गुरुवार, 29 जनवरी 2015

आओ, बहस करें!

पियारे, बड़ा ही मस्त व मनोरंजनात्मक सीन है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि दिल्ली में चुनाव नहीं दो प्रत्याशियों के मध्य 'दंगल' छिड़ा हुआ है। दोनों ही एक-दूसरे को 'ललकार' रहे हैं। यह ललकार इत्ती तगड़ी है कि जनता भी सहम गई है। चुनाव का फोकस जनता पर से हट कर दो सूरमाओं पर टिक लिया है।

चुनावी दंगल में बहस इस बात पर आनकर केंद्रित हो गई है कि आओ, बहस करें! एक सूरमा दूसरे सूरमा को बहस के वास्ते ललकार रहा है। किंतु, दूसरा सूरमा पब्लिकली बहस के तईं कतई तैयार नहीं। कह रहा है- सड़क पर नहीं संसद में बहस करेंगे। लेकिन नहीं, पहला सूरमा अब भी अड़ा हुआ है कि बहस सड़क पर ही आमने-सामने होगी।

चलो ठीक है कि बहस होगी और खुल्म-खुल्ला होगी पर इस बात की क्या 'गारंटी' है कि बहस 'जन-मुद्दों' पर ही होगी, 'व्यक्तिगत' नहीं? फिलहाल, दोनों सूरमाओं की 'बॉडी-लैंग्वीज' और 'जुबानी आक्रमकता' को देखकर लगता तो नहीं कि बहस जन-मुद्दों पर ही होगी। चुनावी सभाओं में दोनों सूरमा जब भी बोलते हैं, जनता की बात कम आपस में व्यक्तिगत ज्यादा हो लेते हैं। यानी, जब तलक तुम मेरे साथ रहे बहुत 'अच्छे' थे। मगर जैसे ही मुझसे जुदा हुए दुनिया के सबसे 'खराब इंसान' हो गए। वही पति-पत्नी और सास-बहू टाइप खीझ-खीझयाहट।

ऐसे में भी कहते हो कि आओ, बहस करें!

अच्छा यह देखिए, बहस के वास्ते उदाहरण अमेरिकी चुनाव प्रणाली के दिए जा रहे हैं। कह रहे हैं, जैसे ओबामा और रोमानी के बीच बहस हुई थी, ठीक वैसी ही बहस हम भी करेंगे। वाह! क्या बात है पियारे। अरे हुजूर वो अमेरिका है अमेरिका। वहां संसद में दो बंदों के बीच बहस कभी 'व्यक्तिगत' नहीं, बहुत ही 'ऊंचे लेवल' की होती है। बहस में न एक-दूसरे को 'गरियाया' जाता है न एक-दूसरे से 'जिद्द' की जाती है। उस बहस में अच्छे-अच्छे पानी मांग लेते हैं। और, अपने यहां सड़क तो छोड़िए संसद में जिस टाइप की बहसें होती हैं। तौबा-तौबा। कभी लात-घूंसे चलते हैं तो कभी माइक तान लिए जाते हैं। महत्त्वपूर्ण अध्यादेश तक तो संसद के भीतर चिंदी-चिंदी कर दिए जाते हैं। और आप कह रहे हैं कि आओ, बहस करें! ठहर कर सोच लो कई दफा।

मेरे विचार में तो दोनों सूरमाओं को बहस की जिद्द छोड़कर, जनता से केवल वायदे पर वायदे, वायदे पर वायदे ही करने चाहिए। इसी में चुनाव, राजनीति, जनता और सूरमाओं की 'भलाई' है। यह बात जनता भी अच्छे से जानती-समझती है कि बहस की जिद्द या वायदों का टॉनिक चाहे जित्ता भी उन्हें दिया जाए, चुनाव निपट लेने के बाद मिलना उन्हें कुछ नहीं है, सिवाय 'बाबाजी का ठुल्लू' के।

बहस से कहीं बेहतर तो वायदे हैं, कम से कम इसमें 'फिल-गुड' जैसा 'अहसास' तो बना रहता है।

बहस करने से दो दलों के साथ-साथ दोनों सूरमाओं के बीच खामखां 'रायता' अलग फैलेगा। एक तरफ खबरिया चैनल वाले 'मजा' लेंगे तो दूसरी तरफ सोशल नेटवर्किंग वाले। यों भी, हमारे देश के चुनावी हालात अब मजा लेने और देने जैसे ही बनते जा रहे हैं। एक सूरमा दूसरे सूरमा से तो भिड़ता ही है पर उससे कहीं ज्यादा उनकी 'भक्त-पलट' तैयार रहती है लड़ने-भिड़ने को। असल चुनाव तो भक्त-पलटन ही लड़ाती-लड़वाती है।

बहस के लिए भले ही अभी एक सूरमा तैयार न हो पर उनकी भक्त-पलटन पूरी तरह तैयार है।

खैर, यह डिपेंड दोनों सूरमाओं पर है कि वे कब, कहां, किधर, कैसे बहसियाते हैं। हम तो फिलहाल मजा लेने और मनोरंजन करने को तैयार बैठे हैं।

बुधवार, 28 जनवरी 2015

ओबामा के जाने के बाद

हालांकि बराक ओबामा जा चुके हैं मगर फिजा में उनकी मौजूदगी अब भी बरकरार है। किस्म-किस्म की बातें-चर्चाएं ओबामा की भारत यात्रा को लेकर हो रही हैं। खबरिया चैनलों पर भी ओबामा के बहाने बहस का दौर 'गर्म' है।

अभी तलक तो बातें ओबामा की सिक्योरिटी को लेकर हो रही थीं मगर अब ओबामा से भारत को क्या मिला; इस पर हो रही हैं। विदेश नीति के जानकार पंडित लगे हुए हैं, अपने-अपने तरीके से ओबामा की भारत यात्रा का 'गुणा-भाग' करने में।

इत्ती चर्चा-बहस-बातें होने के बाद भी मुझ जैसा (कॉमन मैन) अभी तलक यह न जान-समझ पाया है कि ओबामा की यात्रा से भारत को क्या मिला? भारत के युवाओं की झोली में क्या आया? हां, परमाणु करार पर दोनों देशों में 'सहमति' जरूर बनी पर पियारे आम आदमी परमाणु करार या पावर का क्या करेगा? परमाणु करार न उसे रोटी देगा, न मकान, न कपड़ा, न रोजगार। फिर भी, 'संतुष्टि' के तईं बकौल गालिब- दिल के खुश रखने को गालिब यह ख्याल अच्छा है।

कुछ सुनने में यह भी आया कि ओबामा के दल ने हमारे देश के वरिष्ठ सीईओ के साथ देश में बिजनेस बढ़ाने के वास्ते मेल-मुलाकात की थी। इस बिजनेस मीट के बाबत खबरिया चैनलों पर भी पूरे दिन चर्चाएं होती रहीं। कोई अमेरिका के कानून समझाता रहा था तो कोई भारत के युवाओं के हुनूर पर बहस करता रहा। देख-सुनकर लग तो ऐसा रहा था कि ओबामा के आने के साथ ही न केवल भारत बल्कि यहां के युवा-बेरोजगारों के दिन बस 'फिरने' ही वाले हैं! लेकिन बात घुम-फिरकर वहीं आ गई कि इस बिजनेस मीट का जमा-हासिल क्या सामने आया? न मीडिया ने ढंग से बतलाया न सरकार ने समझाया। 'शायद' मीडिया और सरकार अभी ओबामा की 'खुमारी' से बाहर नहीं निकल पाए हैं!

ओबामा की खुमारी में बहुत से लोग (भक्त-टाइप) ओबामा के 'संबोधन' को भी 'ढंग' से न समझ पाए होंगे। खासकर, धार्मिक कट्टरता और स्त्री सशक्तीकरण की बात को। होता है.. होता है.., जब विचार से कहीं ज्यादा व्यक्ति का व्यक्तित्व हम पर हावी हो जाता है। ठीक ऐसा तब भी हुआ था जब बिल क्लिंटन हिंदुस्तान आए थे।

हैरानी क्या, मेरे मोहल्ले से लेकर सोशल मीडिया तलक ओबामा की सिक्योरिटी, च्यूंगम, डैशिंगलुक या फिर प्रधानमंत्री के ड्रेसिंग सेंस के ही चर्चे अधिक रहे।

सरकार ओबामा की यात्रा को हो सकता है दिल्ली चुनाव में भुना ले जाए पर कॉमन मैन अब भी वहीं है, जहां कल था। क्यों पियारे सही है न।

शनिवार, 24 जनवरी 2015

ओबामा आ रहे हैं

मेरे मोहल्ले का माहौल 'क्रेजीमय' है क्योंकि ओबामा आ रहे हैं! अरे नहीं.. नहीं.. मेरे मोहल्ले में नहीं आ रहे। आ तो देश की राजधानी (दिल्ली) में रहे हैं, मगर 'क्रेजीनेस' की बयार दिल्ली से चलकर मेरे मोहल्ले (बरेली) तलक आन पहुंची है। मोहल्ले का हर दूसरा बंदा-बंदी अपनी जुबान पर ओबामा का नाम रखकर यों घुम रहा है, मानो ओबामा उनके परदादा के भतीजे रहे हों। ओबामा के नाम पर चेहरे ऐसे खिले हुए हैं, मानो बसंत (इस दफा) टाइम से पहले ही आ गया हो।

मोहल्ले के घरों में इन दिनों सास-बहू टाइप सीरियलों की आवाजें कम खबरिया चैनलों की 'ओबामायुक्त खबरें' अधिक सुनने को मिल रही हैं। हर कोई ओबामा की हाई-प्रोफाइल सिक्योरिटी के ताम-झाम को जानकर ऐसा खुश है मानो ओबामा के जाने के बाद वह सिक्योरिटी उसे ही मिलने वाली हो। मेरा पियारे इत्ता जानकर ही गद-गद है कि ओबामा की सुरक्षा के वास्ते 15 हजार सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। और, हजारों की तदाद में सिक्योरिटी गार्ड मौजूद रहेंगे।

कईयों को तो ओबामा का विजिटिंग प्लान यों कंठस्थ है मानो 'वैलकम' उन्होंने ही करना हो। ओबामा क्या खाएंगे। क्या पिएंगे। कहां बैठेंगे। कहां घुमेंगे। किस कार में किसके साथ जाएंगे। आदि-आदि।

लेकिन, मेरा क्रेज ओबामा से कहीं ज्यादा उनकी सुरक्षा को आए 'कुत्तों' को देखने में है। सुना है, बड़े ही हाई-प्रोफाइल किस्म के कुत्ते हैं। खाना भी बड़ा 'धांसू' किस्म का खाते हैं। टाइम के भी खासा 'पंक्चूअल' हैं। सिर्फ 'सूंघ' कर ही पता लगा लेते हैं कि खतरा किस टाइप का है। वाह! क्या कमाल की नाक पाई है ओबामा के कुत्तों ने। अगर बस में होता तो एकाध को मैं यहीं रोक लेते, अपनी सुरक्षा के लिए। इधर, जब से फेमस टाइप का लेखक हुआ हूं, सुना है, मेरे भी दुश्मन बढ़ गए हैं। एक हमारे यहां के कुत्ते हैं, जिन्हें ज्यादातर 'डॉग शो' का 'आइकन' बनाकर ही पेश किया जाता है।

सुनने में यह भी आया है कि मेरे मोहल्ले के कुछ लोग ओबामा से मिलने का मन बना रहे हैं। हालांकि यह सपना हकीकत में तो छोड़िए सपने में भी संभव नहीं पर क्या कीजिएगा क्रेज तो क्रेज है।

है न कित्ता अजीब, मोहल्ले वाले अमेरिका के राष्ट्रपति के लिए इत्ता क्रेजी हुए जा रहे हैं और लगभग ओबामा के मुकाबिल (उत्ता ही फेमस) एक लेखक (यानी मैं) उनके मोहल्ले में मौजूद है उसे कोई 'घास' तक नहीं डालता। ओबामा से मिलने का खतरा उठाने को तैयार है और एक जो बे-खतरा मिलने को तैयार बैठा है, उसके कने कोई न आता। अजीब दुनिया है यह पियारे। बड़ी ही अजीब।

फिर भी, जिन्हें ओबामा से मिलने का क्रेज है उनकी वे जानें। फिलहाल, मैं तो ओबामा के बजाए अपने गणतंत्र की परेड को देखना अधिक पसंद करूंगा। क्योंकि हमारा गणतंत्र हम देशवासियों का 'गर्व' है।

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

ओबामा का भारत आना


कोई मजाक बात है! पता है, ओबामा, बाराक हुसैन ओबामा, अमेरिका के राष्ट्रपति, भारत आ रहे हैं। वो भी 26 जनवरी- गणतंत्र दिवस- के मौके पर। तो फिर हम क्यों नहीं उनके 'वैलकम' में 'पलक-पाबड़े' बिछाएंगे। कोई 'मामूली नेता' आ रहा होता तो भी ठीक था, किंतु यह तो अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। अब इत्ते बड़े मुल्क के राष्ट्रपति के वास्ते सुरक्षा के इंतजाम भी तो बड़े-बड़े ही होंगे न, क्यों पियारे। चकल्लसबाजी में कहीं कोई खामी रह-रवा गई तो दुनिया हम ही सुनाएगी। कहेगी- अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत बुला तो लिया मगर सिक्योरटी देना आता नहीं। बताइए, बुरा न लगेगा ऐसा सुनकर।

सुनने-पढ़ने में आ रहा है कि ओबामा की सिक्योरटी के इंतजाम बहुत 'तगड़े' हैं। सिक्योरटी का सारा जिम्मा अमेरिकी-सुरक्षा एजेंसियों ने अपने हाथों में ले रखा है। मैं यही पढ़कर घंटे-दो घंटे अंगुलियों को दांतों के बीच भींचे रहा कि ओबामा की निगरानी में 15 हजार सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहें हैं। साथ ही, उनकी सुरक्षा में सुरक्षा-कर्मियों के अलावा खास किस्म के कुत्ते भी शामिल रहेंगे। ये कुत्ते किसी भी खतरे को इंसानों से कहीं ज्यादा तेज भांप लेते हैं। और, मात्र 'सूंघ' के दाम पर ही केस को 'सॉल्व' कर डालते हैं। इन कुत्ते के तईं विशेष प्रकार का भोजन तैयार होगा।

बताइए, अमेरिका ने गोला-बारूद के साथ-साथ कुत्तों के क्षेत्र में भी कित्ती तरक्की कर ली है। एक हमारे यहां के कुत्ते हैं, जो डॉग-शो में ही करतब-सरतब दिखाने में व्यस्त रहते हैं।

सुरक्षा का ताम-झाम अकेली राजधानी (दिल्ली) में ही नहीं, आगरा में भी इसी जैसा है। आगरा जाकर वे ताजमहल का दीदार करेंगे। आगरावालों की तो किस्मत ही चमक जाएगी कि ओबामा (अमेरिकी राष्ट्रपति) उनके शहर में हैं। लेकिन शहर में बरसों पुराना एक मशहूर 'पागलखाना' भी है। पता नहीं, ओबामा वहां का दौरा करेंगे या नहीं। जब भी कोई बड़ी हस्ती आगरा आती है, पता नहीं क्यों, पागलखाना जाना पसंद नहीं करती? हो सकता है, सुरक्षा एजेंसियों को वो जगह सुरक्षा के हिसाब से उचित न लगी हो। बता दूं, पागल कभी किसी को 'हानि' नहीं पहुंचाते। ऐसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। क्योंकि मेरे शहर में भी एक 'पागलखाना' है।

अब कहने वाले कह रहे हैं कि जित्ती सिक्योरटी ओबामा को दी जा रही है, इसकी आधी से भी आधी (या फिर नामात्र को भी) हमारे यहां 'आम आदमी' को नहीं दी जाती। आम आदमी की सुरक्षा में सीसीटीवी कैमरा तो दूर की बात है, एक पुलिसवाला तक नहीं होता। 'नादान' हैं वो लोग जो ओबामा की सिक्योरटी पर सवाल उठा रहे हैं। अरे भई वो ओबामा हैं ओबामा, अमेरिका के राष्ट्रपति। उनकी सिक्योरटी अमेरिका में भी इत्ती ही टाइट रहती है, जित्ती भारत में रहेगी। वो कोई आम आदमी थोड़े न हैं! भला आम आदमी सिक्योरटी लेकर क्या करेगा? वो कोई ओबामा जित्ता 'फेमस' थोड़े है? आम आदमी को अपनी सुरक्षा आप करनी चाहिए। जैसा कि मैं किया करता हूं।

बहुत ही दबी जुबान में सुनने में आया है कि कुछ वामपंथी-प्रगतिशील टाइप के लोग ओबामा की भारत यात्रा का विरोध लाल-काले झंडे या बैंड दिखकर करेंगे। करें, खूब करें। अब उनके कने यही सब करने को रह गया है। मुझे लगता है, उनका ये विरोध 'जमीन' पर नहीं 'फेसबुक' पर ही होगा। आजकल वे सरकार, मंत्री, व्यवस्था आदि के खिलाफ विरोध सीधा फेसबुक पर ही दर्ज करवाने लगे हैं। 'जमीनी' राजनीति या विरोध अब उनके बस का रहा नहीं शायद।

अरे हां, 'आहत भावनाओं' के मारे संगठनों ने भी ओबामा की यात्रा और उन पर खरच की जा रही भारी-भरकम सिक्योरिटी का विरोध नहीं किया है। हो सकता है, उनके दिल में भी ओबामा से एक दफा हाथ मिलाने की तमन्ना पल रही हो। तब कहीं पढ़ा था, पहली दफा जब बिल क्लिंटन भारत आए थे, तब उनसे हाथ मिलाकर बहुत से सांसदों-नेताओं-मंत्रियों ने अपने हाथों को कई दिनों तलक धोया नहीं था। (बातें हैं बातों का क्या...)

अब आ रहे हैं तो आएं ओबामा भारत। जिनकी सेहत पर फर्क पड़ना हो पड़े। फिलहाल, आम आदमी तो अभी 'भीषण ठंड' का 'प्रकोप' ही झेल रहा है।

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

Ek Patra Chetan Bhagat Ke Naam

पियारे Chetan Bhagat,

चाहता तो मैं यही था कि तुम्हें यह लैटर 'रोमन लिपि' में ही लिखूं लेकिन लिख इसलिए नहीं पा रहा हूं क्योंकि यह न्यूजपेपर रोमन लिपि में न छपता है न छापता। इसलिए हिंदी में (कहीं-कहीं अंगरेजी शब्दों के साथ) लिख रहा हूं।

यार, तुम जब लिखते हो गजब करते हो। अपनी राइटिंग से न केवल राइटिंग फिल्ड बल्कि मार्केट में भी 'सेंसेशन' बनाए रहते हो। पर, तुम्हारी राइटिंग की मार्केटिंग स्ट्रेटजी को तुम या तुम्हारे चाहने वाले तो समझ सकते हैं किंतु हम हिंदी के राइटर नहीं समझ पाते। और पिल पड़ते हैं, तुम्हें और तुम्हारे लेखन को तरीके-तरीके से 'गरियाने'। हालांकि, यह हमें अच्छे से मालूम है कि तुम्हें गरियाकर हमें मिलने-मिलाने वाला कुछ नहीं पर क्या करें, इस बहाने 'मन की भड़ास' ही निकाल लेते हैं। यों भी, हिंदी राइटिंग में किसी भी फिल्ड के राइटर के पाठकों के बीच जल्दी फेमस होने पर भड़ास निकालना परंपरा सी रही है। सो, आजकल तुम निशाने पर हो।

तुमने यह कहकर कि "लेखन में देवनागरी की जगह रोमन लिपि अपनाइ जानी चाहिए" हम हिंदी राइटर्स को बेचैन-सा कर दिया है। तुम्हें नहीं पता कि तुमने कित्ती बड़ी बात कह दी है। तुम्हारे इस कहन से हम हिंदी के राइटर्स की कित्ती और किस हद तलक 'भाषागत भावनाएं' आहत हुई हैं। कुछ तो इस कदर आहत हैं कि तुम्हारे समस्त लेखन और किताबों को ही खारिज कर, तुम्हारा जबरदस्त 'बॉयकॉट' करने को कह रहे हैं। कह रहे हैं कि तुम रीडर या सोसाइटी के नहीं केवल 'मार्केट' के लेखक हो। मार्केट ने ही तुम्हें इत्ता बड़ा राइटर बनाया है।

