सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

राजनीति में मांझी होना

जिनको रखनी हो वे रखें किंतु मुझे जीतन राम मांझी से रत्तीभर शिकायत नहीं हैं! शिकायत होगी भी क्यों? उन्होंने कुछ गलत थोड़े ही किया है। मौका देखकर चौका मारना राजनीति का बरसों पुराना नियम-कायदा रहा है। जिस नेता को अपनी कुर्सी बचाने के हित जहां नजर आते हैं, वो वहीं भागता है। राजनीति में सारी 'माया' और 'दुनियादारी' 'कुर्सी' पर ही टिकी है। कुर्सी पास है तो हर कहीं दबदबा है। कुर्सी नहीं तो कुछ भी नहीं। सत्ता, राजनीति और समाज में केवल कुर्सी का ही बोलबाला काम करता है, बाकी सब तो हवा-हवाई बातें हैं।

कहने वाले कह रहे हैं कि मांझी ने जदयू की नैया डुबो दी। विश्वासघात किया। जिसने सत्ता की चाबी सौंपी, उसे ही कमरे में बंद कर दिया। देखो पियारे, यह राजनीति है राजनीति। यहां नेता (अपवाद को त्याग दें) केवल एक ही ख्वाहिश लेकर आता है कि वो अपनी नाव को बचाते हुए, दूसरे की नाव किस तिकड़म से डुबो सकता है। इतिहास गवाह है कि निज-हित की राजनीति ने न जाने कित्ते ही नेताओं-मंत्रीयों को नाव में बैठे-बैठे ही डुबो दिया गया है। राजनीति में कोई किसी का 'सगा' नहीं होता। हां, 'प्रतिद्वंद्वी' हर कोई हर किसी का होता है। ऐसा केवल भारतीय राजनीति में ही नहीं, लगभग हर मुल्क की राजनीति में होता आया है। राजनीति के खेल से 'पार' पाना मुश्किल काम होता है।

मांझी के 'बगावती तेवर' देखते ही बनते हैं। अपनी बगावत के दम पर मांझी ने हर किसी को 'किनारे' कर दिया है। साथ ही, यह भी जतला दिया कि मांझी 'रबर-स्पेंट' नहीं हैं। असल मायने में 'कड़े तेवर' वाले नेता हैं। इसीलिए तो न इस्तीफा दिया न किसी तोप के आगे झुके। न जी न यह मांझी का 'राजनीतिक अवसरवाद' नहीं। बल्कि 'राजनीतिक निज-हितवाद' है। 21वीं सदी की राजनीति इसी पर टिकी है। देखिए न, बीजेपी में एक-एक कर सारे 'वरिष्ठ' किनारे हो लिए, अब सत्ता की चाबी नए लोगों के पास है। नए लोग ही अब देश के साथ-साथ पार्टी को भी चला रहे हैं।

राजनीति में बगावतें यों ही नहीं होती रहतीं। हमारे देश की राजनीति में आग्रह-पूर्वाग्रह बहुत हैं। कोई किसी को आगे बढ़ने नहीं देना चाहता। जोर लगाकर अगर कोई आगे बढ़ता भी है, तो उसकी टांग विरोधियों द्वारा कम अपनों द्वारा ही अधिक खींची जाती है। जनता के बीच काम करने का समय ही नहीं देते, फिर कहते हैं, इत्ते साल सत्ता में रहे और जनता के लिए कुछ न किया। अमां, करते तो तब जब कोई करने देता। हर बात में तो 'कंडिशन एप्लाइ' का 'डंडा' चिपका रहता है।

अमां, जब मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, तो उन्हें कुछ काम भी करने देते। काम करने से पहले ही उनकी 'छिछालेदर' और 'टांग' खींचना शुरू हो गई। अब ऐसे में बंदा बगावत न करेगा तो और क्या करेगा? फिर कहते हैं कि मांझी ने नाव डुबो डाली! जब नाव ने खुद ही तय कर लिया कि उसे डुबना ही डुबना है, फिर मांझी भी भला क्या कर लेते?

सच तो यह है कि मांझी पर खेला गया 'राजनीतिक कार्ड' पार्टी के नेताओं को ही उल्टा पड़ गया। राजनीति-सत्ता के मैदान में कब, कौन-सा 'ऊंट' किस करवट बैठ ले, कोई नहीं जानता। यही तो असली मजा है, हमारे देश की राजनीति का। मनोरंजन का मनोरंजन। रायते का रायते।

इन दिनों हर किसी की निगाहें, बिहार और दिल्ली पर ही टिकी हुई हैं। दोनों ही जगह 'राजनीतिक नौटंकियों' का बाजार खासा गर्म है। कौन किसको कित्ती और कहां तलक 'मात' दे पाता है, सारा जोर और विरोध इसी पर आनकर टिक लिया है। कमाल यह है कि जनता के मुद्दों से मतलब न उन्हें है न इन्हें। सब मशगूल हैं, अपनी-अपनी राजनीति की गोटियां फिट करने में। जिसकी गोटी अच्छे से फिट हो ली, उसके मजे हैं; बाकी जनता नौटंकी का लुत्फ ले रही है।

फिलहाल, मांझीजी अपनी बगावत के दम पर यों ही लगे रहें। अपनी हनक बरकरार रखें। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

1 टिप्पणी:

Namrata Kumari ने कहा…

बहुत खूब कही। मांझी का कहना है कि, "मांझी की नाव कभी नहीं डूबती।" :D उनको मेरी शुभकामना। अब दिल्ली का तो फैसला हो गया, देखते है बिहार की किस्मत में क्या है...