बैठ गया तो फिर साक्षात वित्तमंत्री भी मैदान में आ जाएं, खुश करना कभी-कभी 'टेढ़ी खीर' हो जाता है। ऐसा न जाने कित्ती ही दफा हुआ है कि सेंसेक्स एक दफा बिदका तो फिर सबकुछ 'तबाह' करके ही कंट्रोल में आया।

प्रायः जो लोग यह 'दावा' करते हैं कि वे अपनी पत्नी और सेंसेक्स की चाल से पूरी तरफ वाकिफ हैं, दरअसल, 'सफेद झूठ' बोलते हैं। (हां, कुछ 'अपवाद' भले ही हो सकते हैं।) देखो पियारे, पत्नी और सेंसेक्स की चाल शतरंज के पियादों की चाल से भी कहीं ज्यादा अनएस्पेक्टिड और खतरनाक होती है। दोनों ही कब, कहां और किस लेवल पर मात दे दें, पता नहीं चलता। क्या भरोसा, सीधी चाल चलती पत्नी कब पति को उसी के घर में 'टंगड़ी' मार दे। या फिर सीधी चाल चलता सेंसेक्स कब नीचे की ओर लुढ़कना शुरू कर दे। इसीलिए, पति और निवेशक को पत्नी और सेंसेक्स की चाल के अनुसार ही अपनी चाल के दायरे तय करने चाहिए। क्या नहीं...।

बेशक, आज की तारीख में सेंसेक्स एकदम 'जौली मूड' में है।  30 हजार के पार निकल कर खुद की 'कामयाबी' पर 'झठला' रहा है। सरकार और अर्थव्यवस्था के साथ 'कदमताल' भी कर रहा है। पर क्या भरोसा कल को किसी बात पर बिदक ले और लुढ़कना शुरू कर दे। सेंसेक्स की चढ़त एक बार को सहन हो सकती है किंतु लुढ़कना कतई सहन न हो पाता। न जाने कित्ते ही घर सेंसेक्स की लुढ़काहट में तबाह हो लिए हैं अब तक। यह फैक्ट है कि सेंसेक्स किसी को बख्शता नहीं और न ही आज तलक किसी का सगा हुआ है।

हालांकि पत्नी सेंसेक्स जित्ती 'रिजिड' तो न होती मगर कुछ कम न होती। पत्नी का 'जौली मूड' कब किसी बात पर 'रौद्र रूप' धारण कर ले, कोई नहीं जानता। हां, इत्ती 'गुंजाइश' पत्नी के मूड के साथ जरूर रहती है कि उसे 'एडजस्ट' किया जा सकता है। पर सेंसेक्स के साथ तो वो भी नहीं है। एक दफा जो बिगड़ा सो बड़ी मुश्किल से सुधरने में आता है। देखिए न, सन् 2008 के बाद से अब 2014-2015 में आनकर थोड़ा सुधरा है। मगर फिर भी 'गारंटी' कोई नहीं है।

खैर, सेंसेक्स के साथ 18 साल और पत्नी के साथ 11 साल के 'अनुभव' के हिसाब से यह जरूर बतला सकता हूं कि दोनों को ही समझना मुश्किल ही नहीं नामुकिन है। इसीलिए, अपनी 'बचाते' हुए दोनों के साथ जहां तलक संभव हो 'एडजस्ट' करते रहिए। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

सोमवार, 16 मार्च 2015

हे! चोर, मेरा लिखा भी चुरा

पता नहीं लेखक लोग अपना लिखा चोरी चले जाने पर इत्ता बौखलाए क्यों रहते हैं? गाली-गलौज से लेकर मुकदमेबाजी तक पर उतर आते हैं। अखबारों-पत्रिकाओं में चोरी गए लेख के खिलाफ लंबी-लंबी टिप्पणियां लिखते हैं। हर मिलने-जुलने से वाले चोरी गए लेख का रोना ऐसे रोते हैं मानो सोना-चांदी चोरी चल गए हों। अरे भई आप लेखक हैं। ऊपर वाले ने लिखने का हुनूर आपको बख्शा है। अगर कुछ चोरी चला भी गया तो दोबारा लिख लें। इसमें समस्या क्या है? लेखक के लिए लिखना 'बाएं हाथ' का खेल होता है।

उलटा लेखक को तो चोर का 'एहसानमंद' होना चाहिए कि उसने चोरी के लिए उसके लिखे को चुना। वरना, दुनिया में इत्ते लेखक मौजूद हैं, चोर किसी और का भी लिखा चुरा सकता था। मगर चोर ने ऐसा नहीं किया। आपके लिखे को ही चुराया। यानी, आपके लेखन में 'कुछ बात' जरूर है। चोर आपके लेखन पर निगाह बनाए हुए था। उसे आपका लिखा पसंद था।

देखिए, बात को समझिए, चोर की नजर और आशिक के दिल का कोई भरोसा नहीं होता कब, कहां, किस पर आ जाए। इसलिए चोर की हरकत का कतई बुरा नहीं मानना चाहिए।

आप क्या समझते हैं, चोरी करना हंसी-खेल होता है। जान के साथ-साथ इज्जत तक दांव पर लगानी पड़ती है। तब कहीं जाकर चोर चोरी कर पाता है। सोना-चांदी, रुपए-पैसे चुराना तो खैर अलग बात है। लेकिन साहित्यिक चोरी करना बहुत 'गंभीरता' का काम है। अच्छों-अच्छों को नानी याद आ जाती है, साहित्यिक चोरी करने में। साहित्यिक चोरी के लिए चोर भी साहित्यिक दिमाग वाला होना चाहिए।

इधर, सोशल नेटवर्किंग के डिमांड में आने से साहित्यिक चोरों की संख्या में कमी आई है। अब चोरों ने साहित्य पर हाथ साफ करना कम और फेसबुक-टि्वटर के स्टेटस को चुराना अधिक शुरू कर दिया है। आए दिन कोई न कोई खबर कानों में पड़ ही जाती है कि फलां ने मेरा स्टेटस चुरा लिया। फलां में मेरा ट्वीट चुरा लिया। यों भी, सोशल नेटवर्किंग पर चोरी करना है भी बहुत आसान। चुटकुले और कविताएं तो अक्सर ही यहां चोरी होते रहते हैं। अरे, न जाने कित्ते ही स्टेटस (फेसबुक-टि्वटर के) अखबार वाले अपने यहां बिना लेखक से पूछे छाप लेते हैं।

किंतु साहित्यिक या लेखकीय चोरी को मैं चोरी नहीं मानता। भले ही अपने नाम से किया पर चोर ने आपकी लिखी चीज का प्रचार-प्रसार तो किया। यह क्या कम बड़ी बात है। आपका लिखा आपके पास ही 'डंप' हो रहा था, चोर ने उसे नए आकार-प्रकार में अपने नाम से निकलवा दिया। क्या गलत किया? लिखे का प्रचार-प्रसार होना चाहिए। कैसे हो रहा है, कौन कर रहा है, किस तरह से कर रहा है; इस पर ध्यान कम से कम देना चाहिए।

अरे, मैं तो जाने कब से चाहता हूं कि मेरा लिखा कोई चुराए। उसका अपने तरीके से प्रचार-प्रसार करे। चुरा लेने के बाद मुझे कोई बताए कि आपका लिखा फलां-फलां ने चुरा लिया है। मैं उस चोरी की अनुभूति को भीतर तलक महसूस करना चाहता हूं। मैं उन लेखकों-साहित्यकारों की तरह नहीं हूं, जो अपना लिखा चोरी चलने जाने पर आंसू बहाते हैं। चोर को गरियाते हैं। अजी, इसमें आंसू बहाना कैसा? पब्लिक डोमेन में रहकर, इस बात की किसी के पास कोई गारंटी नहीं होती कि उसका सब-कुछ सुरक्षित है। कोई न कोई, कुछ न कुछ, कहीं न कहीं से चुरा ही रहा है। प्रेमी दिल चुरा रहा है। नेता कुर्सी चुरा रहा है। दुकानदार रेट चुरा रहा है।

चोरा-चारी बुराई नहीं अब धर्म बनती जा रही है। तमाम लोगों की आस्थाएं-भावनाएं इससे जुड़ी हैं। इसीलिए मैं चाहता हूं कि कोई मेरा लिखा भी चुराए। जिस दिन मेरा लिखा कुछ चुरा, भगवान कसम, उस चोर को मैं अपने खरचे से पार्टी दूंगा। उसे बार-बार अपने सीने से लगाकर उसे प्यार की झप्पी दूंगा। पर, पहले मेरा कुछ चुरे तो! 

मंगलवार, 10 मार्च 2015

बेवकूफ बनो, बेवकूफियां करो

मैं और मेरी 'बेवकूफियां' हमेशा साथ-साथ रहती-चलती हैं। शायद ही दिन या रात का कोई ऐसा पल हो जिसमें मैं बेवकूफियां न करता हूं। मुझे बेवकूफियां करना इसलिए 'पसंद' है क्योंकि ये मुझे 'कूल' रखती हैं तथा समाज और दुनिया को समझने की 'ताकत' देती हैं। मेरा मानना भी है कि जिस बंदे कने बेवकूफियां नहीं, उसके जीवन का कोई अर्थ-मतलब नहीं। जीवन में बेवकूफियों और बेवकूफों का रहना उत्ता ही जरूर है, जित्ता सनी लियोनी का बिकनी में रहना।

बेवकूफ तो मैं बचपन से हूं, ऐसा अक्सर (आज भी) पिताजी मुझे कहते-बतलाते रहते हैं। बचपन में मुझे मेरी बेवकूफियों पर 'मार' पड़ती थी, अब 'हंसी' उड़ाई जाती है। लेकिन 'बुरा' न मैंने तब माना था, न ही अब मानता हूं। बुरा क्यों मानूं? मेरी बेवकूफियां हैं, मैं उनके साथ चाहे कैसे भी रहूं, मेरी मर्जी। मेरी तो हरदम कोशिश यही रहती है कि मैं अपनी बेवकूफियों का असर अपने कामों (लेखन में भी) में जारी रखूं। बेवकूफियां मेरे 'सहज' बनने रहने की सबसे बड़ी 'प्रेरणा' हैं।

बहुत संभव है, ऐसा लेखक लोग न मानते हों, किंतु अपने बारे में मैं सौ फीसद यही मानता हूं कि लेखक 'बेवकूफ' होता है। लेखक अगर बेवकूफ न होता तो इत्ती 'पैनी दृष्टि' से न समाज को देख पाता न दुनिया को। 'समझदार' बने रहकर अगर आप इस समाज और दुनिया को समझने की कोशिश करेंगे तो पक्का 'धोखा' ही खाएंगे। बेवकूफ की निगाह से अगर समाज और दुनिया को देखेंगे तो हर वक्त कुछ न कुछ नए 'करतब' और 'कार्टून' देखने को मिलते रहेंगे। मेरा दावा है, इस समाज और दुनिया में मात्र दस प्रतिशत समझदार और नब्बे प्रतिशत बेवकूफ हैं। हर घर में चार में से दो बेवकूफ जरूर होते हैं। और जित्ती 'प्रैक्टिकल' बात बेवकूफ करेगा, उत्ता समझदार नहीं।

दरअसल, समझदारों के साथ हमेशा से सबसे बड़ा 'दुर्भाग्य' यही रहा है कि वे अपने को समझदार ही मानते-समझते रहे हैं। अपनी समझदारी के पीछे हमेशा 'लठ्ठ' लिए पड़े रहते हैं। जबकि बेवकूफ के साथ ऐसा नहीं है। बेवकूफ हर 'कंडिशन' में एकदम 'कूल' रहता है। न वो अपने सिर पर वैचारिकता का लोड लेता है न प्रगतिशीलता का तमगा अपने माथे पर चिपकाए घुमता है। हर समस्या का निदान है, बेवकूफ के पास। लेकिन समाज और दुनिया तो बेवकूफ को बेवकूफ ही समझती है। ठीक जैसे- गधे को गधा। जबकि जानवरों में गधे से बड़ा 'ज्ञानी' कोई नहीं!

मुझे इस बात का बहुत 'फक्र' है कि लेखकों के बीच मैं अकेला 'बेवकूफ लेखक' हूं। मेरा लेखन, मेरी सोच, मेरी वैचारिकता सब बेवकूफियों की खान है। मेरी मित्र-मंडली में एक से बढ़कर एक बेवकूफ हैं। जिनसे मुझे किस्म-किस्म का 'बेवकूफी भरा लेखन' करने की प्रेरणा मिलती है। स्थिति यह है कि दिन में दो-तीन बेवकूफी भरे व्यंग्य जब तलक न लिख लूं, चैन नहीं पड़ता। अपनी बेवकूफियों को बनाए-बचाए रखने के लिए मैं कथित बुद्धिजीवियों-प्रगतिशीलों से 'उचित दूरी' बनाकर रखता हूं।

बेवकूफियों के मजे बेवकूफ ही अच्छी तरह से उठा सकता है। जो बेवकूफ नहीं है, वो क्या जाने 'रायते का स्वाद'। बेवकूफों की अपनी दुनिया है, जिसमें वो हमेशा मस्त रहते हैं। अपनी दुनिया में आने से किसी को रोकते-टोकते नहीं। फिर भी, पता नहीं, लोग बेवकूफ को 'खराब नजर' से ही क्यों देखते हैं? जबकि बेवकूफ ने आज तक किसी का न कुछ चुराया, न छीना। जो हो, मगर बेवकूफ पर किसी बात का कोई असर नहीं पड़ता। उनके तईं तो पूरी दुनिया और समाज ही बेवकूफों की शरण स्थली है।