मैं जानता हूं, तुम पर हमारे 'विरोध' का कोई असर न होगा। क्योंकि तुमने वो आर्टिकल लेखन के हिसाब से थोड़े मार्केट की डिमांड के हिसाब से लिखा था। मार्केट में जो चल रहा है, तुम अक्सर उसे ही सामने लाते हो। अच्छा है। किंतु पियारे चेतन हम हिंदी के राइटर्स न समझते ये मार्केट-सार्केट की बातें। हम तो सीधा-साधा सा लेखन करना जानते हैं। किताब बिकी तो ठीक, न बिकी तो भी ठीक। अब हम तुम थोड़े न हैं कि किताब रिलिज होने से पहले उसका मस्त एड बनवाएं या प्रोमोशन करें।

तुम्हारी समझ ने जित्ता काम किया, उत्ता तुमने अपने आर्टिकल में लिख दिया। चलो सही किया। कोई माने या न माने यह उसकी मर्जी।

लास्टली, बस एक बात जानना चाहता हूं तुमसे, अपनी अगली किताब तुम 'रोमन लिपि' में ही लाओगे न? अगर तुम ऐसा करते हो तो, बाइ 'हाफ गर्लफ्रैंड' की कसम, मैं सबसे पहले तुम्हारी किताब खरीदकर पढ़ूंगा और उस पर मस्त रिव्यू भी लिखूंगा। 

सोमवार, 19 जनवरी 2015

आहत भावनाओं की मार्केटिंग

जमाना चूंकि मार्केटिंग का है, इस नाते किसी भी चीज या बात की 'मार्केटिंग' आराम से की जा सकती है।

तो पियारे मैं 'आहत भावनाओं' की 'मार्केटिंग' करना चाहता हूं। इन दिनों लोगों की आहत भावनाएं जोर भी खूब मार रही हैं। समाज और साहित्य का हर दूसरा बंदा किसी न किसी चीज या बात को लेकर अपनी भावनाओं को आहत किए बैठा है। आहत भावनाओं के साथ जित्ता वो सड़कों पर उछल-कूद मचा रहा है, उससे कहीं ज्यादा सोशल नेटवर्किंग पर। अच्छा, सोशल नेटवर्किंग पर उसे अपनी आहत भावनाओं पर जित्ते 'कमेंट' मिल रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा 'लाइक'। वो इसी में 'चौड़ा' हुआ जा रहा है। चौड़ा क्यों न होगा, आहत भावनाओं की मार्केटिंग सोशल नेटवर्किंग से बेहतर कहीं और हो सकती है भला?

आजकल लोगों की भावनाएं पीके, कार्टून और चेतन भगत के कारण आहत हुई हुईं हैं। जिसके मन में जित्ता और जैसा भी आ रहा है, सोशल नेटवर्किंग पर अपनी आहत भावनाओं को 'एक्सप्रेस' कर रहा है। कोई 'अतिरेक' में जाकर तो कोई 'कूल' होकर। हालांकि कूल होकर लिखने वाले काफी कम हैं। क्योंकि वे अपनी आहत भावनाओं पर 'कंट्रोल' करना अच्छे से जानते हैं। होशियारी भी इसी में हैं कि आप सोशल नेटवर्किंग के प्लेटफार्म पर खुद को कित्ता कूल रख पाते हैं। यहां एंवई सीरियस होने का मतलब है, अपनी भद्द पिटवाना।

पीके पर लोगों की भावनाएं इस कारण आहत हो रखी हैं क्योंकि इसमें धर्म और देवी-देवताओं का अपमान टाइप कुछ है। आस्थावान वीर अपनी-अपनी आहत भावनाओं के साथ कभी सड़क तो कभी फेसबुक; जहां जगह मिल रही है, 'हुड़दंग' काट रहे हैं। पीके को पीके (मतलब फिल्म) की तरह न ले रहे हैं। 'सेंटिमेंटल' टाइप हुए जा रहे हैं। अक्लमंदी का तकाजा यह कहता है पियारे कि आहत भावनाओं के वीर 'फिल्म' का जवाब 'फिल्म' बनाकर दें। ठीक है न।

कार्टून को लेकर भी कुछ इसी टाइप की 'चिल्ल-पौं' मची हुई है। कार्टून से लोगों की भावनाएं आहत हैं। लेकिन कार्टून का जवाब कोई कार्टून बनाकर न दे रहा। सभी अपनी-अपनी आहत भावनाओं को लेकर 'बहसबाजी' में फंसे-उलझे हुए हैं।

अब हिंदी भाषा प्रेमियों की भावनाएं चेतन भगत के एक लेख से आहत हैं। चेतन का कहना है, 'हमें लेखन में देवनागरी की जगह रोमन लिपि को अपनाना चाहिए।' अब चेतन को हिंदी की तासीर के बारे में क्या मालूम? वो तो मूलतः अंगरेजी के लेखक हैं। अंगरेजी में लिखते हैं। अंगरेजी में सोचते हैं। अंगरेजी के दम पर ही नाम और दाम कमा रहे हैं। लेकिन हिंदी में मामला जरा दूसरा है। यहां लोग लिखते कम, जलते ज्यादा हैं। खुद अपनी भाषा के साथ चाहे जैसा व्यवहार करते हों मगर अंगरेजी वाला कुछ दे तो भाई लोग राशन-पानी लेकर उस पर चढ़ लेते हैं। चेतन भगत के साथ भी ऐसा ही कुछ मामला बन रहा है  इन दिनों। हिंदी के लेखक अपनी-अपनी आहत भावनाओं की खिचड़ी फेसबुक पर पका रहे हैं।

