बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

पुस्तक मेला और सेल्फी

पियारे, दिल्ली में किताबों का मेला सज लिया है। किस्म-किस्म की किताबें। किस्म-किस्म के ऑफर। किस्म-किस्म के लेखक। सब वहां मौजूद रहेंगे। किताबों के विमोचन। किताबों पर बातें। किताबों पर खुशनुमा व आलोचनात्मक टिप्पणियां भी होंगी। हर कोई अपनी-अपनी किताबों को संभाले स्टॉलों पर खड़ा होगा- जी मेरी किताब खरीदिए, मेरी किताब खरीदिए। मेरी किताब पर इत्ता और मेरी किताब उत्ता 'डिस्काउंट' मिल रहा है। लोगों का आकर्षण किताब से कहीं ज्यादा उस पर मिलने वाले डिस्काउंट पर केंद्रित रहेगा।

कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जिनका किताब-लेखक-डिस्काउंट से कहीं ज्यादा 'क्रेज' वरिष्ठ लेखकों संग 'सेल्फियां' लेने-देने में रहेगा। वरिष्ठों संग ली गईं सेल्फियां फेसबुक-टि्वटर पर चिपकाई जाएंगी। और बड़े ही 'ठसक' के साथ स्टेटस लिखा जाएगा- फलां वरिष्ठ लेखक के साथ सेल्फी लेते हुए। या सेल्फी की मुद्रा में गंभीर विचार-विमर्श करते हुए।

देखते-देखते सेल्फी अब 'क्रेज' से ज्यादा 'स्टेटस-सिंबल' बन गई है। यह तो पुस्तक मेला की बात रही, लोग तो किताब लिखते-पढ़ते हुए भी सेल्फी लेकर फेसबुक पर चढ़ा देते हैं। जिंदगी में अब कुछ भी 'पर्सनल' न रहा पियारे, सब 'सेल्फियाना' लो लिया है। इसीलिए तो पुस्तक मेला में लेखकों-किताबों से कहीं ज्यादा सेल्फियों के आदान-प्रदान की 'धूम' रहेगी।

सेल्फी के बहाने वरिष्ठों को भी यह कहने का मौका मिल जाएगा कि देखो, अभी दुनिया में हम मौजूद हैं। इत्ते नए लेखकों के बीच 'हाशिए' पर जरूर चले गए हैं पर 'रूतबा' अभी बरकरार है। वैसे सेल्फी ने क्या वरिष्ठ, क्या नए सबको 'सियाना' कर दिया है, अपनी-अपनी सेल्फियों के प्रति।

पुस्तक मेला में सेल्फियां तो ठीक हैं पर 'खीझ' सबसे ज्यादा तक पैदा होती है जब बंदा अपनी ली सेल्फियों को अलां-फलां के साथ 'टैग' करता है। जित्ता दुख सेल्फी नहीं देती, उत्ता टैगिंग देती है। अमां, हमें मालूम है कि आप फलां-फलां वरिष्ठ के साथ हैं, उनके करीबी हैं, उन्हें जानते-पहचानते हैं, उनके साथ सेल्फी भी लिए हैं पर उसे हमारे साथ तो टैग न कीजिए। टैगिंग खामखां का रायता फैलाती है।

प्रयास तो यही है कि इस दफा खुद भी पुस्तक मेला घुम आया जाए। कुछ नए, कुछ वरिष्ठ लेखकों से मिलकर हम भी 'सेल्फियाने' का 'लुत्फ' उठा सकें। ली सेल्फियां अपनी फेसबुक दीवाल पर टांग सकें। ताकि इधर-उधर हमारा रूतबा भी बढ़े। साथ-साथ, दूसरों को पुस्तक मेला में सेल्फियां लेते करीब से देख भी सकें। बताते हैं, जित्ता आनंद सेल्फी लेने में आता है, उससे कहीं ज्यादा आनंद देखने में आता है।

वो समय दूर नहीं, जब पुस्तक मेला की पहचान 'किताबों' से कम, 'सेल्फियों' से अधिक होने लगेगी। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

कोई टिप्पणी नहीं: