बुधवार, 10 दिसंबर 2014

टाइम मैगजीन और मेरी पर्सनेल्टी

मेरे भीतर हर वो खूबी है, जिसके दम पर मैं टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर खिताब पा सकता हूं। मगर टाइम मैगजीन वालों की नजर अभी तलक मुझ पर क्यों नहीं पड़ी, इस पर मुझे 'आश्चर्य' है! हो सकता है, निगाह पड़ने के बावजूद, भूल गए हों। या फिर मेरी पर्सनेल्टी का वजन मैगजीन के अनुरूप फिट न बैठा हो। या फिर, क्या भरोसा, किसी ने मेरे खिलाफ चुगली-शुगली ही कर दी हो। जैसा, अभी मोदीजी के साथ हुआ। अच्छा खासा मोदीजी का नाम सलेक्ट होने के बावजूद निकाल दिया गया। संभव है, ऐसा 'अंदरूनी पॉलिटिक्स' के कारण हुआ होगा!

यहां एक-दूसरे की प्रतिष्ठा से जलने-भुनने वालों की कोई कमी थोड़े न है। हर कोई इस जुगाड़ में तैयार बैठा है कि बस उसका काम बन जाए फिर दुनिया जाए भाड़-चूल्हे में। किसी और का क्या कहूं, इस मामले में, मेरे अनुभव ही बहुत हैं। न जाने कित्ती ही दफा मुझे घोषित हुए पुरस्कारों-सम्मानों पर दाएं-बाएं के लोगों ने भांजी मार ली है। न जाने कित्ती दफा ऐसा हुआ है कि मेरे नाम का इस्तेमाल लोगों ने अपनी जुगाड़ के लिए कर लिया।

किंतु मैंने कभी किसी पॉलिटिक्स का बुरा नहीं माना। बुरा मानकर खामखां खुद का ही खून जलाने से क्या फायदा? मेरी पर्सनेल्टी ऐसी-वैसी बातों या राजनीति का बुरा मानने की है भी नहीं। अरे, कहां मैं और कहां दूसरे लोग।

पर टाइम वालों को तो मेरे नाम पर विचार अवश्य ही करना चाहिए था! मुझे पर्सन ऑफ द इयर चुनकर न केवल टाइम बल्कि मेरे देश, मेरे शहर का मान भी बढ़ता। लेखकीय बिरादरी में मेरा पौव्वा और अधिक ठसक के साथ जमता। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों के बीच अच्छी-खासी पूछा-पाछी बढ़ती सो अलग। टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर बनना कोई हंसी-ठिठोली थोड़े है। बंदे के भीतर प्रसिद्धि का माल-मसाला भी देखना पड़ता है। जोकि मेरे भीतर पहले से मौजूद है।

मोदीजी का नाम कट जाने का मतलब यह नहीं है कि कोई भारतीय पर्सन ऑफ द इयर का खिताब पा ही नहीं सकता। इसके लिए मैं हूं न। दोबारा से मैंने टाइम वालों के यहां जुगाड़ बैठाई है। मुझे पक्की उम्मीद है कि टाइम वाले मान जाएंगे। आखिर मेरी पर्सनेल्टी में कम दम थोड़े है।

जहां इत्ते बड़े-बड़े सम्मान-पुरस्कार मुझे मिल गए, एक टाइम मैगजीन का पर्सन ऑफ द इयर और सही। इस बहाने सूची में एक सम्मान और बढ़ जाएगा। है कि नहीं।

फिलहाल, प्रतीक्षा की कतार में हूं।

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