बुधवार, 17 दिसंबर 2014

क्यों न खुदकुशी ही कर ली जाए!

बैठे-ठाले, यों ही, एक विचार दिमाग में आ गया- क्यों न खुदकुशी कर ली जाए। क्या हर्ज है...? यों भी, खुदकुशी करना अब न 'पाप' रहा न 'अपराध'! हालांकि मैं मरने से बहुत डरता हूं पर बिना सजा अगर कोई अपराध करने की छूट मिल रही है, तो क्यों न करूं। दो चीजें छोड़ना मैं कभी पसंद नहीं करता- एक मुफ्त में मिल रहा माल और दूसरा- बिन सजा का अपराध। जब सरकार ही खुदकुशी को अपराध मानने के कानून को खत्म करने का मन बना चुकी है फिर मैं क्यों अपने दिल-दिमाग पर ज्यादा 'लोड' लूं या अपराध-बोध जैसा महसूस करूं। खुदकुशी करने में अगर सफल हो गया तो दुनिया से निकल लेंगे नहीं तो जिंदगी जीएंगे ही। बाद में, फिर कभी, मन बनने पर दोबारा ट्राइ मार लेंगे। अब तो 'खुली छूट' है।

खुदकुशी के मसले पर सरकार ने काफी देर से 'संज्ञान' लिया जबकि मैं तो हमेशा से ही खुदकुशी के पक्ष में रहा हूं! सच्ची...। पता है, खुदकुशी करना एक गंभीर कविता या एक हिट कहानी लिखने से कहीं ज्यादा कठिन काम है। जित्ते पापड़ बीवी को मनाने में नहीं बेलने पड़ते, उससे कहीं ज्यादा मन को खुदकुशी के लिए मनाने में बेलने पड़ते हैं। क्या पता कब-किस वजह से मन बिदक जाए और खुदकुशी की कोशिश 'सपना' ही बनकर रह जाए। इसीलिए खुदकुशी करने से पहले दिमाग से कहीं ज्यादा जरूरी है मन को मनाना। मन चंगा तो प्यारे हर-हर गंगा।

न जी न मैं खुदकुशी पर केवल बातें ही नहीं छौंक रहा- एक दफा ऐसा करने की कोशिश खुद भी कर चुका हूं। पर क्या करूं, मन ने किस्म-किस्म के डर-अपराध का रायता फैला दिया और मैं एक नेक काम को अंजाम देते-देते नाकाम रह गया।

पता है, मैं खुदकुशी क्यों करना चाहता था। मैं खुदकुशी इसलिए करना चाहता था क्योंकि दर्जा दस में मैं पांच दफा फेल हो चुका था। एक ही क्लास में- वो भी पांच दफा- फेल होने वाले बंदे की मनोस्थिति को आप समझ ही सकते हैं। जित्ता मुझे घर में सुनने को नहीं मिल करती थी, उससे कहीं ज्यादा बाहर वाले सुनाते थे। अपने बच्चों के फेल होने की फिक्र से कहीं ज्यादा चिंता मेरे फेल होने की किया करते थे। फेल होने के तुरंत बाद जब भी मुझे छत पर पतंग उड़ाते या गली में गुल्ली-डंडा खेलते हुए देख लेते थे, तुरंत पिताजी के कान भर देते थे कि आपका 'बेशर्म लड़का' फेल होने के बावजूद पतंग उड़ा रहा है और गिल्ली-डंडा खेल रहा है। उसके बाद पिताजी मेरा जो 'हाल' किया करते थे, यहां बतला पाना बेहद मुश्किल है।

इसीलिए मन बनाया था कि क्यों न खुदकुशी कर सारे झंझटों पर ही खाक डाल दी जाए। न रहेगा बांस, न बजेगी बंसुरी। मगर क्या करूं, मन ने बीच में साथ देने से मना कर दिया और खामखां मुझे अपनी खुदकुशी की कोशिश को 'कैंसल' करना पड़ा।

अब एक दफा फिर से सरकार के मार्फत खुदकुशी करने की लाइन क्लियर सी हुई है। सोच रहा हूं, इस बार पक्की ट्राई मार ही ली जाए। किंतु अभी तलक मेरे हाथ ऐसा कोई कारण नहीं आ पाया है, जिनके दम पर मैं खुदकुशी करने का मन बना सकूं। मैं एंवई, बेफालतू मुद्दे पर, खुदकुशी नहीं करना चाहता। खुशकुशी के लायक कोई 'मस्त कारण' तो हो। ताकि लोग-बाग भी मेरी खुदकुशी पर आंसू बहाने के बजाए जश्न मना सकें। सरकार के कानों तलक भी यह बात पहुंचे कि बंदे ने खुदकुशी कित्ती 'एंजॉयफुली' की है।

तो आगे से अगर किसी मजदूर, किसान या गरीब की खुदकुशी की खबर अखबार में छपी मिले तो उस पर 'अफसोस' न जतलाइएगा, बस यह मानकर 'संतोष' कर लीजिएगा कि यह तो 'सरकार का वरदान' और 'बिन दर्द का एहसास' है। फिर कोई भी खुदकुशी 'खुदकुशी' न लगकर 'खुशखबरी' जैसी ही लगेगी। संभव है, मेरी खबर भी ऐसी ही लगे!

फिलहाल, मैं अपनी खुदकुशी की वजह को तलाशने में लगा हूं।

कोई टिप्पणी नहीं: