सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

इस जीत का यारों क्या कहना

एक बार को लगा था कि मैच हमारे हाथों से 'फिसल' लिया है। लेकिन फिसलते मैच को दाएं-बाएं से 'फांसते' हुए टीम इंडिया ने पाकिस्तान को आखिरकार 'मात' दे ही दी। टीम इंडिया की पाकिस्तान पर विजय किसी 'जश्न' से कम नहीं होती। हर तरफ पटाखों की गूंज और बधाईयों का रेला। फेसबुक-टि्वटर पर हर सेकेंड अपडेट होते स्टेटस जश्न की रंगत को दोगुना किए दे रहे थे। कोई मजाक बात थोड़े थी, आखिर भारत ने पाकिस्तान से मैच जीता था। पाकिस्तान से मैच जीतने का मतलब है, बिछी बिसात पर सीधी मात देना।

नहीं जानता कि पाकिस्तान टीम पर जीत का दवाब कित्ता था पर टीम इंडिया पर जीत का उत्ता ही दवाब था जित्ता दिल्ली चुनाव में बीजेपी पर। मगर अफसोस दिल्ली चुनाव में बीजेपी को 'करारी शिक्सत' मिली और 'आप' को 'चमत्कारिक' जीत। बीजेपी वाले 'मायूस' दिखे और आप वाले 'खुश'। होता है.. होता है.., जब दो दल या टीमें आपस में भिड़ती हैं तो एक की जीत और एक ही हार निश्चित है। इसीलिए तो क्रिकेट के साथ-साथ चुनावों को भी 'बाइ-चांस' कहा जाता है। थोड़ा 'नसीब' भी 'कमाल' दिखाला ही जाता है।

वो तो अच्छा हुआ कि अपने दम-खम पर टीम इंडिया पाकिस्तान से मैच जीत गई। खुदा-न-खास्ता कहीं अगर हार जाती तो क्रिकेट-प्रेमियों से कहीं ज्यादा 'पेट-दर्द' चैनलों और क्रिकेट के कथित सूरमाओं को होता। फिर चलता लंबी-लंबी बहसों, नसीहतों और खींचाईयों का दौर। हालांकि जीत के बाद भी कुछ कथित सूरमाओं को 'ऐसे या वैसे खेलने' की सलाह देते चैनलों पर देखा-पाया गया था। लेकिन जीत के जश्न में सारी सलाहें बेमानी-सी लगती हैं। जीत वो खुशनुमा हकीकत है, जो हर कमजोरी पर कंबल डाल देती है। फिर भी, कहने वालों का हम न मुंह बंद कर सकते हैं न सलाहें देना।

आलम यह है कि क्रिकेट हमारे देश में 'दीवानगी' की सारी हदों को पार कर चुका है। न केवल टीम बल्कि एक-एक खिलाड़ी से इत्ती-इत्ती 'उम्मीदें' पाली जाती हैं कि अक्सर खिलाड़ी भी 'कन्फ्यूजिया' जाता है कि कौन सी उम्मीद को पूरा करे और कौन सी को छोड़े! क्या बच्चा, क्या बूढ़ा हर किसी का तन-मन केवल क्रिकेट में ही बसता है। क्रिकेट के रंग के आगे उसे हर रंग बे-रंग लगता है। क्रिकेट के प्रति यही दीवानगी अक्सर खिलाड़ियों को भी पिच पर कहीं न कहीं मात दे ही जाती है। कहना न होगा, इश्क के बाद क्रिकेट को ही अब यहां दीवानगी का प्रतीक कहा-माना जाने लगा है।

क्रिकेट के प्रति इस दीवानगी को देखकर अक्सर मेरा भी मन करता है कि लेखन-वेखन छोड़कर क्यों न क्रिकेटर ही बन जाऊं! पैसा, शोहरत, ग्लैमर, विज्ञापन सब एक साथ मिलेंगे। लेखन में जित्ता मैं एक लेख लिखकर कमा पाता हूं, उसे दस गुना एक शॉट पर ही कमा लूंगा। कहीं अगर बल्ला चल निकला तो फिर वारे नियारे ही समझो पियारे। इस-उस हीरोइन के साथ 'सेल्फियां' लेने का 'सुख' मिलेगा अलग से। क्रिकेट में इत्ता पैसा है कि मेरी आगे आने वाली सात-आठ पुश्तें आराम से बैठके खाएंगी। देखा नहीं था, पिछला वर्ल्ड कप जीतने की खुशी में खिलाड़ियों पर कैसा दिल खौलकर पैसा लुटाया गया था। सब के सब खिलाड़ी करोड़पति हो लिए थे तब। खिलाड़ी चलना चाहिए बस फिर तो विज्ञापन ही विज्ञापन और नाम ही नाम।

अभी मौका टीम इंडिया की पाकिस्तान पर धांसू जीत को एंजॉय करने का है। इस धांसू जीत पर खुलकर जश्न मनाइए लेकिन इत्ता भी न उड़िए कि एक ही जीत को वर्ल्ड कप की जीत मान लें। वर्ल्ड कप तलक पहुंचने का रास्ता अभी बहुत लंबा है। एक ही जीत की खुमारी में अगर डूबे रहेंगे फिर तो बहुत मुश्किल हो लेगी पियारे।

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