अमां, चेतन के दिमाग में एक बात आई उसने लिख दी। अब यह मर्जी आपकी कि 'मानो' या 'न मानो'। खामखां, अपनी भावनाओं को आहत क्यों किए बैठे हो। चेतन को देखो, उसने मात्र एक लेख के दम पर आपकी आहत भावनाओं के साथ अपनी 'मार्किटिंग' कर ली। आज हिंदी का बड़े से बड़ा लेखक-साहित्यकार चेतन की बहस में उलझा हुआ है। पियारे इसी को तो कहते हैं, 'शुद्ध मार्केटिंग'। लेकिन, हम हिंदी वाले तो आहत भावनाओं के दम पर ही 'जग-प्रसिद्ध' होना चाहते हैं।

कभी-कभी लगता है, हमारी भावनाएं वाकई कित्ती 'कमजोर' पड़ चुकी हैं कि 'सेकेंड' भर में 'आहत' हो जाती हैं। आहत भावनाओं के साथ हम अपना 'आपा' तक खो बैठते हैं। दिमाग को 'ठंडा' रख यह सोचने-समझने की कोशिश ही नहीं करते कि हम भावनाओं को व्यक्त नहीं उसका सरेआम 'मजाक' उड़ा रहे हैं।

क्यों न भावनाओं को भावनाएं ही बना रहने दिया जाए। उन्हें आहत करने से क्या हासिल? इसीलिए तो मैं अपनी आहत भावनाओं की मार्केटिंग पर ध्यान ज्यादा देता हूं ताकि भावनाएं 'कूल' रहें।

शनिवार, 10 जनवरी 2015

मेरा कार्टून बनाइए

जी हां। मैं तैयार हूं। आइए, मेरा कार्टून बनाइए। कैसा भी बनाइए। कहीं से भी बनाइए। न मुझे 'एतराज' होगा, न मैं 'विरोध' करूंगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध जब आज तलक मैंने खुद से नहीं किया तो पियारे तुमसे क्या करूंगा। मुझे अभिव्यक्ति की खातिर सहमत-असहमत होना 'मंजूर' है, 'मार' डालना नहीं।

अपना कार्टून बनाने के लिए मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैं लगता-दिखता ही 'कार्टून' हूं। मेरी पत्नी मुझे मेरे नाम से नहीं 'कार्टून' कहकर ही बुलाती है। अपने नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों, दोस्तों, लेखक बिरादरी के बीच मैं बतौर 'कार्टून-लेखक' मशहूर हूं। न जाने कित्ती ही दफा मेरी बड़ी बेटी मेरा कार्टून बनाकर गेट के बाहर चिपका चुकी है। मोहल्ले वाले मेरा कार्टून देखकर मुझ पर हंसते और बेटी को उम्दा आर्ट के तईं बधाईयां देते हैं। तब मुझे मेरी कार्टून शक्ल के साथ-साथ बेटी पर भी 'गर्व' होता है।

मैंने अब तक का अपना जीवन 'कार्टूनपंती' में ही जिया है। मेरे दिलो-दिमाग पर कार्टून और व्यंग्य हर वक्त 'खुमारी' की मानिंद छाए रहते हैं। मुझे दूसरे पर व्यंग्य करने से कहीं ज्यादा मजा खुद पर करने में आता है। खुद पर व्यंग्य कर मैं खुद को शब्दों में निचोड़ लेता हूं। उस निचोड़ का अपना ही लुत्फ है पियारे।

मुझे कभी-कभी खुद में खुशवंत सिंह की 'आत्मा' का 'अहसास' होता है। कित्ता बड़ा 'जिगर' था खुशवंत सिंह का कि उन्हें अपने ऊपर बने कार्टूनों पर कभी गुस्सा नहीं आया। न ही कभी विरोध किया। हां, वे अक्सर यह जरूर कहा करते थे कि मैं कित्ता 'बकवास' लिखता हूं। कुछ मायनों में मेरे लेखन की प्रेरणा खुशवंत सिंह का 'बकवास लेखन' ही है। इसीलिए मैं न व्यंग्य से घबराता हूं न कार्टून का बुरा मानता हूं।

अमां, ऐसे सीधे-सादे लेखन से भी क्या फायदा जब तलक उसमें 'तंज' न हो। तंज लेखन की बुनियाद है। कार्टून और व्यंग्य इसीलिए बनाए और लिखे जाते हैं ताकि दुनिया-समाज-व्यवस्था-व्यक्ति-जाति-धर्म-कट्टरता को 'कटाक्षपूर्ण आईना' दिखाया जा सके। यही वो आईना है, जिसमें हमें हमारी शक्ल ठीक-ठीक दिखती है। बाकी तो सब एक-दूसरे को प्रभावित करने के चोचले हैं।

अगर कार्टून न हो तो दुनिया कित्ती 'बोरिंग' लगेगी। कार्टून हमारे भीतर 'मीठी चुभन' जगाने के लिए होते हैं नाकि दिल पे लेने के लिए। आप एक कार्टूनिस्ट को मौत की नींद सुलाएंगे तो उस जैसे दस और खड़े हो जाएंगे। कार्टूनिस्ट का काम ही सोते को नींद से जगाना है फिर भला वो कैसे सो सकता है?

