शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

प्रभु का रेल बजट

वो कहते हैं न कि प्रभु से सवाल-जवाब नहीं करा करते। जो वे कह देते हैं, चुपचुप मान लेते हैं। कहीं प्रभु 'नाराज' हो गए तो...।

इसीलिए कह रहा हूं, इस केस (रेल बजट) में भी यह ध्यान रखें कि जो या जैसा रेल बजट प्रभु ने प्रस्तुत कर दिया, बिना अधिक चू-चपड़ किए मान लें। अरे, हमको तो रेल बजट पर 'गर्व' होना चाहिए कि इसे साक्षात प्रभु ने बनाया था! रेल बजट में जित्ते भी प्रावधान या जोड़-घटाने किए गए सब 'प्रभु की मर्जी' थी। अब 'प्रभु की मर्जी' तो प्रभु की मर्जी होती है पियारे, उसमें न 'शक' होता है न 'शुबहा'। यों भी, प्रभु की मर्जी पर आज तलक किसका बस चला है, जो अब चलेगा!

रेल बजट की गूढ़-गंभीर बातों को जाने दीजिए। वो आम आदमी को न समझ आईं हैं न आएंगी। उनको समझने के लिए बड़े-बड़े विश्लेषक ही काफी हैं। परंतु प्रभु का 'मुकाबला' वो भी नहीं कर सकते। हमको को बस इत्ता पता होना चाहिए कि प्रभु ने यह रेल बजट अपने भक्तों (यानी आम आदमी) को ध्यान में रखकर बनाया था। केवल आम आदमी की सुख-सुविधा की खातिर न उन्होंने रेल किराया बढ़ाया न किसी किस्म का अतिरिक्त बोझ ही डाला। हां, रिर्जवेशन की प्रक्रिया को चार माह पहले खिसका दिया। ताकि दूर-दराज घुमने जाने वाले चार महीने पहले ही अपना रिर्जवेशन करवा कर रेल सफर के अच्छे दिनों का आनंद ले सकें।

वरिष्ठ नागरिकों के तईं लोअर बर्थ के प्रस्ताव के साथ-साथ ऊपर जाने (आई मीन) ऊपरी बर्थ पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की व्यवस्था होगी। ताकि वरिष्ठ नागरिकों को किसी किस्म का 'कष्ट' सफर के दौरान न उठाना पड़े।

महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता में रखते हुए प्रभु ने महिला कोच में 'सीसीटीवी कैमरे' लगाने का आश्वासन दिया है। एक चैनल पर देख-सुन रहा था कि इस प्रस्ताव पर महिलाएं बहुत खुश हैं। उन्होंने इस वास्ते प्रभु को 'धन्यवाद' भी प्रेषित किया।

मुंबई-अहमदाबाद के बीच 'बुलेट ट्रेन' चलाने के साथ-साथ मुंबई की लोकल ट्रेनों को 'एसी' करने की बात भी कही। न न अब विपक्ष की तरह यह मत बोलिएगा कि हम दिल्ली, बरेली या इंदौर में रहते हैं, बुलेट या एसी ट्रेन का हमसे क्या मतलब? अजी मतलब क्यों नहीं है? मुंबई-अहमदाबाद भी तो हमारे देश का हिस्सा ही हैं। वहां का विकास मतलब देश का विकास। मोदीजी की बात को जहन में रखिए कि 'सबका साथ, सबका विकास।'

मुझे ही देखिए न, मैं तो (रुहेलखंड) बरेली से हूं। मेरे शहर से तो एक भी ट्रेन के गुजरने या ठहरने की बात रेलमंत्रीजी ने नहीं की। तो क्या इत्ती सी बात के लिए मैं प्रभु से नाराज हो लूंगा। नहीं जी कतई नहीं। अबकी बार न चली तो अगली दफा चलेगी। वैसे भी सीधी एक ट्रेन तो बरेली से मुंबई के बीच चलती ही है। जिन्हें ज्यादा जल्दी है वे हवाई जहाज से जाएं।

इंसान को कभी जो नहीं है, उसके लिए नहीं रोना चाहिए। जो है उसे सिर आंखों पे बैठाना चाहिए। है कि नहीं।

प्रभु ने इत्ता कुछ दे दिया रेल बजट में कि ज्यादा की दरकार लगती ही नहीं! रेलवे की साइट पर जाकर मन-पसंद खाना मंगवाइए। ट्रेनों की स्पीड बढ़ाई जाएगी। पुराने-जर्जर ट्रैकों को जल्द सुधारा जाएगा। आदि-आदि।

सौ बातों की एक बात- रेल किराया नहीं बढ़ाया। यह प्रभु का हम जनता पर सबसे बड़ा अहसान है। और क्या चाहिए हमें। जनता के वोट का कुछ हक तो सरकार अदा करेगी कि नहीं?

यह 'प्रभु की मर्जी' का बजट था। इसे 'दिल से' स्वीकारें और प्रभु के प्रति 'निष्ठा' बनाएं रखें।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

खामोश! खोज चालू आहे

ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी की खोज दिल्ली से लेकर कन्याकुमारी तक ही जारी है, उन्हें मेरे शहर के मोहल्ले में भी खोजा जा रहा है। मेरे मोहल्ले के लोग तन-मन से लगे हुए हैं, राहुल गांधी की खोजा-खाजी में। फिलहाल, अभी तक जो सूचना मेरे कने है, उसमें राहुल गांधी को बिहारीपुर से लेकर कुत्तुबखाना और बड़ा बाजार से लेकर किला तक खोजा जा चुका है लेकिन कहीं कोई सूत्र हाथ नहीं आया है। साथ-साथ, मोहल्ले के उन घरों-हिस्सों में भी राहुल गांधी की खोज जारी है, जहां अक्सर उन पर बातें सुनने को मिल जाया करती थीं। हो सकता है, अपने किसी समर्थक या प्रशंसक के यहां 'आराम' फरमा रहे हों। बाहर न आना चाह रहे हों। तरह-तरह के प्रश्नों से बचना चाह रहे हों। वैसे भी दिल्ली में रहकर भला कौन एकाग्रचित्त होकर 'शांति' से रह सकता है।

कहने वाले कह रहे हैं कि राहुल गांधी को 'नाराज' होकर 'बजट सत्र' छोड़कर इस तरह से नहीं जाना चाहिए था। भला क्यों नहीं जाना चाहिए था? क्या राहुल गांधी को नाराज होने का हक नहीं? क्या उनका दिल नहीं करता कहीं आने-जाने का? अरे बजट सत्र का क्या है, इसे तो हर साल ही होना है। इस बजट सत्र नहीं अगले बजट सत्र में मौजूद हो लेंगे। बजट सत्र के लिए पार्टी और उसके नेता किस काम आएंगे? यों भी, पार्टी नेता सालभर कौन-सा 'खास काम' करते हैं! खास काम कर रहे होते तो दिल्ली चुनाव में पार्टी 'जीरो' थोड़े हो जाती। वहां तो सभी अपनी ढपली, अपना राग बजाते-गाते रहते हैं।

हो सकता है, राहुल बाबा की 'नाराजगी' का कारण यही सब रहा हो। लेकिन हम बिन उनसे पूछे सिर्फ 'कयास' ही लगा सकते हैं। अपना सच तो वे ही जानते-समझते होंगे।

और अगर छुट्टी पर या घुमने चले भी गए तो ऐसा कौन सा दुनिया का सातवां अजूबा घट गया। सब जाते हैं छुट्टी पर। साल के 365 दिनों में से 150 दिन तो मैं ही दफ्तर से छुट्टी पर रहता हूं। मन नहीं है दफ्तर जाने का, नहीं जाता। बंदा काम करते-करते 'उक्ताएगा' नहीं क्या? सो ऐसा ही कुछ मन राहुल गांधी का भी किया होगा सो वे छुट्टी चले गए। छुट्टी पर जाना कोई 'गुनाह' थोड़े न है पियारे। छुट्टी पर जाने से सेहत मस्त और दिमाग दुरुस्त रहता है। लेकिन छुट्टी पर जाने के 'फायदे' को वो क्या खाक समझेंगे जो खुद कभी छुट्टी पर नहीं जाते।

स्पष्ट नहीं पर राहुल गांधी के 'पहाड़' पर कहीं होने की कुछ तस्वीरें 'टि्वटर' पर वायरल हुई हैं फिर भी लोग तरह-तरह के सवाल कर रहे हैं। कह रहे हैं कि बतलाकर नहीं जा सकते थे? क्यों बतलाकर जाते? क्या आप उनके फूफा या मामा लगते हो? लाइफ में हर किसी को 'प्राइवेट स्पेस' की 'दरकरार' होती है। फिर चाहे वो राहुल गांधी हों या सलमान खान।

लेकिन कहने वालों का क्या कीजिएगा उन्हें तो मुंह का ढक्कन खोलने से मतलब।

फिर भी जो खोज रहे हैं (चाहे दिल्ली या बरेली में) उनको खोज लेने दीजिए। हो सकता है, खोजना उनका 'शौक' हो। अगर वाकई 'शौक' है तो 'खामोशी' से खोजें ताकि मीडिया या विपक्ष को खबर न हो। यहां तिल का ताड़ बनते वक्त ही कित्ता लगता है।

राहुल गांधी को खोजने वालों को 'शायद' न पता हो कि इससे भी कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण मुद्दा इन दिनों दिल्ली में चल रहा है, भूमि अधिग्रहण को लेकर। किसान और सरकार के बीच रस्साकशी जारी है। कौन कित्ता और कहां तलक झुकता है, यह समय बतलाएगा लेकिन धरना प्रदर्शन चल रहे हैं।

राहुल गांधी को खोजने से जब 'फुर्सत' मिल जाए तो एक दफा किसानों का मन भी टटोल लीजिएगा कि वो क्या चाहते हैं?

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

अगले जन्म मोहे युवराज जैसा क्रिकेटर ही कीजियो

देखा पियारे, इसे कहते हैं 'नसीब'। कोई छोटा-मोटा नसीब नहीं, पूरे 16 करोड़ का नसीब। युवराज ने 16 करोड़ में बिक कर साबित कर दिया कि बंदे की मार्केट में आज भी अच्छी-खासी वेल्यू है। बीसीसीआइ ने युवराज को वर्ल्ड कप के लायक न समझा तो क्या, आइपीएल में तो बंदे का 'जलवा' बरकरार है। क्रिकेट का पूरा रोमांच ही जलवे पर टिका हुआ है। जिसके बल्ले में जलवा दिखाने की ताकत होगी वो चलेगा, जिसमें नहीं होगी हमेशा के लिए बैठ जाएगा।

यह बदलते जमाने का क्रिकेट है, यहां खेल के साथ 'पैसा' और 'ग्लैमर' दोनों चलते हैं। खिलाड़ी की पहचान 'विज्ञापन' से बनती है। इसीलिए तो विज्ञापन जगत में क्रिकेट के खिलाड़ियों की जबरदस्त धूम रहती है। कभी बल्ला न भी चले, विज्ञापन तो चल ही रहे हैं न। 'कमाई' होनी चाहिए, चाहे बल्ले से हो या विज्ञापन से। कोई खास फरक नहीं पड़ता।

जो भी हो युवराज ने 16 करोड़ में बिक कर अपने आलोचकों को करारा जवाब तो दे ही दिया कि मेरे दिन अभी फिरे नहीं हैं। तुमने सलेक्ट न किया तो क्या, आइपीएल है न। यों भी, आइपीएल खिलाड़ियों के लिए 'नोट' पैदा करने की वो मशीन है, जिसमें सिर के बाल से लेकर पैर के अंगूठे तक सबकुछ नोट ही नोट में भीगा रहता है। मैदान पर चौके-छक्के जमाते रहिए, दर्शकों की तारीफ और नोट कमाते रहिए।

कई दफा देखा है, जो खिलाड़ी साधारण क्रिकेट में नहीं चल पाते, आइपीएल में मस्त चलते हैं। मात्र 20 ओवरों में वो कमाल कर दिखाते हैं, जो 50 ओवरों में नहीं दिखला पाते। क्रीस गेल इसका सबसे 'हॉट एग्जाम्पल' है। क्रीस गेल का बल्ला आइपीएल में ऐसी आग उगलता है कि सामने वाला चारों खाने चित्त। इसे ही आइपीएल की 'ब्यूटी' कहते हैं पियारे।

भीड़ में कुछ ऐसे सियाने भी हैं, जिन्हें आइपीएल के फॉरमेट और खिलाड़ियों के बिकने पर हमेशा 'आपत्ति' रहती है। कहते हैं, आइपीएल न केवल क्रिकेट बल्कि खिलाड़ियों का भी भारी 'नुकसान' कर रहा है। क्रिकेट में से खेल टाइप भावना को विलुप्त कर रहा है। किंतु देखकर ऐसा लगता तो नहीं। आइपीएल ने तो 'पारंपरिक क्रिकेट' के फॉरमेट को और अधिक रोमांचक, रोचक, हॉट और ग्लैमरस बनाया है। क्या बच्चा, क्या बूढ़ा हर कोई क्रिकेट के प्रति यों दीवाना रहता है, जैसे भक्त लोग भगवान के प्रति।

अब 2015 के युग में अगर 70-80 के दशक का क्रिकेट खेलने या देखने को कहोगे तो भला कौन खेलेगा, कौन देखेगे और कौन पसंद करेगा! आजकल हर किसी को सबकुछ 'इंस्टंट' चाहिए। इधर बॉल बल्ले पर आई, उधर छक्का पड़ा। चूक गए तो गिल्लियां गायब। 20 ओवरों के बाद खेल खत्म, पैसा हजम। घर जाकर आराम करें।

युवराज को 16 करोड़ में बिका देख, मुझे अंदर से कित्ता 'प्राउड' टाइप फिल हो रहा है, बतला नहीं सकता। दिल कर रहा है, 16 करोड़ में न सही मैं 16 हजार में ही बिक जाऊं! लेखक हूं तो क्या, बिक तो सकता ही हूं। बिकना न बिकना मेरी चॉइस पर डिपेंड करता है। मैं आजू-बाजू के 'कहे' पर क्यों ध्यान दूं। वो किसी शायर ने क्या 'खूब' कहा है न- कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...।

लेकिन कभी-कभी मुझको खुद पर अफसोस भी होता है कि हाय! मैं लेखक ही क्यों हुआ? क्यों खिलाड़ी या नेता नहीं हुआ? खिलाड़ी या नेता बनकर मन-मर्जी बिकने-बिकाने का 'लुत्फ' तो ले लेता। इस लेखन में क्या धरा है! यहां-वहां छप लो। और देख-देखकर मन ही मन खुश होते रहो। पारिश्रमिक इत्ता कि पत्नी के कुंडल की डंडी भी न आ पाती है। रात-दिन पत्नी के 'ताने' सुनने को मिलते हैं सो अलग। कि, 'दिनभर घर में पड़े-पड़े बस पन्ने ही काले-नीले करते रहना। कोई 'कमाऊ टाइप' का काम क्यों नहीं पकड़ लेते। एक युवराज है और एक तुम हो।'

पत्नी को तो खैर नहीं समझा सकता हां अपने दिल को जरूर 'बहला' लेता हूं कि इस दफा न सही पर अगले जन्म मुझे युवराज जैसा क्रिकेटर ही कीजियो।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

मेरी पतलून और पीएम का सूट

आखिर शर्म कैसी बतलाने में कि मेरे कने दो ही पतलूनें हैं! जिसमें से एक- 'दहेज' में मिली थी और दूसरी- मेरी 'कमाई' की है। सोच रहा हूं, दोनों पतलूनों में से किसी एक को 'नीलाम' कर दूं। पहनते-पहनते अब 'उक्ता'-सा गया हूं। दहेज में मिली पतलून को नीलाम कर नहीं सकता क्योंकि यह 'ससुराल का माल' है। कहीं अगर बीवी को पता चल गया तो घर में हुक्का-पानी बंद होने का खतरा हो सकता है। हां, खुद की कमाई से बनवाई पतलून को नीलाम कर सकता हूं। इस पतलून पर बीवी भी कई दफा मुझे 'टोक' चुकी है। कहती है, 'तुम्हारी यह पतलून तुम्हारे लेखन जित्ती ही 'फालतू' है। फैंको इसको।'

बीवी क्या जाने अपनी कमाई से सिलवाई गई एक मात्र पतलून को फैंकना कित्ता 'कष्टकारी' होता है। लेकिन मेरे कने मेरी पतलून को नीलाम करने के अलावा दूसरा कोई चारा भी तो नहीं है। पतलून की नीलामी से आए रुपयों से मैं दूसरी पतलून खरीदूंगा। हिंदी के लेखक के साथ यही सबसे बड़ी समस्या है कि वो इत्ता भी नहीं कमा पता कि अपने तईं ढंग की कोई पतलून-सतलून ही खरीद सके।

दरअसल, खुद की पतलून को नीलाम करने का 'आइडिया' मुझे पीएम के 'लखटकिया सूट' की नीलामी को देखकर आया। पीएम के नीलाम हुए सूट की चर्चाएं हर तरफ जंगल में आग की माकिफ फैल हुई हैं। हर कोई चकित है, पीएम के सूट की नीलामी के भाव को सूनकर। ताजा खबर यही है कि पीएम का सूट मात्र चार करोड़ रुपए में एक हीरा व्यापारी ने खरीद लिया है। चार करोड़...आश्चर्य कैसा; आखिर पीएम का सूट था। कोई मुझ जैसे ऐसे-गैरे, नत्थू-खैरे की पतलून थोड़े ही।

पीएम के सूट के चर्चे तब भी बहुत हुए थे, जब ओबामा के साथ गार्डन में घुमते-टहलते हुए उन्हें इस सूट में देखा गया था। तब सूट की कीमत पर तमाम तरह के कयास लगे थे। कोई बोला 'दस लाख' का है। कोई बोला 'नौ लाख' का है। इस बीच खबर यह भी आई कि सूट 'मात्र सात हजार' का है! उड़ाने वालों ने सूट को 'बदनाम' करने के तईं लाखों की कीमत की 'अफवाहें' फैला दीं थीं। अफवाहों का क्या है, अफवाहों के हाथ-पैर तो होते नहीं। बस यहां से वहां उड़ती रहती हैं।

चलो जो भी हो मगर पीएम ने सूट को नीलाम कर 'अच्छा' ही किया। नीलामी से जुटा पैसा 'स्वच्छता' के वास्ते खरच किया जाएगा। साथ-साथ, अफवाहबाजों का मुंह भी बंद होगा।

खैर, पीएम का सूट चार करोड़ में नीलाम हो गया। पर मेरी पतलून का क्या होगा? यह कित्ते में नीलाम हो पाएगी, फिलहाल इसी उधेड़-बुन में बिजी हूं।

हालांकि मेरी पतलून पर 'साढ़े दस रुपए' की बोली अभी तलक लग चुकी है। बाकी मेरा 'नसीब'।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

फ्री से लेकर फ्री तक

यह एक मेरी ही नहीं बल्कि प्रत्येक हिंदुस्तानी की 'मनोग्रंथी' है कि उसका दिल 'फ्री' की चीजों-बातों में अधिक रमता है। फर्क इससे नहीं पड़ता कि फ्री में क्या मिल रहा है, बस होना 'फ्री' चाहिए। फ्री लेने के मामले में हम सुई से लेकर जहाज तक नहीं चुकने वाले हैं। मैंने तो ऐसे कई फ्री-प्रेमी देखे हैं, जो दुकानदार से फ्री में भी फ्री की उम्मीद रखते हैं। उनका पेट 'बाय वन गेट वन' (फ्री) से नहीं, 'बाय फ्री गेट फ्री' से ही भरता है। लगभग ऐसा ही सीन कई बार 'डिस्काउंट' के मामले में भी देखने को मिल जाता है। ग्राहक की डिमांड डिस्काउंट में भी और डिस्काउंट की रहती है।

फ्री के प्रति मोह हमारे 'डीएनए' में है। ऐसा नहीं है कि फ्री लोअर या मीडिल क्लास की ही पसंद है, अपर क्लास भी अक्सर फ्री के मोहपाश में रंगे-हाथों पकड़े जा चुके हैं। बल्कि सच बोलूं तो, फ्री का टेस्ट चखने को बेताब अपर क्लास वाले ज्यादा रहते हैं। बेशक खरीददारी वे मॉल से करते हों परंतु जाते उसी दुकान पर हैं, जहां बाय वन गेट टू या थ्री का टैग लगा होता है। फुटपाथ से खरीदे आइटम को भी मॉल से खरीदा हुआ ही बतालाते हैं। और दाम ऐसे, कि बंदा खड़े-खड़े ही लुढ़क ले।

इधर जब से ऑन-लाइन स्टोर्स पर फ्री या डिस्काउंट की मांग बढ़ी है, लोगों की निगाह हर वक्त किस्म-किस्म के ऑफरों पर ही टिकी रहती है। त्योहारी सीजन में ऑन-लाइन स्टोर्स अच्छे से जानते हैं अपने माल को कम से कम कीमत में ग्राहकों के बीच खपाना। मार्केट की यही तो होशियारी है कि वो अपने माल को किस एंगल से ग्राहक के बीच बेचता है।

लेकिन ग्राहक और जनता के बीच थोड़ा फर्क होता है पियारे। हां, यह बात सही है कि फ्री का माल ग्राहक को भी चाहिए और जनता को भी। इसीलिए दोनों टाइप के लोग बेकरार रहते हैं फ्री के तईं। शायद इसी उम्मीद के तहत केजरीवालजी ने दिल्ली की जनता से काफी कुछ फ्री-नुमा वायदे कर डाले थे। अभी उन्होंने सीएम पद की शपथ ली ही है कि आवाजें फ्री वाई-फाई और बिजली-पानी की उठने लगी हैं। फ्री लॉलीपॉप के तईं जनता ने सोशल नेटवर्किंग पर उनकी खींचाई भी शुरू कर दी है। क्या करें... यह जनता है। जनता कुछ भी कहने का हक रखती है। आखिर उसने वोट दिया है। क्या वोट की कीमत नेता या सरकार से वसूलेगी नहीं? जनता से 'सब्र' कहां होता है। भले ही नेता चाहे कुछ भी कहते-बोलते रहें।

वही तो पियारे, फ्री का पेच जनता के बीच अक्सर 'कर्रा' पड़ जाता है। नेता लोग चुनावी वायदे तो कर लेते हैं मगर जब निभाने की बारी आती है तो कहते हैं, अरे वो तो 'चुनावी जुमला' था। लेकिन नेताजी, देश या समाज जुमलों से नहीं इरादों से चलता है। अगर इरादों में 'दम' है तो सरकार चलेगी नहीं तो 'जीरो' या 'तीन' पर आकर टिकने में जरा देरी नहीं लगती।

महसूस-सा तो ऐसा ही होता है कि 'आप' का फ्री वाई-फाई का वायदा महज 'चुनावी जुमला' भर था। क्योंकि फ्री कहना जित्ता आसान है, उससे कहीं ज्यादा कठिन है उसे निभा पाना। बाकी 'आप' जाने और जाने 'जनता'!

