गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

रजाई में नया साल

देख रहा हूं, लोग बाग नई-नई जगहों पर जाकर नया साल मनाने की तैयारियां कर रहे हैं। कोई विदेश की सैर को निकल रहा है तो कोई देश में रहकर ही किसी गर्म-ठंडे प्रदेश को। कोई क्लब-पार्टी में जाम और डांस के साथ नया साल मनाने को उतावला हुआ जा रहा है। तो कोई बुरी को छोड़कर अच्छी आदतें डालने का 'संकल्प' ले रहा है। नए साल के स्वागत का क्रेज लोगों के मन-मस्तिष्क पर जुनून की माफिक तारी है।

लेकिन मैं नया साल मनाने कहीं बाहर नहीं जा रहा। पत्नी व रिश्तेदारों से साफ कह दिया है कि मैं नया साल घर पर रहकर अपनी प्यारी रजाई में ही मनाऊंगा। नए साल के जश्न के वास्ते फूंकने को न मेरे कने पैसे हैं, न टाइम। साल का स्वागत तो रजाई में रहकर भी किया जा सकता है।

इधर-उधर जाकर यहां-वहां पीकर गिर पड़ने से तो बेहतर है, अपनी रजाई में ही पड़े रहना। रजाई में बैठकर पीने का आनंद ही अलग है। कम पीयो या ज्यादा, यहां कौन टोकने वाला है। पीकर बहको या ओको करना सब रजाई में ही है। इस बहाने दुनिया की नजरों से तो बचा रहूंगा।

सुनकर हैरानी जरूर होगी। मैंने आज तलक कोई भी नया साल रजाई से इतर सेलिब्रेट नहीं किया। मित्रों ने अगर कभी जिद करी भी तो उन्हें घर पर ही बुला लिया। रजाई में रहकर नया साल मनाने के लिए। रजाई का अपना ही मजा है। रजाई में रहकर चिंतन और सेलिब्रेशन दोनों ही बड़े आराम से किए जा सकते हैं।

मेरी रजाई के मुझ पर बहुत 'एहसान' हैं। मैं कित्ती ही देर इसके भीतर बैठकर चिंतन, लेखन, मनोरंजन करता हूं, कभी बुरा नहीं मानती। बल्कि खास ख्याल रखती है कहीं मुझे ठंड न लगे। इत्ते सालों के बाद- मेरी जवानी भले ही ढल रही हो- मगर रजाई की जवानी आज भी टनाटन है। इसमें बैठकर मुझे वो सुख मिलता है, जो हिटर या ब्लोअर तक नहीं दे सकता।

एक सच यह भी है, अगर रजाई न होती तो शायद मैं लेखक भी न होता। मुझे लेखक बनाने में किसी गॉड-फादर का नहीं बल्कि रजाई का बहुत बड़ा हाथ है। मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ लेखन रजाई में रहकर ही किया है। हर तरीके से मैं मेरी रजाई का एहसानमंद हूं।

अब इत्ती प्यारी रजाई को छोड़कर नया साल मैं किसी क्लब या होटल में मनाऊं; न जी न कतई नहीं। मैं भला, मेरी रजाई भली।

नया साल मुबारक।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

जाने वाले साल को सलाम

...और कुछ घंटों बाद ये साल भी अलविदा कह लेगा। साल के साथ बिताए दिनों-लम्हों की यादें ही हमारे कने रह जाएंगी। खट्टी-मीठी बातें ही यादगार बनी रहेंगी। बिना किसी से शिकवा-शिकायत किए-रखे मेरे लिए तो ये साल 'मस्त' रहा।

मैंने तो साल भर दबाकर लिखा। लिखकर खूब कमाई की। पढ़ा भी खूब। हां, बुद्धिजीवियों की मंडली से दूर ही रहा। न किसी बुद्धिजीवि से मिलने गया, न किसी को घर बुलाया। जिंदगी को जित्ता 'आराम' से जिया और लेखन को जित्ता 'चैन' से किया जाए, उसी में मजा है। वरना खाली-पाली 'ठलुअई' करने में क्या जाता है।

देश के राजनीतिक माहौल ने 'मनोरंजन' को दोगुना कर दिया। कभी चुनावी मनोरंजन तो कभी नेताओं की आपसी तू-तू, मैं-मैं। कभी जुमलों की फेंका-फांकी तो कभी बयानों की फुलझड़ियां। देश के नेताओं ने पूरे साल इस बात का खास ख्याल रखा कि जनता के मनोरंजन में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए। चाहे जन-हित में आ जाए।

साथ-साथ सहिष्णुता-असहिष्णुता पर बहस-विवाद भी 'धांसू' चली। गौरतलब ये रहा कि असहिष्णुता के डंक ने सबसे अधिक तथाकथित बुद्धिजीवियों-साहित्यकारों, फिल्मी कलाकरों को ही 'परेशान' किया। हवाबाजी में कित्तों ने ही अपने सम्मान-पुरस्कार लौटा दिए। लेकिन आम आदमी को ये सब कहीं महसूस नहीं हुआ। उसे तो केवल अपनी रोजी-रोटी से ही मतलब रहा। सही भी है, बंदा जब महानता के ग्राफ से आगे बढ़ जाता है, तब उसके नखरे भी आला-दर्जे के हो जाते हैं। अपना तो मनोरंजन यहां भी जबरदस्त हुआ।

दिल्ली की हवा प्रदूषण ने खराब कर रखी है। इसीलिए केजरीवालजी ऑड-इवन का फार्मूला लेके आए हैं। ऑड-इवन के फार्मूले पर सहमतियां कम, आलोचनाएं अधिक हो रही हैं। जिनके कने एक ही कार है, वे बेचारे दफ्तर आने-जाने की परेशानियों से कैसे जूझेंगे ये सोच-सोचकर ही दुबले हुए जा रहे हैं। उधर कार कंपनियां ये उम्मीद बांधे बैठी हैं कि शायद हमारी सेल में और बृद्धि हो जाए। ऑड-इवन की आड़ में सब अपनी-अपनी जुगाड़ तलाश रहे हैं। ये मनोरंजन भी कम दिलचस्प न है प्यारे।

महंगाई की तल्खी भी पूरे साल छाए रही। न वो, न ये इत्ते वायदों के बाद भी महंगाई पर लगाम न कस सके। विपक्ष और जनता ने महंगाई पर कुछ दिन हंगामा काटा फिर सब शांत होकर बैठ गए। सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर मनोरंजन किया सो अलग।

अच्छा, मोदी विरोधियों ने भी साल भर जमकर अपना मनोरंजन करवाया। बेचारे हर वक्त इस जुगाड़ में लग रहे कि कब मोदीजी कुछ कहें और वे लपकर हाय-हाय करने में जुट जाएं। मोदीजी भी क्या खूब निकले, उन्होंने अचानक से पाकिस्तान पहुंचकर न केवल नवाज शरीफ बल्कि विरोधियों को भी चारों-खाने चित्त कर दिया। विरोधी अब घणी मुसीबत में हैं कि कहें तो क्या कहें। यह गुजरते साल का सबसे 'मनोरंजक सीन' रहा। क्यों प्यारे।

खैर, साल भर जो-जैसा घटा कुछ मीठा, कुछ कड़वा रहा। मगर मनोरंजन कायम रहा। मनोरंजन ही जिंदगी है। बाकी में क्या रखा है।

अब तो बस जाते हुए साल को 'सलाम' कहने का दिल है। और आने वाले साल का स्वागत।

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

जो लिखा सर्वश्रेष्ठ लिखा

चंद रोज पहले एक परम-मित्र ने मुझसे पूछा- 'यार, साल 2015 का अपना लिखा कोई 'सर्वश्रेष्ठ' व्यंग्य बताओ? मैंने कहा- 'इत्ते लिखे व्यंग्यों में किसी एक को 'सर्वश्रेष्ठ' बताना मेरे तईं बहुत कठिन है। मेरे लिए मेरा लिखा सबकुछ सर्वश्रेष्ठ ही है। सर्वश्रेष्ठ से नीचे मैं कुछ लिखता ही नहीं।'

मेरी सुनकर मित्र थोड़ा सकुचाया-मुस्कुराया। फिर बोला- 'तूने तो अपने संपूर्ण लेखन को ही सर्वश्रेष्ठ करार दे दिया। यानी, अपना आकलन एवं मूल्याकंन खुद ही। गजब।' मैंने उसे समझाया- 'प्यारे, मैं अपने लेखन का आकलन या मूल्याकंन दूसरों से करवाने में यकीन नहीं रखता। 'बाल की खाल' न दूसरों की निकालता हूं, न खुद की निकालने देता हूं। सर्वश्रेष्ठ हूं। सर्वश्रेष्ठ से कमतर कुछ लिखता नहीं।'

अबकी दफा मित्र अपने माथे पर थोड़ा बल रखकर बोला- 'वाह! खुद को महान कहने का बड़ा शौक है तुझे। ऐसा तो कभी न परसाई, न जोशी, न प्रेमचंद, न रेणु ने अपने बारे में नहीं कहा। लोगों ने ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ और उनके लेखन को 'महान' बनाया।' मैंने उसकी गलती को सुधारते हुए कहा- 'पहली बात इत्ते बड़े-बड़े लेखकों से मेरी तुलना ही गलत है। उन्होंने अपना लिखकर महानता हासिल की, मैं अपना लिखकर कर रहा हूं। भले ही उन्होंने अपने लेखन को सर्वश्रेष्ठ न कहा हो पर मैं अपने बारे में कह रहा हूं। खुद के बारे में कुछ भी राय रखना, ये मेरा लोकतांत्रिक अधिकार है मियां।'

मित्र लगभग खीझते हुए बोला- 'अगर ऐसा ही है तो तेरे लेखन में सर्वश्रेष्ठ जैसा कुछ है ही नहीं, जिसकी तू इत्ती तारीफ कर रहा है। तू एकदम 'कूड़ा' लिखता है। तेरे लेखन में न धीरता है, न गंभीरता, न ही सुंदरता।'

सच बोलूं तो मेरे लेखन पर खीझने वाले लोग मुझे बेहद पसंद हैं। इसीलिए मैं मेरे परम-मित्र की जली-कटी पर रत्तीभर नाराज न हुआ। इत्मिनान से जवाब दिया। 'प्यारे, तेरा तहे-दिल से शुक्रिया कि तुझे मेरा लिखा कूड़ा लगा। अब गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैं 'सर्वश्रेष्ठ कूड़ा' लिखता हूं! शायद यही वजह है कि मेरी अब तलक न कोई किताब है, न अंटी में कोई पुरस्कार। किताब और पुरस्कार के लिए जुगाड़ वे बैठाते हैं, जिन्हें अपने तईं किसी छोटे-बड़े सम्मान को हासिल करना होता है। मेरे लिए तो मेरा लिखा ही सबकुछ है। तेरे साथ-साथ पाठकों का धन्यवाद कि वे मुझे पढ़ते हैं। उनकी आलोचना और प्रशंसा दोनों के प्रति नतमस्तक हूं।'

लगे हाथ मैंने उसे ये भी बता दिया कि 'व्यंग्य में अगर गंभीरता और धीरता को घुसेड़ दूंगा फिर व्यंग्य किस काम का रह जाएगा? व्यंग्य का मतलब ही है, मीठी छुरी से मीठा वार करना ताकि सामने वाले की सुलगे तो मगर मीठास के साथ। इसी में व्यंग्य-लेखन का मजा है।'

लगा कि मेरे प्रवचनों सुनकर मित्र काफी पक गया है सो उसके मूड को थोड़ा 'लाइट' किया- 'चार बोतल वोदका, काम मेरा रोज का...' गाना दिखाकर। कुछ देर बाद मित्र मूड में आ गया और बोला- 'ये गाना भी तेरे लेखन जित्ता ही सर्वश्रेष्ठ है!' तुरंत सवाल दागा- 'यार, तू फिल्मों में गाने क्यों नहीं लिखता? बड़ा स्कोप है। कहें तो बात करवाऊं, मेरी जुगाड़ है वहां।'

मैंने कहा- 'नहीं प्यारे मैं मेरे व्यंग्य-लेखन से ही संतुष्ट हूं। चादर से बाहर पैर पसारने की आदत नहीं मुझे। तुझ जैसे सुधि पाठक मुझे पढ़कर राय दे देते हैं, मेरे तईं बहुत है। शिकायत किसी से रखता नहीं हूं। मस्ती के साथ जिंदगी और लेखन को जीता हूं। तेरे प्रपोजल का शुक्रिया।'

मित्र ने 'मेरी बात का बुरा न मानना यार...' कहते हुए मुझे 2016 की शुभकामनाएं देते हुए विदा ली। मैं भी उसे शुभकामनाएं देने के बाद अपने सर्वश्रेष्ठ लेखन में जुट गया।

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

असहिष्णुता पर छिड़ा अजीबो-गरीब दंगल

डरे सिर्फ आमिर खान या उनकी पत्नी ही नहीं हैं, डर मैं भी गया हूं। और, इत्ता डर गया हूं कि सड़क चलते अगर कोई मुझसे कहीं का पता ही पूछने लगता है, तो 'घबराकर' बता नहीं पाता। मन में तुरंत यह 'डर' घर कर जाता है कि सही पता बताने के बावजूद अगला मुझे कहीं 'असहिष्णु' न समझ ले। असहिष्णुता के डर ने हमारे आस-पास ऐसा माहौल बना दिया है कि अब तो बाहर वालों की छोड़िए पत्नी की बात काट में ही डर लगता है। क्या पता कब पत्नी मुझे असहिष्णु घोषित कर गरिया दे!

असहिष्णुता पर छिड़ी तकरार दिन-ब-दिन बढ़ती ही चली जा रही है। सड़क, चौराहे, दफ्तर, घर पर अब सामाजिक या परिवारिक मुद्दों पर बात कम असहिष्णुता पर बहस ज्यादा होती है। अब तो लोग फेसबुक, टि्वटर, वाह्ट्एप पर एक-दूसरे का हाल-चाल बाद में पूछते हैं, पहले असहिष्णुता के मुद्दे पर सामने वाले की 'राय' जानना चाहते हैं। अगले की राय अगर उनकी राय से मेल खाती है तो ठीक; नहीं तो दे गाली, दे गाली, दे गाली...।

यानी, असहमति का मतलब अब गालियां हो गई हैं। लोगों के बीच अपने नायकों के प्रति 'भक्तिभाव' जरूरत से ज्यादा ही बढ़ गया है। यही वजह है कि मैं किसी को भी किसी भी मुद्दे पर अपनी राय न देता हूं न उनकी राय लेता हूं। जो दिल में होता है, उसे लिखकर खुद को हल्का कर लेता हूं। आजकल का जमाना कुछ ऐसा ही है प्यारे- न किसी से हिलगो, न किसी को हिलगाओ। कानों में तेल डाले और आंखों पर पट्टी बांधे जो चल रहा है, यों ही चलते रहने दो।

डर के साथ-साथ असहिष्णुता अब 'मनोरंजन' या 'हिट' होने का सबब भी बनती जा रही है। जिनके कने कुछ नहीं है, वे असहिष्णुता पर ही बेतुके बयान दे-देकर मस्त फिरकी लेने में लगे हैं। टीवी चैनल वाले रात-दिन उन्हीं के बयानों पर डिबेट चला रहे हैं। डिबेट में भी खास कुछ होता नहीं। दो भिन्न पार्टियों के नेता आधा घंटे तक एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहते हैं। बेचारा दर्शक क्या करे, वो भी उनकी लड़ाई-भिड़ाई का असहिष्णुता के बहाने घर बैठे मनोरंजन करता रहता है। सड़क पर आनकर खुलकर बोल नहीं सकता। क्या पता कौन सी पार्टी या नेता उसे भी असहिष्णु घोषित कर दे।

पहले मैं रात में 'रंगीन सपने' आने से परेशान रहता था, अब मुझे 'असहिष्णुता' के सपने आते हैं। कल रात का सपना तो बहुत ही भयानक था। मैंने देखा कि पत्नी ने मुझे इस वजह से तलाक देने की घमकी दी है क्योंकि मैंने उसे आईफोन दिलवाने से मना कर दिया था। उसने तुरंत मुझे असहिष्णु पति कहते हुए तलाक देने की घमकी दे डाली। कल रात से मैं इत्ता डरा हुआ हूं कि आज का पूरा दिन 'तलाक के बाद मेरा क्या होगा' इसी सोच में बीत गया। हालांकि वो मात्र सपना ही था। पर पत्नी के मूड का क्या भरोसा कब सेंसेक्स की माफिक बदल जाए!

काबिल लोग हालांकि बार-बार यह कहकर 'सांत्वता' दे रहे हैं कि देश-समाज का माहौल जरा भी असहिष्णु नहीं है। यहां हर कोई 'आराम' से रह सकता है। हम एक 'सहिष्णु मुल्क' हैं। अफवाहों पर ध्यान न दें। मानना तो मेरा भी यही है कि असहिष्णुता जैसा यहां कुछ भी नहीं। मगर बयानवीरों का क्या कीजिएगा, वो तो पिद्दी भरी बात पर ही ऐसा करारा बयान दे डालते हैं कि भीतर तलक सुलग जाती है। बात-बात में तो पाकिस्तान चले जाने की धमकी दे डालते हैं। अब आप ही बताओ कि डर लगेगा कि नहीं? आखिर असहमति-आलोचना का भी तो 'सम्मान' होना चाहिए न। इस बात पर तो राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री तक अपनी मोहर लगा चुके हैं। किंतु दिलजलों कौन समझाए?

