गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

वेलेंटाइन और झाड़ू

पत्नी को 'झाड़ू' से विशेष लगाव है। यह लगाव दिल्ली में 'आप' की धमाकेदार जीत के बाद और अधिक बढ़ गया है। हालत यह है कि हमारे घर में पत्नी की 'साड़ियों' से अधिक 'झाड़ूएं' हैं। हर झाड़ू की अपनी खासियत है। पत्नी एक झाड़ू तो हमेशा अपने साथ ही रखा करती है। यही वजह है कि मैं पत्नी से किसी भी मुद्दे या बात पर न उलझता हूं न झगड़ता। क्योंकि अपना 'अंजाम' मुझे मालूम है। 'झाड़ू पछाड़' देने में उसे जरा भी देरी नहीं लगती।

इस वेलेंटाइन पत्नी ने 'इच्छा' जतलाई है कि मैं उसे 'फूल' की जगह 'झाड़ू' ही दूं। हालांकि पत्नी कने तमाम किस्म की झाड़ूएं पहले से ही हैं लेकिन फिर भी उसे झाड़ू ही चाहिए। चूंकि यह पत्नी की 'इच्छा' है तो इसे पूरा करना मेरा 'धर्म' ही नहीं 'मजबूरी' भी है। पत्नी की इच्छा को पूरा न करने का मतलब है, घर में 'हुक्का-पानी' बंद।

फिर भी 'अतिरिक्त हिम्मत' जुटाके पत्नी से मैंने पूछ ही लिया कि उसे वेलेंटाइन डे पर 'फूल' क्यों नहीं और 'झाड़ू' ही क्यों चाहिए? पत्नी का जवाब था- 'फूल के देने के जमाने अब लद लिए है, पति महोदय। जो काम फूल नहीं कर सकता वो झाड़ू कर सकती है। फूल तो थोड़ी देर बाद 'मुरझा' लेगा लेकिन झाड़ू 'बिंदास' चलेगी। भले ही झाड़ू में फूल की तरह 'खुशबू' न हो पर उसके 'एहसास का असर' ही बंदे को 'कंट्रोल' में रखता है। एक मैं ही नहीं बल्कि हर पत्नी को पति से और प्रेमिका को प्रेमी से फूल नहीं झाड़ू ही मंगनी चाहिए। ताकि 'डर' बना रहे।'

'लेकिन डर्लिंग वेलेंटाइन डे पर फूल की जगह झाड़ू कुछ 'अजीब'-सा नहीं लगेगा।', मैंने पूछा। पत्नी ने तड़ाक से जवाब दिया, 'अजीब.. अजीब-सा क्या लगना है? फूल से अगर तुम्हें इत्ता ही मोह है तो 'फूल-झाड़ू' दे दो। तुम्हारा भी मन रह लेगा और मेरी इच्छा भी पूरी हो लेगी। आज हर तरफ झाड़ू का ही जलवा है। देखा नहीं, दिल्ली में झाड़ू ने कैसी मस्त 'झाड़ू पछाड़' लगाई कि सब के सब निपट लिए। कोई 'जीरो' पर टिक लिया तो कोई 'तीन' पर ही सिमट लिया। एक ही एक्शन में कंपलीट बुहार डाला सबको। आज झाड़ू ही आम आदमी की ताकत और पहचान है। इसीलिए मुझे भी इस वेलेंटाइन झाड़ू ही चाहिए।'

तर्कबाजी में पत्नी से मैं तो क्या बुद्धिजीवि भी नहीं जीत सकते। वैसे पत्नी के कहे का असर यहां-वहां थोड़ा दिखने लगा है। एक दिल्ली शहर में ही नहीं मेरे शहर (बरेली) में भी आम आदमी का झुकाव झाड़ू की तरफ बढ़ लिया है। जिसे देखो उसकी जुबान पर बस 'झाड़ू' और 'मफलरमैन' के ही चर्चे हैं। हर कोई झाड़ू हाथ में लेके हर तरह की गंदगी को बुहार देना चाहता है। पारंपरिक राजनीति और व्यवस्था को झाड़ू के दम पर 'आईना' दिखाना चाहता है। मेरे शहर की लड़कियां भी अब अपने साथ झाड़ू रखना पसंद करने लगी हैं ताकि सड़कछाप शोहदों को सबक सिखाया जा सके।

अब मेरे जैसे पतियों की चिंताएं बढ़ने लगी हैं। कहीं ऐसा न हो कि मेरी पत्नी की देखा-दाखी अब हर पत्नी अपने पति से झाड़ू-गिफ्ट की डिमांड करने लगे। पत्नी को झाड़ू गिफ्ट में देने का मतलब पति लोग समझ ही सकते हैं। पत्नी ने अगर इच्छा जतलाइ है तो उसे पति को पूरा करना ही है, अब चाहे वो 'झाड़ू' मांग ले या 'पहाड़'।

वेलेंटाइन डे के दिन लड़कियों के हाथों में झाड़ू होने का असर इत्ता तो बना रहेगा ही कि विरोधी किस्म के लठैत उनके कने न फटक सकेंगे। इस दिन सबसे ज्यादा झाड़ लड़कियों को ही सहनी पड़ती है। चलिए, झाड़ू के बहाने ही सही आम आदमी की तरह लड़कियां भी मजबूत हों, यह अच्छा ही है।

अब मुझे तो पत्नी संग रहना है इस नाते वेलेंटाइन डे पर उसको झाड़ू देने की इच्छा पूरी करूंगा ही करूंगा। आखिर अपनी चारपाई घर के बाहर थोड़े न डलवानी है पियारे।

3 टिप्‍पणियां:

sadhana vaid ने कहा…

रोचक ! वैसे है पते की डिमांड ! अब पोर्टेबिल फोल्डिंग झाडू की इजाद भी होनी चाहिए जिसे लड़कियाँ रोडसाइड रोमियोज़ को सबक सिखाने के लिये अपने पर्स में ले जा सकें ! मनोरंजक आलेख !

रचना त्रिपाठी ने कहा…

सही सोचा है। दे डालिये झाड़ू ही गिफ्ट में। पत्नी भी खुश और साथ में घर और घरवाले भी दुरुस्त रहेंगे।

GathaEditor Onlinegatha ने कहा…

Excellent stroy
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