गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

खामोश! खोज चालू आहे

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी की खोज दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक ही जारी है, उन्हें मेरे शहर के मोहल्ले में भी खोजा जा रहा है। मेरे मोहल्ले के लोग तन-मन से लगे हुए हैं, राहुल गांधी की खोजा-खाजी में। फिलहाल, अभी तक जो सूचना मेरे कने है, उसमें राहुल गांधी को बिहारीपुर से लेकर कुत्तुबखाना और बड़ा बाजार से लेकर किला तक खोजा जा चुका है लेकिन कहीं कोई सूत्र हाथ नहीं आया है। साथ-साथ, मोहल्ले के उन घरों-हिस्सों में भी राहुल गांधी की खोज जारी है, जहां अक्सर उन पर बातें सुनने को मिल जाया करती थीं। हो सकता है, अपने किसी समर्थक या प्रशंसक के यहां 'आराम' फरमा रहे हों। बाहर न आना चाह रहे हों। तरह-तरह के प्रश्नों से बचना चाह रहे हों। वैसे भी दिल्ली में रहकर भला कौन एकाग्रचित्त होकर 'शांति' से रह सकता है।

कहने वाले कह रहे हैं कि राहुल गांधी को 'नाराज' होकर 'बजट सत्र' छोड़कर इस तरह से नहीं जाना चाहिए था। भला क्यों नहीं जाना चाहिए था? क्या राहुल गांधी को नाराज होने का हक नहीं? क्या उनका दिल नहीं करता कहीं आने-जाने का? अरे बजट सत्र का क्या है, इसे तो हर साल ही होना है। इस बजट सत्र नहीं अगले बजट सत्र में मौजूद हो लेंगे। बजट सत्र के लिए पार्टी और उसके नेता किस काम आएंगे? यों भी, पार्टी नेता सालभर कौन-सा 'खास काम' करते हैं! खास काम कर रहे होते तो दिल्ली चुनाव में पार्टी 'जीरो' थोड़े हो जाती। वहां तो सभी अपनी ढपली, अपना राग बजाते-गाते रहते हैं।

हो सकता है, राहुल बाबा की 'नाराजगी' का कारण यही सब रहा हो। लेकिन हम बिन उनसे पूछे सिर्फ 'कयास' ही लगा सकते हैं। अपना सच तो वे ही जानते-समझते होंगे।

और अगर छुट्टी पर या घुमने चले भी गए तो ऐसा कौन सा दुनिया का सातवां अजूबा घट गया। सब जाते हैं छुट्टी पर। साल के 365 दिनों में से 150 दिन तो मैं ही दफ्तर से छुट्टी पर रहता हूं। मन नहीं है दफ्तर जाने का, नहीं जाता। बंदा काम करते-करते 'उक्ताएगा' नहीं क्या? सो ऐसा ही कुछ मन राहुल गांधी का भी किया होगा सो वे छुट्टी चले गए। छुट्टी पर जाना कोई 'गुनाह' थोड़े न है पियारे। छुट्टी पर जाने से सेहत मस्त और दिमाग दुरुस्त रहता है। लेकिन छुट्टी पर जाने के 'फायदे' को वो क्या खाक समझेंगे जो खुद कभी छुट्टी पर नहीं जाते।

स्पष्ट नहीं पर राहुल गांधी के 'पहाड़' पर कहीं होने की कुछ तस्वीरें 'टि्वटर' पर वायरल हुई हैं फिर भी लोग तरह-तरह के सवाल कर रहे हैं। कह रहे हैं कि बतलाकर नहीं जा सकते थे? क्यों बतलाकर जाते? क्या आप उनके फूफा या मामा लगते हो? लाइफ में हर किसी को 'प्राइवेट स्पेस' की 'दरकरार' होती है। फिर चाहे वो राहुल गांधी हों या सलमान खान।

लेकिन कहने वालों का क्या कीजिएगा उन्हें तो मुंह का ढक्कन खोलने से मतलब।

फिर भी जो खोज रहे हैं (चाहे दिल्ली या बरेली में) उनको खोज लेने दीजिए। हो सकता है, खोजना उनका 'शौक' हो। अगर वाकई 'शौक' है तो 'खामोशी' से खोजें ताकि मीडिया या विपक्ष को खबर न हो। यहां तिल का ताड़ बनते वक्त ही कित्ता लगता है।

राहुल गांधी को खोजने वालों को 'शायद' न पता हो कि इससे भी कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा इन दिनों दिल्ली में चल रहा है, भूमि अधिग्रहण को लेकर। किसान और सरकार के बीच रस्साकशी जारी है। कौन कित्ता और कहां तलक झुकता है, यह समय बतलाएगा लेकिन धरना प्रदर्शन चल रहे हैं।

राहुल गांधी को खोजने से जब 'फुर्सत' मिल जाए तो एक दफा किसानों का मन भी टटोल लीजिएगा कि वो क्या चाहते हैं?

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