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

पुस्तक मेला और सेल्फी

पियारे, दिल्ली में किताबों का मेला सज लिया है। किस्म-किस्म की किताबें। किस्म-किस्म के ऑफर। किस्म-किस्म के लेखक। सब वहां मौजूद रहेंगे। किताबों के विमोचन। किताबों पर बातें। किताबों पर खुशनुमा व आलोचनात्मक टिप्पणियां भी होंगी। हर कोई अपनी-अपनी किताबों को संभाले स्टॉलों पर खड़ा होगा- जी मेरी किताब खरीदिए, मेरी किताब खरीदिए। मेरी किताब पर इत्ता और मेरी किताब उत्ता 'डिस्काउंट' मिल रहा है। लोगों का आकर्षण किताब से कहीं ज्यादा उस पर मिलने वाले डिस्काउंट पर केंद्रित रहेगा।

कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जिनका किताब-लेखक-डिस्काउंट से कहीं ज्यादा 'क्रेज' वरिष्ठ लेखकों संग 'सेल्फियां' लेने-देने में रहेगा। वरिष्ठों संग ली गईं सेल्फियां फेसबुक-टि्वटर पर चिपकाई जाएंगी। और बड़े ही 'ठसक' के साथ स्टेटस लिखा जाएगा- फलां वरिष्ठ लेखक के साथ सेल्फी लेते हुए। या सेल्फी की मुद्रा में गंभीर विचार-विमर्श करते हुए।

देखते-देखते सेल्फी अब 'क्रेज' से ज्यादा 'स्टेटस-सिंबल' बन गई है। यह तो पुस्तक मेला की बात रही, लोग तो किताब लिखते-पढ़ते हुए भी सेल्फी लेकर फेसबुक पर चढ़ा देते हैं। जिंदगी में अब कुछ भी 'पर्सनल' न रहा पियारे, सब 'सेल्फियाना' लो लिया है। इसीलिए तो पुस्तक मेला में लेखकों-किताबों से कहीं ज्यादा सेल्फियों के आदान-प्रदान की 'धूम' रहेगी।

सेल्फी के बहाने वरिष्ठों को भी यह कहने का मौका मिल जाएगा कि देखो, अभी दुनिया में हम मौजूद हैं। इत्ते नए लेखकों के बीच 'हाशिए' पर जरूर चले गए हैं पर 'रूतबा' अभी बरकरार है। वैसे सेल्फी ने क्या वरिष्ठ, क्या नए सबको 'सियाना' कर दिया है, अपनी-अपनी सेल्फियों के प्रति।

पुस्तक मेला में सेल्फियां तो ठीक हैं पर 'खीझ' सबसे ज्यादा तक पैदा होती है जब बंदा अपनी ली सेल्फियों को अलां-फलां के साथ 'टैग' करता है। जित्ता दुख सेल्फी नहीं देती, उत्ता टैगिंग देती है। अमां, हमें मालूम है कि आप फलां-फलां वरिष्ठ के साथ हैं, उनके करीबी हैं, उन्हें जानते-पहचानते हैं, उनके साथ सेल्फी भी लिए हैं पर उसे हमारे साथ तो टैग न कीजिए। टैगिंग खामखां का रायता फैलाती है।

प्रयास तो यही है कि इस दफा खुद भी पुस्तक मेला घुम आया जाए। कुछ नए, कुछ वरिष्ठ लेखकों से मिलकर हम भी 'सेल्फियाने' का 'लुत्फ' उठा सकें। ली सेल्फियां अपनी फेसबुक दीवाल पर टांग सकें। ताकि इधर-उधर हमारा रूतबा भी बढ़े। साथ-साथ, दूसरों को पुस्तक मेला में सेल्फियां लेते करीब से देख भी सकें। बताते हैं, जित्ता आनंद सेल्फी लेने में आता है, उससे कहीं ज्यादा आनंद देखने में आता है।

वो समय दूर नहीं, जब पुस्तक मेला की पहचान 'किताबों' से कम, 'सेल्फियों' से अधिक होने लगेगी। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

जुमले की गोली

पियारे बताओ, हम भी कित्ता 'नादान' थे, लगभग यकीन ही करे बैठे थे। यकीन के चक्कर में हर रोज न जाने कित्ती दफा मोबाइल का 'मैसेज-बॉक्स' खोलकर और एटीएम से 'मिनी-स्टेटमेंट' निकाल के चेक कर लिया करते थे कि कहीं काला धन के बदले आने वाले 15 लाख खाते में आ तो नहीं गए! परंतु उस वक्त काटो तो खून नहीं वाली स्थिति हो जाया करती थी, जब खाते में इस तरह का इत्ता 'हैवी एमाउंट' न होता था। पापा कसम खुद के नसीब पर इत्ता गुस्सा न आता था, जित्ती कि साहेब के किए वायदे पर। लेकिन हम कर भी क्या सकते थे, आखिर जनता हैं, जनता का काम ही नेताजी के वायदों पर उम्मीद का पानी चढ़ाए रहना है।

इत्ता ही नहीं, एक और 'तगड़ा' वाला झटका तब लगा जब अमित शाहजी को यह कहते सुना कि काले धन के बदले 15 लाख खाते में आने वाली बात तो साहेब का 'चुनावी जुमला' था। चुनावी जुमला...। उफ्फ...। यह क्या कह रहे हैं मान्यवर। इत्ता तगड़ा झटका देने से पहले यह भी न सोचा कि हम जैसे लाखों मतदाताओं के दिलों पर क्या गुजरेगी? कैसे-कैसे और कित्ते-कित्ते टाइप के 'हैवी-हैवी सपने' संजोए हुए थे उन्होंने उस कथित धन को लेकर, मतलब सब के सब 'स्वाह' हुए। मान्यवर, आप नहीं जानते आपके जुमले ने हमें कित्ती 'मोटी गोली' दी है। यह गोली न निगलते बन रही है, न उगलते। आपने तो हमें बीच मझदार में खड़ा कर अकेला व असहाय छोड़ दिया।

मान्यवर, क्या आपको मालूम नहीं कि हम 'मुफत के धन' के प्रति (चाहे काला हो या हरा) कित्ते 'बेचैन' रहते हैं। सरकार का तो छोड़िए अपने मां-पापा तक से पैसा लिए बिना नहीं छोड़ते। मेरे एक बेहद करीबी रिश्तेदार हैं, उनकी निगाह तो हर वक्त अपनी माताजी के बचे-खुचे धन को खा-चबा लेने में ही लगी रहती है। देखिए न, इस वक्त हर किसी की जुबान पर सिलेंडर की सब्सिडी के ही चर्चे हैं। चाहे कोई कित्ता अमीर या कित्ता गरीब क्यों न हो पर सब्सिडी की रकम छोड़ना नहीं चाहता। और एक आप हैं, जिन्होंने इत्ता आसानी से मिलने वाले कथित धन को 'राजनीतिक जुमला' करार दे दिया। आश्चर्य। घोर आश्चर्य।

इसका मतलब अब काला धन भी वापस न आएगा! उसको वापस लाने का वायदा भी कहीं राजनीति जुमला तो नहीं था, मान्यवर। स्थिति स्पष्ट करें।
अब हमें धीरे-धीरे यकीन हो चला है कि साहेब का 'अच्छे दिन' का वायदा भी 'चुनावी जुमला' ही था। इसी जुमले की गोली पीकर जनता बहक गई और कमल का फूल खिला बैठी। सरकार के नौ महीने भी पूरे हो लिए मगर 'विकास' है कि होने में ही नहीं आ पा रहा। कुछ तो 'लोचा' है पियारे।

सभी पार्टियां अपने-अपने तरीके से जनता को 'जुमले की गोलियां' पिला रही हैं। वोट डलने और सरकार बन जाने के बाद वायदे जुमले में और जुमले गोली में 'तब्दील' हो जाते हैं। मन करे तो सटक लो, नहीं तो जीभ पर धरे-धरे चूसते रहो। शायद इसी को 'चुनावी जुमलों' की राजनीति कहा जाता है पियारे।

पापा कसम आपके जुमले को सुनकर हमें धक्का तो तगड़ा वाला लगा है। पर क्या करें, इसे भी सहेंगे क्योंकि हम जनता हैं। हमारा दिल बहुत 'मजबूत' है। इत्ती आसानी से बैठता नहीं। सुन रहे हैं न, मान्यवर। हम्म, 'जुमला' था...!

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

इस जीत का यारों क्या कहना

एक बार को लगा था कि मैच हमारे हाथों से 'फिसल' लिया है। लेकिन फिसलते मैच को दाएं-बाएं से 'फांसते' हुए टीम इंडिया ने पाकिस्तान को आखिरकार 'मात' दे ही दी। टीम इंडिया की पाकिस्तान पर विजय किसी 'जश्न' से कम नहीं होती। हर तरफ पटाखों की गूंज और बधाईयों का रेला। फेसबुक-टि्वटर पर हर सेकेंड अपडेट होते स्टेटस जश्न की रंगत को दोगुना किए दे रहे थे। कोई मजाक बात थोड़े थी, आखिर भारत ने पाकिस्तान से मैच जीता था। पाकिस्तान से मैच जीतने का मतलब है, बिछी बिसात पर सीधी मात देना।

नहीं जानता कि पाकिस्तान टीम पर जीत का दवाब कित्ता था पर टीम इंडिया पर जीत का उत्ता ही दवाब था जित्ता दिल्ली चुनाव में बीजेपी पर। मगर अफसोस दिल्ली चुनाव में बीजेपी को 'करारी शिक्सत' मिली और 'आप' को 'चमत्कारिक' जीत। बीजेपी वाले 'मायूस' दिखे और आप वाले 'खुश'। होता है.. होता है.., जब दो दल या टीमें आपस में भिड़ती हैं तो एक की जीत और एक ही हार निश्चित है। इसीलिए तो क्रिकेट के साथ-साथ चुनावों को भी 'बाइ-चांस' कहा जाता है। थोड़ा 'नसीब' भी 'कमाल' दिखाला ही जाता है।

वो तो अच्छा हुआ कि अपने दम-खम पर टीम इंडिया पाकिस्तान से मैच जीत गई। खुदा-न-खास्ता कहीं अगर हार जाती तो क्रिकेट-प्रेमियों से कहीं ज्यादा 'पेट-दर्द' चैनलों और क्रिकेट के कथित सूरमाओं को होता। फिर चलता लंबी-लंबी बहसों, नसीहतों और खींचाईयों का दौर। हालांकि जीत के बाद भी कुछ कथित सूरमाओं को 'ऐसे या वैसे खेलने' की सलाह देते चैनलों पर देखा-पाया गया था। लेकिन जीत के जश्न में सारी सलाहें बेमानी-सी लगती हैं। जीत वो खुशनुमा हकीकत है, जो हर कमजोरी पर कंबल डाल देती है। फिर भी, कहने वालों का हम न मुंह बंद कर सकते हैं न सलाहें देना।

आलम यह है कि क्रिकेट हमारे देश में 'दीवानगी' की सारी हदों को पार कर चुका है। न केवल टीम बल्कि एक-एक खिलाड़ी से इत्ती-इत्ती 'उम्मीदें' पाली जाती हैं कि अक्सर खिलाड़ी भी 'कन्फ्यूजिया' जाता है कि कौन सी उम्मीद को पूरा करे और कौन सी को छोड़े! क्या बच्चा, क्या बूढ़ा हर किसी का तन-मन केवल क्रिकेट में ही बसता है। क्रिकेट के रंग के आगे उसे हर रंग बे-रंग लगता है। क्रिकेट के प्रति यही दीवानगी अक्सर खिलाड़ियों को भी पिच पर कहीं न कहीं मात दे ही जाती है। कहना न होगा, इश्क के बाद क्रिकेट को ही अब यहां दीवानगी का प्रतीक कहा-माना जाने लगा है।

क्रिकेट के प्रति इस दीवानगी को देखकर अक्सर मेरा भी मन करता है कि लेखन-वेखन छोड़कर क्यों न क्रिकेटर ही बन जाऊं! पैसा, शोहरत, ग्लैमर, विज्ञापन सब एक साथ मिलेंगे। लेखन में जित्ता मैं एक लेख लिखकर कमा पाता हूं, उसे दस गुना एक शॉट पर ही कमा लूंगा। कहीं अगर बल्ला चल निकला तो फिर वारे नियारे ही समझो पियारे। इस-उस हीरोइन के साथ 'सेल्फियां' लेने का 'सुख' मिलेगा अलग से। क्रिकेट में इत्ता पैसा है कि मेरी आगे आने वाली सात-आठ पुश्तें आराम से बैठके खाएंगी। देखा नहीं था, पिछला वर्ल्ड कप जीतने की खुशी में खिलाड़ियों पर कैसा दिल खौलकर पैसा लुटाया गया था। सब के सब खिलाड़ी करोड़पति हो लिए थे तब। खिलाड़ी चलना चाहिए बस फिर तो विज्ञापन ही विज्ञापन और नाम ही नाम।

अभी मौका टीम इंडिया की पाकिस्तान पर धांसू जीत को एंजॉय करने का है। इस धांसू जीत पर खुलकर जश्न मनाइए लेकिन इत्ता भी न उड़िए कि एक ही जीत को वर्ल्ड कप की जीत मान लें। वर्ल्ड कप तलक पहुंचने का रास्ता अभी बहुत लंबा है। एक ही जीत की खुमारी में अगर डूबे रहेंगे फिर तो बहुत मुश्किल हो लेगी पियारे।

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

झाड़ू पछाड़

पियारे, एक होता है 'धोबी पछाड़' और एक होता है 'झाड़ू पछाड़'। केजरीवाल के 'झाड़ू पछाड़' ने कांग्रेस और बीजेपी को ऐसा पछाड़ा कि सूपड़ा ही साफ कर दिया। एक 'तीन' पर आनकर टिक ली और दूसरी 'जीरो' पर। अब दोनों की ही स्थिति काटो तो खून नहीं वाली है। क्या सोचा था और क्या हो लिया।

इसीलिए तो कहते हैं पियारे, कि न राजनीति न समाज में कभी किसी को 'कम' या 'कमजोर' नहीं सझना चाहिए। कौन, किस वक्त, कैसी वाट लगा दे, पता नहीं चलता। राजनीति में अनुमान के विपरित जब पासा उलटता है तो बहुत गहरे जख्म दे जाता है। फिर करते रहिए उन जख्मों पर मरहम-पट्टी, जो होना था वो तो हो ही गया।

केजरीवाल की झाड़ू ने झाड़ा कम बुहारा ज्यादा। एक ही बार में ऐसी बुहार लगाई कि हारे हुए दल ताउम्र याद रखेंगे। कचरा जब दयारे से बाहर जाने लगे फिर उसकी बुहार लगाना बनता है। ताकि कचरे को भी यह पता रहे कि उसकी असली जगह 'डस्टबिन' ही है। चलिए, इस बहाने राजनीति और समाज के बीच झाड़ू की डिमांड कुछ और बढ़ जाएगी।

सबसे ज्यादा हैरानी तो इस बात पर है कि बड़ी-बड़ी राजनीति करने वाले राजनैतिक सूरमा तलक फेल हो गए, एक अकेली झाड़ू से निपटने में। जिस झाड़ू की सींकों को वे इत्ता हलके में ले रहे थे, उन्हीं ने उनकी 'अकड़' और 'सियानेपन' पर कंपलीट बुहार लगा दी। अब अपनी बचाने के तईं, सफाईयां चाहे कित्ती ही देते रहिए मियां मगर हर गए तो हार गए। हार हुआ बंदा, चाहे राजा हो या रंक, कहलाता 'लूजर' ही है।

दरअसल, राजनीति है ही ऐसी चीज जो अच्छों-अच्छों का दिमाग खराब कर देती है। राजनीति में आते ही नेता खुद को भगवान और जनता को तुच्छ समझ बैठता है। किंतु नहीं जानता, जो जनता नेता के सिर पर एक तरफा जीत का सेहरा बांध सकती है, वही जनता एक तरफा हार की झाड़ू भी फिरा सकती है। यहां भी वही हुआ। जो इस बात का मुगालता पाले बैठे थे कि जनता इस दफा भी उनके झांसे में फंस जाएगी पर क्या मालूम था कि जनता उन्हें ही अपने मतों में फंसाकर पटखनी दे देगी।