रही बात आमिर खान की तो उन्हें अपनी पत्नी की बात अपने तक ही सीमित रखनी चाहिए थी। काहे भरी सभा में यह सब उगल दिया। अगर ये सब उन्होंने असहिष्णुता पर फिरकी लेने या फिर अपनी आने वाली फिल्म 'दंगल' में मंगल करवाने के लिए कहा तो बात अलग है। मगर समाज का सेंटिमेंट भी तो उन्हें समझना चाहिए न। पहले माहौल कुछ और था, अब कुछ और है।

असहिष्णुता पर छड़ा दंगल चाहे कोई-कैसा भी एंगल ले ले पर हमें इस बात पर 'संतोष' करना चाहिए कि देश-समाज में 'सहिष्णु' लोग भी रहते हैं।

किस्मत हो तो सल्लू मियां जैसी

मां कसम खून खौल जाता है अगर मुझे कोई लेखक कहकर पुकार ले। मन करता है कहने वाले के मुंह में लाल मिर्ची भर दूं। और प्रोमिस लूं कि अब कभी मुझे वो लेखक कहकर नहीं बुलाएगा। चाहे गुंडा, मवाली, चोर, उचक्का कुछ कह ले मगर लेखक न कहे।

अब तो लेखक शब्द से ही मुझे एलर्जी-सी होने लगी है। दो-चार व्यंग्य-श्यंग्य क्या लिख दिए, यहां वहां क्या छप-छपा गए कि लेखक होने का ठप्पा लग गया। लेखक होकर कमाया क्या, यह कोई नहीं पूछता। न न इज्जत और नाम की बात न कीजिएगा। अमां, इज्जत और नाम तो बदनाम लोग खूब कमा लेते हैं। नाम के साथ-साथ 'धाक' जमाते हैं सो अलग। शहर और मोहल्ले में 'सिक्का' चलता है उनका। लोग भाई-भाई कहकर इज्जत के साथ बुलाते हैं।

और एक मैं हूं न ढंग से मोहल्ले वाले जाते हैं न शहर-परिवार वाले। कभी-कभी तो पत्नी तक फुक्का-लेखक कहकर मजाक उड़ा डालती है। ताना मारकर कहती है- 'तुम अपने लेखन के दम पर एक ढंग का फोन तक तो मुझे दिलवा न पाए। क्या खाक बड़े लेखक हो! अरे, तुमसे भले तो नेता-अभिनेता लोग हैं। देखा है कभी उनकी पत्नियों को कित्ते ऐश से रहती हैं। बात मुंह से निकलने की देरी होती है और चीज हाजिर। एक तुम हो, सुबह से लेकर रात तक पन्ने काले-नीले करते रहते हो और बदले में मिलता क्या है ठेंगा।'

हालांकि पत्नी के ताने चूभते बहुत विकट हैं पर कभी-कभी उसकी कही बात ठीक लगती है। यह बात सही है, लेखक आप चाहे कित्ते भी बड़े या वरिष्ठ क्यों न हो लो पर कमाई उत्ती नहीं हो पाती। अपवाद को जाने दें पर सच यही है। लेखक का स्टेटस लेखक से ऊपर कभी नहीं उठ पाता। भले ही अपनी पीठ खुद चाहे वो कित्ती ही थपथपा ले।

जब से सल्लू मियां के बरी होने की खबर पत्नी को लगी है, उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं। बता दूं- मेरी पत्नी सल्लू मियां की बहुत बड़ी फैन है। हमारे बेडरूम में मेरी जगह सल्लू मियां की फोटू टांगकर रखती है। उस दिन मुझे हड़काते हुए कह रही थी- 'देखा तुमने सल्लू मियां बच गए। बचते क्यों नहीं, आखिर रूतबे का कुछ तो असर होना था न। इसे कहते हैं, सिक्का जमाके चलाना। सबके सब देखते रह गए और सल्लू मियां बेदाग निकल आए।'

जरूरी समझते हुए पत्नी को बीच में टोकते हुए मैंने कहा- 'लेकिन ये हुआ गलत। न्याय सबके साथ समान होना चाहिए। भेदभाव नहीं।' पत्नी ने आंखे तरेरी और बोली- 'क्या न्याय-फ्याय की रट लगाए हुए हो। जमाना बहुत बदल गया है। अब सबकुछ 'पैसा' है। जिसके कने पैसा खरच करने की कुव्वत है, यहां बस वही टिका रह सकता है। पैसे में बहुत ताकत होती है। ज्यादा दूर क्यों जाते हो, अपने को ही देख लो न, लेखक बनकर नाम भले ही कमाया हो पर पैसा तो नहीं कमाया न। दुनिया 'आदर्शवाद' से नहीं, सिर्फ पैसे और पैसे से ही चलती है। बात कड़वी है मगर है खरी।'

प्रैक्टिकली पत्नी कड़वा मगर सही कह रही थी। सारा खेल है पैसे का ही। इधर सल्लू मियां के बरी होने पर मिठाइयां बांटी जा रही थीं। उनके प्रशंसक ढोल-ताशे बजा रहे थे। उधर पीड़ित परिवारों के दिलों पर क्या गजरी, कोई पूछने वाला नहीं। यही तो फर्क है अमीरी-गरीबी के बीच चलने वाले न्याय का।

इसीलिए तो कभी-कभी लगता है कि बेकार ही लेखक हो गया। इससे अच्छा तो नेता या अभिनेता होता। कम से कम नाम-पैसा-रूतबा सब जेब में तो होता। पत्नी भी खुश रहती। जिंदगी एकदम ताने और तनाव से मुक्त टनाटन चल रही होती। मगर सबकी 'किस्मत' सल्लू मियां जैसी थोड़े न होती है प्यारे। है कि नहीं...।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

गणित और सम-विषम का लफड़ा

गणित मेरी बचपन से ही 'कमजोर' थी। गणित से मुझे उत्ता ही 'डर' लगा करता था, जित्ता पहाड़ देखकर उस पर चढ़ने से लगता है। गणित की वजह से मैं भिन्न-भिन्न क्लासों में कित्ती ही दफा 'फेल' हुआ। पापा के थप्पड़ खाए। क्लास-टीचर की घुड़कियां सहीं। मोहल्ले वालों के ताने झेले। पर गणित को मुझ पर 'दया' न आई। फिर आखिर में थक-हारकर उसने मुझे नहीं मैंने ही उसे 'छोड़' दिया।

आलम यह है कि आज भी कोई मुझसे नौ का पहाड़ा सुनाने को कहता है तो मैं बगलें झांकने लग जाता हूं। नौ का पहाड़ा सुनाना मुझे बीवी की जली-कटी सुनने से भी कठिन लगता है। बताने में कैसे 'शर्म' कि मुझे केवल दो का पहाड़ा ही अच्छे से आता है। बाकी पहाड़े न मैंने कभी याद करे, न ही मेरे पल्ले पड़े। फिर भी, जैसे-तैसे कर-कराके काम चला लेता हूं।

अभी कल ही बेटी ने, दिल्ली की गाड़ियां अब सम और विषम नंबरों के हिसाब से चला करेंगी, के बारे में मुझसे पूछ लिया। बेटी बोली- 'पापा, सम और विषम को जरा 'डिटेल' में समझाइए।' पहले तो मैं ना-नुकूर करता रहा। कल-परसों बताने पर टाल दिया। तिस पर भी जब वो नहीं मानी तो मैंने उससे कहा- 'देखो बेटा, गणित है मेरी बचपन से कमजोर। इसलिए सम और विषम को डिटेल में तो नहीं समझा सकता। हां, 'शॉर्ट' में बता सकता हूं पर प्रोमिस करो अपनी मम्मी को नहीं बोलोगी।'

खैर, बेटी मम्मी को न बोलने की बात पर राजी हो गई। फिर मैंने उसे बताया कि 'जब तलक तुम्हारी मम्मी से मेरी शादी नहीं हुई थी, तब तक मेरी स्थिति सम थी मगर शादी होने के बाद स्थिति विषम हो गई। यानी, कभी खुशी, कभी गम। तो बेटा ठीक ऐसी ही स्थिति अब दिल्ली वालों की हो गई है। अब वे सम और विषम नंबरों की गाड़ियां ही चला पाएंगे।'

बेटी ने कहा- 'पापा, दिल्ली के मुख्यमंत्री तो बहुत 'ईमानदार' हैं। उन्हें दिल्ली वालों का ख्याल रखना चाहिए। दिल्ली में जगहें कित्ती दूर-दूर हैं न। हमारी बरेली की तरह थोड़े न कि कुतुबखाना से पैदल चलकर दस-पंद्रहा मिनट में सिविल लाइंस पहुंच गए।' हां, बात तो तेरी ठीक है बेटा। पर ईमानदारी का कुछ खामियाजा तो दिल्ली वालों को भुगतना होगा ही न। अब तो वही होगा जैसा ईमानदार मुख्यमंत्री का फरमान है।' मैंने उत्तर दिया।

वैसे ईमानदारी भी किसी गणित से कम 'कठिन' नहीं होती। ससुरी शुरू से लेकर अंत तक समझ नहीं आती। कि, ईमानदार बंदा कब क्या कर जाए। मगर कोसने से क्या फायदा। दिल्ली वालों को सम और विषम के बीच खुद को 'एडजस्ट' करना ही होगा। चाहे हंसकर करें या रोकर।
इससे तो अपनी बरेली ही भली। यहां न सम का झंझट, न विषम का चक्कर। लाइफ एकदम चकाचक।

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

रजाई में लेखन

अगर रजाई न होती तो मैं लेखक भी न होता! न न हंसिए नहीं, ये सच है। देश-दुनिया में तमाम तरह के लेखक-साहित्यकार हुए हैं। लेखन का सबका अपना-अपना मिजाज रहा है। कुछ ने अपना लेखन नहा-धोकर, पैंट-शर्ट, सूट-बूट पहनकर किया तो कुछ ने रेल या हवाई यात्रा के दौरान। सभी ने अपने-अपने क्षेत्र में लेखन से पाई सफलता के झंडे गाड़े हैं।

लेखन में सफलता के झंडे तो मैंने भी गाड़े हैं पर रजाई में रहकर। जी हां मैंने अपना ज्यादातर लेखन रजाई में ही किया है। रजाई में लेखन का जो 'मजा' है, वो अन्यत्र नहीं। खासकर जाड़ों में रजाई के भीतर बैठकर लिखने में जो आनंद मिलता है, उसका जवाब नहीं। हालांकि लोग कहते हैं कि जाड़ों में चिंतन व लेखन की वाट लग जाती है मगर मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं है। मेरी 'क्रिएटिविटी' की बत्ती सबसे अधिक जाड़ों में ही जला करती है, रजाई के साथ।

मुझे जाड़े पसंद हैं। जाड़ों से मुझे जरा भी डर नहीं लगता। जाड़ा जित्ता अधिक पड़ता है, मेरे लेखन व चिंतन का ग्राफ उत्ता ही बढ़ता चला जाता है। रजाई में रहकर गर्मा-गर्म कॉफी पीते हुए लेखन करना स्वर्ग जित्ता सुखद है मेरे लिए। अपने लेखन का 'सर्वश्रेष्ठ' मैंने रजाई में बैठकर ही लिखा है।

पिछले पंद्रहा सालों से मेरे कने एक अदद रजाई है। इत्ते सालों में घर की जाने कित्ती ही चीजें चेंज हो गईं लेकिन रजाई नहीं बदली। रजाई बदलने के पीछे पत्नी से कित्ती ही दफा ठन भी चुकी है। बात मैयके जाने तक आ गई है। मगर मैंने साफ कह दिया- मैं एक बार को तुम्हें बदलने की सोच सकता हूं किंतु अपनी प्रिय रजाई को नहीं। रजाई में मेरा लेखन ही नहीं, मेरी जान बसती है। इसका साथ कभी नहीं छोड़ना मुझे।

अब तो मोहल्ले वाले भी रजाई को लेकर मेरी 'मजाक' बनाने लगे हैं किंतु मैं किसी की परवाह नहीं करता। केवल अपने मन की करता हूं। जिस रजाई ने मुझे लेखन में इत्ती ऊंचाईयों तक पहुंचाया, भला उसे ही बदल डालूं। क्यों...? अरे, ये तो जाड़े रहे मैं तो गर्मियों में भी अपना लेखन रजाई में रहकर ही करता हूं। गर्मियों में मेरी रजाई मुझे 'ठंडक' का एहसास कराती है।

अपनी रजाई मुझे इत्ती प्रिय है कि मैं इसे बाहर शादी-ब्याह में भी ले जाता हूं। वो क्या है कि मुझे अपनी रजाई के अलावा किसी दूसरे की रजाई में नींद ही नहीं आती। नींद का असली सुख मुझे मेरी रजाई में ही मिलता है। कभी-कभार तो रात के सफर में भी अपनी रजाई को साथ ले लेता हूं।

भला कंबल ओढ़ने वाले रजाई के सुख को क्या समझेंगे। जब भी मैंने कंबल में बैठकर चिंतन या लेखन किया, फेल ही रहा हूं। ससुरी दिमाग की बत्ती ही गोल कर देता है कंबल का बोझ। आलम ये है, जिस घर या कमरे में कंबल होते हैं, मैं वहां जाना ही पसंद नहीं करता। कंबल से मुझे उत्ती ही ऐलर्जी है, जित्ती बुद्धिजीवियों को आजकल मोदी सरकार से।

मैं तो हरदम अपनी रजाई का शुक्रिया अदा करता रहता हूं। अगर ये मेरी जिंदगी में न आई होती तो शायद मैं लेखक भी न बन पाता। लेखन के क्षेत्र में रजाई ने मुझे कभी 'घमंडी' नहीं होने दिया। हमेशा 'डाउन टू अर्थ' ही बनाए रखा। न कभी बुद्धिजीवि बनने का आईडिया दिया, न बुद्धिजीवियों के बीच बैठने को प्रेरित किया। लेखक पर जब बुद्धिजीवि होने का बुखार चढ़ जाता है फिर न वो घर का रह पाता है न घाट का। किंतु मेरे साथ ऐसा नहीं है, मैं कल भी रजाई में था, आज भी रजाई में हूं, भविष्य में भी रजाई में ही रहूंगा।

आज मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि हां मैं रजाई में रहकर लेखन करता हूं। रजाई मेरी दिलरूबा सरीखी है।

मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

भई मैं तो डरता हूं

पक्का फेंकते हैं वो लोग जो यह कहते हैं कि 'हम किसी से नहीं डरते'। कुछ ज्यादा या कम 'डरते' तो सभी हैं मगर खुलकर कहने में कतराते हैं। 'हम डरते हैं' कहने में नाक कटने का खतरा रहता है न। इंसान अपनी नाक बचाने की खातिर क्या-क्या जुगत नहीं लड़ता किसी से छिपा नहीं। इसीलिए डर के ऊपर 'हम किसी से नहीं डरते' का मुल्लमा चढ़ा दिया जाता है। ताकि दुनिया की निगाह में छवि जंग-बहादुर टाइप बनी रहे।

पहले मुझे भी इस बात का घणा गुमान था कि 'मैं किसी से नहीं डरता'। चाहे खुदा ही क्यों न सामने आ जाए, खुल्ला कह दूंगा- मैं तुमने नहीं डरता। लेकिन जब शादी हुई। घर में पत्नी(जी) आईं। उनके साथ समय बिताने का मौका मिला। तब से मेरे दिमाग से 'मैं किसी से नहीं डरता' का भूत बहुत तेजी से उतर गया। उतरते-उतरते आज इस स्तर तक पहुंच गया है कि अगर मोहल्ले के नुक्कड़ पर खड़े होकर कोई किसी को आवाज भी देता है तो भी मैं 'डर' जाता हूं। ऐसा महसूस होता कि पत्नी(जी) पुकार रही हैं।

जानता हूं, हंस रहे होंगे आप मुझ पर कि ये कैसा पति है जो पत्नी से डरता है। ये हाल- अपवाद को छोड़ दें- एक मेरा ही नहीं दुनिया भर के सारे पतियों का है। बाहर चाहे वो कित्ते ही बड़े 'हिटलर' बने घूमते हों पर घर में 'भीगी बिल्ली' ही बने रहते हैं। पत्नी के आगे उनकी 'हिटलरशाही' कतई नहीं चल पाती। लेकिन कहने से कतराते हैं कि वो अपनी पत्नी से डरते हैं।

आमिर खान ने भी पिछले दिनों 'डर लगता है' वाली बात अपनी मर्जी से थोड़े न पत्नी के डर की वजह से बोली थी। मगर उसे क्या मालूम था, डर का रायता इत्ती फैलेगा कि संभालना मुश्किल पड़ेगा। वैसे, पत्नी की भावनाओं में आकर जो पति बह गया, फिर बचना कठिन हो जाता है। व्यक्तिगत अनुभव है इसलिए बता रहा हूं। फिर न कहिएगा कि बताया नहीं।

आजकल डर बहुत जोर मारे हुए है। जिस सेलिब्रिटी को देखो, बड़े ही बोल्ड अंदाज में कहता मिल जाता है कि 'मैं किसी से नहीं डरता'। मानो, सेलिब्रिटियों ने डर पर अपना कॉपीराइट ठोक दिया हो। अभी हाल केजरीवालजी भी यही बोले थे कि 'वो किसी से नहीं डरते'। हालांकि शाम होते-होते उनका डर छुमंतर-सा हो गया। मगर 'नहीं डरता हूं' कहकर मीडिया के बीच अपना चेहरा तो चकमा ही लिया न।

'डर के आगे जीत' के जमाने अब निपट लिए। सुखी वही है, जो डर कर रहता है। डर ही डर में पर्दे से पीछे से अपना उल्लू सीधा करता रहता है। दुनिया को ऐसा दिखाओ कि तुम बहुत डरते हो पर भीतर से निडर बने रहो। अगर सीधे रास्ते पर चलोगे तो दुनिया बेवकूफ कहेगी। समझदारी इसी में है कि टेढ़े रास्ते पर चलो। सलमान का रास्ता टेढ़ा जरूर था पर अंत में जीता वही। उसने कभी ये नहीं कहा कि 'मैं किसी से नहीं डरता'।

डर चाहे पत्नी का हो या बॉस का मन में बनाएं रखें। डर को डर से मत देने में ही तो मजा है। अगर डर न होता तो सेलिब्रिटियों को 'हम किसी से नहीं डरते' जैसा जुमला छेड़ने का मौका कहां मिलता?

