गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

चुनाव है या मनोरंजन

एक मैं ही नहीं, देश का हर बंदा 'कनफ्यूजिया' गया है कि दिल्ली में चुनाव हो रहे हैं या 'मनोरंजनात्मक करतबबाजियां'। तीनों पार्टियों के पास जनता के मुद्दे कम किस्म-किस्म के 'मनोरंजनात्मक आइटम' अधिक हैं। इनमें, सबसे अधिक मनोरंजन करवा रहे हैं 'आप' और 'बीजेपी'। मनोरंजन के लिए हर रोज कोई न कोई नया मामला सामने आ ही जाता है और पार्टियां लग जाती हैं, एक-दूसरे की 'टांग' खींचने में। जो जिसकी टांग अधिक खींच लेता है, उसी के चर्चे खबरिया चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक खूब होते हैं। एक प्रकार से उसे दिल्ली चुनाव का असली 'हीरो' बनाकर पेश किया जाता है।

बहस और विवाद के मुद्दे भी ऐसे-ऐसे कि 'शर्म' तो जाने दीजिए, 'हंसी' आए बिना नहीं रहती। 'आप' और 'बीजेपी' के बीच इस बात की 'जंग' सबसे अधिक है कि मेरी कमीज उसकी कमीज से सफेद कैसे? दोनों पार्टियां लगी रहती हैं, अपनी-अपनी कमीजों को रगड़-रगड़कर 'उजला' बनाने में। जबकि जनता अच्छे से जानती है कि किस पार्टी या नेता की कमीज कित्ती सफेद है। लोकतंत्र में जनता से कुछ न छिपा रहता पियारे।

फिलहाल, आजकल बहस-कम-मनोरंजन का मुद्दा 'विज्ञापन' और 'चंदा' है। बीजेपी ने 'आप' पर विज्ञापन छापा तो 'आप' वाले तिलमिला उठे। विज्ञापन में अण्णा को जीते-जी श्रद्धांजलि दे दी गई। और केजरीवाल के 'गोत्र' पर सवाल उठा दिया गया। हालांकि इस विज्ञापन का जनता या जन-मुद्दों से कोई लेना देना, लेकिन, अब लगता है कि राजनीति और चुनाव में सबकुछ जायज हो चला है। तुम मुझ पर व्यक्तिगत कीचड़ उछालो, मैं तुम पर उछालूं। कीचड़ उछलाई की इस नौटंकी में जनता के मुद्दे कहीं नहीं ठहरते।

विज्ञापन का विवाद थमा न था कि बीच में 'आप' के 'चंदे' के मुद्दे ने एंट्री मार ली। बीजेपी ने चंदा-मुद्दे को लपक लिया और शुरू हो गई दोनों के बीच भयंकर वाली जुबानी जंग। 'आवाम' नाम के संगठन ने बीच में आकर दिल्ली चुनाव में रायता और फैला दिया। अब 'आप' वाले लगे हैं, चंदे पर फैले रायते को सिमेटने-सिमटाने में। लेकिन पियारे चंदे का रायता ऐसा न है कि जुबानी जंग या जस्टीफिकेशन से ही सिमट जाए। यह बात हर कोई जानता है कि बिना चंदे के चुनाव भला कहीं संपन्न हुए हैं। कोई पार्टी कम चंदा लेती है, तो कोई ज्यादा। सौ टके की बात- चंदे के दम पर ही बड़े-बड़े चुनाव लड़े-लड़वाए जाते हैं। पार्टियां करती रहें, चंदे पर अपनी स्थिति स्पष्ट लेकिन यह जो पब्लिक है, यह सब जानती है।

सुने-पढ़ने में आया है कि बुद्धिजीवि वर्ग खासा खफा है 'चुनाव दंगल' पर। कह रहा है- ऐसा चुनावी इतिहास में कभी न हुआ, जैसा दिल्ली के चुनावों में अब हो रहा है। नादान हैं बुद्धिजीवि लोग। जैसा कभी न हुआ, वो कभी न कभी तो होना ही था, सो अब हो लिया। समय-समाज-तकनीक-राजनीति-नेता सब बदले हैं तो क्या चुनावों का टेस्ट न बदलेगा? यह 21वीं सदी के उत्तर-आधुनिक चुनाव हैं। यहां अब सबकुछ मान्य और जायज है। आज के चुनावों में 'चुनावपंती' कम 'मनोरंजनपंती' ज्यादा हावी रहती है। इसीलिए तो हमारे देश का चुनावी सीजन हिट रहता है पियारे। जो हिट है वो ही फिट है।

दिल्ली में छिड़े चुनावी दंगल पर ज्यादा टेंशन लेने का नहीं। 'कूलली' चुनावों को देखने और एंजॉय करने का। मुफत में घर बैठे नेता लोग और पार्टियां चुनावी-मनोरंजन कर-करवा रही हैं, यह क्या कम है? अमेरिका की तरह थोड़े न कि दो पार्टियों के दल एक-दूसरे से कायदे से बहस कर निकल लेते हैं। चुनावों में जब तलक उमंग, तरंग और रंग न हों तो क्या मजा?

चुनावी चक्कलसें यों ही चलती रहें। मनोरंजन होता रहे। ऐसे में जन-मुद्दों पर कौन ध्यान देता है पियारे।

2 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

दुनिया का सबसे अच्छा खासा मनोरंजक है हमारे लोकतंत्र का चुनाव महोत्सव ..
बहुत बढ़िया चिकोटी

अनूप शुक्ला ने कहा…

चकाचक चिकोटी!