रविवार, 28 दिसंबर 2014

कंबल बनाम रजाई

ठंड में कंबल मुझे रजाई से अधिक 'सुख' देता है। कंबल में गर्मी का एहसास रजाई से 'दोगना' होता है। कंबल 'सर्वहारा' की निशानी है जबकि रजाई 'प्रगतिशीलता' की प्रतीक। कंबल का वजन रजाई के मुकाबले कम पर सहने लायक होता है। कंबल के साथ धोने-निचोड़ने की 'सुविधा' रहती है जबकि रजाई को सिर्फ 'धुना' जा सकता है, धोया नहीं। खास बात, कंबल- चाहे हल्की ठंड हो या हाड़तोड़- तापमान के अनुरूप 'मस्त मजा' देता है जबकि रजाई का ज्यादातर उपयोग हाड़तोड़ ठंड में ही किया जाता है। कंबल को तीन-चार तहों में सिमेट कर आसानी से पलंग के भीतर सरकाया जा सकता है मगर रजाई हाथी के आकार सी जगह लेती है। इसीलिए परिवारों में अब रजाई के मुकाबले कंबल की 'डिमांड' तेजी से बढ़ी है। बाजार भी अब कंबल की तरफ 'आकर्षित' हो रहा है।

किंतु व्यंग्य-लेखन में कंबल को अभी उत्ती जगह नहीं मिली पाई है, जित्ती की रजाई को। ठंड में ज्यादातर व्यंग्यकारों को रजाई की तो याद रहती है मगर कंबल को भुला देते हैं। कंबल पर व्यंग्य लिखना तो छोड़िए, अपने फेसबुक स्टेटस पर भी उसका जिक्र नहीं करते। रजाई में चिंतन, रजाई की जरूरत, सर्दी और रजाई, रजाई में मस्तियां टाइप तो लिखते रहते हैं मगर कंबल को 'उपेक्षित' रख छोड़ देते हैं। जबकि- मेरा दावा है- रजाई से कहीं ज्यादा बेहतरीन चिंतन कंबल में बैठकर किया जा सकता है। पर क्या कीजिएगा, लेखक का मन है, कब, कहां, किस पर डोल जाए!

जो हो- पर न मेरी निगाह न मेरे लेखन में- कंबल कभी 'उपेक्षित' नहीं रहा। कंबल की गर्महाट को मैंने व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में बरकरार रखा है। सच कहूं, ठंड में मेरा ज्यादातर लेखन और चिंतन कंबल की 'गुलाबी गर्माहट' में से ही निकलता है। चाहे पारा माइनस में ही क्यों न पहुंच जाए या चाहे कोहरा कित्ता ही अपनी आगोश में क्यों न ले ले पर मेरे कंबल के आगे सब 'फेल' हैं। एक दफा कंबल में घुस जाओ फिर ठंड तो क्या ठंड का बाप भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। कंबल ठंड को ऐसे 'पछाड़' लगाता है जैसे- बाजार यथास्थितिवादियों की।

रजाई चूंकि 'प्रगतिशीलता' की प्रतीक है इसीलिए ज्यादातर प्रगतिशील लोग ही उसमें बैठकर 'चिंतन' किया करते हैं। यही वजह है, जाड़ों में उनका चिंतन और लेखन ज्यादा भारी और अपच-सा हो जाता है। दरअसल, लिखते वक्त अपनी विचाराधारा के साथ-साथ रजाई का वजन भी वे अपने दिमाग पर ओढ़ लेते हैं। अब ठंड में इत्ता भारी-भरकम लेख लिखेंगे तो पियारे ऐसा कैसे चलेगा? ठंड में दिमाग, शरीर, चिंतन और लेखन जित्ता 'हल्का' रहे उत्ता ही भला।

मगर कंबल के साथ ऐसा कोई रगड़ा नहीं है। कंबल के भीतर बैठकर आराम से जित्ता चाहे उत्ता हल्का-फुलका चिंतन एवं लेखन कीजिए- मजा आएगा। कंबल किसी किस्म का न कोई बोझ देता है न लेता। इसीलिए तो रैन-बसेरों से लेकर गरीब-मजदूरों तक के घरों में कंबल ही अधिक पाए जाते हैं। सरकार भी, ठंड में, गरीबों-बेसहारों को- कैमरों के आगे- कंबल ही तो बांटती-बंटवाती है। कथित समाजसेवक भी कंबल बांटकर ही अपनी समाजसेवा के वजन को बढ़ाते हैं।

कवियों-कहानीकारों की जाने दीजिए पर व्यंग्यकारों को कंबल पर 'उचित फोकस' करना चाहिए। लिखें रजाई पर भी लिखें पर कंबल के असर को भी साथ लेकर चलें। कंबल में बैठकर रजाई की तारीफ करना, कंबल के प्रति 'सौतेला' व्यवहार सा लगता है। सोचिए, अगर कंबल न होते तो आज पूरी कायनात ही ठंड में सिमटी-सिकुड़ी बैठी होती। रजाई में गर्माहट की अपनी सीमाएं हैं पियारे।

इस कड़कड़ाती व कोहरायुक्त ठंड में मेरा व्यंग्य लेखन कंबल को ही 'समर्पित' है। यह कंबल की गर्माहट का ही असर है, जो इत्ती ठंड में भी मेरे लेखन में गर्माहट बनी हुई है। बाकी तो जो है सो है ही। क्यों पियारे...।

4 टिप्‍पणियां:

Kavita Rawat ने कहा…

रजाई और कम्बल का तुलनात्मक अध्ययन कर आपने कम्बल के साथ आज हो रही बेरुखी को बड़े ही सार्थक चिंतन के साथ प्रस्तुत किया है आपने ..
ठण्ड में रजाई और कम्बल दोनों की जरुरत है सबको .....
बहुत बढ़िया प्रस्तुति

Kamlesh Pandey ने कहा…

भाई सा! कम्बल में भी अब मुलायम मुलायम रोयें लगा कर रजाई की गरिमा देने का दौर है ये... सर्वहारा कम्बलों के दौर गए..बल्कि हलके, बहुत हलके कम्बल गर्माहट में रजाईयों को मात दे रहे हैं..इस नए प्रकार के कम्बल पर लिखा भी खूब जा रहा है. बहरहाल आपका आलेख खूब मजेदार है.. बदले में आपको अपने ब्लॉग पर कुछ व्यंग्य पढने को आमंत्रित करता हूँ. http://kamalbhai.blogspot.in/

Anshu Mali Rastogi ने कहा…

आपका बहुत-बहुत शुक्रिया कमलेशजी।

Rahul Singh ने कहा…

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