शनिवार, 24 जनवरी 2015

ओबामा आ रहे हैं

मेरे मोहल्ले का माहौल 'क्रेजीमय' है क्योंकि ओबामा आ रहे हैं! अरे नहीं.. नहीं.. मेरे मोहल्ले में नहीं आ रहे। आ तो देश की राजधानी (दिल्ली) में रहे हैं, मगर 'क्रेजीनेस' की बयार दिल्ली से चलकर मेरे मोहल्ले (बरेली) तलक आन पहुंची है। मोहल्ले का हर दूसरा बंदा-बंदी अपनी जुबान पर ओबामा का नाम रखकर यों घुम रहा है, मानो ओबामा उनके परदादा के भतीजे रहे हों। ओबामा के नाम पर चेहरे ऐसे खिले हुए हैं, मानो बसंत (इस दफा) टाइम से पहले ही आ गया हो।

मोहल्ले के घरों में इन दिनों सास-बहू टाइप सीरियलों की आवाजें कम खबरिया चैनलों की 'ओबामायुक्त खबरें' अधिक सुनने को मिल रही हैं। हर कोई ओबामा की हाई-प्रोफाइल सिक्योरिटी के ताम-झाम को जानकर ऐसा खुश है मानो ओबामा के जाने के बाद वह सिक्योरिटी उसे ही मिलने वाली हो। मेरा पियारे इत्ता जानकर ही गद-गद है कि ओबामा की सुरक्षा के वास्ते 15 हजार सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। और, हजारों की तदाद में सिक्योरिटी गार्ड मौजूद रहेंगे।

कईयों को तो ओबामा का विजिटिंग प्लान यों कंठस्थ है मानो 'वैलकम' उन्होंने ही करना हो। ओबामा क्या खाएंगे। क्या पिएंगे। कहां बैठेंगे। कहां घुमेंगे। किस कार में किसके साथ जाएंगे। आदि-आदि।

लेकिन, मेरा क्रेज ओबामा से कहीं ज्यादा उनकी सुरक्षा को आए 'कुत्तों' को देखने में है। सुना है, बड़े ही हाई-प्रोफाइल किस्म के कुत्ते हैं। खाना भी बड़ा 'धांसू' किस्म का खाते हैं। टाइम के भी खासा 'पंक्चूअल' हैं। सिर्फ 'सूंघ' कर ही पता लगा लेते हैं कि खतरा किस टाइप का है। वाह! क्या कमाल की नाक पाई है ओबामा के कुत्तों ने। अगर बस में होता तो एकाध को मैं यहीं रोक लेते, अपनी सुरक्षा के लिए। इधर, जब से फेमस टाइप का लेखक हुआ हूं, सुना है, मेरे भी दुश्मन बढ़ गए हैं। एक हमारे यहां के कुत्ते हैं, जिन्हें ज्यादातर 'डॉग शो' का 'आइकन' बनाकर ही पेश किया जाता है।

सुनने में यह भी आया है कि मेरे मोहल्ले के कुछ लोग ओबामा से मिलने का मन बना रहे हैं। हालांकि यह सपना हकीकत में तो छोड़िए सपने में भी संभव नहीं पर क्या कीजिएगा क्रेज तो क्रेज है।

है न कित्ता अजीब, मोहल्ले वाले अमेरिका के राष्ट्रपति के लिए इत्ता क्रेजी हुए जा रहे हैं और लगभग ओबामा के मुकाबिल (उत्ता ही फेमस) एक लेखक (यानी मैं) उनके मोहल्ले में मौजूद है उसे कोई 'घास' तक नहीं डालता। ओबामा से मिलने का खतरा उठाने को तैयार है और एक जो बे-खतरा मिलने को तैयार बैठा है, उसके कने कोई न आता। अजीब दुनिया है यह पियारे। बड़ी ही अजीब।

फिर भी, जिन्हें ओबामा से मिलने का क्रेज है उनकी वे जानें। फिलहाल, मैं तो ओबामा के बजाए अपने गणतंत्र की परेड को देखना अधिक पसंद करूंगा। क्योंकि हमारा गणतंत्र हम देशवासियों का 'गर्व' है।

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