गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

जीरो महंगाई दर और आम आदमी

अजीब विडंबना है पियारे। महंगाई दर बढ़े तो मुश्किल। घटे तो मुश्किल। सब परेशान। सबसे ज्यादा परेशान, आम आदमी है, जिसे महंगाई दर का क ख ग तक नहीं मालूम। मगर परेशान है। अखबार हाथ में थामे महंगाई दर पर खबर पढ़ता रहता है। जैसा अखबार लिख देता है, उसी हिसाब से महंगाई दर पर सोचने-विचारने लग जाता है। कभी सरकार को कोसता है। कभी अमीरों को। कभी पहले और अब के जमाने को। यों भी, कहने, सोचने और कोसने पर टैक्स थोड़े है।

महंगाई दर पर खबर के हिसाब से वो अपने घर-बाहर के बजट का ग्राफ तैयार करता है। कभी बाहर की चीजों में कटौती करता है, कभी अपनी आदतों में। तब भी, महंगाई दर उसे और उसके बजट को पछाड़ ही जाती है। वो उसके जोड़-घटाने पर मन ही मन मुस्कुराती है। अब मुस्कुराने के अतिरिक्त वो कर भी क्या सकती है? दरअसल, उसे आम आदमी की बेचारगी पर मुस्कुराने पर बड़ा मजा आता है। नेताओं की तरह वो भी जानती है कि यहां का आम आदमी हमेशा ऐसे ही रोता-कलपता रहेगा। इसे कम मिले तब भी रोएगा और ज्यादा मिले तब भी। रोना-झिकना आम आदमी की फितरत जो है।

महंगाई और महंगाई दर को सबसे ज्यादा आम आदमी ही बदनाम कर रहा है। बिना कुछ जाने-समझे वो उस पर अपनी राय कायम कर देता है। सीधी-सी बात है, जब तलक महंगाई नहीं बढ़ेगी अमीरों के शुभ-लाभ में बढोत्तरी कैसे होगी? उनकी तिजोरियां कैसे वजनदार होंगी? कैसे उनका समाज और देश में 'सबसे बड़े अमीर' के रूप में रूतबा बढ़ेगा? अब महंगाई आम आदमी के लिए भले ही दुख का सबब हो, परंतु नेताओं और अमीरों को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। वे महंगाई दर के बढ़ने और घटने दोनों में सुखी और मस्त हैं।

अरे, आम आदमी को तो महंगाई दर के जीरो होने पर खुशी जतानी चाहिए। महंगाई दर का जीरो होना उसकी सफलता है। अब अगर महंगाई दर के जीरो होने पर भी महंगाई कम नहीं हो रही तो इसमें भला महंगाई दर का क्या दोष? महंगाई दर ने तो अपना काम कर ही दिया न! आम आदमी की आम आदमी जाने।  

देखिए न, आम आदमी खूब दबाकर खा-पचा रहा है फिर भी रो रहा है हाय महंगाई। अगर आम आदमी वकाई महंगाई से त्रस्त है, तो जीना क्यों नहीं छोड़ देता? न रहेगा सांप, न टूटेगी लाठी। हमें यह सच स्वीकार कर लेना चाहिए कि महंगाई हकीकत है। महंगाई का काम ही महंगा होना है। फिर उस पर इत्ता रोना-झिकना क्यों? हमें महंगाई दर को नहीं आम आदमी की मानसिकता को कोसना चाहिए। क्या नहीं...?

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