मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

खुदा बचाए वरिष्ठों की सोहबत से

मेरे मोहल्ले में एक से बढ़कर एक वरिष्ठ (प्रगतिशील) हैं। सभी की आपस में खूब यारी है। लगभग हर रोज मोहल्ले के नुक्कड़ पर वरिष्ठों (प्रगतिशील) की मीटिंग जुड़ा करती है। मीटिंग में आपस में न कोई हंसता है न मुस्कुराता। हर किसी के चेहरे पर 'गंभीरता' का गहरा भाव ही विराजमान रहता है। मानो, अभी-अभी किसी मुरदे को शमशान का रास्ता दिखाकर आए हों।

खैर, मीटिंग में 'साहित्यिक' चर्चाएं न के बराबर पर 'राजनीतिक' चर्चाएं खूब होती हैं। खासकर, वर्तमान सरकार पर। यों भी, वर्तमान सरकार और प्रधानमंत्री से उनका 'साढ़े छत्तीस' का आंकड़ा है। इसीलिए वे चर्चा में ऐसा कोई अवसर अपने हाथों से जाने नहीं देते, जब वर्तमान सरकार के काम-काज से 'असहमति' न जतलाते हों। उनकी असहमतियां भी इत्ती 'विकट' किस्म की होती हैं कि अगर सरकार सुन ले तो, कमस से, 'गश' खा जाए।

हालांकि मेरी कोशिश उनके ग्रुप से दूर ही रहने की रहती है फिर भी कभी-कभार 'समय काटने' के लिए उनके साथ हो लेता हूं। इस नाते वे भी मुझे 'आंशिक' किस्म का 'प्रगतिशील' ही समझते हैं। (बतला दूं, अभी मेरे वरिष्ठ होने में बहुत समय है।) लेकिन, इत्ता मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि वरिष्ठों की सोहबत में रहना 'हंसी-खेल' नहीं है। एक्चुली, वरिष्ठ लोग 'पकाते' बहुत हैं। हंसते बहुत कम बस मुंह ही बिगाड़े रहते हैं। न समाज, न साहित्य, न राजनीति, न परिवार, न फिल्म, न उत्सव उन्हें कुछ 'अच्छा' ही नहीं लगता। हर वक्त हर किसी में कोई न कोई 'नुक्स' निकालने बैठ जाते हैं। और, नुक्स भी ऐसे-ऐसे कि न सिर दर्द की गोली न लेना पड़े तो मेरा नाम बदल दीजिएगा!

अरे, मैं तो उनके ग्रुप में जरा-बहुत देर ही रहकर इत्ता पक जाता हूं कि घर आकर दिमाग को 'कूल' करने के वास्ते मुझे सनी लियोनी की फिल्म देखनी पड़ती है। तब कहीं जाकर दिमाग थोड़ा नॉर्मल हो पाता है।

वरिष्ठों (प्रगतिशीलों) का बस चले तो पूरी दुनिया केवल अपने दम और अपनी विचारधारा पर चलाएं। अव्वल तो ऐसा संभव नहीं लेकिन अगर कभी ऐसा हुआ तो दुनिया में दो चीजें कभी न रह पाएंगी; एक- 'हंसी' और दूसरी- 'प्रगति'। वरिष्ठों को इन्हीं दो चीजों से सबसे अधिक 'एलर्जी' रहती है। बदलाव से 'डरते' हैं इसीलिए 'यथास्थितिवाद' के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं।

इसीलिए मैं हर किसी से यही कहता हूं कि चाहे 'बदनाम' की सोहबत कर लेना किंतु 'वरिष्ठों' (प्रगतिशील) की सोहबत में कभी न पड़ना। कसम से, न केवल दिमाग बल्कि चेहरा भी 'मातमी' हो जाएगा। (चाहो तो एक दफा आजमा कर देख लो...)

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