तब ही तो मैं लोगों से कहता हूं कि बेवकूफ बनो, बेवकूफियां करते रहे फिर देखो यह दुनिया, यह समाज कित्ता 'मस्त' नजर आएगा।

शुक्रवार, 6 मार्च 2015

सेंसेक्स संग होली

सेंसेक्स से मेरा अब का नहीं बरसों पुराना नाता है। चाहे गम हो या खुशी हम हमेशा साथ-साथ रहते हैं।

मेरे मुकाबले सेंसेक्स ज्यादा 'संवेदनशील' है। बात चाहे छोटी हो या बड़ी सेंसेक्स तुरंत दिल पर ले लेता है। मगर है दिल का बेहद साफ। न मेरे, न अपने निवेशकों के प्रति दिल में 'मैल' या 'बैर' नहीं रखता। सेंसेक्स के दिमाग की 'हटती' तब है, जब उस की प्रतिष्ठा पर राजनैतिक या अंतरराष्ट्रीय किस्म का जोर पड़ता है। एक दफा अगर सेंसेक्स की हट जाए तो फिर संभालना मुश्किल पड़ जाता है। पसीने आ जाते हैं सरकार से लेकर वित्तमंत्री तक को सेंसेक्स को मनाने में।

आजकल सेंसेक्स 'बेहद प्रसन्न' है। लगभग हर रोज मुस्कुरा रहा है। सेंसेक्स को यों मुस्कुराता देख, मेरा दिल भी खुश रहता है। अपनी खुशी को दोगुना करने के लिए इस दफा मैंने होली सेंसेक्स के साथ मनाना तय किया है। तीस हजारी होकर खुशियों के जो रंग सेंसेक्स ने बिखेरे हैं, उसका 'सैलिब्रेशन' तो बनता है। सेंसेक्स ने जो कर दिखाया, इसका हमें जाने कब से इंतजार था।

सेंसेक्स के साथ होली मनाने के अपने फायदे हैं। मेन फायदा तो यही है कि सेंसेक्स के साथ होली न 'सियासी' होती है न 'औपचारिक'। यह 'शुद्ध दोस्ताना' होली होती है। नेताओं की तरह नहीं कि राजनीतिक फायदे की खातिर आज इसके साथ होली मना ली, तो कल को उसके साथ। न ही सेंसेक्स बात-बात में ईमानदारी-सादगी की नौटंकियां किया करता है। सेंसेक्स 'शुद्ध पूंजीवाद' का समर्थक है, मेरी तरह। अपने निजी फायदे की खातिर सेंसेक्स न अंबानी पर वार करता है न अडानी पर। सेंसेक्स का सारा जोर 'कमाई' पर रहता है। सेंसेक्स बढ़ता है, तो देश की अर्थव्यवस्था के रंग मजबूत होते हैं।

संवेदी होने के साथ-साथ सेंसेक्स 'रंगीन तबीयत' भी है। मस्ती के मूड में जब होता है, तो क्या दीवाली, क्या होली झूमकर नाचता-गाता-खिलखिलाता है। अपनी मस्ती चाल से सेंसेक्स ने इस बार की होली को रंगीन बना दिया है। दलाल पथ से लेकर जनपथ तक सब के चेहरे सेंसेक्स की रंगीनियत में सराबोर हैं।

कुछ लोग हैं, जिन्हें सेंसेक्स का तीस हजारी हजारी होना अखर रहा है। सवाल कर रहे हैं कि सेंसेक्स आखिर बढ़ क्यों रहा है? सेंसेक्स पर यह कौन-सी मस्ती छाई हुई है? दरअसल, वे 'मूर्ख' हैं, जो सेंसेक्स की बढ़त से जलते हैं। उन्हें क्या पता, जो मजा सेंसेक्स की बढ़त में है, वो कद की बढ़त में भी नहीं। ऐसे लोग बेहद छोटी सोच के होते हैं। वे अपनी होली तो 'बद-रंग' करते ही है, साथ-साथ चहाते हैं कि सेंसेक्स भी होली पर मुंह लटकाए रहे। लेकिन सेंसेक्स हमारा स्मार्ट है, उसे दीवाली पर जगमगाना और होली पर रंगीन होना अच्छे से आता है।
 
एक मैं ही नहीं, सेंसेक्स के साथ होली कोई भी मना सकता है। सेंसेक्स के द्वार हमेशा सबके लिए खुले हैं। सेंसेक्स के दरबार में न कोई ऊंचा है न नीचा। सेंसेक्स सबको एक जैसा महत्त्व देता है।

फिलहाल, इस दफा होली मैं सेंसेक्स के साथ मना रहा हूं। अगर आपका भी मन है, तो बेखटक आ जाइए। आप आएंगे तो होली की मस्ती और रंगीन हो लेगी।

