गुरुवार, 29 जनवरी 2015

आओ, बहस करें!

पियारे, बड़ा ही मस्त व मनोरंजनात्मक सीन है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दिल्ली में चुनाव नहीं दो प्रत्याशियों के मध्य 'दंगल' छिड़ा हुआ है। दोनों ही एक-दूसरे को 'ललकार' रहे हैं। यह ललकार इत्ती तगड़ी है कि जनता भी सहम गई है। चुनाव का फोकस जनता पर से हट कर दो सूरमाओं पर टिक लिया है।

चुनावी दंगल में बहस इस बात पर आनकर केंद्रित हो गई है कि आओ, बहस करें! एक सूरमा दूसरे सूरमा को बहस के वास्ते ललकार रहा है। किंतु, दूसरा सूरमा पब्लिकली बहस के तईं कतई तैयार नहीं। कह रहा है- सड़क पर नहीं संसद में बहस करेंगे। लेकिन नहीं, पहला सूरमा अब भी अड़ा हुआ है कि बहस सड़क पर ही आमने-सामने होगी।

चलो ठीक है कि बहस होगी और खुल्म-खुल्ला होगी पर इस बात की क्या 'गारंटी' है कि बहस 'जन-मुद्दों' पर ही होगी, 'व्यक्तिगत' नहीं? फिलहाल, दोनों सूरमाओं की 'बॉडी-लैंग्वीज' और 'जुबानी आक्रमकता' को देखकर लगता तो नहीं कि बहस जन-मुद्दों पर ही होगी। चुनावी सभाओं में दोनों सूरमा जब भी बोलते हैं, जनता की बात कम आपस में व्यक्तिगत ज्यादा हो लेते हैं। यानी, जब तलक तुम मेरे साथ रहे बहुत 'अच्छे' थे। मगर जैसे ही मुझसे जुदा हुए दुनिया के सबसे 'खराब इंसान' हो गए। वही पति-पत्नी और सास-बहू टाइप खीझ-खीझयाहट।

ऐसे में भी कहते हो कि आओ, बहस करें!

अच्छा यह देखिए, बहस के वास्ते उदाहरण अमेरिकी चुनाव प्रणाली के दिए जा रहे हैं। कह रहे हैं, जैसे ओबामा और रोमानी के बीच बहस हुई थी, ठीक वैसी ही बहस हम भी करेंगे। वाह! क्या बात है पियारे। अरे हुजूर वो अमेरिका है अमेरिका। वहां संसद में दो बंदों के बीच बहस कभी 'व्यक्तिगत' नहीं, बहुत ही 'ऊंचे लेवल' की होती है। बहस में न एक-दूसरे को 'गरियाया' जाता है न एक-दूसरे से 'जिद्द' की जाती है। उस बहस में अच्छे-अच्छे पानी मांग लेते हैं। और, अपने यहां सड़क तो छोड़िए संसद में जिस टाइप की बहसें होती हैं। तौबा-तौबा। कभी लात-घूंसे चलते हैं तो कभी माइक तान लिए जाते हैं। महत्त्वपूर्ण अध्यादेश तक तो संसद के भीतर चिंदी-चिंदी कर दिए जाते हैं। और आप कह रहे हैं कि आओ, बहस करें! ठहर कर सोच लो कई दफा।

मेरे विचार में तो दोनों सूरमाओं को बहस की जिद्द छोड़कर, जनता से केवल वायदे पर वायदे, वायदे पर वायदे ही करने चाहिए। इसी में चुनाव, राजनीति, जनता और सूरमाओं की 'भलाई' है। यह बात जनता भी अच्छे से जानती-समझती है कि बहस की जिद्द या वायदों का टॉनिक चाहे जित्ता भी उन्हें दिया जाए, चुनाव निपट लेने के बाद मिलना उन्हें कुछ नहीं है, सिवाय 'बाबाजी का ठुल्लू' के।

बहस से कहीं बेहतर तो वायदे हैं, कम से कम इसमें 'फिल-गुड' जैसा 'अहसास' तो बना रहता है।

बहस करने से दो दलों के साथ-साथ दोनों सूरमाओं के बीच खामखां 'रायता' अलग फैलेगा। एक तरफ खबरिया चैनल वाले 'मजा' लेंगे तो दूसरी तरफ सोशल नेटवर्किंग वाले। यों भी, हमारे देश के चुनावी हालात अब मजा लेने और देने जैसे ही बनते जा रहे हैं। एक सूरमा दूसरे सूरमा से तो भिड़ता ही है पर उससे कहीं ज्यादा उनकी 'भक्त-पलट' तैयार रहती है लड़ने-भिड़ने को। असल चुनाव तो भक्त-पलटन ही लड़ाती-लड़वाती है।

बहस के लिए भले ही अभी एक सूरमा तैयार न हो पर उनकी भक्त-पलटन पूरी तरह तैयार है।

खैर, यह डिपेंड दोनों सूरमाओं पर है कि वे कब, कहां, किधर, कैसे बहसियाते हैं। हम तो फिलहाल मजा लेने और मनोरंजन करने को तैयार बैठे हैं।

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