जो डर गया, वो हिट हो गया। क्या समझे...।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

मुझे भी कुछ दान करना है

जब से मार्क जकरबर्ग के पिता बनने पर अपने 99 फीसद शेयर दान करने की खबर पढ़ी है, मेरा दिल भी 'कुछ' दान करने को मचल उठा है। लेकिन 'कुछ' क्या दान करूं, यह तय नहीं कर पा रहा। ऐसा नहीं है कि मेरे कने दान करने को कुछ नहीं। है बहुत कुछ पर समझ में नहीं आ पा रहा, क्या करूं?

दिमाग पर काफी देर तलक जोर डालने के बाद एक चीज ध्यान में आई है, जिसे मैं दान कर सकता हूं। मगर थोड़ी अड़चन है। वो क्या है, उस चीज को बहुत लंबे समय से मैंने इस्तेमाल नहीं किया है इसलिए मिलने में कठिनाई हो रही है। वैसे खोजने से तो सुई भी आराम से मिल सकती है। पर सबसे बड़ी बात तो खोजना है न।

मुझ जैसा आलसी व्यक्ति भीड़ में पत्नी के गुम हो जाने को जब नहीं खोज पाता फिर उस चीज को क्या खोज पाऊंगा, जिसे मेरा दिल दान करने की सोच रहा है। क्यों न उस चीज को खोजने के लिए मैं अमेरिकी खोजी एजेंसी की सहायता ही ले लूं! अपनी खोज को अमेरिकी खोजी एजेंसी के सुपुर्द कर, देश-समाज-बिरादरी में मेरा रूतबा बढ़ेगा सो अलग। अरे, जब अमेरिकी लोग पाकिस्तान में छिपे ओसामा बिन लादेन को खोजकर टपका सकते हैं, फिर मेरी चीज को खोजना तो उनके बाएं हाथ का गेम होगा।

खैर, आप लोगों की तसल्ली के लिए बता देता हूं कि मैं दान क्या करना चाहता हूं। दरअसल, मैं मेरी 'कलम' दान करना चाहता हूं। मुझ जैसा लेखक कलम के सिवाय और दान भी क्या कर सकता है। चूंकि बहुत लंबे समय से मैंने कलम का इस्तेमाल बंद कर दिया है, इसलिए उसे कहां रखकर भूल गया हूं, यह अब मुझे भी याद नहीं। जब से कलम की जगह की-बोर्ड ने ली है, तब से हाथ से लिखना न के बराबर हो गया है। आलम ये है कि अब तो कलम से अपना नाम लिखने के लिए भी जोर-आजमाइश करनी पड़ती है। आदत छूट गई है न।

पहले लेखक लोग कलम से 'क्रांति' किया करते थे, अब की-बोर्ड से कर लेते हैं। अंतर केवल इत्ता ही आया है। स्कूल जाने वाला बच्चा भी अब कलम की जगह पहले की-पैड मांगता है। ऐसे में लाजिमी है, कलम का खो जाना।

फिलहाल, खोज-बीन में- अमेरिकी खोजी ऐजेंसी के साथ- मैं भी लगा हुआ हूं। जैसे ही मिल जाती है, उसे दान कर दूंगा। फिर मेरा रूतबा भी मार्क जकरबर्ग जित्ता हो जाएगा।

दुनिया की निगाह में 'महान' बनने के लिए अगर कुछ दान करना पड़े तो कोई हर्ज नहीं। क्यों ठीक है न...।

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

ईमानदारी के प्रति नतमस्तक

तब शायद मैं 'बेवकूफ' था। मुझमें चीजों को आईने के आर-पार देखने की अक्ल ही नहीं थी। बताइए, मैं केजरीवालजी की ईमानदारी पर शक किया करता था। रात-दिन उन्हें गरियाता था। उनके साथ उनकी पार्टी का 'मजाक' उड़ता था। न जाने कित्ते ही लेख मैंने उनकी 'बुराई' में अखबारों में लिख डाले। मगर आज मुझे उन सब लिखे गए लेखों पर 'घणा अफसोस' हो रहा है। खुद को गलिया रहा हूं कि हाय! ये मैंने क्या किया।

जबकि समूचे राजनीतिक परिदृश्य में केजरीवालजी से बड़ा ईमानदार कोई है ही नहीं! चाहे तो एलईडी लाइट लेके ढूंढ सकते हैं। सिर्फ ईमानदारी के बल पर उन्होंने न केवल दिल्ली में अपनी सरकार बनाई बल्कि अपने गरीब विधायकों की सैलरी भी चौगुना करवा दी। इसे कहते हैं, पार्टी एवं अपने गरीब विधायकों के प्रति समर्पित एक कर्मठ (ईमानदार) मुख्यमंत्री।

जब से 'आप' के गरीब विधयाकों की सैलरी में चौगुना वेतन वृद्धि की खबर पढ़ी है- सच बताऊं- मेरा दिल केजरीवालजी की दया-प्रधान ईमानदारी के प्रति 'नतमस्तक' हो गया है। मुख्यमंत्री होकर अपने विधायकों के जेब खर्च एवं पापी पेट के बारे में इत्ता सिर्फ केजरीवालजी ही सोच सकते हैं। असल मायने में, अपनी पार्टी के विधायकों के 'अच्छे दिन' तो वे ही लेकर आए हैं। मोदीजी का अच्छे दिन का जुमला आखिरकार केजरीवालजी ने उनसे झटक ही लिया। बहुत-बहुत बधाई उन्हें।

कहने वाले कह रहे हैं कि केजरीवाल ने विधायकों की सैलरी चौगुना कर जनता से धोखा किया। ईमानदारी की आड़ में उन्हें ठग है। न स्वराज ला पाए, न जनलोकपाल बिल दे पाए। अरे, कुछ नहीं। लोग नादान हैं। राजनीति और ईमानदारी की समझ नहीं रखते। उन्हें पता ही नहीं हाथी के दांत की तरह ईमानदारी भी दो प्रकार की होती है। दिखाने वाली अलग, खाने वाली अलग। केजरीवालजी ने दोनों ही तरह की ईमानदारी दिखाकर अपना टेढ़ा उल्लू सीधा कर लिया। पहले ईमानदारी को दिखाया बाद में उसे ही खा लिया। क्या गलत किया? राजनीति ये सब चलता है। अगर नेता ये सब न करे तो बेचारे की भूखों मरने की नौबत आ जाए।

भला कौन मुख्यमंत्री चाहेगा कि उसके विधायक तंगहाली में जीवन बिताएं। मेट्रो-बस-ऑटो के धक्के खाएं। आखिर उनका भी परिवार है। उनकी भी भौतिक इच्छाएं हैं। ये सब ईमानदारी से नहीं केवल पैसे से ही पूरी हो सकती हैं। फिर क्या गलत किया उन्होंने- अपने विधायकों की सैलरी चौगुना कर। ध्यान रखें, राजनीति में कुर्सी मिलने के बाद जनता के हित बाद में, पहले अपने-अपनों के हित देखे जाते हैं।

देने के लिए ईमानदारी से बढ़िया दूसरी कोई गोली नहीं होती। बहलाने के लिए ईमानदारी से उम्दा कोई खिलौना नहीं होता। केजरीवालजी ने दोनों ही तरीके से इसका सद्पयोग किया। ईमानदारी के दम पर दिल्ली में सरकार बनाई। खुद मुख्यमंत्री बन बैठे। अब विधायकों की सैलरी को सीधा चौगुना कर दिया। इसे कहते हैं, हर हाथ में लड्डू देना।

आदर्श या आदर्शवाद एक सीमा तक ही भला लगता है। राजनीति, साहित्य, समाज में अगर आप सिर्फ आदर्शवाद या ईमानदारी के साथ ही जिंदगी बिताना चाहते हैं तो आप कोरे मूर्ख हैं। जमाना अब पहले जैसा नहीं रहा। आज की तारीख में सुखी वही है, जो तिकड़मबाज है। बिना तिकड़मबाजी के न रोटी मिल सकती है, न नौकरी। इस मामले में नेता बहुत समझदार होता है। वो आदर्शवाद और ईमानदारी को जनता के समक्ष अच्छे से भूनाना जानता है। जनता भी सबकुछ जानते हुए हर दफा उसके झांसे में आ जाती है। झांसे में आने के अतिरिक्त उसके कने कोई 'विकल्प' नहीं होता न।

केजरीवालजी की बुराई चाहे कित्ती भी कर लीजिए। सैलरी बढ़नी थी, बढ़ गई। दिल्ली में 'ऑड' और 'इवन' का फरमान जारी होना था, सो हो गया। करते रहिए काएं-काएं। दिल्ली सरकार मस्त है। जनता के पस्त होने की फिकर किसे है।

जब ईमानदार सरकार बनवाई है, तो उसकी ईमानदार नीतियों को झेलना तो होगा ही। हंसकर झेलें या रोकर। यह आप पर है।

सोमवार, 30 नवंबर 2015

गले मिलने के बहाने

आज के जमाने में बिना मतलब- वो भी जबरन खींचके- कोई किसी को गले नहीं लगाता। सियासत में गले लगने या लगाने के मायने कुछ और ही होते हैं। जब तलक एक नेता की दूसरे नेता के साथ 'गोटी' फिट नहीं बैठेती, कोई किसी को गले नहीं लगाता। गले वो तभी लगाएगा, जब उसके सियासी हित सामने वाले से मेल खाएंगे। आजकल तो बिना मतलब बेटा बाप को गले नहीं लगाता ये तो फिर भी सियासत ठहरी।

मगर अरविंद केजरीवाल कह रहे थे कि लालूजी ने उन्हें जबरन खींचके गले लगा लिया, जबकि उनकी गले पड़ने की कोई मंशा न थी। कोशिश तो मैंने बहुत की केजरीवालजी की बात को गले से नीचे उतारने की पर नहीं उतार पाया। भला एंवई कौन नेता पराई पार्टी के नेता के गले पड़ेगा? दुनिया जानती है, सियासत में गले पड़ना कोई हंसी-खेल नहीं होता। कभी-कभी जनता को दिखाने तो कभी अपना उल्लू सीधा करने के लिए नेता लोग एक-दूसरे को गले लगाया करते हैं। गले लगने या लगाने में से शिष्टाचार को- सियासत के मामले में- फिलहाल निकाल ही दें।

अच्छा अगर उन्होंने उनको जबरन गले लगाया ही था, तो वे तुरंत पीछा भी तो छुड़ा सकते थे। किंतु तस्वीरों में तो वे ऐसा कुछ करते नजर नहीं आते। जबकि गले लगते वक्त उनके चेहरे पर असीम खुशी दिखलाई पड़ती है। जैसे कह रहे हों- आपका हमारा ये गला-मिलन सियासत में आगे बड़े गुल खिलाएगा। बहुत संभव है, दिल्ली में बड़ा गुल खिलाके, वे अन्य जगह भी ऐसी मंशा रखते हों। सियासत में जित्ता गले मिला जाए, उत्ता कम है।

वो तो चलो नेता रहे एक-दूसरे से गले मिलकर अपना-अपना सियासी हित साध लिया। यहां तो आज तलक मुझे कभी किसी ने गले नहीं लगाया। गले लगाना तो दूर की बात ठहरी, बिना मतलब किसी ने मुझसे हाथ तक नहीं मिलाया। गले लगाने के साथ-साथ अब हाथ मिलाने के मायने भी बदल गए हैं। बंदा अब सामने वाले से हाथ तब ही मिलाता है, जब उसे दूसरे हाथ से कुछ लेना होता है। कभी रहा होगा हाथ मिलाना 'शिष्टाचार' अब तो मतलब पर निर्भर करता है। यों भी, आजकल सारे संबंध और संबंधी मतलब के ही यार हैं। बिना बात कौन किसे पूछता है।

समाज और परिवार की जाने दीजिए किंतु सियासत में बिना गले लगे या मिले आपकी गाड़ी दो कदम नहीं चल सकती। सियासत में रिश्ते-नाते मतलब के तहत ही बनते-बिगड़ते हैं। मतलब होगा तो नेता गधे को भी बाप बनाने से नहीं चूकेगा। और आप कह रहे हैं कि उन्होंने जबरन ही गले लगा लिया। अमां, छोड़िए इत्ती सियासत तो हम भी समझते हैं। वो बात अलग रही कि हम कभी किसी नेता से गले नहीं मिले पर गले मिलने का अर्थ-मतलब तो जानते-समझते ही हैं न।

बिहार में नीतीश बाबू ने लालूजी को कोई यों ही गले थोड़े न लगाया था। गले लगाने का फल उन्हें पुनः मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर हासिल हो गया। सियासत में हर गला अपनी 'महत्ता' रखता है। भले ही नाप अलग-अलग हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मतलब पड़ने पर हर नाप के गले को अपने मुताबिक ढाला जा सकता है। अपने गले को जित्ता लचीला रखेंगे, उत्ता ही मजा पाएंगे। स्पष्ट बोलूं तो सियासत की दुकानदारी चल ही गला-मिलन के दम पर रही है। जित्ते गले, उत्ती गलबहियां।

काम निकालने के लिए किसी को गले लगाना या लगना कोई खराब परंपरा नहीं। समाज और सियासत में बरसों से ये होता आया है। कुछ लोग गले अपना उल्लू सीधा करने के लिए मिलते हैं, तो कुछ पीठ में छुरा घुसेड़ने के लिए। गले न मिलें तो सारा खेल ही फेल हो जाए यहां।

खुद को इत्ता भोला बनाने की कोशिश न कीजिए। गले मिले हैं तो खुल्ला स्वीकार करें। किसी खास मकसद के तहत किसी से गले मिलने में कैसी शर्म हुजूर! 

रविवार, 29 नवंबर 2015

कहां है महंगाई...?

कैसे-कैसे लोग हैं समाज में। बताइए, महंगाई की चिंता में घुले जा रहे हैं। चौबीस घंटे बस महंगाई-महंगाई-महंगाई के बारे में ही सोचते रहते हैं। महंगाई बढ़ती है तो सवाल करते हैं कि महंगाई क्यों बढ़ी? महंगाई घटती है तो सवाल करते हैं कि महंगाई क्यों घटी? यानी, न नाक को दाएं से पकड़ चैन पाते हैं, न बाएं से।

महंगाई की मार को झेलते-झेलते इत्ता समय हो चुका है मगर फिर भी उसके प्रति चिंतित रहना, भला कहां की अकलमंदी है? अब तलक तो महंगाई हमारी आदत बन जानी चाहिए थी। चाहे कित्ता भी बढ़े-घटे हमारी सेहत पर कोई फरक नहीं पड़ना है। यों, दुनिया-समाज में दूसरी चिंताएं क्या कम हैं, जो महंगाई को भी चिंता का सबब बना लिया जाए।

मैं तो कतई इस 'फेवर' नहीं हूं कि महंगाई पर किसी प्रकार की चिंता-विंता करनी चाहिए। या महंगाई के लिए सरकारों या नेताओं को 'गरियाना' चाहिए। इत्ती-सी बात हम नहीं समझ पाते कि उम्र की तरह महंगाई का काम भी बढ़ना है। जैसे बढ़ती उम्र को घटाया नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह बढ़ती महंगाई को भी नहीं घटाया जा सकता। हां, कुछ उत्पादों पर फौरी तौर पर रिलेक्सेशन जरूर दिया जा सकता है किंतु एकदम से महंगाई को खत्म नहीं किया जा सकता। महंगाई का बढ़ना समय का शाश्वत सत्य है।

बाजारों में बढ़ती भीड़ को देखकर कभी मुझे लगा ही नहीं कि महंगाई है! लोग खरीददारी पर खरीददारी किए चले जा रहे हैं। एक-एक दुकान पर इत्ती-इत्ती भीड़ है कि पैर रखना तक मुश्किल। सड़कों पर पैदल चलना तक मुहाल है। लोग जित्ता दुकान के अंदर से खरीद रहे हैं, उत्ता ही बाहर (फड़-ठेलों) से भी। हां, खरीददारों की हैसियत जरूर अलग-अलग हो सकती है लेकिन बाजारों में भयंकर खरीददारी जारी है।

जमाना बदला है। अब आदमी की जरूरत केवल रोटी-कपड़ा-मकान नहीं रह गई है। आदमी जरूरत में अब कार, मोबाइल और मनोरंजन भी शामिल हो गया है। दाल-रोटी खरीदने वाला आम आदमी कपड़े और मोबाइल भी उसी चाव से खरीदता है। मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के बीच 'परचेसिंग सेंस' बेइंतहा बढ़ा है। पहले घरों में साईकिल रेयर मानी जाती थी, अब तो महंगी से महंगी कार तक रेयर न रही। हर दूसरे घर में फर्स्ट या सेकेंड कार मिल ही जाएगी। फिर भी रोने वाले रोते हैं कि हाय! महंगाई बहुत है। अगर महंगाई है तो बाजारों में इत्ती भीड़ क्यों हैं प्यारे?

गजब यह है कि महंगाई पर सियापा करते वक्त हम लोगों की बढ़ती सैलरी का रेशो नहीं देखते। महंगाई अगर बढ़ी है तो सैलरियों में भी तो इजाफा हुआ है। समाज में 100 रुपए किलो दाल खरीदने वाले भी हैं और 10 हजार का स्मार्टफोन खरीदने वाले भी। बाजारों में सबकुछ बिक रहा है। चाहे महंगाई हो या न हो। यहां तो ऐसे लोग भी हैं, जो 60 हजार का आईफोन एक झटके में खरीद लेते हैं। फिर बताओ प्यारे, कहां है महंगाई?

महंगाई के बढ़ने को जिसने दिल पर लिया, वो 'अवसाद' में डूबता चला गया। अमां, अवसाद में जाने की यहां और भी वजहें मौजूद हैं, केवल महंगाई को लेकर अवसाद में जाना 'स्मार्टनेस' नहीं। महंगाई है तो कम खाइए या कम में गुजारा कीजिए। क्या जरूरी है, महंगाई के लिए हर वक्त रोना ही रोया जाए?

देखो जी, महंगाई न किसी के रोने से रुकने वाली है, न किसी के सड़कों पर चीखने-चिल्लाने से। उसका काम है बढ़ना है, वो बढ़ेगी ही। सरकारें आएंगी जाएंगी किंतु महंगाई को अपनी चाल चलना है वो अनवरत चलती ही रहेगी। खामखा, सरकारों और नेताओं को महंगाई के वास्ते गरियाकर अपनी जुबान को मैला करना। जस्ट चिल्ल डूड।

मेरी मानिए, महंगाई को अपना दोस्त बना लीजिए। उसके साथ गलबहियां कीजिए। महंगाई के घटने-बढ़ने को मनोरंजन का साधन बनाइए। फिर देखिएगा महंगाई कभी चिंता का कारण नहीं बनेगी। चिंता का रास्ता चिता तक लेकर जाता है, इत्ता ध्यान रखें। महंगाई पर खाक डालिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में महंगाई के सिवा।

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

बे-पढ़े-लिखे होने के फायदे ही फायदे

मुझे पढ़े-लिखे लोगों के बीच बैठने में असहज-सा महसूस होता है। उनकी बड़ी-बड़ी ज्ञानपूर्ण बातें मेरे पल्ले नहीं पड़तीं। पढ़े-लिखे लोग हर बात, हर मुद्दे में दिमाग को बीच में ले आते हैं। वे दिमाग से ज्यादा सोचते हैं। जबकि मैं अपने दिमाग को रत्तीभर कष्ट नहीं देना चाहता। मेरी कोशिश यही रहती है कि दिमाग को जित्ता ज्यादा 'आराम' मिले, उत्ता सही। एंवई दिमाग पर 'प्रेशर' डालके क्या फायदा!

आजकल जैसा जमाना चल रहा है, उसमें दिमागवालों की जरा भी 'कद्र' नहीं। जो जित्ता बड़ा दिमागवाला, वो उत्ता बड़ा बेवकूफ। बेवकूफी के साथ जी गई जिंदगी ज्यादा 'खुशनुमा' होती है। टेंशनरहित रहती है। वो कहते भी हैं न कि बने रहोगे लुल्ल तनखाह पाओगे फुल। इसीलिए मेरी कोशिश ज्यादा से ज्यादा बेवकूफ या लुल्ल ही बने रहने की रहती है। मैं मेरे लेखन से लेकर दफ्तर तक में अक्सर अपनी लुल्लता का प्रदर्शन करता रहता हूं। बड़ा सुकून मिलता है।

ज्यादा पढ़े-लिखे होने में दिक्कतें भी ज्यादा रहती हैं। कम पढ़ा-लिखा कैसे भी, कहीं से भी अपना काम चला ही लेता है। ज्यादा कुछ नहीं तो नेता-विधायक-सभासद ही बन जाता है। राजनीति का क्षेत्र बे-पढ़े-लिखों के वास्ते सबसे मुफीद जगह है।

देखिए न, नौंवी क्लास फेल होने के बाद भी लालूजी के सुपुत्रजी डिप्टी-सीएम बन बैठे। भले ही उनकी अपेक्षित-उपेक्षित पर जुबान फिसल गई। तो क्या... ठीक-ठाक कुर्सी तो हासिल हो ही गई न। राजनीतिक जीवन में एक नेता को कुर्सी-पद-नाम के अतिरिक्त और क्या चाहिए होता है भला।

साथ ही, उन्होंने मुझ जैसे परम-फेलवीरों को यह आस भी बंधा दी कि हमारे कैरियर की सबसे अधिक संभावनाएं राजनीति में ही हैं। अब मैं खुद पर हाईस्कूल में तीन दफा फेल होने पर ज्यादा शर्म महसूस नहीं करता। फेल होना निश्चित ही सम्मान की बात है।

उनकी देखा-दाखी मैं भी अपनी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी को छोड़कर राजनीति में आने का मन बना रहा हूं। राजनीति में नाम कमाना कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं। दो-चार तगड़े-तगड़े बयान दे दो, लो गए ऑल-टाइम फेमस। बदनामी से नाम कमाना अब कोई शर्म की बात नहीं रही प्यारे।

पढ़े-लिखों की सोहबत से कहीं ज्यादा भली है बे-पढ़े-लिखों की सोहबत। कम से कम इसमें आगे बढ़ने के चांस तो हैं। डिप्टी-सीएम या नेता-मंत्री बनने का रास्ता तो खुल जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने 'अपेक्षित' को 'उपेक्षित' पढ़ा है। फर्क पड़ता है, आपके ऊंचे औहदे से। राजनीति में रहने का सबसे बड़ा सुख तो यही है। है कि नहीं...।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

अपेक्षित जुबान की उपेक्षित फिसलाहट

ऐसा नहीं है कि जुबान सिर्फ नेता की ही 'फिसलती' है, कभी-कभार आम आदमी की भी फिसल जाती है। किंतु आम आदमी की फिसली जुबान के चर्चे मीडिया या सोशल साइसट्स पर नहीं होते। हां, नेता की जुबान के फिसलने का नोटिस हर जगह से लिया जाता है। नेता की गलती न होने के बावजूद उसे 'बलि का बकरा' बना दिया जाता है। घोर अपमान।

जुबान के फिसलने में दोष जुबान का होता है लेकिन गर्दन बेचारे नेता की ही पकड़ी जाती है। यह सरासर नाइंसाफी है। नेता के बयान को इत्ती-इत्ती बार चैनलों पर चलाया जाता है कि बेचारे नेता भी शर्म के मारे पानी-पानी हो जाता होगा! मगर अपना 'दर्द' कहे किससे। यहां तो हर कोई उसकी फिसली जुबान की चोक लेने को तैयार बैठा है।

देखिए न, लालूजी के सुपुत्र के मुंह से 'अपेक्षित' की जगह 'उपेक्षित' क्या निकल गया, मीडिया से लेकर सोशल प्लेटफार्म तक 'हल्ला' मच गया। हर कोई अपने-अपने तरीके से उनकी मजाक बनाने में लग गया। ठीक है, जुबान अपेक्षित की जगह उपेक्षित पर फिसल गई। होता है, होता है। पहली बार है। शपथ लेते वक्त अक्सर जुबान यों ही फिसल जाया करती है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं कि बंदे में खोट है। बंदा जनता के इरादों पर एकदम 'अपेक्षित' (!) ही उतरेगा। अपेक्षित या उपेक्षित का किसी के नंवी या दसवीं पास-फेल होने से कोई फरक नहीं पड़ता। राजनीति में केवल कद का पऊआ चलता है। आखिर मियां इलेक्सन जीतकर आए हैं। कोई हंसी-मजाक थोड़े है।

फिर यह क्यों नहीं समझते, इत्ती भीड़ के बीच शपथ-पत्र पढ़ना कोई आसान बात थोड़े न होती है। पहली बार में तो सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। मुझे ही देख लीजिए, जब कक्षा दस में मैं पहली दफा फेल हुआ था, तब मन में बड़ी झिझक टाइप होती थी, कि लोग क्या कहेंगे? मोहल्ले वालों के बीच कैसे छवि बन जाएगी। लेकिन बाद में जब दो-तीन बार लगातार फेल होता चला गया फिर न मन में झिझक रही न लोगों के कहने का डर। मुझे तो आज भी कक्षा दस में तीन दफा फेल होने पर 'गर्व' टाइप फील होता है।

मैं पुनः कह रहा हूं, उनकी अपेक्षित की जगह उपेक्षित पर बस जुबान ही फिसली थी। बाकी सब ठीक-ठाक है। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी वो उपेक्षित (आईमीन- अपेक्षित) तरीके से संभाल पाएंगे। देखते रहिएगा...। लालूजी के सुपुत्र हैं आखिर।

वैज्ञानिक लोग इत्ती-इत्ती खोजें करते रहते हैं परंतु जुबान के 'न' फिसलने की दवाई अभी तलक न खोज पाए हैं। कि, बंदा कुछ कहने-बोलने से पहले एक दफा जुबान न फिसलने की गोली खा ले और फिर शालीनता के साथ बोलता रहे। ये ससुरी जुबान की फिसलाहट बहुत बड़े-बड़े टंटे करवा देती है कभी-कभी तो। झेलना बेचारे नेताओं को पड़ता है।

जुबान की फिसलाहट पर 'मेडिकली लगाम' का कसा जाना आज के समय की बड़ी मांग है।

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

आम आदमी त्रस्त, महंगाई मस्त

महंगाई के मसले पर एक दफा फिर से चोचें लड़ना शुरू हो गई हैं। नेता लोग चुनाव की खुमारी से बाहर निकलकर महंगाई पर बोलने-चिल्लाने लगे हैं। गाय-बीफ-असहिष्णुता-अवार्ड वासपी की नौटंकियों को परे रख मीडिया भी महंगाई पर 'फोसक' कर रहा है। रही बात आम आदमी की वो कल भी महंगाई से त्रस्त था, आज भी त्रस्त ही है। नेता, राजनीति और समाज के बीच उसकी भूमिका महंगाई को सिर्फ सहते रहने की है, बोलने की नहीं। अगर बोलेगा भी तो यहां कौन है उसकी सुनने वाला!

इसीलिए आम आदमी अपनी त्रस्त कंडिशन में भी हर दम मस्त रहता है। मस्त न रहे तो और क्या करे? न महंगाई को काबू करना उसके अधिकार क्षेत्र में है, न महंगाई को बढ़ना उसके बस की बात है। हां, महंगाई को लेकर दो-चार-पांच दिन आंसू बहना उसे जरूर आता है। बहाता भी है। लेकिन यहां फुर्सत किसे है, आम आदमी के आंसूओं को देखने की। नेता लोग अपनी में तो मीडिया अपनी में मस्त है। ऐसे में आम आदमी की तो रहने ही दीजिए।

सच बोलूं, अब तो महंगाई का मसला मुझे 'भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी बौराए' टाइप लगने लगा है। महंगाई को लेकर चाहे जित्ता नेताओं को गरिया लो, चाहे जित्ता व्यवस्था को कोस लो, चाहे जित्ता जमाखारों को लतिया लो पर महंगाई की सेहत पर कहीं कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आता। वो अपनी ही गति से मस्त घटती-बढ़ती रहती है। सरकारें आती हैं, जाती हैं किंतु महंगाई का मसला जस का तस बना रहता है।

दरअसल, पिछली सरकार ने आम आदमी को महंगाई की खूब प्रैक्टिस करवाई थी। महंगाई के चलते आम आदमी को हर हाल में जीना-रहना बताया था। उसे इत्ता मजबूर कर दिया था कि वो अपनी जरूरत का सामान बिन खरीदे रह ही न सके। सो, तब से लेकर अब तक आम आदमी महंगाई के भिन्न-भिन्न रूपों को अलग-अलग तरीके से झेल रहा है। महंगाई अब उसकी आदत बन चुकी है। 100 रुपए किलो दाल या 80 रुपए किलो प्याज के बिकने से उसकी सेहत पर ज्यादा कुछ असर नहीं पड़ता। पेट की आग को शांत करने के लिए, ठंडा पानी तो पीना ही पड़ेगा न। है कि नहीं...।

लोग गलत कहते हैं कि महंगाई डायन है। डायन महंगाई नहीं, डायन तो व्यवस्था है, जो इत्ता खाकर भी हर वक्त और खाने की इच्छा रखती है। बेचारी महंगाई को दोष देने से क्या हासिल? न अपने चाहे से वो बढ़ती है, न अपने चाहे से वो घटती। जैसा नेता-सत्ता-व्यवस्था उसे चलाते हैं, वो चलती है। इसीलिए तो महंगाई की चाल को मस्ती की चाल कहा जाता है।

आम आदमी की मानिंद पहले मैं भी महंगाई के मसले को लेकर खासा परेशान रहता था। हर समय सरकार और नेताओं को कोसता रहता था। मगर फर्क फिर भी किसी की सेहत पर कोई नहीं पड़ता था। सब अपनी-अपनी में मस्त रहकर जिंदगी का मजा लेते रहते थे। फिर धीरे-धीरे कर मैंने भी नेताओं और सरकारों को कोसना बंद कर दिया। अपने तरीके से बढ़ती महंगाई को एंजॉय करने लगा। यों, कुढ़ते रहने से तो बेहतर है कि महंगाई को एंजॉय ही किया जाए। खामखा अपना दिमाग और जुबान खराब करने से क्या हासिल प्यारे।

अब तो अगर महंगाई बढ़ती भी तो भी मैं किसी को नहीं गरियाता। महंगाई को मस्ती के साथ एंजॉय करता हूं। 100 रुपए किलो की दाल और 80 रुपए किलो का प्याज खरीदकर लंबी तानकर सोता हूं। जब नेताओं-सरकारों को मेरी फिकर नहीं तो भला मैं क्यों करूं? मस्त रहो। एंजॉय करो। महंगाई को अपनी चाल चलने दो, जैसे अक्सर सेंसेक्स चला करता है।

मेरी बात मानिए, महंगाई की चिंता करना छोड़ ही दीजिए। महंगाई को अपने हाल पर खुश रहने दें और हम-आप अपने हाल पर खुश रहें। इसी में समझदारी है। बाकी आपकी मर्जी।

रविवार, 15 नवंबर 2015

असहिष्णुता पर बमचक

असहिष्णुता पर 'तगड़ी बमचक' मची है। चारों तरफ से असहिष्णुता का शोर ही सुनाई दे रहा है। गली के नुक्कड़ पर खड़े लोग असहिष्णुता पर बात करते हुए मिल जाते हैं। दफ्तर में भी कोई न कोई बंदा असहिष्णुता पर बहस छेड़ ही देता है। असहिष्णुता का आलम यह हो लिया है कि मुझे अपनी परछाई भी अब असहिष्णु-सी लगने लगी है!

सड़क चलते या घर में रहते किसी से ऊंची आवाज में बोलने से भी अब डर लगता है, कहीं मैं असहिष्णु न करार दिया जाऊं। अब तो पत्नी के बनाए खाने पर भी ज्यादा ना-नुकूर नहीं करता। खाना जैसा बनकर आ जाता है, खा लेता हूं। खाना चाहे दिन में दो बार मिले या एक बार या न मिले तो भी कोई नहीं। किंतु प्रतिवाद नहीं करता। क्या भरोसा पत्नी मुझे असहिष्णु समझ ले। असहिष्णु समझ, मेरे खिलाफ कहीं राष्ट्रपति भवन तक मार्च न निकाल दे। मेरी असहिष्णुता पर अखबारों में लेख न लिख दे। इसीलिए, घर में न बहस करता हूं, न प्रतिक्रिया देता हूं। चुपचाप पत्नी की हां में हां मिलता रहता हूं। ताकि घर में सहिष्णुता कायम रह सके।

मेरे ज्यादा प्रतिवाद न करने पर पत्नी को भी लगने लगा है कि मैं 'सुधर' गया हूं। इसलिए वो अब मुझसे खुश-खुश सी रहती है। लेकिन उसे क्या बताऊं, बाहर का माहौल क्या है? विपरित विचार या असहमति को तुरंत असहिष्णुता की कैटेगिरी में रख, हंगामा काटा जा रहा है। जो सालों-साल से बिलों में दुबके बैठे थे, अब बाहर निकल आएं हैं। और, जनता को असहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे हैं। मानो, इससे पहले न समाज, न देश, न लोगों के बीच असहिष्णुता कभी रही ही न हो।

असहिष्णुता पर इत्ता हंगामा कट जाने के बाद धीरे-धीरे ये शब्द 'मनोरंजन' की पंक्ति में आता जा रहा है। लोग कथित असहिष्णुता पर 'गंभीर' कम, 'मजाकिया' अधिक लगने लगे हैं। असहिष्णुता का आलम ठीक वैसा ही है, जैसा पुरस्कार लौटाने वालों का। उन्होंने भी पुरस्कार लौटा-लौटाकर खुद को 'हंसी का पात्र' बना लिया है। तर्क ये पेश कर रहे हैं कि देश-समाज में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है इसलिए पुरस्कार लौटा रहे हैं। यानी, इससे पहले देश-समाज में सबकुछ ठीक-ठाक व सहिष्णु था। कमाल है प्यारे।

लेखकों के साथ विपक्ष भी खूब है। असहिष्णुता का वास्ता देकर इत्ता लंबा मार्च निकाल देता है। मगर इससे पहले देश में हुईं हिंसक वारदातों पर वे भी चुप्पी साधे रहे। कुछ न बोले। तब शायद, उनकी निगाह में, असहिष्णुता के मायने कुछ और ही हों।

कथित असहिष्णुता की बहती नदी में हाथ धोना बैठे-ठालों का काम है। जिसे वे पूरी शिद्दत के साथ कर रहे हैं। सत्ता और सरकार जब बदलती है, तब कुछ लोग 'हाशिए' पर चले ही जाते हैं। जो हाशिए पर चले जाते हैं, वो चर्चा या लाइम-लाइट में बने रहने के लिए कुछ तो करेंगे ही। फिर ये ही सही...।

मैंने तो खुद को टाइम के हिसाब से एडजस्ट कर लिया है। असहिष्णुता पर चल रही नौटंकियों का मजा घर बैठे ले रहा हूं। जुबान पर ताला लगाकर रखता हूं, कहीं बहक न जाएं। फिर मुझे भी कहीं असहिष्णु घोषित न कर दिया जाए। गर्म माहौल में खुद को 'कूल' रखने का ढंग आता मुझे। तब ही तो न पत्नी से झगड़ता हूं, न दफ्तर में 'इफ एंड बट' करता हूं, न ठेले वाले से मोल-भाव करता हूं; क्या पता कौन मुझे असहिष्णु समझ ले!

