गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

फ्री से लेकर फ्री तक

यह एक मेरी ही नहीं बल्कि प्रत्येक हिंदुस्तानी की 'मनोग्रंथी' है कि उसका दिल 'फ्री' की चीजों-बातों में अधिक रमता है। फर्क इससे नहीं पड़ता कि फ्री में क्या मिल रहा है, बस होना 'फ्री' चाहिए। फ्री लेने के मामले में हम सुई से लेकर जहाज तक नहीं चुकने वाले हैं। मैंने तो ऐसे कई फ्री-प्रेमी देखे हैं, जो दुकानदार से फ्री में भी फ्री की उम्मीद रखते हैं। उनका पेट 'बाय वन गेट वन' (फ्री) से नहीं, 'बाय फ्री गेट फ्री' से ही भरता है। लगभग ऐसा ही सीन कई बार 'डिस्काउंट' के मामले में भी देखने को मिल जाता है। ग्राहक की डिमांड डिस्काउंट में भी और डिस्काउंट की रहती है।

फ्री के प्रति मोह हमारे 'डीएनए' में है। ऐसा नहीं है कि फ्री लोअर या मीडिल क्लास की ही पसंद है, अपर क्लास भी अक्सर फ्री के मोहपाश में रंगे-हाथों पकड़े जा चुके हैं। बल्कि सच बोलूं तो, फ्री का टेस्ट चखने को बेताब अपर क्लास वाले ज्यादा रहते हैं। बेशक खरीददारी वे मॉल से करते हों परंतु जाते उसी दुकान पर हैं, जहां बाय वन गेट टू या थ्री का टैग लगा होता है। फुटपाथ से खरीदे आइटम को भी मॉल से खरीदा हुआ ही बतालाते हैं। और दाम ऐसे, कि बंदा खड़े-खड़े ही लुढ़क ले।

इधर जब से ऑन-लाइन स्टोर्स पर फ्री या डिस्काउंट की मांग बढ़ी है, लोगों की निगाह हर वक्त किस्म-किस्म के ऑफरों पर ही टिकी रहती है। त्योहारी सीजन में ऑन-लाइन स्टोर्स अच्छे से जानते हैं अपने माल को कम से कम कीमत में ग्राहकों के बीच खपाना। मार्केट की यही तो होशियारी है कि वो अपने माल को किस एंगल से ग्राहक के बीच बेचता है।

लेकिन ग्राहक और जनता के बीच थोड़ा फर्क होता है पियारे। हां, यह बात सही है कि फ्री का माल ग्राहक को भी चाहिए और जनता को भी। इसीलिए दोनों टाइप के लोग बेकरार रहते हैं फ्री के तईं। शायद इसी उम्मीद के तहत केजरीवालजी ने दिल्ली की जनता से काफी कुछ फ्री-नुमा वायदे कर डाले थे। अभी उन्होंने सीएम पद की शपथ ली ही है कि आवाजें फ्री वाई-फाई और बिजली-पानी की उठने लगी हैं। फ्री लॉलीपॉप के तईं जनता ने सोशल नेटवर्किंग पर उनकी खींचाई भी शुरू कर दी है। क्या करें... यह जनता है। जनता कुछ भी कहने का हक रखती है। आखिर उसने वोट दिया है। क्या वोट की कीमत नेता या सरकार से वसूलेगी नहीं? जनता से 'सब्र' कहां होता है। भले ही नेता चाहे कुछ भी कहते-बोलते रहें।

वही तो पियारे, फ्री का पेच जनता के बीच अक्सर 'कर्रा' पड़ जाता है। नेता लोग चुनावी वायदे तो कर लेते हैं मगर जब निभाने की बारी आती है तो कहते हैं, अरे वो तो 'चुनावी जुमला' था। लेकिन नेताजी, देश या समाज जुमलों से नहीं इरादों से चलता है। अगर इरादों में 'दम' है तो सरकार चलेगी नहीं तो 'जीरो' या 'तीन' पर आकर टिकने में जरा देरी नहीं लगती।

महसूस-सा तो ऐसा ही होता है कि 'आप' का फ्री वाई-फाई का वायदा महज 'चुनावी जुमला' भर था। क्योंकि फ्री कहना जित्ता आसान है, उससे कहीं ज्यादा कठिन है उसे निभा पाना। बाकी 'आप' जाने और जाने 'जनता'!

1 टिप्पणी:

Yogi Saraswat ने कहा…

badhiya likha hai aapne