सोमवार, 22 दिसंबर 2014

मैं और मेरा कंबल

...मगर मुझे मेरा ही कंबल सबसे प्रिय है। जी हां 'कंबल', 'रजाई' नहीं। मेरा कंबल मुझे न केवल 'सर्दी' बल्कि 'आवारार्दी' से भी बचाता है। न जाने कित्ते ही भयंकर से भयंकरतम जाड़े मैंने मेरे कंबल के साथ काट दिए। मजाल है, जो सर्दी ने मुझे एक दिन भी 'परेशान' किया हो। मुझे मेरे कंबल में बैठकर वो सुकून मिलता है, जो महंगी से महंगी और गर्म से गर्मतर रजाई नहीं दे सकती।

सच बोलूं, अपने लेखकीय और पारिवारिक जीवन में आज जो कुछ भी मैं हूं सिर्फ मेरे कंबल के कारण ही हूं। अपने जीवन की पहली कविता और पहला व्यंग्य मैंने कंबल में बैठकर ही लिखा था। जित्ते किस्म के 'आइडिए' मुझे कंबल में रहकर आते हैं, उत्ते रजाई में बैठकर नहीं। रजाई दिमाग के साथ-साथ लेखन पर भी भारी 'बोझ' डालती है। रजाई में प्रगतिशील चिंतन एवं लेखन तो आराम से किया जा सकता है किंतु सर्वहारा-लेखन कंबल में ही आकार लेता है।

कंबल जन और समाज से जुड़ने की 'स्वतंत्रता' देता है। हल्का होने के कारण न दिमाग पर अतिरिक्त बोझ डालता है न कलम पर। इसीलिए मैं न केवल अपने बल्कि प्रत्येक कंबल पर 'गर्व' करता हूं।

हम लेखकों ने कंबल के साथ कुछ कम 'अन्याय' नहीं किए हैं। सर्दियों में लेखन चाहे कंबल में बैठकर किया हो मगर जिक्र रजाई का ही आया है। न जाने कित्ते ही व्यंग्य, कथाएं, कविताएं, किस्से रजाईयों को समर्पित किए हैं। कंबल को यों 'उपेक्षित' रख छोड़ा मानो यह कोई बिरादरी से बाहर की चीज हो। जबकि जित्ती 'ताकत' कंबल की 'गर्माहट' से मिलती है, उत्ती रजाई में कहां! कंबल के प्रति लेखक-बिरादरी का 'सौतेलापन' मुझे हर पल 'अखरता' रहा है।

नेताओं और कथित समाजसेवकों ने भी कंबल का कम 'शोषण' नहीं किया है। अक्सर सर्दियों में ही उन्हें कंबल के बहाने गरीबों-मजबूरों की याद आती है। कैमरों के आगे कंबल बांट-बंटवाकर वे अपनी राजनीति और कथित समाजसेवा को चमकाते हैं। खुद चाहे घरों में रजाईयों में सोते हों मगर बाहर कंबल की तारीफ में कसीदे गढ़ते हैं। कंबल को गरीबों-बेसहारों का 'मसीहा' बताते हैं। लेकिन कंबल-उद्योग के लिए दिल से कभी कुछ करते हुए नहीं दिखते।

फिर भी, हमारे कंबलों का दिल बहुत बड़ा है। कंबलों का हमेशा एक ही उद्देश्य रहा है- गरीबों-मजबूरों-बेसहारों को सर्दियों में गर्माहट देना। इसीलिए मेरा दिल भी हमेशा कंबल के करीब रहने का ही करता है। मुझे किसी तरह की रजाई की दरकरार नहीं। मैं मेरे कंबल के साथ 'खुश' हूं। मेरा कंबल सर्दियों की जान और मेरे लेखन की पहचान है।

जय हो।