शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

नसीब अपना-अपना

लो पियारे, दिल्ली के 'चुनावी दंगल' का सारा मामला अब 'नसीब-बदनसीब' पर आनकर टिक लिया है। यानी, जिनका नसीब तेज है वे सरकार बना ले जाएंगे। और जिनके नसीब से बदनसीबी जुड़ी है, वे मफलर बांधकर टापते रहेंगे। तो क्या मान लें कि चुनाव जनता के वोटों के दम पर नहीं नसीब-बदनसीब के दम पर लड़े व जीते जाते हैं!

साहेब ने भी नसीब को टारगेट करते हुए क्या खूब छोड़ी है, सत्ता की बागडोर नसीबवालों के हाथों में दीजिए, बदनसीबों के नहीं। बात सही भी है। जो काम नसीब वाले केवल नसीब के दम पर कर लेते हैं, बदनसीब कहां कर पाते हैं? शायद यह नसीब का ही कमाल रहा कि साहेब का चाय की दुकान से शुरु हुआ सफर, प्रधानमंत्री की कुर्सी तलक जारी है। नसीब-नसीब के खेल में साहेब की पार्टी देश में बड़ा बहुमत पा गई और केंद्र में सरकार बना ले गई। बिचारे बदनसीब लोग दिल्ली में बैठे 'तमाशा' देखते रहे। और रह-रहकर अपनी किस्मत ('नसीब') को कोसते रहे।

दिल्ली के चुनावी दंगल में जो हालात हैं, उसे देखकर साफ लग रहा है कि यहां असली लड़ाई नसीब-बदनसीब के बीच ही है। जनता और उससे जुड़े मुद्दों से किसी को कुछ लेना-देना नहीं। बहुत हुआ तो बिजली-पानी सस्ता करवा देंगे बस। बाकी का दंगल कभी 'विज्ञापनबाजी' पर आनकर टिक लेता है तो कभी 'व्यक्तिगत छिछालेदर' पर। दोनों दल मजे से चुनाव को 'इंटरटेन' कर-करवा रहे हैं।

रही बात जनता के नसीब की। तो पियारे उसमें कुछ नहीं बदलेगा। जनता का नसीब जैसा कल था, आज भी वैसा ही रहेगा। नेता हाथ-पैर जोड़कर वोट मांगेगा। वायदा करेगा। जनता वोट देगी। नतीजे आ जाने के बाद तुम इस रास्ते, हम उस रास्ते। हम जीते हमारा नसीब तेज था, तुम हारे तुम बदनसीब थे। नसीब-बदनसीब के बीच जनता खुद से किए वायदों को 'तलाशती' रहेगी मगर हाथ कुछ न आएगा। इसे ही तो कहते हैं, 'डर्टी पॉलिटिक्स'। ('डर्टी पॉलिटिक्स' को अब 'इज्जत' की निगाह से देखा जाने लगा है।)

सोच रहा हूं, मैं भी 'नसीब' पर यकीन करना शुरु कर ही दूं। क्या पता, साहेब की तरह मेरी किस्मत भी चमक जाए। लेखक से नेता बन जाऊं। जैसा नसीब साहेब का रहा 'दस लाख' का सूट (नाम जड़ित) पहनने का वैसा शायद मैं भी पहन पाऊं। मफलर या टोपी पहनने में वो गेटअप नहीं आ पाता। इसमें आम आदमी जैसा फील होता है। क्या कीजिएगा, सबका अपना-अपना नसीब है पियारे। कुछ अपने नसीब की खाते है, तो कुछ बदनसीब एक वक्त का खाना भी नहीं खा पाते।

नसीब-बदनसीब की इस जंग में दिल्ली की जनता का नसीब कित्ता जागेगा, बस कुछ दिनों बाद पता चल जाएगा। तब तलक अपने-अपने नसीब को यों ही टटोलते रहें।