इसीलिए तो मैं दुनियाभर के कार्टूनिस्टों को खुला निमंत्रण दे रहा हूं कि आइए, मेरा कार्टून बनाइए। मुझे बेइंतहा खुशी होगी। मुझे लगेगा कि मैंने अभिव्यक्ति की आजादी का पूरा सम्मान किया है। मुझे ऐसे सम्मान देना पसंद है।

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

गिरना सेंसेक्स का

एक जरा सेंसेक्स 800 पाइंट क्या 'खिसक' गया, दलाल पथ पर 'कोहराम'-सा मचा गया। लग लिए सब के सब सेंसेक्स को 'कोसने'। करने लगे चर्चाएं सब के सब कि सेंसेक्स तो अब गया। पप्पू पनबाड़ी से लेकर जमनालाल दलाल तक 'डर' के मारे दोहरे हो लिए। माथे पर हाथ रख यों मुंह टेड़ा-मेड़ा करने लगे, जाने कौन-सा 'जलजला' आ गया हो शेयर बाजार में।

वाकई कित्ता 'डरपोक' हैं न हम। जरा-जरा सी बातों-मसलों पर 'डर' जाते हैं। अरे, सेंसेक्स का इंडेक्स ही तो गिरा है, शेयर बाजार बंद थोड़े न हो गया। ऐसा सेंसेक्स के इतिहास में न जाने कित्ती दफा हुआ है। फिर, गिर-गिरकर संभला भी तो है सेंसेक्स। और क्या खूब संभला है। अगर संभला न होता तो अठ्ठाइस हजार के पार न पहुंचा होता। सेंसेक्स के भीतर गिरकर संभले की 'ताकत' हम इंसानों से कहीं ज्यादा है।

बुरा न मानइयो पियारे, हम सेंसेक्स को लेकर 'दोगली सोच' रखते हैं। सेंसेक्स जब चढ़ रहा होता है, तब हमारे हौसले इस कदर बुलंद होते हैं कि सीधा एवरेस्ट पर ही जा बैठते हैं। लेकिन जब सेंसेक्स गिरता है, तब इस कदर 'मद्दे' में आ जाते हैं, जैसे शेयर बाजार पर 'ताला' ही पड़ने वाला हो। सेंसेक्स को लेकर हमारे भीतर 'पेशैंस' नाम ही चीज है ही नहीं। गिरावट में हम सेंसेक्स का इत्ता 'बुरा' सोच लेते हैं, इत्ता तो कोई अपने 'दुश्मन' का भी न सोचता।

अभी कुछ दिन पहले जब सेंसेक्स 'अच्छे दिनों' की 'लहर' पर सवार था, तब हर किसी के 'चेहरे गुलाबी' और 'इरादे फौलादी' थे। न जाने कित्ते ही सेंसेक्स-भक्तों ने अपने घर में भगवानजी की मूर्ति के करीब सेंसेक्स की भी तस्वीर रख ली थी। आधी पूजा भगवानजी की और आधी सेंसेक्स महाराज की किया करते थे। मेरे मोहल्ले के एक परम सेंसेक्स-भक्त ने तो सेंसेक्स महाराज के 'सम्मान' में 'अखंड सेंसेक्स पाठ' तक करवा डाला था। मैं खुद उसमें शामिल हुआ था। पाठ के बाद सेंसेक्स महाराज के नाम का 'प्रसाद' भी वितरित हुआ था।

लेकिन, अब वही परम सेंसेक्स-भक्त मुंह लटकाए है। 800 पाइंट सेंसेक्स के लुढ़ने पर सेंसेक्स महाराज की पूजा तो छोड़िए, उसकी तरफ देखना तक बंद कर दिया है। इत्ते दिनों से सरपट-सरपट भागते सेंसेक्स ने एक जरा सा 'सुसताऊ ब्रेक' क्या ले लिया, भक्तों की तो 'भावनाएं आहत' हो गईं। अभी तलक भावनाएं 'पीके' देखकर आहत हो रही थीं, अब सेंसेक्स के गिरने पर भी होने लगीं। कमाल है पियारे। इंसानी भावनाओं का वाकई कोई भरोसा नहीं कब में 'बिदक' जाएं।

और सुनिए, शेयर बाजार के बड़े-बड़े पंडित फरमा रहे हैं कि सेंसेक्स का 'मूड' क्रूड ऑयल का तेल निकलने, एफआइआइ के भारी मात्रा में बाजार से पैसा निकालने और मंदी की आहट के कारण 'बिगड़ा' है। यह कोई 'नई बात' तो नहीं है पियारे। सेंसेक्स के लुढ़कने पर हर बार कोई न कोई ऐसा ही 'जुमला' छोड़ दिया जाता है। फिर सब 'शांत' हो जाते हैं। सौ बातों की एक बात- सेंसेक्स को गिरना था और वो गिर गया। बात खत्म। इत्ते महीनों से इत्ती ऊंची-ऊंची चढ़ाईयां चढ़ते-चढ़ते क्या सेंसेक्स 'थका' न होगा? आखिर उसको भी तो 'आराम' की जरूरत है। उसका भी तो घर-परिवार है। इसलिए एक-दो दिन उसने भी अपनी फुर्सत के निकाल लिए।