गुरुवार, 5 मार्च 2015

सेल्फी होली

तय हुआ है कि इस दफा मेरे मोहल्ले में 'सेल्फी होली' खेली जाएगी। यानी, रंग लगाने की छूट एक-दूसरे को रहेगी फिर भी जिन्हें दूसरों से रंग लगवाने में 'परहेज' है, वे अपने रंग खुद लगा सकते हैं। रंग में पुते चेहरों की 'सेल्फी' ली जाएगी। सेल्फी को तुरंत अपने फेसबुक या टि्वटर खाते पर टांगा जाएगा। जिसकी सेल्फी मस्त होगी, उसको ईमानस्वरूप 'सेल्फीयुक्त स्मार्टफोन' दिया जाएगा।

देख रहा हूं, सेल्फी होली खेलने की सूचना पाकर घरों से वो लोग भी बाहर निकलने लगे हैं, जिन्हें होली पर रंग खेलना तो बहुत दूर की बात रही, कभी मौजूद तक नहीं देखा था। होली पर न जाने कहां, किस गुफा में जाकर छिप जाते थे। खोजने पर अगर मिल भी जाते थे, तो रंग लगाने व लगवाने में इत्ता परहेज करते थे कि कहीं उनका 'किडनैप' ही न हो जाए।

एक वो ही नहीं, ऐसे न जाने कित्ते ही लोग होते हैं, जिनको रंग लगाओ तो 'भड़क' जाते हैं। मरने-मारने पर उतारू हो लेते हैं। अजीब होते हैं, वो लोग जो रंग की रूमानियत को नहीं समझते।

शायद इसी कारण लोगों में अब 'सेल्फी होली' खेलने का चलन बढ़ा है। अपने रंग खुद लगाओ और सेल्फी लेकर तुरंत फेसबुक या टि्वटर पर ठेल दो। ताकि देखने वालों को भी लगे कि बंदा मस्त होली खेलता है। सेल्फी पर मिले लाइक और कमेंट मूड के साथ-साथ दिन भी बना देते हैं। सेल्फी के क्रेज ने अब त्यौहारों को भी सेल्फी-त्यौहार बना डाला है।

मोहल्ले में सेल्फी होली खेलने के आइडिए को बुर्जुग लोग हजम नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें सेल्फी होली का कॉसेप्ट समझ नहीं आ रहा। पूछने पर कहते हैं- 'सेल्फी होली'...? ये कौन-सी होली होती है...? अपना रंग लेकर खुद ही लगाना यह कोई बात हुई भला? अरे, होली के रंगों का मजा ही दूसरे से लगवाने में है। होली में जब तलक मस्तियां न हों, भला कैसी होली? सेल्फी होली तो एक प्रकार से 'सेल्फिश होली' है।

मोहल्ले के बुर्जुग लोगों की 'भावनाओं' को मैं समझ सकता हूं लेकिन नए दौर के नए लोगों के लिए सेल्फी होली ही अब 'असली होली' है। बदलते दौर ने त्यौहारों के 'कॉनसेप्ट' को एकदम से बदलकर रख दिया है। सेल्फी का क्रेज इस कदर बढ़ा है कि लोग त्यौहार मनाने से ज्यादा सेल्फी लेना पसंद करते हैं। किस्म-किस्म के मूड की सेल्फियों से फेसबुक की दीवालें अटी रहती हैं।

सेल्फी होली के असर ने मस्तियों को भी बदल डाला है। सेल्फी होली खेलने वाले अपनी मस्तियां खुद करते हैं। और अपनी ही मस्तियों की सेल्फी लेकर आनंद से भर जाते हैं। आत्मकेंद्रित ही सही पर सेल्फी होली के बहाने वे लोग भी रंग से थोड़ा खेल लेते हैं, जिन्हें रंग से हमेशा एलर्जी-सी रही है। एक होली ही नहीं, अब लगभग हर त्यौहार सेल्फी है।

अब मोहल्ले के बुर्जुग चाहे जो समझें या कहें मगर मुझे मोहल्ले वालों को सेल्फी होली खेलते देखना अच्छा लग रहा है। सेल्फी होली में उन चेहर को भी देख पा रहा हूं, जो होली आते ही गायब हो जाया करते थे। मगर आज खुद से या दूसरे के साथ सेल्फी होली खेल रहे हैं।

देखो पियारे, अपना तो मानना है कि होली पर हर चेहरा रंग-पुता होना चाहिए। अब चाहे वो खुद ही अपने को पोते या दूसरे से पुतवाए। होली पर जिसने रंग न लगाया, वो भला रंगों की तासीर को क्या समझेगा? चाहे सेल्फी होली के बहाने ही सही पर रंग हमारे जीवन में अभी बने हुए हैं। यही बहुत है।