बहरहाल, इस झाड़ू पछाड़ से कौन सा दल कित्ता सबक लेता है ये वो जाने। पर इत्ता तय है कि अब से कोई भी झाड़ू की ताकत को कमतर करके आंकने की गलती न करेगा। जिस झाड़ू के दम पर केजरीवाल ने जनता का दिल जीता है, उम्मीद करते हैं, इसे वो यों ही बनाए रखेंगे। नहीं तो यह जनता बहुत सियानी है, झाड़ू को भी पछाड़ लगाने में पीछे न हटेगी। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

वेलेंटाइन और झाड़ू

पत्नी को 'झाड़ू' से विशेष लगाव है। यह लगाव दिल्ली में 'आप' की धमाकेदार जीत के बाद और अधिक बढ़ गया है। हालत यह है कि हमारे घर में पत्नी की 'साड़ियों' से अधिक 'झाड़ूएं' हैं। हर झाड़ू की अपनी खासियत है। पत्नी एक झाड़ू तो हमेशा अपने साथ ही रखा करती है। यही वजह है कि मैं पत्नी से किसी भी मुद्दे या बात पर न उलझता हूं न झगड़ता। क्योंकि अपना 'अंजाम' मुझे मालूम है। 'झाड़ू पछाड़' देने में उसे जरा भी देरी नहीं लगती।

इस वेलेंटाइन पत्नी ने 'इच्छा' जतलाई है कि मैं उसे 'फूल' की जगह 'झाड़ू' ही दूं। हालांकि पत्नी कने तमाम किस्म की झाड़ूएं पहले से ही हैं लेकिन फिर भी उसे झाड़ू ही चाहिए। चूंकि यह पत्नी की 'इच्छा' है तो इसे पूरा करना मेरा 'धर्म' ही नहीं 'मजबूरी' भी है। पत्नी की इच्छा को पूरा न करने का मतलब है, घर में 'हुक्का-पानी' बंद।

फिर भी 'अतिरिक्त हिम्मत' जुटाके पत्नी से मैंने पूछ ही लिया कि उसे वेलेंटाइन डे पर 'फूल' क्यों नहीं और 'झाड़ू' ही क्यों चाहिए? पत्नी का जवाब था- 'फूल के देने के जमाने अब लद लिए है, पति महोदय। जो काम फूल नहीं कर सकता वो झाड़ू कर सकती है। फूल तो थोड़ी देर बाद 'मुरझा' लेगा लेकिन झाड़ू 'बिंदास' चलेगी। भले ही झाड़ू में फूल की तरह 'खुशबू' न हो पर उसके 'एहसास का असर' ही बंदे को 'कंट्रोल' में रखता है। एक मैं ही नहीं बल्कि हर पत्नी को पति से और प्रेमिका को प्रेमी से फूल नहीं झाड़ू ही मंगनी चाहिए। ताकि 'डर' बना रहे।'

'लेकिन डर्लिंग वेलेंटाइन डे पर फूल की जगह झाड़ू कुछ 'अजीब'-सा नहीं लगेगा।', मैंने पूछा। पत्नी ने तड़ाक से जवाब दिया, 'अजीब.. अजीब-सा क्या लगना है? फूल से अगर तुम्हें इत्ता ही मोह है तो 'फूल-झाड़ू' दे दो। तुम्हारा भी मन रह लेगा और मेरी इच्छा भी पूरी हो लेगी। आज हर तरफ झाड़ू का ही जलवा है। देखा नहीं, दिल्ली में झाड़ू ने कैसी मस्त 'झाड़ू पछाड़' लगाई कि सब के सब निपट लिए। कोई 'जीरो' पर टिक लिया तो कोई 'तीन' पर ही सिमट लिया। एक ही एक्शन में कंपलीट बुहार डाला सबको। आज झाड़ू ही आम आदमी की ताकत और पहचान है। इसीलिए मुझे भी इस वेलेंटाइन झाड़ू ही चाहिए।'

तर्कबाजी में पत्नी से मैं तो क्या बुद्धिजीवि भी नहीं जीत सकते। वैसे पत्नी के कहे का असर यहां-वहां थोड़ा दिखने लगा है। एक दिल्ली शहर में ही नहीं मेरे शहर (बरेली) में भी आम आदमी का झुकाव झाड़ू की तरफ बढ़ लिया है। जिसे देखो उसकी जुबान पर बस 'झाड़ू' और 'मफलरमैन' के ही चर्चे हैं। हर कोई झाड़ू हाथ में लेके हर तरह की गंदगी को बुहार देना चाहता है। पारंपरिक राजनीति और व्यवस्था को झाड़ू के दम पर 'आईना' दिखाना चाहता है। मेरे शहर की लड़कियां भी अब अपने साथ झाड़ू रखना पसंद करने लगी हैं ताकि सड़कछाप शोहदों को सबक सिखाया जा सके।

अब मेरे जैसे पतियों की चिंताएं बढ़ने लगी हैं। कहीं ऐसा न हो कि मेरी पत्नी की देखा-दाखी अब हर पत्नी अपने पति से झाड़ू-गिफ्ट की डिमांड करने लगे। पत्नी को झाड़ू गिफ्ट में देने का मतलब पति लोग समझ ही सकते हैं। पत्नी ने अगर इच्छा जतलाइ है तो उसे पति को पूरा करना ही है, अब चाहे वो 'झाड़ू' मांग ले या 'पहाड़'।

वेलेंटाइन डे के दिन लड़कियों के हाथों में झाड़ू होने का असर इत्ता तो बना रहेगा ही कि विरोधी किस्म के लठैत उनके कने न फटक सकेंगे। इस दिन सबसे ज्यादा झाड़ लड़कियों को ही सहनी पड़ती है। चलिए, झाड़ू के बहाने ही सही आम आदमी की तरह लड़कियां भी मजबूत हों, यह अच्छा ही है।

अब मुझे तो पत्नी संग रहना है इस नाते वेलेंटाइन डे पर उसको झाड़ू देने की इच्छा पूरी करूंगा ही करूंगा। आखिर अपनी चारपाई घर के बाहर थोड़े न डलवानी है पियारे।

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

लुढ़काऊ प्रवृति

मैं 'लोटा प्रजाति' का एक 'लुढ़काऊ लेखक' हूं। लोटा प्रजाति का लेखक होने के नाते, मैं एक विचारधारा या एक गुट के साथ कभी 'स्टेबिल' होकर नहीं रहा। जहां स्पेस देखा, वहां लुढ़क लिया। लुढ़कने में मुझे 'शांति' और 'संतुष्टि' दोनों मिलती है।

पहले लोग मुझ पर मेरी 'लुढ़काऊ प्रवृति' को देखकर तरह-तरह के इल्जाम लगाया करते थे मगर अब 'चुप' रहते हैं। क्योंकि उन्हें अब यकीन हो चला है कि मेरी प्रवृति ही 'लुढ़कना' है। इस नाते मैं कहीं भी, कैसे भी, किसी के साथ भी लुढ़क सकता हूं।

लुढ़काऊ प्रवृति का होने के नाते मैंने विचारधारा का झंझट कभी नहीं पाला। अव्वल तो लोग पूछते नहीं। फिर भी, जिन्हें नहीं मालूम, वे मुझसे मेरी विचारधारा के बाबत जब पूछते हैं, तो मैं उन्हें अपनी विचारधारा 'लोटा विचारधारा' ही बतलाता हूं। तमाम बड़ी-बड़ी विचारधारों से कहीं बेहतर और सहज मुझे मेरी लोटा विचारधारा लगती है। कम से कम इसमें इफ एंड बट का रगड़ा-झगड़ा तो नहीं है पियारे।

मेरा मानना है कि लुढ़कना इंसानी प्रवृति का शाश्वत नियम है। (इसे बदला जा भी नहीं सकता।) लोग अपनी सहजता एवं सुविधा के हिसाब से जहां स्पेस मिलता है, लुढ़क लेते हैं। कुछ तो केवल लुढ़क-लुढ़क कर ही ऊंचे-ऊंचे मकान और इनाम हासिल कर गए हैं। तो कुछ सिर्फ इसलिए लुढ़के क्योंकि लुढ़का उनकी नीयत में शामिल है- एकदम मेरे जैसे। वैसे, निज हित की खातिर यहां-वहां लुढ़कने में कोई बुराई भी नहीं। यों भी, अब बुराईयों पर ध्यान देता ही कौन है। बुराईयां अब 'सद्चरित्र' का 'महत्त्वपूर्ण आईना' हो गई हैं।

इसमें रत्तीभर डाउट नहीं कि सबसे अधिक लोग राजनीति (पॉलिटिक्स) में लुढ़कते हैं। मसलन, टिकट पाने के लिए लुढ़कना। वोट लेने के लिए लुढ़कना। कुर्सी बचाने के लिए लुढ़कना। हाईकमान की चाकरी के लिए लुढ़कना। जनता से किए वायदे करके लुढ़कना। एक पार्टी छोड़ दूसरी पार्टी में लुढ़कना। राजनीति में इत्ती तादाद में लुढ़कते लोगों को देखकर कभी-कभी तो लगता है, थोड़े दिनों में कहीं लुढ़कने-लुढ़काने की कोचिंग क्लास न खुल जाए यहां।

न.. न.. उनके या इनके लुढ़कने पर आप 'आंसू' न बहाइए। निज-हित की राजनीति में यही होता आया है और आगे भी यही होता रहेगा। इसलिए नेताओं के लुढ़कने-लुढ़काने पर खाक डालिए। उनके लुढ़कने को सिर्फ 'एंजॉय' कीजिए, मेरी तरह। यह अब स्वीकार कर लिया गया है कि लुढ़कते रहने में ही सहूलियतें ज्यादा हैं और झंझट न के बराबर।

फिलहाल, मैं अपने जीवन और लेखन में यों ही लुढ़कता रहूंगा। जिन्हें मेरा लुढ़कना न 'पचता' हो वे मुझसे 'किनारा' कर सकते हैं। मैं 'बुरा' नहीं मानूंगा। क्योंकि लुढ़कना मेरा 'धर्म' है। और, मैं इसे बिंदास निभा रहा हूं।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

राजनीति में मांझी होना

जिनको रखनी हो वे रखें किंतु मुझे जीतन राम मांझी से रत्तीभर शिकायत नहीं हैं! शिकायत होगी भी क्यों? उन्होंने कुछ गलत थोड़े ही किया है। मौका देखकर चौका मारना राजनीति का बरसों पुराना नियम-कायदा रहा है। जिस नेता को अपनी कुर्सी बचाने के हित जहां नजर आते हैं, वो वहीं भागता है। राजनीति में सारी 'माया' और 'दुनियादारी' 'कुर्सी' पर ही टिकी है। कुर्सी पास है तो हर कहीं दबदबा है। कुर्सी नहीं तो कुछ भी नहीं। सत्ता, राजनीति और समाज में केवल कुर्सी का ही बोलबाला काम करता है, बाकी सब तो हवा-हवाई बातें हैं।

कहने वाले कह रहे हैं कि मांझी ने जदयू की नैया डुबो दी। विश्वासघात किया। जिसने सत्ता की चाबी सौंपी, उसे ही कमरे में बंद कर दिया। देखो पियारे, यह राजनीति है राजनीति। यहां नेता (अपवाद को त्याग दें) केवल एक ही ख्वाहिश लेकर आता है कि वो अपनी नाव को बचाते हुए, दूसरे की नाव किस तिकड़म से डुबो सकता है। इतिहास गवाह है कि निज-हित की राजनीति ने न जाने कित्ते ही नेताओं-मंत्रीयों को नाव में बैठे-बैठे ही डुबो दिया गया है। राजनीति में कोई किसी का 'सगा' नहीं होता। हां, 'प्रतिद्वंद्वी' हर कोई हर किसी का होता है। ऐसा केवल भारतीय राजनीति में ही नहीं, लगभग हर मुल्क की राजनीति में होता आया है। राजनीति के खेल से 'पार' पाना मुश्किल काम होता है।

मांझी के 'बगावती तेवर' देखते ही बनते हैं। अपनी बगावत के दम पर मांझी ने हर किसी को 'किनारे' कर दिया है। साथ ही, यह भी जतला दिया कि मांझी 'रबर-स्पेंट' नहीं हैं। असल मायने में 'कड़े तेवर' वाले नेता हैं। इसीलिए तो न इस्तीफा दिया न किसी तोप के आगे झुके। न जी न यह मांझी का 'राजनीतिक अवसरवाद' नहीं। बल्कि 'राजनीतिक निज-हितवाद' है। 21वीं सदी की राजनीति इसी पर टिकी है। देखिए न, बीजेपी में एक-एक कर सारे 'वरिष्ठ' किनारे हो लिए, अब सत्ता की चाबी नए लोगों के पास है। नए लोग ही अब देश के साथ-साथ पार्टी को भी चला रहे हैं।

राजनीति में बगावतें यों ही नहीं होती रहतीं। हमारे देश की राजनीति में आग्रह-पूर्वाग्रह बहुत हैं। कोई किसी को आगे बढ़ने नहीं देना चाहता। जोर लगाकर अगर कोई आगे बढ़ता भी है, तो उसकी टांग विरोधियों द्वारा कम अपनों द्वारा ही अधिक खींची जाती है। जनता के बीच काम करने का समय ही नहीं देते, फिर कहते हैं, इत्ते साल सत्ता में रहे और जनता के लिए कुछ न किया। अमां, करते तो तब जब कोई करने देता। हर बात में तो 'कंडिशन एप्लाइ' का 'डंडा' चिपका रहता है।

अमां, जब मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था, तो उन्हें कुछ काम भी करने देते। काम करने से पहले ही उनकी 'छिछालेदर' और 'टांग' खींचना शुरू हो गई। अब ऐसे में बंदा बगावत न करेगा तो और क्या करेगा? फिर कहते हैं कि मांझी ने नाव डुबो डाली! जब नाव ने खुद ही तय कर लिया कि उसे डुबना ही डुबना है, फिर मांझी भी भला क्या कर लेते?

सच तो यह है कि मांझी पर खेला गया 'राजनीतिक कार्ड' पार्टी के नेताओं को ही उल्टा पड़ गया। राजनीति-सत्ता के मैदान में कब, कौन-सा 'ऊंट' किस करवट बैठ ले, कोई नहीं जानता। यही तो असली मजा है, हमारे देश की राजनीति का। मनोरंजन का मनोरंजन। रायते का रायते।

इन दिनों हर किसी की निगाहें, बिहार और दिल्ली पर ही टिकी हुई हैं। दोनों ही जगह 'राजनीतिक नौटंकियों' का बाजार खासा गर्म है। कौन किसको कित्ती और कहां तलक 'मात' दे पाता है, सारा जोर और विरोध इसी पर आनकर टिक लिया है। कमाल यह है कि जनता के मुद्दों से मतलब न उन्हें है न इन्हें। सब मशगूल हैं, अपनी-अपनी राजनीति की गोटियां फिट करने में। जिसकी गोटी अच्छे से फिट हो ली, उसके मजे हैं; बाकी जनता नौटंकी का लुत्फ ले रही है।

फिलहाल, मांझीजी अपनी बगावत के दम पर यों ही लगे रहें। अपनी हनक बरकरार रखें। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

नसीब अपना-अपना

लो पियारे, दिल्ली के 'चुनावी दंगल' का सारा मामला अब 'नसीब-बदनसीब' पर आनकर टिक लिया है। यानी, जिनका नसीब तेज है वे सरकार बना ले जाएंगे। और जिनके नसीब से बदनसीबी जुड़ी है, वे मफलर बांधकर टापते रहेंगे। तो क्या मान लें कि चुनाव जनता के वोटों के दम पर नहीं नसीब-बदनसीब के दम पर लड़े व जीते जाते हैं!

