सोमवार, 19 जनवरी 2015

आहत भावनाओं की मार्केटिंग

जमाना चूंकि मार्केटिंग का है, इस नाते किसी भी चीज या बात की 'मार्केटिंग' आराम से की जा सकती है।

तो पियारे मैं 'आहत भावनाओं' की 'मार्केटिंग' करना चाहता हूं। इन दिनों लोगों की आहत भावनाएं जोर भी खूब मार रही हैं। समाज और साहित्य का हर दूसरा बंदा किसी न किसी चीज या बात को लेकर अपनी भावनाओं को आहत किए बैठा है। आहत भावनाओं के साथ जित्ता वो सड़कों पर उछल-कूद मचा रहा है, उससे कहीं ज्यादा सोशल नेटवर्किंग पर। अच्छा, सोशल नेटवर्किंग पर उसे अपनी आहत भावनाओं पर जित्ते 'कमेंट' मिल रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा 'लाइक'। वो इसी में 'चौड़ा' हुआ जा रहा है। चौड़ा क्यों न होगा, आहत भावनाओं की मार्केटिंग सोशल नेटवर्किंग से बेहतर कहीं और हो सकती है भला?

आजकल लोगों की भावनाएं पीके, कार्टून और चेतन भगत के कारण आहत हुई हुईं हैं। जिसके मन में जित्ता और जैसा भी आ रहा है, सोशल नेटवर्किंग पर अपनी आहत भावनाओं को 'एक्सप्रेस' कर रहा है। कोई 'अतिरेक' में जाकर तो कोई 'कूल' होकर। हालांकि कूल होकर लिखने वाले काफी कम हैं। क्योंकि वे अपनी आहत भावनाओं पर 'कंट्रोल' करना अच्छे से जानते हैं। होशियारी भी इसी में हैं कि आप सोशल नेटवर्किंग के प्लेटफार्म पर खुद को कित्ता कूल रख पाते हैं। यहां एंवई सीरियस होने का मतलब है, अपनी भद्द पिटवाना।

पीके पर लोगों की भावनाएं इस कारण आहत हो रखी हैं क्योंकि इसमें धर्म और देवी-देवताओं का अपमान टाइप कुछ है। आस्थावान वीर अपनी-अपनी आहत भावनाओं के साथ कभी सड़क तो कभी फेसबुक; जहां जगह मिल रही है, 'हुड़दंग' काट रहे हैं। पीके को पीके (मतलब फिल्म) की तरह न ले रहे हैं। 'सेंटिमेंटल' टाइप हुए जा रहे हैं। अक्लमंदी का तकाजा यह कहता है पियारे कि आहत भावनाओं के वीर 'फिल्म' का जवाब 'फिल्म' बनाकर दें। ठीक है न।

कार्टून को लेकर भी कुछ इसी टाइप की 'चिल्ल-पौं' मची हुई है। कार्टून से लोगों की भावनाएं आहत हैं। लेकिन कार्टून का जवाब कोई कार्टून बनाकर न दे रहा। सभी अपनी-अपनी आहत भावनाओं को लेकर 'बहसबाजी' में फंसे-उलझे हुए हैं।

अब हिंदी भाषा प्रेमियों की भावनाएं चेतन भगत के एक लेख से आहत हैं। चेतन का कहना है, 'हमें लेखन में देवनागरी की जगह रोमन लिपि को अपनाना चाहिए।' अब चेतन को हिंदी की तासीर के बारे में क्या मालूम? वो तो मूलतः अंगरेजी के लेखक हैं। अंगरेजी में लिखते हैं। अंगरेजी में सोचते हैं। अंगरेजी के दम पर ही नाम और दाम कमा रहे हैं। लेकिन हिंदी में मामला जरा दूसरा है। यहां लोग लिखते कम, जलते ज्यादा हैं। खुद अपनी भाषा के साथ चाहे जैसा व्यवहार करते हों मगर अंगरेजी वाला कुछ दे तो भाई लोग राशन-पानी लेकर उस पर चढ़ लेते हैं। चेतन भगत के साथ भी ऐसा ही कुछ मामला बन रहा है  इन दिनों। हिंदी के लेखक अपनी-अपनी आहत भावनाओं की खिचड़ी फेसबुक पर पका रहे हैं।

अमां, चेतन के दिमाग में एक बात आई उसने लिख दी। अब यह मर्जी आपकी कि 'मानो' या 'न मानो'। खामखां, अपनी भावनाओं को आहत क्यों किए बैठे हो। चेतन को देखो, उसने मात्र एक लेख के दम पर आपकी आहत भावनाओं के साथ अपनी 'मार्किटिंग' कर ली। आज हिंदी का बड़े से बड़ा लेखक-साहित्यकार चेतन की बहस में उलझा हुआ है। पियारे इसी को तो कहते हैं, 'शुद्ध मार्केटिंग'। लेकिन, हम हिंदी वाले तो आहत भावनाओं के दम पर ही 'जग-प्रसिद्ध' होना चाहते हैं।

कभी-कभी लगता है, हमारी भावनाएं वाकई कित्ती 'कमजोर' पड़ चुकी हैं कि 'सेकेंड' भर में 'आहत' हो जाती हैं। आहत भावनाओं के साथ हम अपना 'आपा' तक खो बैठते हैं। दिमाग को 'ठंडा' रख यह सोचने-समझने की कोशिश ही नहीं करते कि हम भावनाओं को व्यक्त नहीं उसका सरेआम 'मजाक' उड़ा रहे हैं।

क्यों न भावनाओं को भावनाएं ही बना रहने दिया जाए। उन्हें आहत करने से क्या हासिल? इसीलिए तो मैं अपनी आहत भावनाओं की मार्केटिंग पर ध्यान ज्यादा देता हूं ताकि भावनाएं 'कूल' रहें।

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