शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

प्रभु का रेल बजट

वो कहते हैं न कि प्रभु से सवाल-जवाब नहीं करा करते। जो वे कह देते हैं, चुपचुप मान लेते हैं। कहीं प्रभु 'नाराज' हो गए तो...।

इसीलिए कह रहा हूं, इस केस (रेल बजट) में भी यह ध्यान रखें कि जो या जैसा रेल बजट प्रभु ने प्रस्तुत कर दिया, बिना अधिक चू-चपड़ किए मान लें। अरे, हमको तो रेल बजट पर 'गर्व' होना चाहिए कि इसे साक्षात प्रभु ने बनाया था! रेल बजट में जित्ते भी प्रावधान या जोड़-घटाने किए गए सब 'प्रभु की मर्जी' थी। अब 'प्रभु की मर्जी' तो प्रभु की मर्जी होती है पियारे, उसमें न 'शक' होता है न 'शुबहा'। यों भी, प्रभु की मर्जी पर आज तलक किसका बस चला है, जो अब चलेगा!

रेल बजट की गूढ़-गंभीर बातों को जाने दीजिए। वो आम आदमी को न समझ आईं हैं न आएंगी। उनको समझने के लिए बड़े-बड़े विश्लेषक ही काफी हैं। परंतु प्रभु का 'मुकाबला' वो भी नहीं कर सकते। हमको को बस इत्ता पता होना चाहिए कि प्रभु ने यह रेल बजट अपने भक्तों (यानी आम आदमी) को ध्यान में रखकर बनाया था। केवल आम आदमी की सुख-सुविधा की खातिर न उन्होंने रेल किराया बढ़ाया न किसी किस्म का अतिरिक्त बोझ ही डाला। हां, रिर्जवेशन की प्रक्रिया को चार माह पहले खिसका दिया। ताकि दूर-दराज घुमने जाने वाले चार महीने पहले ही अपना रिर्जवेशन करवा कर रेल सफर के अच्छे दिनों का आनंद ले सकें।

वरिष्ठ नागरिकों के तईं लोअर बर्थ के प्रस्ताव के साथ-साथ ऊपर जाने (आई मीन) ऊपरी बर्थ पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की व्यवस्था होगी। ताकि वरिष्ठ नागरिकों को किसी किस्म का 'कष्ट' सफर के दौरान न उठाना पड़े।

महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता में रखते हुए प्रभु ने महिला कोच में 'सीसीटीवी कैमरे' लगाने का आश्वासन दिया है। एक चैनल पर देख-सुन रहा था कि इस प्रस्ताव पर महिलाएं बहुत खुश हैं। उन्होंने इस वास्ते प्रभु को 'धन्यवाद' भी प्रेषित किया।

मुंबई-अहमदाबाद के बीच 'बुलेट ट्रेन' चलाने के साथ-साथ मुंबई की लोकल ट्रेनों को 'एसी' करने की बात भी कही। न न अब विपक्ष की तरह यह मत बोलिएगा कि हम दिल्ली, बरेली या इंदौर में रहते हैं, बुलेट या एसी ट्रेन का हमसे क्या मतलब? अजी मतलब क्यों नहीं है? मुंबई-अहमदाबाद भी तो हमारे देश का हिस्सा ही हैं। वहां का विकास मतलब देश का विकास। मोदीजी की बात को जहन में रखिए कि 'सबका साथ, सबका विकास।'

मुझे ही देखिए न, मैं तो (रुहेलखंड) बरेली से हूं। मेरे शहर से तो एक भी ट्रेन के गुजरने या ठहरने की बात रेलमंत्रीजी ने नहीं की। तो क्या इत्ती सी बात के लिए मैं प्रभु से नाराज हो लूंगा। नहीं जी कतई नहीं। अबकी बार न चली तो अगली दफा चलेगी। वैसे भी सीधी एक ट्रेन तो बरेली से मुंबई के बीच चलती ही है। जिन्हें ज्यादा जल्दी है वे हवाई जहाज से जाएं।

इंसान को कभी जो नहीं है, उसके लिए नहीं रोना चाहिए। जो है उसे सिर आंखों पे बैठाना चाहिए। है कि नहीं।

प्रभु ने इत्ता कुछ दे दिया रेल बजट में कि ज्यादा की दरकार लगती ही नहीं! रेलवे की साइट पर जाकर मन-पसंद खाना मंगवाइए। ट्रेनों की स्पीड बढ़ाई जाएगी। पुराने-जर्जर ट्रैकों को जल्द सुधारा जाएगा। आदि-आदि।

सौ बातों की एक बात- रेल किराया नहीं बढ़ाया। यह प्रभु का हम जनता पर सबसे बड़ा अहसान है। और क्या चाहिए हमें। जनता के वोट का कुछ हक तो सरकार अदा करेगी कि नहीं?

यह 'प्रभु की मर्जी' का बजट था। इसे 'दिल से' स्वीकारें और प्रभु के प्रति 'निष्ठा' बनाएं रखें।

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