सोमवार, 5 जनवरी 2015

दिमाग बनाम खोपड़ी

मैंने तय किया है कि मैं 2015 में भी 'दिमाग' से नहीं केवल 'खोपड़ी' से ही कम लूंगा। खोपड़ी से काम लेना मुझे दिमाग की अपेक्षा ज्यादा सहज व सरल लगता है। दिमाग 'चिकचिक' बहुत किया करता है। जबकि खोपड़ी 'खामोशी' से अपना काम करती रहती है। दिमाग के साथ सबसे बड़ा 'लोचा' इसकी संवेदनाओं का बहुत जल्द एक्टिव हो जाना है। जहां जरा-सा कुछ हुआ नहीं कि तुरंत दिमाग पर लोड पड़ना चालू। इसी वजह से दिमागदार लोगों की 'भावनाएं' (संवेदनाओं में बहकर) बहुत जल्द आहत हो जाती हैं। तब ही तो लोग 'पीके' पर 'पीकर' जैसा बवाल करने पर उतारू हो जाते हैं।

अरे, दिमाग मिलने का यह मतलब थोड़े न है कि हर वक्त, हर कहीं, हर मसले में उसका 'इस्तेमाल' किया ही जाए! कुछ चीजें, कुछ बातें दिमाग से इतर सोच-समझकर भी कर लेनी चाहिए; मेरी तरह से। दिमाग तो एकदम 'ठलुआ मशीनरी' है, उसे जित्ता ज्यादा चलाओगे, वो उत्ता तेज दौड़ेगी। बस यही तेज दौड़-भाग काम खराब कर देती है। पहुंचना कहां होता है और पहुंच कहीं जाते हैं। इसीलिए तो दिमागदार लोग ज्यादा भटके हुए होते हैं।

खोपड़ी दिमाग से एकदम 'उलट' काम करती है। खोपड़ी के साथ जल्दीबाजी या तेजी जैसा कोई अंझट-झंझट नहीं होता। उसकी हड्डियों में जित्ता सोचने-समझने-विचारने की शक्ति होती है, उत्ता ही उसे उपयोग में लाती है। बेमतलब लोड लेना न खोपड़ी को मंजूर है न ही उसकी फितरत। जित्ती अच्छे से और मस्ती से कट जाए, उत्ता ही ठीक।

यह मेरा 'पर्सनल एक्सपीरियंस' है कि मैंने कभी अपनी खोपड़ी को 'स्ट्रेस' में नहीं देखा है। मेरी खोपड़ी जित्ता मस्त खुद रहती है, उत्ता ही मस्त मुझे भी रखती है। मेरे व्यक्तित्व में हंसने-हंसाने और मौज के साथ लाइफ को जीने का उत्साह केवल खोपड़ी के कारण ही हैं। वरना दिमाग ने तो मुझे 'डिप्रेशन' में झौंक ही डाला था पियारे।

और हां बतला दूं, यह व्यंग्य-लेख भी मैंने दिमाग के नहीं खोपड़ी के इस्तेमाल के साथ लिख है। आज लेखन में मैं जो कुछ भी हूं केवल अपनी खोपड़ी के कारण हूं। जब दिमाग से लिखा करता था, तब लेखन में 'गंभीरता' का बोझ बहुत बढ़ा गया था। हर समय गंभीर-गंभीर से ख्याल-विचार में दिमाग आते रहते थे। तब लेखन के साथ-साथ लाइफ भी बड़ी कॉपलीकेटिड सी हो गई थी पियारे।

लेकिन जब से दिमाग को त्याग खोपड़ी का इस्तेमाल शुरू किया है, काफी आराम है।

मैं जिद नहीं कर रहा, केवल राय दे रहा हूं, चाहें तो आप लोग भी नए साल से दिमाग की जगह खोपड़ी की सहायता लेना शुरू कर सकते हैं। बाकी दिमाग है आपका। खोपड़ी है आपकी। मर्जी है आपकी।

1 टिप्पणी:

Rahul Singh ने कहा…

nice article sir
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