फिलहाल, मैं मेरे मोहल्ले में खेली जा रही 'सेल्फी होली' का 'फुलटू आनंद' ले रहा हूं। सेल्फी होली का कॉसेप्ट इत्ता भी बुरा नहीं।

पागलखाने में होली

इस दफा मैंने 'डिसाइड' किया है कि होली 'पागलों' संग खेलूंगा। 'पागलखाने' जाकर खेलूंगा। पागलों जैसे कपड़े पहनकर खेलूंगा। पागलों संग पूर्ण 'पागलपंती' में डूबकर खेलूंगा। मैंने लाइफ में लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों, सियानों, पूंजीपतियों, नेताओं, बिगडैलों, घर-परिवार वालों, नाते-रिश्तेदारों आदि के संग-साथ खूब होली खेली है किंतु पागलों संग होली खेलने का 'अनुभव' मेरा पहला होगा। यकीन कीजिए, पागलों संग होली खेलने के प्रति मैं उत्ता ही 'एक्साइटिड' हूं, जित्ता सनी लियोली पर्दे पर कपड़े उतारने के लिए रहती है।

सूखी-साखी होली खेलने में मुझे रत्तीभर मजा नहीं आता। होली पर जब तलक रंग-बिरंगी मस्तियां न हों, भला ऐसी होली का क्या मतलब? होते हैं कुछ ऐसे सियाने भी जो होली को कायदे से खेलने की सलाह देते हैं। शरीर पर रंग पड़ते ही 'हत्थे से उखड़' लेते हैं। रंगे-पूते चेहरे उन्हें 'खलनायक' जैसे नजर आते हैं। भांग की मस्ती उन्हें बिगडैल-प्रवृति का प्रतीक लगती है। होली (रंग) वाले दिन भी खुद को कमरे में यों बंद कर लेते हैं मानो घर में कोई शेर-चीता घुस आया हो।

लेकिन पागलों के साथ ऐसा कुछ नहीं है। पागल लोग बड़े ही 'मस्त' तरीके से होली खेलते हैं। न रंग लगवाने पर एतराज जताते हैं न लगाने पर। रंग-बिरंगे कलर उनके जीवन में सबसे खूबसूरत अर्थ रखते हैं। रंग उनके एकाकीपन को तोड़ते हैं। उन्हें फुल चांस देते हैं, होली के बहाने खुद को 'रिचार्ज' करने का। होली की मस्तियां पागलों संग बढ़कर दोगुनी हो जाती हैं पियारे।

चूंकि पागलखाना मेरे शहर में ही है। इस नाते पागलपंती टाइप कुछ गुण मेरे भीतर भी मौजूद रहते हैं हर वक्त। जिन्हें मैं गाहे-बगाहे भुनाता भी रहता हूं। यकीन कीजिए, पागलपंती की हरकतों में जो मजा है, वो नॉर्मल इंसान बने रहने में नहीं। पागलपंती आपको हर बंधन से पूर्णता स्वतंत्र रखती है, सबकुछ करने के लिए। पागलपंती के एहसास को पाने के लिए एकाध दफा मैंने खुद भी पागल बनकर इस अनुभव को महसूस किया है। पागलों के साथ या उन्हें होली खेलते देखने में जो सुख है, वो अन्यत्र नहीं।

नॉर्मल इंसान के साथ तो मैं हर बार होली खेलता ही हूं क्यों न इस बार पागलों के साथ 'पागलखाना' जाकर ही खेली जाए। ताकि पागलों को भी यह लगे कि उनके टाइप का एक बंदा उन जैसा ही बनकर उनके साथ रंग भरे त्यौहार को 'सेलिब्रेट' करने आया है। वैसे, मैं काफी-कुछ लगता-दिखता भी 'पागलों' जैसा ही हूं, ऐसा मेरी गर्लफ्रेंड ने कई दफा मुझको बोला है।

होली की मस्तियों का यही तो मजा है कि इस दिन अच्छा-खासा बंदा भी लगभग 'पगला' जाता है। कुछ अपनी पागलपंती पर कंट्रोल किए रहते हैं तो कुछ बिलकुल ही पागल हो जाते हैं। बिलकुल ही पागल हो जाने वालों से मैं उत्ती ही दूरी बनाकर रखता हूं, जित्ती बरेली दिल्ली से।

