शनिवार, 10 जनवरी 2015

मेरा कार्टून बनाइए

जी हां। मैं तैयार हूं। आइए, मेरा कार्टून बनाइए। कैसा भी बनाइए। कहीं से भी बनाइए। न मुझे 'एतराज' होगा, न मैं 'विरोध' करूंगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध जब आज तलक मैंने खुद से नहीं किया तो पियारे तुमसे क्या करूंगा। मुझे अभिव्यक्ति की खातिर सहमत-असहमत होना 'मंजूर' है, 'मार' डालना नहीं।

अपना कार्टून बनाने के लिए मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं लगता-दिखता ही 'कार्टून' हूं। मेरी पत्नी मुझे मेरे नाम से नहीं 'कार्टून' कहकर ही बुलाती है। अपने नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों, दोस्तों, लेखक बिरादरी के बीच मैं बतौर 'कार्टून-लेखक' मशहूर हूं। न जाने कित्ती ही दफा मेरी बड़ी बेटी मेरा कार्टून बनाकर गेट के बाहर चिपका चुकी है। मोहल्ले वाले मेरा कार्टून देखकर मुझ पर हंसते और बेटी को उम्दा आर्ट के तईं बधाईयां देते हैं। तब मुझे मेरी कार्टून शक्ल के साथ-साथ बेटी पर भी 'गर्व' होता है।

मैंने अब तक का अपना जीवन 'कार्टूनपंती' में ही जिया है। मेरे दिलो-दिमाग पर कार्टून और व्यंग्य हर वक्त 'खुमारी' की मानिंद छाए रहते हैं। मुझे दूसरे पर व्यंग्य करने से कहीं ज्यादा मजा खुद पर करने में आता है। खुद पर व्यंग्य कर मैं खुद को शब्दों में निचोड़ लेता हूं। उस निचोड़ का अपना ही लुत्फ है पियारे।

मुझे कभी-कभी खुद में खुशवंत सिंह की 'आत्मा' का 'अहसास' होता है। कित्ता बड़ा 'जिगर' था खुशवंत सिंह का कि उन्हें अपने ऊपर बने कार्टूनों पर कभी गुस्सा नहीं आया। न ही कभी विरोध किया। हां, वे अक्सर यह जरूर कहा करते थे कि मैं कित्ता 'बकवास' लिखता हूं। कुछ मायनों में मेरे लेखन की प्रेरणा खुशवंत सिंह का 'बकवास लेखन' ही है। इसीलिए मैं न व्यंग्य से घबराता हूं न कार्टून का बुरा मानता हूं।

अमां, ऐसे सीधे-सादे लेखन से भी क्या फायदा जब तलक उसमें 'तंज' न हो। तंज लेखन की बुनियाद है। कार्टून और व्यंग्य इसीलिए बनाए और लिखे जाते हैं ताकि दुनिया-समाज-व्यवस्था-व्यक्ति-जाति-धर्म-कट्टरता को 'कटाक्षपूर्ण आईना' दिखाया जा सके। यही वो आईना है, जिसमें हमें हमारी शक्ल ठीक-ठीक दिखती है। बाकी तो सब एक-दूसरे को प्रभावित करने के चोचले हैं।

अगर कार्टून न हो तो दुनिया कित्ती 'बोरिंग' लगेगी। कार्टून हमारे भीतर 'मीठी चुभन' जगाने के लिए होते हैं नाकि दिल पे लेने के लिए। आप एक कार्टूनिस्ट को मौत की नींद सुलाएंगे तो उस जैसे दस और खड़े हो जाएंगे। कार्टूनिस्ट का काम ही सोते को नींद से जगाना है फिर भला वो कैसे सो सकता है?

इसीलिए तो मैं दुनियाभर के कार्टूनिस्टों को खुला निमंत्रण दे रहा हूं कि आइए, मेरा कार्टून बनाइए। मुझे बेइंतहा खुशी होगी। मुझे लगेगा कि मैंने अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा सम्मान किया है। मुझे ऐसे सम्मान देना पसंद है।

कोई टिप्पणी नहीं: