बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नए साल के संकल्प

नए साल के पहले दिन लोग तरह-तरह के 'संकल्प' लेते हैं। कोई सिगरेट-शराब त्यागने का संकल्प लेता है। कोई दूसरे की बीवी पर शरारती निगाहें न डालने का संकल्प लेता है। कोई अच्छा एवं नेक इंसान बनने का संकल्प लेता है। कोई रिश्वत न मांगने और भ्रष्टाचार न फैलाने का संकल्प लेता है। कोई विवादों में न पड़ केवल रचनात्मक लेखन करने का संकल्प लेता है। कोई स्मार्टफोन की बैट्री या चर्जर बदलने का संकल्प लेता है। कोई फेसबुक, टि्वटर पर गंदी बातें न करने का संकल्प लेता है। कोई चाय की जगह ग्रीन-टी पीने का संकल्प लेता है। आदि-आदि।

मतलब, जित्ती तरह के लोग उत्ती तरह के उनके संकल्प। हालांकि- अपवादों को छोड़कर- नए साल पर लिए गए संकल्प महीने का अंत आते-आते 'धूल खाते' नजर आते हैं। क्योंकि संकल्पों को त्यागना हमारा 'पुश्तैनी अधिकार' जो है। और, संकल्प लेने में न पैसे लगते हैं न ही टैक्स देना पड़ता है। इसीलिए तो नए साल का सबको इंतजार रहता है।

अब 'देखा-देखी' कह लें या फिर 'फैशन का हिस्सा' नए साल पर मैंने भी 'मात्र तीन' संकल्प (!) ले ही लिए हैं।

मेरे संकल्प ये हैं-

संकल्प नं. वन- छिपकली एवं कॉकरोच प्रजाति से न डरूंगा।

मुझे लाइफ में सबसे अधिक डर छिपकली और कॉकरोच से ही लगता है। घर-बाहर उनके एहसास भर से मेरे 'रोंटे' खड़े हो जाते हैं। फिर न मैं सही से कुछ खा पाता हूं, न पहन पाता हूं, न लिख पाता हूं, न सो पाता हूं, न हवा-पानी को जा पाता हूं। हर वक्त यही डर दिल में बैठा रहता है कि कोई छिपकली या कॉकरोच कहीं से न निकल आए और मुझे 'नुकसान' न पहुंचा दे। इसीलिए मैं अपने कने हर समय फरस्ट-एड बॉक्स रखता हूं। इस डर की वजह से एकाध बार तो मैं 'डिप्रेशन' में भी जा चुका हूं।

लेकिन अब बहुत हुआ। डर की भी एक सीमा होती है पियारे। वो धोनी महाराज ने कित्ता उचित कहा है कि डर के आगे जीत है। इसीलिए नए साल पर मैं संकल्प लेता हूं- चाहे जित्ता ही नुकसान क्यों न हो जाए- छिपकली और कॉकरोच से नहीं डरूंगा। न उन पर 'हिट' की बौछार करूंगा, न 'लक्ष्मण-रेखा' खीचूंगा, न कहीं 'मोरपंखी' रखूंगा। अगर नजर आए तो सीधा हाथों से पकड़कर बोतल में बंद कर दूंगा। फिर पूछूंगा- बताओ, पाटनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? बात-बेबात मुझे डराते थे, अब बोतल में बंद रहकर खुद डरो।

संकल्प नं. दो- चिंताप्रधान लोगों से दूर रहूंगा।

मुझे हर वक्त की चिंता करने वालों से बड़ी 'एलर्जी' है। खास बात यह है कि वे अपनी चिंता बहुत कम दूसरे (मतलब पड़ोसी) की चिंता अधिक किया करते हैं। जित्ता बेफिकर वे अपनी निजी एवं पारिवारिक जिंदगी में कुछ न जानने के लिए रहते हैं, उससे कहीं बेकरार दूसरी की जानने में रहते हैं। दखलअंदाजी यों करते हैं मानों वे दूसरे के 'गॉडफादर' हों।

इसीलिए मैं संकल्प लेता हूं- ऐसे सियाने चिंताप्रधान लोगों से नए साल से 'उचित दूरी' बनाकर रहूंगा। न अपनी चिंता उन्हें बताऊंगा, न ही उनकी चिंता का सबब जानूंगा। अपने में ही 'मस्त' रहना, मुझे खुद की सबसे बड़ी आजादी लगती है।

तीसरा और अंतिम संकल्प- घर वापसी करूंगा।

न न चौंकिए नहीं। मैं वो (धर्म वाली) घर वापसी की बात नहीं बल्कि 'राजनीतिक' घर वापसी की बात कर रहा हूं। अमां, बहुत अरसा हो गया पन्ने रंगते-रंगते। अब थोड़ा राजनीति करके भी देख ली जाए। आखिर जनसेवा के बहाने निजसेवा करने में क्या हर्ज है! सब कर रहे हैं।

अतः मैं संकल्प लेता हूं कि मैं घर वापसी उसी पार्टी में करूंगा जिसका सिक्का आजकल सबसे अधिक मजबूत है। हो सकता है, इस बहाने मेरी लाइफ भी बन जाए, जैसे अन्य नेताओं-मंत्रियों-विधायकों की बनी है। राजनीति में जाने में हर्ज ही क्या है? लेखक भी भला राजनीति से कौन-सा अलग हैं? नेता जनता की राजनीति कर रहा है और लेखक लेखन की।

नए साल पर मैंने ये तीन संकल्प ले तो लिए हैं। अब आप भी दुआ कीजिए कि मैं लिए गए संकल्पों पर 'खरा' उतरूं। संकल्प कहीं 'फैशन' बनकर ही न रह जाएं। बाकी तो जो है सो है ही पियारे।

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