हां, सेंसेक्स के गिरने से 'मंदड़ियों' के चेहरे अवश्य 'खिल' गए। उन्हें तो 'जन्नत' हासिल हो गई। कहने का मौका मिल गया- सेंसेक्स के अब 'बुरे दिन' आ गए। लेकिन शेयर बाजार में मंदड़ियों का स्थिति 'चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात' जैसी है। मंदड़ियों का बस चले तो सेंसेक्स के पैरों में बेड़ियां डाल उसे आगे बढ़ने ही न दें। पर हमारा सेंसेक्स बहुत 'दिलेर' है। वक्त आने पर मंदड़ियों को 'धोबी पछाड़' दे ही देता है। फिर सब लाइन पर आ जाते हैं।

इसीलिए सेंसेक्स की गिरावट पर यों 'मायूस' होने की जरूरत नहीं। गिरना-चढ़ना तो सेंसेक्स का 'लाइफ-स्टाइल' है। गिरकर संभलने और संभलकर जीतने वाला ही तो 'विनर' कहलाता है। तब ही तो सेंसेक्स शेयर बाजार का 'इंडेक्स-विनर' है। है कि नहीं...!

सोमवार, 5 जनवरी 2015

दिमाग बनाम खोपड़ी

मैंने तय किया है कि मैं 2015 में भी 'दिमाग' से नहीं केवल 'खोपड़ी' से ही कम लूंगा। खोपड़ी से काम लेना मुझे दिमाग की अपेक्षा ज्यादा सहज व सरल लगता है। दिमाग 'चिकचिक' बहुत किया करता है। जबकि खोपड़ी 'खामोशी' से अपना काम करती रहती है। दिमाग के साथ सबसे बड़ा 'लोचा' इसकी संवेदनाओं का बहुत जल्द एक्टिव हो जाना है। जहां जरा-सा कुछ हुआ नहीं कि तुरंत दिमाग पर लोड पड़ना चालू। इसी वजह से दिमागदार लोगों की 'भावनाएं' (संवेदनाओं में बहकर) बहुत जल्द आहत हो जाती हैं। तब ही तो लोग 'पीके' पर 'पीकर' जैसा बवाल करने पर उतारू हो जाते हैं।

अरे, दिमाग मिलने का यह मतलब थोड़े न है कि हर वक्त, हर कहीं, हर मसले में उसका 'इस्तेमाल' किया ही जाए! कुछ चीजें, कुछ बातें दिमाग से इतर सोच-समझकर भी कर लेनी चाहिए; मेरी तरह से। दिमाग तो एकदम 'ठलुआ मशीनरी' है, उसे जित्ता ज्यादा चलाओगे, वो उत्ता तेज दौड़ेगी। बस यही तेज दौड़-भाग काम खराब कर देती है। पहुंचना कहां होता है और पहुंच कहीं जाते हैं। इसीलिए तो दिमागदार लोग ज्यादा भटके हुए होते हैं।

खोपड़ी दिमाग से एकदम 'उलट' काम करती है। खोपड़ी के साथ जल्दीबाजी या तेजी जैसा कोई अंझट-झंझट नहीं होता। उसकी हड्डियों में जित्ता सोचने-समझने-विचारने की शक्ति होती है, उत्ता ही उसे उपयोग में लाती है। बेमतलब लोड लेना न खोपड़ी को मंजूर है न ही उसकी फितरत। जित्ती अच्छे से और मस्ती से कट जाए, उत्ता ही ठीक।

यह मेरा 'पर्सनल एक्सपीरियंस' है कि मैंने कभी अपनी खोपड़ी को 'स्ट्रेस' में नहीं देखा है। मेरी खोपड़ी जित्ता मस्त खुद रहती है, उत्ता ही मस्त मुझे भी रखती है। मेरे व्यक्तित्व में हंसने-हंसाने और मौज के साथ लाइफ को जीने का उत्साह केवल खोपड़ी के कारण ही हैं। वरना दिमाग ने तो मुझे 'डिप्रेशन' में झौंक ही डाला था पियारे।

और हां बतला दूं, यह व्यंग्य-लेख भी मैंने दिमाग के नहीं खोपड़ी के इस्तेमाल के साथ लिख है। आज लेखन में मैं जो कुछ भी हूं केवल अपनी खोपड़ी के कारण हूं। जब दिमाग से लिखा करता था, तब लेखन में 'गंभीरता' का बोझ बहुत बढ़ा गया था। हर समय गंभीर-गंभीर से ख्याल-विचार में दिमाग आते रहते थे। तब लेखन के साथ-साथ लाइफ भी बड़ी कॉपलीकेटिड सी हो गई थी पियारे।

लेकिन जब से दिमाग को त्याग खोपड़ी का इस्तेमाल शुरू किया है, काफी आराम है।

मैं जिद नहीं कर रहा, केवल राय दे रहा हूं, चाहें तो आप लोग भी नए साल से दिमाग की जगह खोपड़ी की सहायता लेना शुरू कर सकते हैं। बाकी दिमाग है आपका। खोपड़ी है आपकी। मर्जी है आपकी।