बेहतर ये है कि अपनी सहिष्णुता को बचाकर रखिए। असहिष्णुता पर हंमागा काटने वालों को 'टोटल इग्नोर' कीजिए। मस्त रहिए। मनोरंजन में बिजी रहिए। क्योंकि और भी गम हैं दुनिया में असहिष्णुता के सिवा।

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

बिहार में गली दाल

जिस दाल को लेकर दिल्ली समेत पूरे देश में 'हो-हल्ला' कट रहा था, आखिरकार नीतीश बाबू ने उसे बिहार में- महागठबंधन के सहारे- 'गलाकर' दिखला ही दिया। साफ शब्दों में कहूं तो बिहार में दाल गली और दिल्ली में दिवाला निकाला। जी हां, दीवाली से पहले हुआ यह 'महा-धमाका' किसी 'दिवाला निकल जाने' से कम नहीं बीजेपी के लिए।

भक्तों द्वारा बिहार की कथित जीत के वास्ते जमा करके रखे गए पटाखे सुबह तो खूब धूम-धाम से जले लेकिन दोपहर होते-होते पटाखों पर 'सील' जमने लगी और धूम-धाम 'फिकी' पड़ गई। इत्ती बड़ी हार की उम्मीद तो खूब प्रधानमंत्रीजी ने भी न की होगी। इत्ते बड़े-बड़े वायदों के अच्छे दिन दिखाने के बाद भी बदले में हार की सौगात ही मिली। करोड़ों के दिए पैकेज पर पानी फिरा सो अलग। न गाय का उन्माद काम आया, न बीफ पर राजनीति ने रंग दिखाया, न सहिष्णुता-असहिष्णुता का ड्रामा चला, न पोती गई कालिख ने ही कोई सहारा दिया। अंत में, जनता महागठबंधन को जीता कर ही मानी।

यह हकीकत स्वीकार कर ही लीजिए कि राजनीति में 'अच्छे दिन' की बहार बार-बार नहीं आती। अच्छे दिन सुनने में बहुत भाते हैं परंतु अच्छे दिन काम करने, सबको साथ लेकर चलने से ही आ पाते हैं। लेकिन यहां तो अच्छे दिनों के बहाने कुछ अलग टाइप की राजनीति हुई। ऐसे-ऐसे धांसू टाइप बयान सुनने को मिले कि बिचारी जुबान भी शर्मा गई। इन्होंने असहिष्णुता को भुनाने में पूरा आनंद लिया तो उन्होंने जातिवाद की धार को मोथरा नहीं होने दिया। और बिहार में जाति का सिक्का चल ही गया।
 
चुनावों में जो हुआ, जैसा हुआ, क्यों हुआ, कैसे हुआ जीत मिलने के बाद इस पर ध्यान भला कौन देता है। प्रमुख तो जीत ही होती है। जीत के आगे हर समीकरण फेल है। थोड़े दिनों के बाद लोग जाति, असहिष्णुता, भद्दी जुबान सबको भूल जाएंगे। भूलना ही नियति है। जो जीता वही सिकंदर है यहां।

बहरहाल, हार का ठिकरा और जीत का सेहरा चाहे किसी के सिर पर फोड़ते या बांधते रहिए। जो होना था, हुआ। बिहार में महागठबंधन की दाल गल चुकी है, अब यही सत्य है। हां, देखना अब यह होगा कि यह दाल कित्ते दिनों तलक गली रह पाती है। कित्ते लोग साथ बैठकर इस गली दाल को खा-पचा पाते हैं। सनद रहे, महागठबंधनों की दालें पहले भी गलकर सूख चुकी हैं।

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

बाजार, विज्ञापन और दीवाली

पहले जरूर दिवाली पर- विज्ञापनों से भरे हुए मोटे-मोटे अखबार- देखकर सिर चकराता था। भिन्न-भिन्न टाइप की गालियां अखबार और विज्ञापनों पर निकालती थीं। अखबार में खबर के दर्शन न हो पाने का बड़ा मलाल रहता था। हर पेज पर किस्म-किस्म के 'डिस्काउंट ऑफर्स' देखकर खून खौलता था। लेकिन धीरे-धीरे खुद को मैंने वक्त के साथ ढाला और अखबारों में आने वाले त्यौहारी विज्ञापनों को सहजता के साथ लेना शुरू किया। गरियाने का कोई फायदा न था। सिर्फ एक अकेले मेरे गरिया देने भर से न अखबार विज्ञापनों को छापना बंद कर देंगे, न विज्ञापन एजेंसियां अखबारों में विज्ञापन देना। बेहतर रास्ता यही है कि खुद को इनके बीच 'एडजस्ट' किया जाए। एडजस्ट करने में ही 'परम सुख' है।

त्यौहार का मतलब अब वो नहीं रहा, जो पहले कभी किसी जमाने में हुआ करता था। पहले लोगों कने खूब टाइम था, एक-दूसरे से मिलने का, एक-दूसरे के घर जाने का, अपनी छोटी से छोटी खुशी एक-दूसरे के साथ बांटने का। अब किसी के पास इत्ता समय भी नहीं कि वो त्यौहार के असली महत्त्व को अपने बच्चों को समझा सके। सब अपनी-अपनी धुन में मस्त और व्यस्त हैं। ऐसे लोगों के लिए बाजार ने बीच का 'इजी' रास्ता ढूंढ़ निकाला, डील के साथ त्यौहार मनाने का।

प्रत्येक रिश्ते के साथ-साथ अब हर त्यौहार भी ऑन-लाइन है। किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं। घर बैठे ही खरीददारी करें। घर बैठे ही अपनों को विश करें। रिश्तों को मजबूत करने के लिए ऑन-लाइन गिफ्ट बुक करवाकर उन्हें खुश करें। बाजार के पास आपकी हर इच्छा का समाधान है। त्यौहार को कैसे किस प्रकार के डिस्काउंटों के साथ मना सकते हैं, बाजार सब जानता-बताता है।

सुनने में आया है कि इस दीवाली मिठाई से कहीं ज्यादा मोबाइल फोन और कारें बिकी हैं। सेहत को ध्यान में रखते हुए 'पारंपरिक मिठाई' से इतर तमाम ऑप्शन बाजार ने उपलब्ध करवा दिए हैं। कुछ मीठा हो जाए के लिए अब मिठाई का होना ही जरूरी नहीं, ये काम चॉकलेट भी बखूबी कर सकती है। दीवाली की खुशियां चॉकलेट के संग।

गजब तो ये है कि बाजार में चाहे कित्ता भी महंगा मोबाइल फोन आ जाए, उसके खरीददार आपको हर वर्ग के मिलेंगे। वो त्यौहार की क्या जो नए मोबाइल फोन के साथ सेलिब्रेट न किया जाए। यों भी, दीवाली पर नया फोन लेना अब 'शगुन' का हिस्सा-सा बनता जा रहा है। लगभग यही स्थिति कारों में भी है। अब तो लगभग हर घर में कार है। बाजार के असर ने लोगों को कार की आदत-सी डाल दी है। त्यौहार पर कार पर मिले ऑफर्स सोने पे सुहागा।

आजकल के जमाने में समझदारी बाजार के साथ चलने में ही है। बाजार से इतर चलेंगे तो न रिश्तों का मजा ले पाएंगे, न त्यौहार का। त्यौहार के बहाने अब कमाई ही महत्त्वपूर्ण है, चाहे वो अखबार हो या विज्ञापन एजेंसियां। बाजार को कोसने से बेहतर है, उसके संग-साथ चलें। बाजार जो दे रहा है, पूरी खुशी और विश के साथ लें। क्योंकि आना वाला समय केवल बाजार और ऑफर्स का ही है।

इसीलिए तो मैंने खुद को अखबार और विज्ञापन के साथ एडजस्ट कर लिया। मनोरंजन के लिए खबरों से इतर भी तो कुछ होना चाहिए न अखबारों में। फिर किस्म-किस्म के विज्ञापन क्या बुरे हैं। विज्ञापन भी मनोरंजन का दूसरा नाम ही तो है।

दीवाली की खुशियां-मस्तियां अपनों के साथ बाजार और ऑफर्स के साथ मनाएं, सुकून मिलेगा। तब ही तो बाजार ने इसे 'डील वाली दिवाली' नाम दिया है।

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

दाल न गल पाने का अफसोस

बहुत दिनों से मैं दाल गलाने की कोशिश में हूं। लेकिन दाल है कि गलके ही नहीं दे रही। जित्ता गलाने का प्रयास करता हूं, दाल उत्ती ही सख्त होती जाती है। जबकि मेरे मोहल्ले में मेरे अलावा सबकी दाल अच्छे से गल रही है। बाकायदा मोहल्ले वालों के घरों से दाल गलने की जोर-जोर से आवाजें आती हैं। दाल गलने पर इत्ता खुश पहले कभी मैंने उन्हें नहीं देखा।

दो रोज पहले पड़ोसी प्यारेलाल मिले। मैंने उनसे उनकी दाल गलने का राज पूछा तो बोले- 'बेशक महंगी दाल को गलाने में 'मेहनत' लगती है पर मेरी घरवाली कैसे न कैसे करके गला ही लेती है। दाल का पीछा वो तब तलक नहीं छोड़ती, जब तलक दाल पूरी तरह से गल नहीं जाती। एक दाल ही नहीं, वो तो हम सबको भी बहुत अच्छे से गलाना जानती है। प्रत्यक्ष उदाहरण आपके सामने है।'

बहुत देर तक प्यारेलाल की घरवाली के दाल गलाने के बारे में सोचता रहा। फिर घर पहुंचकर पत्नी को बोला- 'प्रिय, अभी प्यारेलाल मिले थे। बता रहे थे कि उनकी घरवाली इत्ती महंगी दाल को भी जमकर गला लेती है। पर तुमसे क्यों नहीं गलती? आखिर कहां कमी रह जाती है?'

मेरी बात सुन लेने के बाद पत्नी ने उत्तर दिया- 'तुममें और उनमें 'नाम' का नहीं, 'स्टेटस' का भी बड़ा 'फर्क' है।' 'नाम का तो समझ में आता है मगर स्टेटस का दाल के गलने न गलने से क्या मतलब।' मैंने तुरंत पूछा।

वो बोली- 'फर्क बहुत बड़ा फर्क पड़ता है। ये 200 रुपए किलो वाली दाल केवल स्टेटस वालों की ही गल रही है। तुम्हारे जैसे मामूली लेखकों की नहीं। पुरस्कार की तरह दाल भी अब तुम लेखकों के पास आने से डरने लगी है, क्या भरोसा कब लौटा दो! तुम दाल खरीद जरूर रहे हो, गल वो फिर भी नहीं पा रही क्योंकि तुम लेखक हो और मैं लेखक की पत्नी। दाल को सब मालूम रहता है कि उसे किस स्टेटस की बंदी गला रही है, किस स्टेटस की नहीं।'

पत्नी का जवाब सुनकर मैं 'हैरत' में पड़ गया। मैंने तो दाल के न गल पाने का कारण कुछ और ही समझ रखा था, लेकिन पत्नी ने तो कुछ और ही समझाया। क्या लेखक होना इत्ता बुरा है? फिर दो मिनट बाद मैंने अपने लेखक होने पर लानत भेजते हुए खुद से ही कहा- भला ऐसा लेखक होने से भी क्या फायदा जिसकी दाल ही न गल पाए।

कुछ देर सोचने के बाद मैंने तय किया, अब मैं अपना स्टेटस ही बदल डालूंगा। अपना स्टेटस वो वाला कर लूंगा, जिसमें रहकर महंगी से महंगी दाल घरवाली खूब अच्छे से गला पाए। फिर न दाल को शिकायत रहेगी, न घरवाली को।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बीवी और पुरस्कार

बीवी मुझसे नाराज होने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देती। कभी-कभी तो बेमतलब और बेमकसद ही मुझ पर नाराज होकर अपनी 'अंदरूनी भड़ास' निकाल लेती है। अच्छा, मैं भी उसकी नाराजगी पर ज्यादा कुछ नहीं बोलता। सिवाय, हां-हूं करके रह जाता हूं। अपनी बचाए रखने का एक ये ही मेरे तईं बीच का रास्ता है। समंदर में रहकर भला मगर से बैर!

फिलहाल, बीवी को मुझसे नाराज होने का एक और ताजा बहाना मिल गया है। वो मुझ पर इस बात को लेकर कुपित है कि मैंने लेखन के मैदान में रहते हुए अभी तलक कोई पुरस्कार-सम्मान क्यों हासिल नहीं किया? अभी परसों ही कहने लगी- 'देखा तुमने, हर लेखक अपना-अपना पुरस्कार लौटाने की भेड़चाल में लगा हुआ है। जमकर मीडिया के बीच फुटेज पा रहा है। हर अखबार के पहले पेज पर लेखक और पुरस्कार के ही चर्चे हैं। और एक तुम हो, जो बंद कमरे में बैठे-बैठे कागज पर कागज 'बर्बाद' किए जा रहे हो। लेखक जरूर हो पर तुम्हें न घर में कोई जाने है, न बाहर।'

बीवी के कहे का ज्यादा 'प्रतिवाद' न करके मैं केवल इत्ता ही कहा- 'रूपमती, वो सब बड़े लेखक हैं। बड़े-बड़े पुरस्कार उन्हें मिले हैं। और, सबसे बड़ी बात वे सब एकजुट होकर अन्याय व हिंसा के खिलाफ अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। मैंने भी इसके संबंध में एक लेख लिखा है। कहो तो सुनाऊं।'

इत्ता सुनते ही बीवी आग की माफिक भड़क ली। 'तुम अपना 'आदर्श' अपने कने रखो। खुद ही लिखो। खुद ही पढ़ो। अरे, ये सब बड़े-बड़े लेखकों की 'स्टंटबाजी' है। मैं सब अच्छे से जानती हूं। देश और समाज में हिंसात्मक घटनाएं कोई नई नहीं हैं। सदियों से होती चली आई हैं। तब तो किसी नामी-गिरामी लेखक ने अपना पुरस्कार नहीं लौटाया? अब ही कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा है?'

मैंने पुनः समझाने की कोशिश की- 'नहीं.. नहीं.. ऐसा कतई नहीं है। अगर वे अपना पुरस्कार लौटा रहे तो कुछ सोच-समझकर ही लौटा रहे होंगे। वो सब 'ज्ञानी' लोग हैं। बरसों से साहित्य की 'सेवा' करते चले आए हैं। नहीं तो आज के समय में इत्ता बड़ा 'रिस्क' भला कौन लेगा? वे सब साहित्य की 'मशाल' हैं।'

'मशाल हैं, ये तुमसे किनने कहा दिया?'- बीवी ने मुझसे लगभग हड़काने के लहजे में पूछा। 'अरे, कहा मुझसे किसी ने नहीं, पर मुझे मालूम है।' मैं उत्तर दिया। 'अच्छा.. अच्छा.. लगता है, तुम्हारा दिमाग घास चरने का बेहद शौकिन है। तुम इन बड़े लेखकों की राजनीति समझ ही नहीं पा रहे। ये पुरस्कार-फुरस्कार ठुकराना तो महज बहाना है, असली मकसद खुद को 'चर्च' में लाना है। सरकार बदलने के बाद उन्हें कोई पूछ नहीं रहा था न इसलिए...।'- बीवी ने एक सांस में जवाब दे डाला।

बहस को थोड़ा खिंचते हुए मैं बोला- 'तुम्हारी सोच वरिष्ठ लेखकों-साहित्यकारों के प्रति ठीक नहीं। इसे बदलो। एक तो वे इत्ता बड़ा सम्मान लौटा रहे हैं और तुम हो कि उन्हें ही कटघरे में खड़ा करे दे रही हो। आज के दौर में मिला हुआ पुरस्कार कौन लौटाता है भला? असर देखो, अब तो नेता लोग भी लेखकों की जिद का नोटिस लेने लगे हैं।'

अब तो बीवी के सब्र का बांध टूट चुका था। तपाक से उबल पड़ी- 'क्यों तुम्हें क्या इन लेखकों से उनकी 'तारीफ' करवाने की 'सुपारी' मिली हुई है? अपनी 'औकात' देख नहीं रहे, चले हो मुझे उनकी औकात समझाने। मैं तुम्हें और इन बड़े लेखकों-साहित्यकारों को खूब अच्छे से जानती हूं। ये बाहर कुछ कहते और मन में कुछ रखते हैं। अगर तुमने इनका ज्यादा 'पक्ष' लिया न तो कल से घर में तुम्हारा दाना-पीना बंद कर दूंगी। समझे। बड़े आए लेखकों की पैरवी करने वाले।'

अब मैंने चुप रहने में ही अपनी भलाई समझी। क्या पता लेखकों का पक्ष लेते-लेते मैं ही 'बे-पक्ष' हो जाऊं! दाना-पानी बंद हो गया तो कहां जाऊंगा? मुझे तो ढंग से दाल गलानी भी नहीं आती! यों भी, दाल का भाव 200 रु के पार निकल गया है। मैं लेखक जरूर हूं पर बीवी से बड़ा नहीं। इसलिए जो लौटा रहे हैं, उन्हें लौटाने दो। खुद सिर्फ 'मनोरंजन' से मतलब रखो।

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

भला क्यों लौटाऊं पुरस्कार?

लेखन में मुझे अभी तलक कोई बड़ा-छोटा पुरस्कार नहीं मिला है। हां, बचपन में एक पुरस्कार 'पतंगबाजी' में अवश्य मिला था। पुरस्कारों के नाम पर एक अकेला वही पुरस्कार मेरे कने है। लेखन में पुरस्कार लेने की न कभी जरूरत महसूस हुई, न ही किसी ने देने का वायदा किया।

पतंगबाजी में पाए पुरस्कार को लेकर अब मुझे हर वक्त डर-सा लगा रहता है। डर इसलिए रहता है- कहीं कोई घर पर न आ धमके और बोले- अपना पुरस्कार लौटाओ। हालांकि वो ऐसा कोई बड़ा या महान पुरस्कार नहीं है, फिर भी, पुरस्कार तो है ही। यों भी, पुरस्कार न छोटा होता है न बड़ा। पुरस्कार पुरस्कार होता है। और, मैं अपना यह पुरस्कार किसी कीमत पर नहीं लौटा सकता। न केवल इस पुरस्कार बल्कि पतंगबाजी में मेरी 'जान' बसती है। मैं एक बार को लिखना छोड़ सकता हूं किंतु पतंगबाजी हरगिज नहीं।

दो-चार रोज पहले पत्नी ने मुझे राय दी थी कि 'तुम्हारे पास पुरस्कारों के नाम जो अकेला पुरस्कार है उसे लौटा दो। भगवान कसम, रोतों-रात 'सेलिब्रिटी' बन जाओगे। रिश्तेदारों के लेकर मीडिया तक में तुम्हारी पूछम-पूछ बढ़ जाएगी। जैसे- अन्य बड़े लेखक लोग अपने-अपने सम्मान-पुरस्कार वासप कर रहे हैं, तुम भी कर दो। वैसे भी, इस पुरस्कार में अब रखा ही क्या है!'

पत्नी की 'लघु राय' को सुनने के बाद मैंने बेहद सहज भाषा में उससे कहा- 'देखो यार, पुरस्कार तो मैं लौटाने से रहा। चाहे इस बात पर तुम मेरा घर में हुक्का-पानी ही क्यों न बंद कर दो। इत्ती मेहनत करके तो एक अदद पुरस्कार हत्थे आया था, उसे भी एंवई लौटा दूं। अमां, पुरस्कार कोई लौटाने के लिए थोड़े न लिए जाते हैं। कि, जब मन में आया पुरस्कार ले लिया, जब दिल न ठुका लौटा दिया। न न मैं इस पुरस्कार को नहीं लौटाऊंगा। जो लौटा रहे हैं, उनकी वे जानें। मैं बे-सेलिब्रिटी बने ही ठीक हूं।'

इत्ती सुनने के बाद पत्नी खासा लाल-पीली थी मुझ पर। बोली- 'तुममें मौका देखकर चौका मारने का कोई गुण नहीं है। जैसा ठस्स तुम्हारा लेखन है, वैसे ही तुम भी। यहां तमाम लेखक-साहित्यकार लोग बहती गंगा में हाथ धोने में लगे हैं और तुम हो कि 'आदर्शवाद' का बैंड बजा रहे हो। अजी, बीत लिए दिन आदर्शवाद के; लेखन में भी और जीवन में भी। अब तो वही महान है, जो मौकापरस्त और समझौतावादी है। इत्ती जान-पहचान तो इन लेखकों को पुरस्कार मिलते वक्त न मिली होगी, जो आज लौटाते हुए मिल रही है। सलमान खान से बड़े हीरो हो लिए हैं सब के सब।'

मैंने पत्नी को पुनः समझाया। देखो डार्लिंग- 'ये सब लेखकों की महज 'स्टंटबाजी' है। सत्ता बदली है तो पेट में मरोड़े उठना लाजिमी है। दर्द कहीं न कहीं से तो बाहर आएगा ही। सो, पुरस्कार ही लौटाए दे रहे हैं। लेकिन खुलकर एक भी बंदा पुरस्कार पाने के लिए की गईं किस्म-किस्म की 'जुगाड़बाजियों' पर कोई बात न कर रहा। अगर लौटाना ही था तो लिया ही क्यों था? तरह-तरह के फासीवाद का हवाला न दीजिए, ये तो यहां किसी न किसी रूप में बरसों से मौजूद है।'

मुझे मालूम था, पत्नी अब तक पक चुकी थी, मेरी बकबास को सुनकर। इसलिए उसने बहस से कट लेना ही उचित समझा। मगर हां जाते-जाते मुझे ये 'श्राप' जरूर दे गई, भगवान करे तुम्हें कोई पुरस्कार न मिले।

वाकई, मैं चाहता भी यही हूं कि मुझे कोई पुरस्कार न मिले। पुरस्कार मिले के तमाम झंझट हैं। अगर बात लौटाने की आ जाए, तो झंझट ही झंझट। पुरस्कार एक तरह से प्रेमिका जैसे होते हैं कि छोड़ने का दिल ही नहीं करता। तब ही तो मैं अपना पतंगबाजी वाला पुरस्कार नहीं लौटा रहा। लौटाकर जरा-बहुत कमाई इज्जत का फलूदा थोड़े न बनवाना है मुझे।

एटिट्यूड में आकर जो लौटा रहे हैं, उन्हें मीडिया के बीच भाव भी अच्छे खासे मिल रहे हैं। बैठे-ठाले अगर कुछ मिल जाए, तो सोने पे सुहागा।

उम्मीद है, अब से आगे आने वाली पीढ़ी भी शायद यही मानकर चलेगी कि पुरस्कार लौटाकर ही दुनिया में 'महान' बना जा सकता है!

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

मंगल पर पानी और डिजिटल क्रांति

बधाई हो। मंगल पर पानी खोज लिया गया है। मंगल पर जीवन होने की संभावनाएं पहले ही खोज ली गई थीं। मंगल अब कित्ता 'आसान' हो गया है न हमारे लिए।

अभी मंगल पर पानी मिला है, उम्मीद है, जल्द ही डिजिटल तरंगों के संकेत भी वहां मिलने लेगें। दुनिया में जब सबकुछ इत्ता तेजी से अदल-बदल रहा है फिर भला हमारे ग्रह उन बदलवों से पीछे कैसे रह सकते हैं। ग्रहों पर जाकर खोज करने की इंसानी कोशिशें धीरे-धीरे रंग ला रही हैं।

मुझे उम्मीद है, हमारे समाज का एक वर्ग मंगल पर बसने का मन बना भी चुका होगा। ये कोई बड़ी बात भी नहीं। जब इंसान पहाड़ों का सीना चीरकर और नदी-नालों को पाटकर अपने रहने के लिए आपर्टमेंटस-डियूप्लेक्स बना सकता है, फिर भला मंगल ग्रह पर बसना कौन-सी बड़ी बात है।

इंसान के लिए अब कुछ भी 'कठिन' नहीं रह गया है। अब हम उस युग में आ पहुंचें हैं, जहां सबकुछ डिजिटल तकनीक के हिसाब से बनने व तय होने लगा है। किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं। एक टच में हर चीज आपके द्वार पर हाजिर है।

मंगल पर पानी मिलना, हमारा डिजिटल क्रांति की दशा में कदम रखना, साफ संकेत दे रहा है कि आगे आने वाला समय 'टोटली डिजिटल' ही होगा। इसीलिए मैंने तय किया है कि मैं मंगल ग्रह पर 'डिजिटल ऐस्सीरिज' की दुकान खोलूंगा। धरती पर रह-रहकर अब मैं भी उक्ता चुका हूं।

मंगल पर जाकर बसने वाले कोई सामान्य लोग तो होंगे नहीं। वहां वही जाकर बस पाएगा, जिसकी अंटी में माल होगा। बिना माल आजकल धरती पर कोई किसी को नहीं पूछता फिर वो तो मंगल ग्रह ठहरा। धरती से हजारों-लाखों किलोमीटर दूर। एक नई दुनिया। नया माहौल। नया वातावरण। नए टाइप के लोग।

हां, नए टाइप के लोगों से ध्यान है, मंगल पर हमारे पड़ोसी ज्यादातर एलियंस बिरादरी के लोग ही होंगे। मंगल पर इंसान को पाकर एलियंस बेचैन तो खासा हो उठेंगे। खामखा ही उनकी शांत और अलग दुनिया में खलल पड़ जाएगा। यह तय है कि इंसान मंगल पर भी बाज नहीं आएगा एलियंस को परेशान करने से। कोई न कोई प्रयोग उन पर कर ही डालेगा।

पर इससे मुझे क्या! इंसान चाहे एलियंस पर प्रयोग करे या किसी अन्य ग्रह पर मुझे तो मंगल पर अपनी डिजिटल दुकान चलाने से मतलब। मेरी कोशिश तो अपने बिजनेस को एलियंस के बीच भी बढ़ाने की ही रहेगी। सुना है, एलियंस लोग तकनीक के मामले में हम इंसानों से कहीं ज्यादा एडवांस होते हैं।

देखिएगा, धीरे-धीरे कर मंगल 'मिनी धरती' बन जाएगा। फिर वहां बर्गर-चाऊमीन से लेकर दारू तक की दुकानें खुल जाएंगी। दारू की दुकान तो होगी ही होगी क्योंकि जहां पानी वहां दारू। पीने वालों की अपने यहां कमी थोड़ी न है, हर गली-मोहल्ले में चार-पांच पिडक्कड़ आसानी से मिल जाते हैं। दारू के साथ-साथ नमकीन की दुकान भी कोई न कोई खोल ही लेगा।

मेरे विचार में इस प्रकार की 'प्रगतिशील खोजें' तमाम ग्रहों पर होती रहनी चाहिए। इंसान को आसानी हो जाएगी तमाम ग्रहों पर खुद का बोरिया-बिस्तरा जमाने में। यों भी, धरती पर इंसानी बोझ दिन-ब-दिन बढ़ता ही चला जा रहा है। इस बहाने घुमने-फिरने के नए-नए पर्यटन स्थल भी स्थापित होंगे। सुनने में इत्ता अच्छा-सा लगेगा कि फलां बंदा अपने रिश्तेदारों से मिलने मंगल पर गया है। कोई बृहस्पति पर, कोई शनि पर तो कोई चंद्रमा-तारों पर। दुनिया एकदम बदल जाएगी ग्रहों की। ईंट-पत्थरों की जगह हर तरफ इंसान ही इंसान नजर आएंगे।

अभी मंगल पर पानी मिला है, हो सकता है, अन्य किसी ग्रह पर तेल भी मिल जाए। खोजने के मामले में इंसान के दिमाग का जवाब नहीं। क्या धरती, क्या आकाश वो कहीं भी कुछ भी खोज सकता है। सही भी है न, इंसान जित्ता खोजेगा, उत्ता ही विस्तार पाएगा।

खोजें यों ही चलती रहें। ताकि ग्रह हमारे लिए 'किताबी तिलिस्म' न रहकर 'वास्तविकता' का ही रूप लगें।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

दाल और चिंता

देश में चल रहे इत्ते बवालों के बीच अगर हम 'महंगाई' और 'दाल' पर ध्यान दे पा रहे हैं, तो यह 'सोने पर सुहागा' जैसा ही है। क्लियर कर दूं, यहां हम से मतलब 'जनता' से है, 'नेता' से नहीं। नेता लोग तो फिलहाल बिहार चुनाव और गाय-बीफ की जंग में ही उलझे हुए हैं। उनके लिए महंगाई का बढ़ना या दाल का 200 रुपए किलो बिकना अभी उत्ती बड़ी चिंता का विषय नहीं है।

हालांकि दाल का 200 रुपए किलो बिकना चिंता का विषय तो हमारे लिए भी नहीं है। पर क्या करें, चिंता करने के वास्ते हमारे कने भी तो कुछ होना चाहिए कि नहीं! महंगाई और दाल क्या बुरी हैं। यों, चिंता करने में कुछ जाता भी नहीं। बस, दिल को तसल्ली और दिमाग को काम मिल जाता है।
पिछली सरकार में तो हम दाल से लेकर आटे तक के दर्द को झेल चुके हैं। तब तो हम इत्ती चिंता किया करते थे कि दिन के चौबीस में से साढ़े तेईस घंटे तो चिंता व्यक्त करने में ही फना हो जाया करते थे।

फिलहाल, सरकार बदल जरूर गई है पर महंगाई पर चिंता करने की हमारी आदत कतई न बदली है। अब हम महंगाई के साथ-साथ सामाजिक ताने-बाने के सहिष्णु रहने की भी चिंता करने लगे हैं। क्या करें, दाल से लेकर समाज तक की जिम्मेवारी हम पर भी तो है। बिचारे नेता-मंत्री लोग क्या-क्या देखेंगे? किस-किस की चिंता करेंगे? उन्हें अपने ही इत्ते काम रहते हैं, महंगाई और दाल की सामाजिक स्थिति क्या है, देख नहीं पाते।

सौ बातों की एक बात है प्यारे, दाल चाहे 200 रुपए किलो बिके या 500 रुपए अंततः गलानी हमें (जनता) को ही है। नेता लोगों की दाल तो खुद-ब-खुद गल जाती है। अगर न भी गले तो कौन-सा उनकी तंददुरुस्त पर खास फर्क पड़ने वाला है। लेकिन शबाश है, वो जनता जो 200 रुपए किलो की दाल को भी गला लेती है। मेरी विचार में, एक नोबेल तो उन्हें भी बनता है, जो इत्ती महंगी दाल को गलाने की क्षमता रखते हैं।

अरे आस-पड़ोस में क्या झांकना, मुझे ही देखिए लीजिए, जाने कब से प्लानिंग कर रहा हूं, 200 रुपए किलो की दाल को खरीदने की लेकिन नहीं खरीद पा रहा। कोई न कोई अड़चन ससुरी बीच में आ ही जाती है। कभी जेब में दौ सौ रुपए भी नहीं होते, जब होते हैं, तो दवा-दारू में खर्च हो लेते हैं।

ऊधर, पत्नी 200 रुपए किलो दाल के वास्ते मेरी 'हैसियत' को ही 'चुनौती' देती रहती है। कहती है, 'लेखक तो तुम इत्ते बड़े हो लेकिन हैसियत तुम्हारी दो कौड़ी की भी नहीं। मात्र 200 रुपए किलो की दाल नहीं खरीद सकते, हार क्या खाक खरीदकर पाओगे। तुमसे कहीं अच्छा तो पड़ोस का मंगू है। चाट का ठेला भले ही लगाता है पर दाल और हार खरीदने में कतई कोताही नहीं बरत्ता। मैं फिर कह रही हूं, लेखन को छोड़कर तुम भी ठेला लगाना शुरू कर दो। कम से कम चार पैसे घर में तो आएंगे। न ही दाल के लिए दूसरों का मुंह ताकना पड़ेगा।'

पत्नी का क्या है, कुछ भी बोल देती है। दाल-आटे-हार का हिसाब-किताब रखना तो मुझे ही होता है। फिर भी, कभी-कभी मुझे अपने लेखक होने पर 'अफसोस' भी होता है कि बताओ 200 रुपए किलो की दाल को खरीदने में मुझे इत्ता सोचना पड़ रहा है। अभी नेता होता तो न सोचना पड़ता, न पत्नी की सुननी पड़ती। दाल गलती सो अलग।

इत्ती महंगी दाल मुझसे तो गलने से रही। एकाध दिन की बात होती तो चल भी जाता। यह तो रोज की बात है। दाल पर चिंता व्यक्त करने के अतिरिक्त मैं कुछ नहीं कर सकता। चिंता करने से दिल को कुछ तो सुकून मिलता है। ये ही सही।

सोमवार, 12 अक्तूबर 2015

पुरस्कार लौटाओ, हिट हो जाओ

ऊपर वाले का रहम है, जो मुझे आज तक कोई पुरस्कार नहीं मिला। मिल गया होता तो आज मेरी गर्दन एहसानों तले झुकी और जबान शुक्रिया कहते-कहते घिस गई होती।

हालांकि ऐसा कोई मानेगा नहीं परंतु सत्य ये है कि पुरस्कार लेना या मिलना दोनों की स्थितियों में लेखक के लिए 'खतरे' समान होता है। जी हां, पुरस्कार किसी 'भीषण खतरे' से कम नहीं होते। पुरस्कार पाने के लिए किस-किस प्रकार की 'तिकड़में' भिड़ानी पड़ती हैं, यह सबको मालूम है। गिरी चीज को उठाने में लेखक को जित्ती कमर नहीं झुकानी पड़ती, उससे कहीं ज्यादा पुरस्कार पाने के लिए झुकानी होती है। कुछ लेखक तो इत्ता 'पुरस्कार प्रेमी' होते हैं कि पुरस्कार मिल जाने के बाद नेताओं के कदमों में यों गिर पड़ते हैं मानो उनका 'अभूतपूर्व एहसान' जतला रहे हों।

