गुरुवार, 8 जनवरी 2015

गिरना सेंसेक्स का

एक जरा सेंसेक्स 800 पाइंट क्या 'खिसक' गया, दलाल पथ पर 'कोहराम'-सा मचा गया। लग लिए सब के सब सेंसेक्स को 'कोसने'। करने लगे चर्चाएं सब के सब कि सेंसेक्स तो अब गया। पप्पू पनबाड़ी से लेकर जमनालाल दलाल तक 'डर' के मारे दोहरे हो लिए। माथे पर हाथ रख यों मुंह टेड़ा-मेड़ा करने लगे, जाने कौन-सा 'जलजला' आ गया हो शेयर बाजार में।

वाकई कित्ता 'डरपोक' हैं न हम। जरा-जरा सी बातों-मसलों पर 'डर' जाते हैं। अरे, सेंसेक्स का इंडेक्स ही तो गिरा है, शेयर बाजार बंद थोड़े न हो गया। ऐसा सेंसेक्स के इतिहास में न जाने कित्ती दफा हुआ है। फिर, गिर-गिरकर संभला भी तो है सेंसेक्स। और क्या खूब संभला है। अगर संभला न होता तो अठ्ठाइस हजार के पार न पहुंचा होता। सेंसेक्स के भीतर गिरकर संभले की 'ताकत' हम इंसानों से कहीं ज्यादा है।

बुरा न मानइयो पियारे, हम सेंसेक्स को लेकर 'दोगली सोच' रखते हैं। सेंसेक्स जब चढ़ रहा होता है, तब हमारे हौसले इस कदर बुलंद होते हैं कि सीधा एवरेस्ट पर ही जा बैठते हैं। लेकिन जब सेंसेक्स गिरता है, तब इस कदर 'मद्दे' में आ जाते हैं, जैसे शेयर बाजार पर 'ताला' ही पड़ने वाला हो। सेंसेक्स को लेकर हमारे भीतर 'पेशैंस' नाम ही चीज है ही नहीं। गिरावट में हम सेंसेक्स का इत्ता 'बुरा' सोच लेते हैं, इत्ता तो कोई अपने 'दुश्मन' का भी न सोचता।

अभी कुछ दिन पहले जब सेंसेक्स 'अच्छे दिनों' की 'लहर' पर सवार था, तब हर किसी के 'चेहरे गुलाबी' और 'इरादे फौलादी' थे। न जाने कित्ते ही सेंसेक्स-भक्तों ने अपने घर में भगवानजी की मूर्ति के करीब सेंसेक्स की भी तस्वीर रख ली थी। आधी पूजा भगवानजी की और आधी सेंसेक्स महाराज की किया करते थे। मेरे मोहल्ले के एक परम सेंसेक्स-भक्त ने तो सेंसेक्स महाराज के 'सम्मान' में 'अखंड सेंसेक्स पाठ' तक करवा डाला था। मैं खुद उसमें शामिल हुआ था। पाठ के बाद सेंसेक्स महाराज के नाम का 'प्रसाद' भी वितरित हुआ था।

लेकिन, अब वही परम सेंसेक्स-भक्त मुंह लटकाए है। 800 पाइंट सेंसेक्स के लुढ़ने पर सेंसेक्स महाराज की पूजा तो छोड़िए, उसकी तरफ देखना तक बंद कर दिया है। इत्ते दिनों से सरपट-सरपट भागते सेंसेक्स ने एक जरा सा 'सुसताऊ ब्रेक' क्या ले लिया, भक्तों की तो 'भावनाएं आहत' हो गईं। अभी तलक भावनाएं 'पीके' देखकर आहत हो रही थीं, अब सेंसेक्स के गिरने पर भी होने लगीं। कमाल है पियारे। इंसानी भावनाओं का वाकई कोई भरोसा नहीं कब में 'बिदक' जाएं।

और सुनिए, शेयर बाजार के बड़े-बड़े पंडित फरमा रहे हैं कि सेंसेक्स का 'मूड' क्रूड ऑयल का तेल निकलने, एफआइआइ के भारी मात्रा में बाजार से पैसा निकालने और मंदी की आहट के कारण 'बिगड़ा' है। यह कोई 'नई बात' तो नहीं है पियारे। सेंसेक्स के लुढ़कने पर हर बार कोई न कोई ऐसा ही 'जुमला' छोड़ दिया जाता है। फिर सब 'शांत' हो जाते हैं। सौ बातों की एक बात- सेंसेक्स को गिरना था और वो गिर गया। बात खत्म। इत्ते महीनों से इत्ती ऊंची-ऊंची चढ़ाईयां चढ़ते-चढ़ते क्या सेंसेक्स 'थका' न होगा? आखिर उसको भी तो 'आराम' की जरूरत है। उसका भी तो घर-परिवार है। इसलिए एक-दो दिन उसने भी अपनी फुर्सत के निकाल लिए।

हां, सेंसेक्स के गिरने से 'मंदड़ियों' के चेहरे अवश्य 'खिल' गए। उन्हें तो 'जन्नत' हासिल हो गई। कहने का मौका मिल गया- सेंसेक्स के अब 'बुरे दिन' आ गए। लेकिन शेयर बाजार में मंदड़ियों का स्थिति 'चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात' जैसी है। मंदड़ियों का बस चले तो सेंसेक्स के पैरों में बेड़ियां डाल उसे आगे बढ़ने ही न दें। पर हमारा सेंसेक्स बहुत 'दिलेर' है। वक्त आने पर मंदड़ियों को 'धोबी पछाड़' दे ही देता है। फिर सब लाइन पर आ जाते हैं।

इसीलिए सेंसेक्स की गिरावट पर यों 'मायूस' होने की जरूरत नहीं। गिरना-चढ़ना तो सेंसेक्स का 'लाइफ-स्टाइल' है। गिरकर संभलने और संभलकर जीतने वाला ही तो 'विनर' कहलाता है। तब ही तो सेंसेक्स शेयर बाजार का 'इंडेक्स-विनर' है। है कि नहीं...!

कोई टिप्पणी नहीं: