मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

जुमले की गोली

पियारे बताओ, हम भी कित्ता 'नादान' थे, लगभग यकीन ही करे बैठे थे। यकीन के चक्कर में हर रोज न जाने कित्ती दफा मोबाइल का 'मैसेज-बॉक्स' खोलकर और एटीएम से 'मिनी-स्टेटमेंट' निकाल के चेक कर लिया करते थे कि कहीं काला धन के बदले आने वाले 15 लाख खाते में आ तो नहीं गए! परंतु उस वक्त काटो तो खून नहीं वाली स्थिति हो जाया करती थी, जब खाते में इस तरह का इत्ता 'हैवी एमाउंट' न होता था। पापा कसम खुद के नसीब पर इत्ता गुस्सा न आता था, जित्ती कि साहेब के किए वायदे पर। लेकिन हम कर भी क्या सकते थे, आखिर जनता हैं, जनता का काम ही नेताजी के वायदों पर उम्मीद का पानी चढ़ाए रहना है।

इत्ता ही नहीं, एक और 'तगड़ा' वाला झटका तब लगा जब अमित शाहजी को यह कहते सुना कि काले धन के बदले 15 लाख खाते में आने वाली बात तो साहेब का 'चुनावी जुमला' था। चुनावी जुमला...। उफ्फ...। यह क्या कह रहे हैं मान्यवर। इत्ता तगड़ा झटका देने से पहले यह भी न सोचा कि हम जैसे लाखों मतदाताओं के दिलों पर क्या गुजरेगी? कैसे-कैसे और कित्ते-कित्ते टाइप के 'हैवी-हैवी सपने' संजोए हुए थे उन्होंने उस कथित धन को लेकर, मतलब सब के सब 'स्वाह' हुए। मान्यवर, आप नहीं जानते आपके जुमले ने हमें कित्ती 'मोटी गोली' दी है। यह गोली न निगलते बन रही है, न उगलते। आपने तो हमें बीच मझदार में खड़ा कर अकेला व असहाय छोड़ दिया।

मान्यवर, क्या आपको मालूम नहीं कि हम 'मुफत के धन' के प्रति (चाहे काला हो या हरा) कित्ते 'बेचैन' रहते हैं। सरकार का तो छोड़िए अपने मां-पापा तक से पैसा लिए बिना नहीं छोड़ते। मेरे एक बेहद करीबी रिश्तेदार हैं, उनकी निगाह तो हर वक्त अपनी माताजी के बचे-खुचे धन को खा-चबा लेने में ही लगी रहती है। देखिए न, इस वक्त हर किसी की जुबान पर सिलेंडर की सब्सिडी के ही चर्चे हैं। चाहे कोई कित्ता अमीर या कित्ता गरीब क्यों न हो पर सब्सिडी की रकम छोड़ना नहीं चाहता। और एक आप हैं, जिन्होंने इत्ता आसानी से मिलने वाले कथित धन को 'राजनीतिक जुमला' करार दे दिया। आश्चर्य। घोर आश्चर्य।

इसका मतलब अब काला धन भी वापस न आएगा! उसको वापस लाने का वायदा भी कहीं राजनीति जुमला तो नहीं था, मान्यवर। स्थिति स्पष्ट करें।
अब हमें धीरे-धीरे यकीन हो चला है कि साहेब का 'अच्छे दिन' का वायदा भी 'चुनावी जुमला' ही था। इसी जुमले की गोली पीकर जनता बहक गई और कमल का फूल खिला बैठी। सरकार के नौ महीने भी पूरे हो लिए मगर 'विकास' है कि होने में ही नहीं आ पा रहा। कुछ तो 'लोचा' है पियारे।

सभी पार्टियां अपने-अपने तरीके से जनता को 'जुमले की गोलियां' पिला रही हैं। वोट डलने और सरकार बन जाने के बाद वायदे जुमले में और जुमले गोली में 'तब्दील' हो जाते हैं। मन करे तो सटक लो, नहीं तो जीभ पर धरे-धरे चूसते रहो। शायद इसी को 'चुनावी जुमलों' की राजनीति कहा जाता है पियारे।

पापा कसम आपके जुमले को सुनकर हमें धक्का तो तगड़ा वाला लगा है। पर क्या करें, इसे भी सहेंगे क्योंकि हम जनता हैं। हमारा दिल बहुत 'मजबूत' है। इत्ती आसानी से बैठता नहीं। सुन रहे हैं न, मान्यवर। हम्म, 'जुमला' था...!

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