यह दीगर बात है, पुरस्कार पाने के बाद लौटाने की 'धमकी' देना सबसे 'क्रांतिकारी कदम' है। इस 'क्रांतिकारी कदम' को उठाने में किसी दल या नेता की 'सहमति' नहीं लेनी होती, बस एक लाइन बोलनी भर होती है- 'मैं फलां-फलां पुरस्कार लौटा रहा हूं।' इत्ते में ही लेखक 'हिट' हो लेता है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों-चौराहों तक पर उसके नामों के चर्चे गुंजने लगते हैं। जाने कहां-कहां से मीडिया वाले उसका साक्षात्कार लेने पहुंच जाते हैं।

मगर लेखक भी 'घणा सियाना' होता है, पुरस्कार लौटाने की बात तो कह देता है पर यह न कहता कि पुरस्कार की राशि भी साथ में लौटा रहा हूं। क्योंकि राशि को तो वो खा-पचाकर हजम कर गया होता है। कोई अपनी अंटी से थोड़े न लौटाएगा पुरस्कार की रकम! समाज और मीडिया के बीच 'हीरो' बनने का यह तरीका निराला है प्यारे।

अभी तो दो-तीन नामी लेखकों ने ही अपना पुरस्कार लौटाने की धमकी दी है, हो सकता है, कल को लल्लन चाट वाला और टिल्लन छोले वाला भी अपने-अपने पुरस्कारों को लौटाने की घोषणा कर दें। बहती गंगा में हाथ धोने में भला क्या जाता है? इस बहाने 'फेम' मिल रहा है, यह क्या कम बड़ी बात है।

चलो अच्छा ही हुआ जो मुझे कोई पुरस्कार न मिला। नहीं तो अब तलक मुझ पर भी यहां-वहां अपना पुरस्कार लौटाने का 'प्रेशर' बनाया जा रहा होता। पर हूं मैं भी बहुत 'बेशर्म', अगर पुरस्कार मिल होता तो किसी हालत न लौटाता। अमां, पुरस्कार कोई लौटाने के लिए थोड़े न लिए जाते हैं। बात करते हैं।

उम्मीद है, पुरस्कार लौटाने की यह 'नौटंकी' अभी और खींचेगी। कुछ बड़े-छोटे नाम और सामने आएंगे। यों, घर बैठे 'मुफ्त की प्रसिद्धि' भला किसे बुरी लगती है?

पर मुझे क्या...। जिन्हें लौटाना हो लौटाए, मुझे तो 'मनोरंजन' से मतलब। मुफ्त का मनोरंजन क्या बुरा है। 

पत्नी का आदेश- व्यंग्य नहीं, केवल कविता लिखो

इन दिनों मैं एक नई 'मुसीबत' में फंस गया हूं। मुसीबत क्या है, बस यों समझ लीजिए बात तलाक तक आन पहुंची है। वो तो मैं किसी तरह 'मैनेज' कर-कराके हमारा वैवाहिक जीवन बचाए हुआ हूं। नहीं तो यह तलाक कांड जाने कब का हो लेता। न न मुझे डर तलाक से कतई नहीं लगता, डर लगता है तलाक के बाद पैदा होने वाली दिक्कतों से। सबसे बड़ी दिक्कत तो खाना-पकाने की है। अब आपसे क्या शर्माना, मुझे न खाना बनाना आता है, न पकाना। एकाध दफा कोशिश की भी रोटी बेलने की पर वो बिल किसी और आकार में गई।

चलिए खैर इन सब बातों को छोड़िए। पहले यह तो जान लीजिए कि मैं किस मुसीबत में फंसा हूं और नौबत तलाक तक क्यों आ गई है।

दरअसल, पत्नी चाहती है कि मैं व्यंग्य लिखना त्यागकर केवल कविताएं ही लिखूं। उसका कहना है कि व्यंग्य मेरी 'पर्सनेलटी' को सूट नहीं करता। केवल कविता करती है। व्यंग्य में मेरा वो 'टेलेंट' बाहर निकल कर नहीं आ पाता, जो कविता लिखकर आ सकता है। व्यंग्य में 'रूमानियत' नहीं होती, जबकि कविता में रूमानियत ही रूमानियत है।

पत्नी की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि मैंने उस पर केंद्रित व्यंग्य तो तमाम लिखे हैं किंतु कविता कभी नहीं लिखी। ज्यादातर व्यंग्यों में उसकी 'खिंचाई' ही की है। अब भला ऐसी कौन पत्नी होगी, जो अपने पति द्वारा अपनी ही खिंचाई को 'बर्दाशत' कर ले! मिनट भर में उसकी खटिया खड़ी कर देगी। हालांकि ऐसा कई दफा हुआ है, जब पत्नी पर व्यंग्य लिखने की कीमत मुझे अपनी खटिया घर के बाहर डालकर चुकानी पड़ी है। हफ्ते भर के लिए खाना-पीना बंद हुआ है सो अलग। मगर मैं भी क्या करूं, मुद्दा या बात चाहे कोई हो, पत्नी का जिक्र बीच में आ ही जाता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बिन पत्नी का जिक्र किए मेरा व्यंग्य पूरा ही न होगा।

पत्नी को कई दफा समझाया कि कविता लिखना मेरे बस की बात नहीं। कविता लिखने के लिए खूबसूरत-खूबसूरत शब्द चाहिए होते हैं। कोमल टाइप भावनाओं में निरंतर चढ़ना-उतरना पड़ता है। अब मैं ठहरा साधारण-सा व्यंग्यकार। मेरे कने न इत्ते खूबसूरत शब्द हैं न इत्ती कोमल भावनाएं। दिमाग तो दिनभर व्यंग्य के ऐंगल ढूंढ़ने में ही खर्च हो लेता है। कविता और वो भी पत्नी पर कहां लिख पाऊंगा। पत्नी पर कविता लिखने का मतलब है, खोपड़ी की छत मजबूत करके रखना। अगला-पिछला सब सोच-साचकर रखना। कविता में व्यक्त जरा-सी भूल आपका कबाड़ा कर सकती है।

मगर पत्नी है कि समझना ही नहीं चाहती। उसने तो जैसे 'जिद्द' ठान ली है, मुझे व्यंग्यकार से कवि बनाने की। मेरे भीतर ऐसी कोई भी 'क्वॉलिटी' नहीं कि मैं कवि बन सकूं। शक्ल भी मैंने व्यंग्यकार जैसी पाई है, कवि जैसी नहीं। साहित्य के दूसरे कवियों की जाने दीजिए, मैं मेरे मोहल्ले के कवियों के मुकाबले भी कहीं नहीं ठहरता। फिर भला मैं कैसे कवि बन पाऊंगा?

यों हमारे बीच में किसी बात पर कभी कोई झगड़ा-सगड़ा नहीं होता बस इस व्यंग्यकार-कवि के झगड़े को छोड़कर। दिन-ब-दिन यह झगड़ा मेरी जान को मुसीबत बनता जा रहा है। पक लिया हूं यह सुन-सुनकर- 'यार, तुम कवि क्यों नहीं बन जाते।' कवि बनने का बाजार में कोई 'इंजेक्शन' भी तो नहीं आता कि ठोकूं और झट्ट से कवि बन जाऊं!

गलती दरअसल मेरी ही है। मुझे शादी से पहले ही पत्नी से पूछ लेना चाहिए था कि तुम्हें व्यंग्यकार पसंद है या कवि। तब इत्ता ध्यान ही नहीं दिया। घंटों-घंटों फोन पर प्रेमालाप तो चलता रहा मगर 'असल मुद्दे' की बात कभी नहीं की। हर बार बस यही सुनने को मिल जाता था कि 'तुम जैसे भी हो मुझे पसंद हो।' शादी बाद जब 'फोनिया प्रेम' का 'भूत' उतरा तो 'हकीकत' सामने आई। जो अब मेरी जान को 'बवाल' बनी हुई है।

मैं जानता हूं कि कवि मैं इस जन्म में तो क्या अगले जन्म में भी नहीं बन पाऊंगा, चाहे कित्ती ही 'कोशिश' कर लूं। लेकिन, क्या करूं, मुझे अब 'आर्टिफिशल कवि' बनना पड़ेगा ताकि मेरी खटिया घर में पड़ी रहे। राशन-पानी बंद न हो। एवं वैवाहिक जीवन की गाड़ी ठीक-ठाक चलती रहे। आखिर मरता क्या न करता पियारे।

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2015

डिसलाइक बोले तो 'कलेस'

पियारे मार्क जुकरबर्ग,

चाहे जैसी चल रही है पर फेसबुक पर अपनी लाइफ एकदम मस्त चल रही है। कहीं किसी से कोई झगड़ा-टंटा नहीं। कोई मुंह-जोरी नहीं। लाइक का जवाब लाइक से। कमेंट का जवाब कमेंट से। इन-बॉक्स का जवाब इन-बॉक्स में।

दरअसल, फेसबुक पर रहते इत्ते सालों में मैंने एक यही बात अच्छे से समझी-जानी है कि यहां जित्ता 'कूल' बने रहोगे, उत्ता ही मजे करोगे। बेमतलब की 'हॉटनेस' यहां किसी काम की नहीं। मेरी निगाह में फेसबुक टाइमपास और हल्ले-फुल्के जोक या वन-लाइन को शेयर करने-करवाने का जरिया है, बाकी यहां क्रांति-फ्रांति की बात, खुद को महज दिलासा दिलाने जैसा है।

बहरहाल, इन दिनों यह खबर गर्म है कि तुम फेसबुक पर 'डिसलाइक' का विकल्प भी लाने वाले हो। यानी, अब फेसबुकिया किसी भी पोस्ट या फोटू को अपनी इच्छा से डिसलाइक भी कर सकेगा। डिसलाइक का हथियार उसके हाथ में होगा, चाहे किसी पर भी चला दे।

यार जुकरबर्ग, क्या हम लोगों की शांति या सोशल दोस्ती तुमसे देखी नहीं जा रही? अमां, क्यों खाली-पीली डिसलाइक का उस्तरा हाथ में देकर विरोधियों की गर्देनों को रेतवाना चाह रहे हो? क्या तुम्हें पता नहीं कि फेसबुक पर जरा-सी बात का जरा देर में तिल का ताड़ बन जाता है। बात दीवार को फांदती-फूंदती अखबारों के पन्नों और थाना-कचहरी तक पहुंच जाती है।

यहां लोग बाग जरा-सी असहमति-आलोचना-प्रतिक्रिया तक तो सहन कर नहीं पाते, डिसलाइक को क्या खाकर हजम कर पाएंगे? फेसबुक पर केवल मीठा-मीठा गप्प करने का चल है और कड़वा-कड़वा थू करने का। यहां कमेंट से कहीं ज्यादा तरजीह लाइक को दी जाती है। जो बंदा जित्ते लाइक पा लेता है, खुद को किसी 'फेसबुकिया-बादशाह' से कम नहीं समझता। लाइक के बदले लाइक की रिश्तेदारियां-दोस्तियां निभती हैं यहां केवल।

मेरी बात का बुरा न मानना पियारे पर डिसलाइक का विकल्प आपस में सिर्फ 'कलेस' ही करवाएगा और कुछ नहीं। डिसलाइक करते ही इन-बॉक्स में आनकर तरह-तरह के सवाल पूछे जाएंगे- तूने मेरी पोस्ट या फोटू क्यों डिसलाइक की? क्या मैं इत्ता बुरा लिखता या दिखता हूं? तुम नहीं समझ रहे, यहां फेसबुकियों पर डिसलाइक का जवाब देना का अतिरिक्त भार पड़ जाएगा। जब लोग लाइक पर भी पूर्ण-संतुष्ट नहीं हो पाते फिर भला डिसलाइक पर क्या होंगे?

कहीं बंदा कमजोर दिल का निकला और ले गया डिसलाइक को अपने दिल पर फिर तो राम ही मालिक?

डिसलाइक की आड़ में कित्ते ही अपनी खुन्नस भी निकालेंगे- क्या इसका अंदाजा है तुम्हें।

जो लोग डिसलाइक के विकल्प को लेकर बहुत खुश हो रहे हैं, वो भी सुन लें, यह दांव उन पर भी उल्टा बैठ सकता है। डिसलाइक को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं आपसी कलेस का माध्यम ही मानिए। अभिव्यक्ति की आजादी के दिन हवा हुए। अब तो जमाना लाइक देने और लेने का। सोशल नेटवर्किंग पर संबंधों की गाड़ी लाइक के दम पर ही चली रही है। इसे यों ही चलते रहने दो पियारे जुकरबर्ग।

मेरी मानो तो फेसबुक पर डिसलाइक का विकल्प चढ़ाओ ही मत। लाइक के साथ अपनी लाइफ एकदम बिंदास और मस्त चल रही है। बंदे की पोस्ट या फोटू पर लाइक मार दो तो खुश हो जाता है। सेकेंड भर में कित्ती ही दुआएं दे देता है। डिसलाइक तो केवल कलेस ही करवाएगा और कुछ नहीं।

बुधवार, 7 अक्तूबर 2015

किस्म-किस्म की समस्याओं के आकार-प्रकार

यों तो देश में समस्याओं की कमी नहीं। जहां नजर डालो, वहां समस्या। कुछ समस्याएं तो ऐसी, जिनका कोई भी, कैसा भी समाधान खोज लीजिए फिर भी समस्या का दंश बना ही रहता है। हमारी राजनीति में तो इत्ती प्रकार की समस्याएं हैं, अगर हर एक का निदान करने बैठे तो सालों लग जाएंगे। तिस पर भी कोई गारंटी नहीं कि समस्या सुलझ ही जाए।

तमाम ऐरी-गैरी समस्याओं के बीच इधर दो-तीन प्रकार की समस्याओं को मैं बहुत शिद्दत से महसूस कर रहा है। ऐसी लगता है, उन समस्याओं के समाधान के बगैर हमारी जिंदगी बेगानी-सी है। मतलब, हम अब पारिवारिक रिश्तों से कहीं ज्यादा उन समस्याओं के विषय में सोचने लगे हैं।
ये समस्याएं तीन प्रकार की हैं- सेक्स समस्या, बालों के झड़ने की समस्या और चेहरे पर झुर्रियां पड़ने की समस्या।

सेक्स समस्या के बारे में तो कुछ पूछिए ही मत- सारा का सारा अखबार तरह-तरह के तेलों और कैप्सूलों के विज्ञापनों से भरा पड़ा रहता है। विज्ञापनों में छपने वाले फोटू बंदे को इत्ता 'उत्साहित' कर देते हैं कि वो फलां तेल या कैप्सूल लेने से पीछे नहीं हटता। ऐसा लगता है, इंसान की समस्त शारीरिक कमजोरी का समाधान तेल और कैप्सूल में छिपा पड़ा है। इधर कुछ सालों में सेक्स-युक्त विज्ञापनों की ऐसी बाढ़-सी आई है, मानो ये समस्या अगर न सुलझी तो भारतीय पुरुष अन्य देशों के पुरुषों से 'पिछड़' जाएंगे।

बालों के झड़ने की समस्या भी कुछ ऐसी ही है प्यारे। टीवी पर फलां-फलां शैम्पूओं के इत्ते-इत्ते विज्ञापन आते हैं, अक्सर ये 'कनफ्यूजन' हो जाता है कि कौन-सा खरीदें और कौन-सा छोड़ दें। हर शैम्पू की दूसरे शैम्पू से बात निराली। कुछ शैम्पूओं के विज्ञापन तो इत्ते 'क्रांतिकारी' टाइप के होते हैं कि लगाते ही बाल 'फेविकोल' की तरह चिपक जाएं।

कभी-कभी तो महसूस होता है कि अगर बंदे-बंदी के बाल झड़ने से न रुके तो चीन कहीं हम पर हमला न कर दे!

और हां, चेहरे पर झुर्रियों की समस्या तो हमारे तईं इत्ती बड़ी है कि देश-समाज की हर बड़ी से बड़ी समस्या उसके आगे फेल है। मजा देखिए, विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली हर क्रीम आपको झट्ट से गोरा-चिट्टा बनाने का दम भरती है। बस एक दफा फलां कंपनी की क्रीम चेहरे पर लगा लीजिए फिर झुर्रियां तो क्या झुर्रियों के बाप तक का साया आपके चेहरे पर पड़ने से रहा। गोरे लगने-दिखने की चाहत ने हमें इत्ता बेताब कर दिया है कि दिन के चौबीस में से बीस घंटे तो हम अपने रूप-सौंदर्य के विषय में सोचते-सोचते ही गंवा देते हैं।

आप भले न स्वीकारें लेकिन मुझे इंसान के चेहरे पर पड़ी झुर्रियां 'राष्ट्रीय समस्या' से भी कहीं बड़ी समस्या नजर आती है। चेहरे की झुर्रियां हटाने को हम इत्ती 'मशक्त' करते रहते हैं, इत्ती तो शायद डेंगू के खात्मे के लिए भी न की होगी।

मार्केट भी यही चाहता है कि ये समस्याएं बनी रहें ताकि उनकी दुकानदारी मस्त चलती रहे। बाकी जरूरी समस्याओं पर खाक डालिए। क्योंकि उनका मार्केट नहीं है।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

राजनीति, राजनेता और मनोरंजन

बदलते वक्त के साथ राजनीति और राजनेता दोनों का ही 'फॉरमेट' बदल गया है। न अब राजनीति पहले जैसी रही, न राजनेता।

सबसे 'दिलचस्प' बात यह हुई है कि राजनीति और राजनेता (अपवादों को छोड़ दिया जाए) में से गंभीरता गायब हास्य और मनोरंजन अधिक आ गया है। यानी, जो नेता जनता का जित्ता मनोरंजन कर पाएगा, वो ही लंबे समय तक टिका-बना रहेगा। हो सकता है, मेरी कही बात खुद नेताओं के गले न उतरे, मगर पियारे सच यही है।

राजनीति और राजनेताओं के बीच सबसे ज्यादा मनोरंजन चुनावों के वक्त ही दिखने को मिलता है। पार्टियां और नेता लोग तरह-तरह के 'करतब' कर जनता को लुभाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। कोई काला धन के नाम पर जुमले बनाता है, तो कोई जंगल राज को खत्म का डायलॉग एकदम फिम्ली अंदाज में बोलता सुनाई पड़ता है। यानी, फूल-टू मनोरंजन।

देखिए न, बिहार चुनाव के मद्देनजर पार्टियों और नेताओं में किस्म-किस्म के मनोरंजन देखने-सुनने को मिल रहे हैं। कुछ नेता लोग तो अपना टिकट कट जाने पर ही 'रो-धो' रहे हैं। रोना भी इत्ता मनोरंजनात्मक कि उन्हें देखकर बच्चा भी खिलखिलाकर हंस पड़े।

वैसे, बात है तो रोने की ही। टिकट कट जाने का मतलब है, चुनाव के साथ-साथ अपनी इज्जत का 'फलूदा' बन जाना। एक तो बिचारा नेता पार्टी के वास्ते इत्ती मेहनत करे और जब चुनाव लड़ने की बात आए तो ऐन वक्त पर उसका टिकट काट दिया जाए। अब भला नेता रोए नहीं तो और क्या करे? आखिर नेता राजनीति में आता किसलिए है, चुनाव लड़ने के लिए ही न!

जो भी हो पर हम जैसे लोगों के लिए नेता का रोना भी किसी मनोरंजन से कम नहीं। नेता रोता है तो कम से कम यह तो पता चल ही जाता है कि उसके भीतर भी रोने-धोने की संभावनाएं हैं। यों भी, नेता कौन-सा अपने लिए रोता है। टिकट कटने के लिए ही तो रोता है। टिकट का क्या है, एक पार्टी नहीं तो दूसरी पार्टी टिकट देकर उसका रोना बंद कर देगी।

चाहे रो कर हो या बयान देकर राजनीति में मनोरंजन होते रहना चाहिए। मनोरंजन नहीं होगा तो राजनीति और नेता 'बोर' लगने लगेंगे। बोरियत अवसाद की जननी है। शायद यही सोचकर हमारे नेता लोग राजनीति में गंभीरता और अवसाद को नहीं आने देना चाहते।

राजनीति और नेता के बीच मनोरंजन यों ही कायम रहे, हमें और क्या चाहिए। पारंपरिक राजनीति से पिंड छुड़ाने का मनोरंजन ही मस्त रास्ता हो सकता है।

कहने वाले चाहे कुछ भी कहते रहें मगर इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि राजनीति का मजा सिर्फ मनोरंजन के दम पर ही बना हुआ है। बिना मनोरंजन के क्या राजनीति और क्या नेता। मनोरंजन चालू आहे, बस यही दुआ है।

सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

मंगल पर पानी

मंगल ग्रह पर पानी मिलने की खबर 'जंगल में आग' की तरह मेरे मोहल्ले में फैल चुकी हैं। अपने सभी जरूरी कामों को छोड़कर हर कोई बस मंगल पर पानी होने की बहस में उलझा हुआ है। सुनने में आया है कि कुछ मोहल्ले वालों ने 'प्लान' किया है, मंगल पर जाकर पानी लाने का। दरअसल, उनकी निगाह में मंगल पर मिला पानी 'गंगाजल' से कम नहीं! मंगल के पानी से नहाकर वे अपने समस्त पापों को धो लेना चाहते हैं।

जब से मैंने मोहल्ले वालों की मंगल ग्रह पर जाकर पानी लाने की बात को सुना है, कसम से, मेरा दिल भी मंगल पर जाने को 'बेताब' है। मैं स्वयं मंगल के पानी से नहाकर अपने समस्त पापों को धो लेना चाहता हूं। हालांकि इससे पहले भी मैं कई दफा गंगा में डूबकी लगाकर अपने पापों को धो आया हूं मगर अभी भी वो सही से धुले नहीं हैं। शरीर के कुछ हिस्सों में कुछ पाप अब भी धुलने से रह गए हैं। यों भी, मैंने जिंदगी में पाप क्या कम किए हैं प्यारे!

चलो अच्छा ही हुआ, जो मंगल पर पानी की संभावना की पुष्टि हो गई। अब धरती का इंसान आराम से मंगल ग्रह पर जाकर बस सकेगा। मंगल पर जीवन की संभावना की पुष्टि वैज्ञानिक लोग पहले ही कर चुके हैं। यों भी, धरती अब रहने लायक बची भी कहां है। हवा से लेकर पानी तक सबकुछ 'अशुद्ध' हो चला है। सुनने में आया है कि आने वाले सालों में धरती पर पानी का लेबल भी काफी नीचे खिसक जाएगा। ऐसे में मंगल ग्रह पर पानी का मिलना, वहां कम से कम पानी की किल्लत के झाड़-झंझट से तो निजात दिलायगा ही।

कुछ लोग मंगल के पानी का उपयोग अपने पापों को धोने में करेंगे तो कुछ आड़े वक्त के लिए पानी को स्टोर करने में। धरती पर पानी की कमी के बाद हमारे कने एक ही ऑप्शन होगा- मंगल के पानी का सद्पयोग।

वैसे, मनुष्य के जुगाड़ू होने में कोई शक नहीं। चाहे धरती हो या पाताल या आकाश या मंगल ग्रह अपने जीने-रहने की जुगाड़ कर ही लेता है। ये जो मंगल ग्रह पर पानी की खोज हुई है न, यह केवल अपनी 'वाह-वाह' के लिए नहीं बल्कि वहां जाकर बसने की 'प्यूचर प्लानिंग' भी इसमें शामिल है। इंसान कभी भी कोई काम एंवई नहीं करता। करता तब ही है, जब उसे अपना फायदा नजर आता है।

हालांकि अभी जो पानी मंगल पर मिला है, उसमें 'नमक' की मात्रा अधिक है। पर कोई नहीं, इंसान उसे भी 'प्योरिफाई' करके अपने पीने-नहाने लायक बना ही लेगा। बहुत संभव है, आगे ऐसी तकनीक भी विकसित हो जाए कि फाबर केबल या डिजिटल विधि के सहारे पानी सीधा धरती को सप्लाई होने लगे। जब समूची दुनिया एक हथेली बराबर स्मार्टफोन में समा सकती है, तो फिर मंगल के पानी का धरती पर आना कौन-सी बड़ी बात है प्यारे। हो सकता है, पानी भी वाह्टसएप या मेसैंजर के सहारे मिलने लगे।

फिलहाल, अभी तो हम धरतीवासियों के लिए मंगल ग्रह पर पानी मिलना अजूबी और अनूठी खोज-खबर ही है। कुछ दिनों तलक हम अभी इसी खुमारी में डूबे रहेंगे। मंगल के पानी से पापों को धोना है या पीने लायक बनाना है या बिजली पैदा करती है, इसकी जोड़-जुगाड़ में व्यस्त रहेंगे। क्योंकि पानी हमारे लिए कोई छोटी-मोटी चीज नहीं। पानी हमारी जान और शान है। पानी के लिए तो गली-मोहल्लों में बड़ी-बड़ी लड़ाईयां तक हो जाती है। बिन पानी सब सून।

अभी तो फिलहाल मेरी मेरे मोहल्ले वालों के साथ मंगल ग्रह पर जाने की तैयारियां चल रही हैं। शायद मंगल का पानी ही हमारे पापों को धोकर हमें 'और पवित्र' बना दे!

बुधवार, 30 सितंबर 2015

मच्छरों से लगाव

यह तो चलो डेंगू का मच्छर रहा यों भी मुझे मच्छरों से 'खासा लगाव' है। इस दुनिया में मच्छर मुझे सबसे अधिक 'स्वतंत्र प्राणी' नजर आता है। न कहीं आने, न कहीं जाने, न किसी पर बैठने, न किसी को काटने किसी प्रकार की कोई रोक-टोक नहीं। एकदम स्वतंत्र और बिंदास।

यह कहावत- 'देखन में छोटे लागें, घाव करें गंभीर' शायद मच्छरों के लिए ही बनाई गई होगी! इसमें कोई शक नहीं मच्छर का काटा सिर्फ बिस्तर और डॉक्टर की पनाह मांगता है। अगर मच्छर डेंगू का हो तो सोने पर सुहागा। इंसान की सारी हेकड़ी मच्छर दो मिनट में निकालकर रख देता है। चाहे कोई कित्ती ही बड़ी तोप क्यों न हो मच्छर के डंक के आगे हर तोप सील जाती है।

पता नहीं क्यों लेकिन हां मुझे डरा-सहमा इंसान बहुत अच्छा लगता है। दिल को बहुत तसल्ली-सी मिलती यह देखकर कि इंसान किसी से डरता भी है। वरना तो इंसान अब न शैतान से डरता है न भगवान से। हर डर का तोड़ निकाल लिया है उसने।

इन दिनों इंसान डेंगू के मच्छर से बेहद डरा हुआ है। डर का आलम यह है कि उसने भीड़ में जाना, लोगों से मिलना, गंदगी के करीब रहना लगभग छोड़ ही दिया है। हर समय खुद को साफ-सुधरा रखने की जुगत में लगा रहता है। वो तो सब ठीक है पर डेंगू का मच्छर इंसान से भी कहीं ज्यादा चालाक और स्मार्ट है। जब जहां मौका पड़ता है, झट्ट से अपना डंक उसके शरीर में घुसेड़ ही देता है। डॉन तो एक बार को फिर भी पकड़ में आ सकता है किंतु डेंगू के मच्छर को पकड़ना आसान ही नहीं बल्कि असंभव है। एक पिद्दी भरे मच्छर से इंसान भला क्या मुकाबला कर पाएगा?

सुनने में आया है कि डेंगू के मच्छर की विल-पॉवर इत्ती मजबूत है कि उस पर किसी भी तगड़े से तगड़े कीटनाशक का कोई असर नहीं होता। अब आप समझ सकते हैं कि मच्छर जिस खून को चूसता है, वो कित्ता 'जहरीला' है। शायद इसीलिए इंसान धरती का सबसे जहरीला प्राणी बनने की ओर अग्रसर है। तब ही तो उस पर किसी की वेदना-संवेदना का कोई असर नहीं होता।

मुझे बड़ा बुरा-सा लगता है, जब लोग डेंगू के लिए बिचारे मच्छर को दोष देते हैं। इसमें बिचारे मच्छर का क्या दोष? उसे जहां अपना पेट भरने का सामान नजर आएगा, वो वहीं जाएगा न। अब इंसान को काटने से उसका पेट भरता है, तो इसमें गलत ही क्या है पियारे। इंसान से लेकर जानवर तक को अपनी सुविधानुसार अपना पेट भरने का हक है।

आपकी तो खैर नहीं जानता लेकिन जब कोई मच्छर मेरा खून चूसने का प्रयास करता है, तो मैं उसे चूसने देता हूं। इस बहाने मेरा 'गंदा खून' कम से कम बाहर तो निकल जाता है। पांच-दस बूंद खून चूस जाने से मैं भला कौन सा 'दुबला' हुआ जा रहा हूं। मच्छर का पेट भरना हमेशा मेरी प्राथमिकता में रहा है। जियो और जीने दो का सिद्धांत मुझे बेहद प्रिय है।

किसी इंसान से दोस्ती करने से बेहतर मैं मच्छर से दोस्ती करना ज्यादा उचित समझूंगा। इंसान तो फिर भी धोखा दे सकता है किंतु मच्छर कभी धोखा नहीं देगा। खासकर, मुझे तो धोखा इसलिए भी नहीं देगा क्योंकि मुझसे उसे उसका पेट भरने लायक पोषण जो मिलता है। इसी कारण मैं इंसानों से ज्यादा मच्छरों से लगाव रखता हूं।

यह मच्छर ही हैं, जिनके कारण आज मैं लिख पा रहा हूं। हर रोज सुबह जगाने के लिए मच्छरों की भून-भूनाहट मेरे तईं किसी 'वरदान' से कम नहीं होती। फिर भला मैं क्यों मच्छरों को बुरा-भला कहूं। मच्छर तो मेरे सुख-दुख के साथी हैं। 

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अब प्याज घोटाला

आह! इत्ते दिनों के बाद किसी घोटाले की खबर सुनने को मिली। वरना, तो घोटाले की खबर सुनने को कान तरस गए थे। एकदम नई सरकार। एकदम नया घोटाला। घोटाला भी ऐसा कि सुनते ही आंखों में पानी आ जाए।... प्याज घोटाला।

वाह! प्याज ने क्या किस्मत पाई है। अभी तलक तो प्याज मार्केट से लेकर किचन तक रूला रहा था, अब घोटाले में सरकार को रूलाएगा। प्याज ने हालांकि पुरानी सरकारों को भी खूब रूलाया है लेकिन इस सरकार को रोते देखने का मजा ही कुछ और है। ईमानदार सरकार। ईमानदार नेता। ईमानदार आचरण। ईमानदार बातें। कित्ती ईमानदारियों के बीच प्याज घोटाला किसी 'ईमानदार घोटाले' से कम नहीं!

सच बोलूं, मुझे बेईमानों को घोटाला करते देखना जरा भी पसंद नहीं। ईमानदार लोग जब घोटाले के रण-क्षेत्र में उतरते हैं, फिर 'मनोरंजन' दोगुना हो जाता है। हालांकि सरकार के मुख्यमंत्री से लेकर नेता लोग यह कह जरूर रहे हैं कि प्याज घोटाले से उनका कोई मतलब नहीं। यह सब विरोधियों की साजिश है, एक ईमानदार सरकार को खुलेआम बदनाम करने की। इस बाबत उन्होंने एक बड़े न्यूज चैनल के खिलाफ भारी-भरकम विज्ञापन भी छपवा दिया है। मगर इससे क्या होता है? एक दफा घोटाले की फेहरिस्त में नाम दर्ज हो गया तो फिर हो ही गया। प्याज घोटाले का यह तमगा अब ईमानदार सरकार के माथे पर चिपका ही रहना है।

बड़े कहते थे कि हम अलग तरह की राजनीति करने वाले लोग हैं। जन-आंदोलन से उपजे हैं। केवल जनता की बात करते हैं। हमारा उद्देश्य भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकना है। दरअसल, राजनीति के मैदान में खड़े होकर ऊंचे-ऊंचे जुमले बनाने में कुछ नहीं जाता है। कोई 'काला धन' पर जुमले बनाता है तो कोई 'भ्रष्टाचार' पर। जुमलों का कर्ज अंततः चुकाना जनता को ही पड़ता है। पांच साल तलक सरकार और नेता तो घोटालों में व्यस्त हो जाते हैं। बाद में सफाई चाहे जो दे लो, सेहत पर फर्क केवल जनता के ही पड़ना है।

वैसे, ईमानदार सरकार को प्याज घोटाले पर इत्ता 'बुरा' नहीं मानना चाहिए। घोटाले तो सत्ता, सरकार, राजनीति, नेता की 'बपौती' होते हैं। भला इनसे कैसा बैर? राजनीति में आएं और घोटाले का दाग न लगे, भला ऐसे भी कोई सरकार चला करती है? घोटाले सरकार और नेता को 'अमिट पहचान' दिलाते हैं।

आप हैं कि एक ही घोटाले पर इत्ता परेशान हो लिए। यहां तो इत्ती सरकारें आईं और चली गईं किस्म-किस्त के घोटालों के तमाम 'इल्जाम' लगे। नेता-मंत्री तक जेल की सैर कर आए। लेकिन मजाल है, जो किसी नेता या सरकार के माथे पर, घोटाले को, लेकर बल भी पड़े हों। वो घोटाले करते रहे। सजा-सुनवाई होती रही। जनता इत्मिनान से मनोरंजन करती रही। दो-चार दिन कोस-कास के मीडिया वाले भी चुप बैठ जाते हैं।

अब तलक हुए तमाम घोटालों के बीच प्याज घोटाला एकदम मस्त घोटाला है। ऐसा घोटाला न पहले कभी हुआ, न आगे होने की संभावना ही है। क्योंकि सरकार दाल-गेहूं-चावल से तो पंगा ले सकती है किंतु प्याज से नहीं। प्याज से पंगा लेने का मतलब है, आंसूओं के साथ रोना। जब भी प्याज के दाम बढ़े हैं, इसने बड़ी से बड़ी सरकारों को खूब रूलाया है।

कथित ईमानदार सरकार के लिए प्याज घोटाला पहला एक्सपीरियंस है। उन्हें इस पहले एक्सपीरियंस को एंज्वॉय करना चाहिए नाकि इस-उस के खिलाफ विज्ञापन छपवाना। घोटाले से सरकार या नेता की छवि 'बदनाम' नहीं बल्कि 'नामदार' बनती है। वो कहावत है न कि बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।

ईमनदार सरकार के पास यही मौका है, अपने नाम को प्याज घोटाले के बहाने चमकाने का।