पागलों संग रंगों की फुहार के बीच उनके साथ डांस का भी 'आनंद' लेना चाहता हूं। सुना हैं, पागल लोग 'नाचते' बहुत 'मस्त' हैं। डांस चीज ही ऐसी है पियारे कि अच्छे-खासे बंदे को भी अपना 'दीवाना' बना लेती है। मगर होली पर डांस की बात ही कुछ और है। मेरे मोहल्ले में होली पर रंग कम खेला जाता है, डांस ज्यादा होता है। और ऐसे-ऐसे करतबपूर्ण डांस की प्रोफेशनल डांसर तलक पानी मांग जाएं। होली पर डांस की कोई 'कैटेगिरी' नहीं होती। हर डांस अपने आप में 'अनूठा' और 'अजूबा' होता है।

बस इसी प्रकार का अनूठा और अजूबा डांस मैं पागलखाने में पागलों संग करना चाहता हूं। ताकि मुझे भी पागलों के बीच अपनी 'डांसमय पागलपंती' को दिखाने का मौका मिल सके। यों भी, शादी के बाद बंदे को खुलकर डांस करने का मौका मिलता ही कहां है? क्योंकि हर दिन हर किस्म का डांस बीवी के आगे ही करना होता है न।

फिलहाल, पागलखाने से बुलावा आया लिया है। पागलों संग होली खेलने का। अगर पागल और पागलखाना जांच गया तो थोड़े दिन मैं वहीं रह लूंगा। नॉर्मल इंसानों के बीच रहते-रहते अब बोर-सा हो चला हूं। 'लाइफ' में 'हर रंग' का 'मजा' लेना चाहिए। क्यों पियारे, है कि नहीं...।

मंगलवार, 3 मार्च 2015

बजट, जूता और होली

वाह! क्या गजब 'कंबिनेशन' ढूंढा है वित्तमंत्री अरुण जेटली जी ने। बजट में उन्होंने आम आदमी के वास्ते 'जूता' 'सस्ता' कर दिया। जूता सस्ता करने के पीछे जरूर उनके ख्याल में 'होली का त्यौहार' रहा होगा। होली पर बंदा नए कपड़े खरीदने के साथ-साथ जूता भी अवश्य खरीदता है। लेकिन अक्सर उसे जूते की कीमत कपड़ों से कहीं ज्यादा चुकानी पड़ जाती है। मतलब, जित्ते में कपड़े आते हैं, उत्ते में वो दो जूते ही खरीद पाता है। मार्केट में आजकल पांच सौ से लेकर तीन हजार तक के जूते मौजूद हैं।

आम आदमी अगर तीन हजार के जूते पहनेगा तो दूसरी चीजों की खरीददारी क्या खाक कर पाएगा? इसीलिए वित्तमंत्री जी ने अन्य चीजों पर दाम बढ़ाके जूते सस्ते कर दिए। बढ़िया किया। बहुत ही बढ़िया किया।

यों तो जूता हर वर्ग की शान हैं लेकिन आम आदमी को जूतों से खास लगाव रहता है। सरकारी कामों में सबसे ज्यादा जूते आम आदमी के ही घिसते हैं। आम आदमी की असहमति का हथियार भी जूते ही हैं। आम आदमी अक्सर जूते को गाली में भी ढाल लेता है। मसलन- काम बिगाड़ा तो जूते पड़ेंगे। महंगाई या व्यक्तिविशेष का विरोध करने के लिए भी जूते की माला गधे या भैंस के गले में डाली जाती है। कभी-कभी लड़कियां भी मजनूंओं को सबके सिखाने के लिए जूते या चप्पल प्रयोग में लाती हैं।

बजट में जूते का सस्ता होना वित्तमंत्रीजी का 'क्रांतिकारी कदम' कहा-माना जाएगा। एक प्रकार से यह आम आदमी को वित्तमंत्रीजी द्वारा दिया गया- 'होली का उपहार' है। इस वास्ते आम आदमी को वित्तमंत्रीजी का 'शुक्रगुजार' होना चाहिए।

मैंने तो तय किया है कि इस दफा होली पर मैं कपड़े नहीं केवल जूते ही खरीदूंगा। ताकि सनद रहे। होली भी जूते पहनकर ही खेलूंगा। कम से कम पैर तो गंदे नहीं होंगे। मैं चेहरे से अधिक पैरों की सफाई का ध्यान रखता हूं। बल्कि मैंने तो अपने परिवार और मोहल्ले वालों को भी इस होली जूते पहनकर ही खेलने की सलाह दी है।

वित्तमंत्रीजी द्वारा सस्ती की गई चीज का 'अपमान' मैं नहीं कर सकता। आम आदमी हूं आम बजट में मिली सस्ती चीज मेरे तईं 'सौगात' की तरह है।
जिन्हें बजट या वित्तमंत्रीजी का विरोध करना है, करें। मैं उनके साथ कतई नहीं हूं। वे विरोध के अतिरिक्त कुछ और कर भी नहीं सकते। विरोधी लोग क्या जानें सस्ते जूते की महत्ता? जूते का सस्ता होना आम आदमी को एक नई पहचान देगा, जैसी आम आदमी पार्टी को टोपी ने दी है। ध्यान रखें, जूता कभी अपनी जमीन नहीं भूलता, हंसिया-हथौड़ा चाहे भूल जाए।

फिलहाल, हम विरोध को भूलाकर बजट में सस्ते हुए जूते का मजा होली के रंगों के साथ लें।

सोमवार, 2 मार्च 2015

खुद पर हंसता और व्यंग्य बनाता हूं

मुझे खुद पर 'हंसने' और 'व्यंग्य' करने में मजा आता है। दिन के 24 में से 23 घंटे मैं खुद पर हंसता हूं। और बाकी के बचे एक घंटे में खुद ही पर व्यंग्य खींचता हूं। इससे मुझे मानिसक और दिली सुकून मिलता है। लगता है, मेरा दिन सार्थक हुआ। खुद पर हंसना और व्यंग्य बनाना सचमूच दिलेरी का काम है।

मेरा दावा है, हंसी और व्यंग्य कभी 'बोरिंग' हो ही नहीं सकते। क्योंकि जिंदगी में यही दो महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं, जिनके साथ इंसान खुद को हल्का और तरोताजा बना पाता है। वरना सुबह से लेकर रात तलक दौड़-दौड़ और बस दौड़ ही है जिंदगी में।

दूसरों पर हंसने से कहीं ज्यादा कठिन है खुद पर हंसना। खुद की बेवकूफियों पर व्यंग्य तानकर पाठक के समक्ष रखना। लेखक की असली परीक्षा तो वही होती है कि वो खुद पर, खुद की आदतों, बेवकूफियों, सियानेपन पर कित्ता और कहां तलक लिख पाता है। मुझे परसाई और केपी सक्सेना के व्यंग्य इसलिए पसंद आते हैं क्योंकि उन्होंने देश, दुनिया, समाज, व्यवस्था, राजनीति आदि पर व्यंग्य खुद पर केंद्रित कर लिखे हैं। अंगरेजी में खुशवंत सिंह की खास पहचान खुद की आदतों पर केंद्रित लेखन रहा है। आरके लक्ष्मण के कार्टूनों में कॉमन मैन (आम आदमी) अंत तक कॉमन मैन ही बना रहा। और व्यवस्था-राजनीति को 'झकझोरता' रहा। इसी में तो आनंद है पियारे कि दूसरों पर सीधा तंज न कर खुद को उस तंज का हिस्सा बनाकर अपनी बात कह जाओ।

बड़े आत्मकेंद्रित से होते हैं वो लोग जो न अपनी हंसी हंसते हैं न दूसरे को हंसता देख पाते हैं। हर समय माथे पर बल डाले और मोहर्रमी सूरत बनाए न जाने किन अजीब से ख्यालों में खोए रहते हैं। इस किस्म के प्राणी ज्यादातर 'बुद्धिजीवि कुनवे' में ही मिला करते हैं। व्यंग्य उनकी निगाह में पल्लेदरजे का लेखन होता है। इसीलिए तो मैं आत्मकेंद्रित किस्म के बुद्धिजीवियों से गज भर की दूरी बनाकर रहता हूं। मैं अपनी हंसी और व्यंग्य पर किसी बुद्धिजीवि की 'भुनभुनी नजर' नहीं डलवाना चाहता।

यों भी, मुझे किसी की बुद्धिजीविता या बेवकूफियों से क्या मतलब, जब हजारों प्रकार की बेवकूफियां मेरे भीतर खुद ही मौजूद हैं। मुझे अपनी बुद्धि से कहीं ज्यादा अपनी बेवकूफियों पर 'नाज' है। ये मेरी बेवकूफियां ही तो हैं, जो आज मुझ से खुद पर व्यंग्य लिखवा रही हैं। बेवकूफियां हर बंदे के अंदर होती हैं, कुछ उन पर हंसकर दिल को बहला लेते हैं तो कुछ हर वक्त उन्हें 'नसीब' की माफिक कोसते रहते हैं।

मेरी तरफ से आपको भी 'खुल्ली छूट' है कि मेरी बेवकूफियों पर हंसे और व्यंग्य बनाएं। आपकी कसम, मुझे बहुत आनंद आएगा। व्यंग्य का असली मजा ही खुद पर कसे जाने में है। क्यों पियारे, है कि नहीं...।