बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

अगले जन्म मोहे युवराज जैसा क्रिकेटर ही कीजियो

देखा पियारे, इसे कहते हैं 'नसीब'। कोई छोटा-मोटा नसीब नहीं, पूरे 16 करोड़ का नसीब। युवराज ने 16 करोड़ में बिक कर साबित कर दिया कि बंदे की मार्केट में आज भी अच्छी-खासी वेल्यू है। बीसीसीआइ ने युवराज को वर्ल्ड कप के लायक न समझा तो क्या, आइपीएल में तो बंदे का 'जलवा' बरकरार है। क्रिकेट का पूरा रोमांच ही जलवे पर टिका हुआ है। जिसके बल्ले में जलवा दिखाने की ताकत होगी वो चलेगा, जिसमें नहीं होगी हमेशा के लिए बैठ जाएगा।

यह बदलते जमाने का क्रिकेट है, यहां खेल के साथ 'पैसा' और 'ग्लैमर' दोनों चलते हैं। खिलाड़ी की पहचान 'विज्ञापन' से बनती है। इसीलिए तो विज्ञापन जगत में क्रिकेट के खिलाड़ियों की जबरदस्त धूम रहती है। कभी बल्ला न भी चले, विज्ञापन तो चल ही रहे हैं न। 'कमाई' होनी चाहिए, चाहे बल्ले से हो या विज्ञापन से। कोई खास फरक नहीं पड़ता।

जो भी हो युवराज ने 16 करोड़ में बिक कर अपने आलोचकों को करारा जवाब तो दे ही दिया कि मेरे दिन अभी फिरे नहीं हैं। तुमने सलेक्ट न किया तो क्या, आइपीएल है न। यों भी, आइपीएल खिलाड़ियों के लिए 'नोट' पैदा करने की वो मशीन है, जिसमें सिर के बाल से लेकर पैर के अंगूठे तक सबकुछ नोट ही नोट में भीगा रहता है। मैदान पर चौके-छक्के जमाते रहिए, दर्शकों की तारीफ और नोट कमाते रहिए।

कई दफा देखा है, जो खिलाड़ी साधारण क्रिकेट में नहीं चल पाते, आइपीएल में मस्त चलते हैं। मात्र 20 ओवरों में वो कमाल कर दिखाते हैं, जो 50 ओवरों में नहीं दिखला पाते। क्रीस गेल इसका सबसे 'हॉट एग्जाम्पल' है। क्रीस गेल का बल्ला आइपीएल में ऐसी आग उगलता है कि सामने वाला चारों खाने चित्त। इसे ही आइपीएल की 'ब्यूटी' कहते हैं पियारे।

भीड़ में कुछ ऐसे सियाने भी हैं, जिन्हें आइपीएल के फॉरमेट और खिलाड़ियों के बिकने पर हमेशा 'आपत्ति' रहती है। कहते हैं, आइपीएल न केवल क्रिकेट बल्कि खिलाड़ियों का भी भारी 'नुकसान' कर रहा है। क्रिकेट में से खेल टाइप भावना को विलुप्त कर रहा है। किंतु देखकर ऐसा लगता तो नहीं। आइपीएल ने तो 'पारंपरिक क्रिकेट' के फॉरमेट को और अधिक रोमांचक, रोचक, हॉट और ग्लैमरस बनाया है। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा हर कोई क्रिकेट के प्रति यों दीवाना रहता है, जैसे भक्त लोग भगवान के प्रति।

अब 2015 के युग में अगर 70-80 के दशक का क्रिकेट खेलने या देखने को कहोगे तो भला कौन खेलेगा, कौन देखेगे और कौन पसंद करेगा! आजकल हर किसी को सबकुछ 'इंस्टंट' चाहिए। इधर बॉल बल्ले पर आई, उधर छक्का पड़ा। चूक गए तो गिल्लियां गायब। 20 ओवरों के बाद खेल खत्म, पैसा हजम। घर जाकर आराम करें।

युवराज को 16 करोड़ में बिका देख, मुझे अंदर से कित्ता 'प्राउड' टाइप फिल हो रहा है, बतला नहीं सकता। दिल कर रहा है, 16 करोड़ में न सही मैं 16 हजार में ही बिक जाऊं! लेखक हूं तो क्या, बिक तो सकता ही हूं। बिकना न बिकना मेरी चॉइस पर डिपेंड करता है। मैं आजू-बाजू के 'कहे' पर क्यों ध्यान दूं। वो किसी शायर ने क्या 'खूब' कहा है न- कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...।

लेकिन कभी-कभी मुझको खुद पर अफसोस भी होता है कि हाय! मैं लेखक ही क्यों हुआ? क्यों खिलाड़ी या नेता नहीं हुआ? खिलाड़ी या नेता बनकर मन-मर्जी बिकने-बिकाने का 'लुत्फ' तो ले लेता। इस लेखन में क्या धरा है! यहां-वहां छप लो। और देख-देखकर मन ही मन खुश होते रहो। पारिश्रमिक इत्ता कि पत्नी के कुंडल की डंडी भी न आ पाती है। रात-दिन पत्नी के 'ताने' सुनने को मिलते हैं सो अलग। कि, 'दिनभर घर में पड़े-पड़े बस पन्ने ही काले-नीले करते रहना। कोई 'कमाऊ टाइप' का काम क्यों नहीं पकड़ लेते। एक युवराज है और एक तुम हो।'

पत्नी को तो खैर नहीं समझा सकता हां अपने दिल को जरूर 'बहला' लेता हूं कि इस दफा न सही पर अगले जन्म मुझे युवराज जैसा क्रिकेटर ही कीजियो।

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