साहेब ने भी नसीब को टारगेट करते हुए क्या खूब छोड़ी है, सत्ता की बागडोर नसीबवालों के हाथों में दीजिए, बदनसीबों के नहीं। बात सही भी है। जो काम नसीब वाले केवल नसीब के दम पर कर लेते हैं, बदनसीब कहां कर पाते हैं? शायद यह नसीब का ही कमाल रहा कि साहेब का चाय की दुकान से शुरु हुआ सफर, प्रधानमंत्री की कुर्सी तलक जारी है। नसीब-नसीब के खेल में साहेब की पार्टी देश में बड़ा बहुमत पा गई और केंद्र में सरकार बना ले गई। बिचारे बदनसीब लोग दिल्ली में बैठे 'तमाशा' देखते रहे। और रह-रहकर अपनी किस्मत ('नसीब') को कोसते रहे।

दिल्ली के चुनावी दंगल में जो हालात हैं, उसे देखकर साफ लग रहा है कि यहां असली लड़ाई नसीब-बदनसीब के बीच ही है। जनता और उससे जुड़े मुद्दों से किसी को कुछ लेना-देना नहीं। बहुत हुआ तो बिजली-पानी सस्ता करवा देंगे बस। बाकी का दंगल कभी 'विज्ञापनबाजी' पर आनकर टिक लेता है तो कभी 'व्यक्तिगत छिछालेदर' पर। दोनों दल मजे से चुनाव को 'इंटरटेन' कर-करवा रहे हैं।

रही बात जनता के नसीब की। तो पियारे उसमें कुछ नहीं बदलेगा। जनता का नसीब जैसा कल था, आज भी वैसा ही रहेगा। नेता हाथ-पैर जोड़कर वोट मांगेगा। वायदा करेगा। जनता वोट देगी। नतीजे आ जाने के बाद तुम इस रास्ते, हम उस रास्ते। हम जीते हमारा नसीब तेज था, तुम हारे तुम बदनसीब थे। नसीब-बदनसीब के बीच जनता खुद से किए वायदों को 'तलाशती' रहेगी मगर हाथ कुछ न आएगा। इसे ही तो कहते हैं, 'डर्टी पॉलिटिक्स'। ('डर्टी पॉलिटिक्स' को अब 'इज्जत' की निगाह से देखा जाने लगा है।)

सोच रहा हूं, मैं भी 'नसीब' पर यकीन करना शुरु कर ही दूं। क्या पता, साहेब की तरह मेरी किस्मत भी चमक जाए। लेखक से नेता बन जाऊं। जैसा नसीब साहेब का रहा 'दस लाख' का सूट (नाम जड़ित) पहनने का वैसा शायद मैं भी पहन पाऊं। मफलर या टोपी पहनने में वो गेटअप नहीं आ पाता। इसमें आम आदमी जैसा फील होता है। क्या कीजिएगा, सबका अपना-अपना नसीब है पियारे। कुछ अपने नसीब की खाते है, तो कुछ बदनसीब एक वक्त का खाना भी नहीं खा पाते।

नसीब-बदनसीब की इस जंग में दिल्ली की जनता का नसीब कित्ता जागेगा, बस कुछ दिनों बाद पता चल जाएगा। तब तलक अपने-अपने नसीब को यों ही टटोलते रहें।

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

चुनाव है या मनोरंजन

एक मैं ही नहीं, देश का हर बंदा 'कनफ्यूजिया' गया है कि दिल्ली में चुनाव हो रहे हैं या 'मनोरंजनात्मक करतबबाजियां'। तीनों पार्टियों के पास जनता के मुद्दे कम किस्म-किस्म के 'मनोरंजनात्मक आइटम' अधिक हैं। इनमें, सबसे अधिक मनोरंजन करवा रहे हैं 'आप' और 'बीजेपी'। मनोरंजन के लिए हर रोज कोई न कोई नया मामला सामने आ ही जाता है और पार्टियां लग जाती हैं, एक-दूसरे की 'टांग' खींचने में। जो जिसकी टांग अधिक खींच लेता है, उसी के चर्चे खबरिया चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक खूब होते हैं। एक प्रकार से उसे दिल्ली चुनाव का असली 'हीरो' बनाकर पेश किया जाता है।

बहस और विवाद के मुद्दे भी ऐसे-ऐसे कि 'शर्म' तो जाने दीजिए, 'हंसी' आए बिना नहीं रहती। 'आप' और 'बीजेपी' के बीच इस बात की 'जंग' सबसे अधिक है कि मेरी कमीज उसकी कमीज से सफेद कैसे? दोनों पार्टियां लगी रहती हैं, अपनी-अपनी कमीजों को रगड़-रगड़कर 'उजला' बनाने में। जबकि जनता अच्छे से जानती है कि किस पार्टी या नेता की कमीज कित्ती सफेद है। लोकतंत्र में जनता से कुछ न छिपा रहता पियारे।

फिलहाल, आजकल बहस-कम-मनोरंजन का मुद्दा 'विज्ञापन' और 'चंदा' है। बीजेपी ने 'आप' पर विज्ञापन छापा तो 'आप' वाले तिलमिला उठे। विज्ञापन में अण्णा को जीते-जी श्रद्धांजलि दे दी गई। और केजरीवाल के 'गोत्र' पर सवाल उठा दिया गया। हालांकि इस विज्ञापन का जनता या जन-मुद्दों से कोई लेना देना, लेकिन, अब लगता है कि राजनीति और चुनाव में सबकुछ जायज हो चला है। तुम मुझ पर व्यक्तिगत कीचड़ उछालो, मैं तुम पर उछालूं। कीचड़ उछलाई की इस नौटंकी में जनता के मुद्दे कहीं नहीं ठहरते।

विज्ञापन का विवाद थमा न था कि बीच में 'आप' के 'चंदे' के मुद्दे ने एंट्री मार ली। बीजेपी ने चंदा-मुद्दे को लपक लिया और शुरू हो गई दोनों के बीच भयंकर वाली जुबानी जंग। 'आवाम' नाम के संगठन ने बीच में आकर दिल्ली चुनाव में रायता और फैला दिया। अब 'आप' वाले लगे हैं, चंदे पर फैले रायते को सिमेटने-सिमटाने में। लेकिन पियारे चंदे का रायता ऐसा न है कि जुबानी जंग या जस्टीफिकेशन से ही सिमट जाए। यह बात हर कोई जानता है कि बिना चंदे के चुनाव भला कहीं संपन्न हुए हैं। कोई पार्टी कम चंदा लेती है, तो कोई ज्यादा। सौ टके की बात- चंदे के दम पर ही बड़े-बड़े चुनाव लड़े-लड़वाए जाते हैं। पार्टियां करती रहें, चंदे पर अपनी स्थिति स्पष्ट लेकिन यह जो पब्लिक है, यह सब जानती है।

सुने-पढ़ने में आया है कि बुद्धिजीवि वर्ग खासा खफा है 'चुनाव दंगल' पर। कह रहा है- ऐसा चुनावी इतिहास में कभी न हुआ, जैसा दिल्ली के चुनावों में अब हो रहा है। नादान हैं बुद्धिजीवि लोग। जैसा कभी न हुआ, वो कभी न कभी तो होना ही था, सो अब हो लिया। समय-समाज-तकनीक-राजनीति-नेता सब बदले हैं तो क्या चुनावों का टेस्ट न बदलेगा? यह 21वीं सदी के उत्तर-आधुनिक चुनाव हैं। यहां अब सबकुछ मान्य और जायज है। आज के चुनावों में 'चुनावपंती' कम 'मनोरंजनपंती' ज्यादा हावी रहती है। इसीलिए तो हमारे देश का चुनावी सीजन हिट रहता है पियारे। जो हिट है वो ही फिट है।

दिल्ली में छिड़े चुनावी दंगल पर ज्यादा टेंशन लेने का नहीं। 'कूलली' चुनावों को देखने और एंजॉय करने का। मुफत में घर बैठे नेता लोग और पार्टियां चुनावी-मनोरंजन कर-करवा रही हैं, यह क्या कम है? अमेरिका की तरह थोड़े न कि दो पार्टियों के दल एक-दूसरे से कायदे से बहस कर निकल लेते हैं। चुनावों में जब तलक उमंग, तरंग और रंग न हों तो क्या मजा?

चुनावी चक्कलसें यों ही चलती रहें। मनोरंजन होता रहे। ऐसे में जन-मुद्दों पर कौन ध्यान देता है पियारे।